Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


दिव्य शक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गाणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकेटनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०३. कायमार्गणा में अल्पबहुत्व

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कायमार्गणा में अल्पबहुत्व

अथ कायमार्गणाधिकार:

संप्रति कायमार्गणायां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-कायाणुवादेण तसकाइय-तसकाइयपज्जत्तएसु ओघं। णवरि मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१०४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकगुणस्थानमेव शेषस्थावरकायिकेषु अस्तीति ज्ञापनार्थं सूत्रे त्रसकायिक-त्रसकायिकपर्याप्तानां ग्रहणं कृतं। अत्रापि स्वक-स्वकासंयतसम्यग्दृष्टिभ्य: मिथ्यादृष्टय: असंख्यातगुणा एव न चानंतगुणा:, तेषामानन्त्याभावात्। अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग: इति ज्ञातव्यो भवति।
अन्यत्रापि चोक्तं-‘कायानुवादेन स्थावरकायेषु गुणस्थानभेदाभावादल्पबहुत्वाभाव:। कायं प्रति उच्यते-सर्वतस्तेजस्कायिका: अल्पा:। ततो बहव: पृथिवीकायिका:। ततोऽप्कायिका:। ततो वातकायिका:। सर्वतोऽनन्तगुणा वनस्पतय:। तत्रकायिकानां पंचेन्द्रियवत्१। ज्ञातव्यं भवद्भि:।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ कायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब कायमार्गणा में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणा के अनुवाद से त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्तकों में अल्पबहुत्व ओघ के समान है। विशेषता केवल यह है कि असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१०४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका- शेष स्थावरकायिक जीवों में एक मात्र मिथ्यादृष्टि गुणस्थान होता है यह ज्ञान कराने के लिए सूत्र में त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्तक पद का ग्रहण किया गया है। यहाँ भी अपने-अपने असंयतसम्यग्दृष्टियों के प्रमाण से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणे ही हैं न कि अनंतगुणे हैं, क्योंकि उनके अनंतपने का अभाव है। यहाँ जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग गुणकार होता है, ऐसा ज्ञातव्य है।

अन्यत्र भी (सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ में) कहा है-

कायमार्गणा के अनुवाद से स्थावरकायिक जीवों में गुणस्थान के भेदोें का अभाव होने से अर्थात् उनके एक मिथ्यात्व गुणस्थान मात्र होने के कारण उनके अल्पबहुत्व नहीं पाया जाता है। काय की अपेक्षा से कहते हैं-अग्निकायिक जीव सबसे कम हैं। उससे अधिक पृथिवीकायिक जीव हैं। उनसे अधिक जलकायिक जीव हैं। उनसे अधिक वायुकायिक जीव हैं और इनसे अनंतगुणे अधिक वनस्पतिकायिक जीव होते हैं। त्रसकायिक जीवों का अल्पबहुत्व पंचेन्द्रिय जीवों के समान जानना चाहिए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अल्पबहुत्वानुगम नामक प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कायमार्गणा नामका तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।