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०३. गणधरदेव ही द्वादशांग श्रुत के कर्ता होते हैं

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गणधरदेव ही द्वादशांगश्रुत के कत्र्ता होते हैं—
अर्थकर्ता भगवान महावीर
भावतोऽर्थकर्ता निरूप्यते-ज्ञानावरणादि-निश्चय-व्यवहारापाया-तिशयजातानन्तज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य-क्षायिक-सम्यक्त्व-दान-लाभ-भोगोपभोग-निश्चय-व्यवहार-प्राप्त्यतिशयभूत-नव-केवल-लब्धि-परिणत:।
एवंविधो महावीरोऽर्थकर्ता।१
अब भाव की अपेक्षा अर्थकर्ता का निरूपण करते हैं-
ज्ञानावरणादि घातिया कर्मों के निश्चय-व्यवहाररूप विनाश कारणों की विशेषता से उत्पन्न हुए अनन्तज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य तथा क्षायिक-सम्यक्त्व, दान, लाभ, भोग और उपभोग की निश्चय-व्यवहाररूप प्राप्ति के अतिशय से प्राप्त हुई नौ केवललब्धियों से परिणत भगवान् महावीर ने भावश्रुत का उपदेश दिया। अर्थात् निश्चय और व्यवहार से अभेद-भेदरूप नौ लब्धियों से युक्त होकर भगवान् महावीर ने भावश्रुत का उपदेश दिया।
इस प्रकार भगवान् महावीर अर्थकर्ता हैं।
ग्रंथकर्ता श्रीगौतमस्वामी
तेण महावीरेण केवलणाणिणा कहिदत्थो तम्हि चेव काले तत्थेव खेत्ते खयोवसम-जणिद-चउरमल-बुद्धि-संपण्णेण बम्हणेण गोदम-गोत्तेण सयलदुस्सुहि-पारएण जीवाजीव-विसय-संदेह-विणासणट्ठमुव-गयवड्ढमाण-पाद-मूलेण इंदभूदिणावहारिदो।२
इस प्रकार केवलज्ञान से विभूषित उन भगवान् महावीर के द्वारा कहे गये अर्थ को, उसी काल में और उसी क्षेत्र में क्षयोपशमविशेष से उत्पन्न हुए चार प्रकार के निर्मल ज्ञान से युक्त, वर्ण से ब्राह्मण, गोतमगोत्री, संपूर्ण दु:श्रुति में पारंगत और जीव-अजीवविषयक संदेह को दूर करने के लिए श्री वद्र्धमान के पादमूल में उपस्थित हुए ऐसे इन्द्रभूति ने अवधारण किया।
पुणो तेणिंदभूदिणा भाव-सुद-पज्जय-परिणदेण बारहंगाणं चोद्दस-पुव्वाणं च गंथाणमेक्केण चेव मुहुत्तेण कमेण रयणा कदा। तदो भाव-सुदस्स अत्थ-पदाणं च तित्थयरो कत्ता। तित्थयरादो सुद-पज्जाएण गोदमो परिणदोे त्ति दव्व-सुदस्स गोदमो कत्ता। तत्तो गंथ-रयणा जादेत्ति।३
अनन्तर भावश्रुतरूप पर्याय से परिणत उन इन्द्रभूति ने बारह अंग और चौदह पूर्वरूप ग्रंथों की एक ही मुहूर्त में क्रम से रचना की है। अत: भावश्रुत और अर्थ-पदों के कर्ता तीर्थंकर हैं तथा तीर्थंकर के निमित्त से गौतम गणधर श्रुतपर्याय से परिणत हुए, इसलिए द्रव्यश्रुत के कर्ता गौतम गणधर हैं। इस तरह गौतम गणधर से ग्रंथ रचना हुई।
अर्थकर्ता भगवान महावीर हैं
कत्तारा दुविहा-अत्थकत्तारो गंथकत्तारो चेदि। तत्थ अत्थकत्तारो भयवं महावीरो।१
कर्ता दो प्रकार हैं-अर्थकर्ता और ग्रन्थकर्ता। उनमें अर्थकर्ता भगवान् महावीर हैं। (धवला पुस्तक-९, पृ. १०७)
गं्रंथकर्ता श्री गौतम स्वामी हैं, ऐसे श्री गौतम स्वामी की महिमा देखिए धवला ग्रंथ में-
संखित्तसद्दरयणमणंतत्थावगमहेदुभूदाणेगलिंगसंगयं बीजपदं णाम। तेसिमणेयाणं बीजपदाणं दुवालसंगप्पयाणमट्ठारस-सत्त-सयभास-कुभाससरूवाणं परूवओ अत्थकत्तारो णाम, बीजपदणिलीणत्थ-परूवयाणं दुवालसंगाणं कारओ गणहरभडारओ गंथकत्तारओ त्ति अब्भुवगमादो। बीजपदाणं वक्खाणओ त्ति वुत्तं होदि। किमट्ठं तस्स परूवणा कीरदे? गंथस्स पमाणत्तपदुप्पायणट्ठं। ण च राग-दोस-मोहोवहओ जहुत्तत्थपरूवओ, तत्थ सच्चवय—णणियमाभावादो। तम्हा तप्परूवणा कीरदे। तं जहा—पंचमहव्वयधारओ तिगुत्तिगुत्तो पंचसमिदो णट्ठट्ठमदो मुक्कसत्तभओ बीज-कोट्ठपदाणुसारि-संभिण्णसोदारत्तु-वलक्खिओ उक्कट्ठोहिणाणेण असंखेज्जलोगमेत्तकालम्मि तीदाणागद-वट्टमाणासेसपरमाणुपेरंतमुत्ति—दव्वपज्जायाणं च पच्चक्खेण जाणंतओ तत्ततवलद्धीदो णीहारविवज्जिओ दित्ततवलद्धिगुणेण सव्वकालोववासो वि संतो सरीरजुज्जोइयदसदिसो सव्वोसहिलद्धिगुणेण सव्वोसहसरूवो अणंतबलादो करंगुलियाए तिहुवणचालणक्खमो अमियासवीलद्धिबलेण अंजलिपुडणि—वदिदसयलाहारे अमियत्तणेण परिणमणक्खमो महातवगुणेण कप्परूक्खोवमो महाणसक्खीण—लद्धिबलेण सगहत्थणिवदिदाहाराण-मक्खयभावुप्पायओ अघोरतवमाहप्पेण जीवाणं मण-वयण-कायगया-सेसदुत्थियत्तणिवारओ सयलविज्जाहि सेवियपादमूलो आयासचारण-गुणेण रक्खियासेसजीवणिवहो वायाए मणेण य सयलत्थसंपादणक्खमो अणिमादिअट्ठगुणेहि जियासेसदेवणिवहो तिहुवणजणजेट्ठओ परोवदेसेण विणा अक्खराणक्खरसरूवासेस—भासंतरकुसलो समवसरणजणमेत्तरू-वधारित्तणेण अम्हम्हाणं भासाहि अम्हम्हाणं चेव कहदि त्ति सव्वेसिं पच्चउप्पायओ समवसरणजणसोदिंदिएसु सगमुहविणिग्गयाणेयभासाणं संकरेण पवेसस्स विणिवारओ गणहरदेवो गंथकत्तारो, अण्णहा गंथस्स पमाणत्तविरोहादो धम्मरसायणेण समोसरणजणपोसणाणुववत्तीदो। एत्थुववज्जंती गाहा— बुद्धि-तव-विउवणोसह-रस-बल-अक्खीण-सुस्सरत्तादी।
ओहि-मणपज्जवेहि य हवंति गणवालया सहिया।।३८।।
संपहि वड्ढमाणतित्थगंथकत्तारो वुच्चदे-
पंचेव अत्थिकाया छज्जीवणिकाया महव्वया पंच।
अट्ठ य पवयणमादा सहेउओ बंध-मोक्खो य।।३९।।
को होदि त्ति सोहम्मिंदचालणादो जादसंदेहेण पंच-पंचसयंतेवासि-सहियभादुत्तिदय—परिवुदेण माणत्थंभदंसणेणेव पणट्ठमाणेण वड्ढमाणवि-सोहिणा वड्ढमाणजिणिंददंसणे वणट्ठासंखेज्जभवज्जियगरुवकम्मेण जिणिंदस्स तिपदाहिणं करिय पंचमुट्ठीए वंदिय हियएण जिणं झाइय पडिवण्णसंजमेण विसोहिबलेण अंतोमुहुत्तस्स उप्पण्णासेसगणिं-दलक्खणेण उवलद्धजिणवयणविणिग्गयबीजपदेण गोदमगोत्तेण बम्हणेण इंदभूदिणा आयार-सूदयद-ट्ठाण-समवाय-वियाहपण्णत्ति-णाहधम्मकहोवासयज्झयणंतयडदस-अणुत्तरोववादियदस-पण्णवायरण-विवायसुत्त-दिट्ठिवादाणं सामाइय-चउवीसत्थय-वंदणा-पडिक्कमण-वइणइय-किदियम्म-दसवेयालि-उत्तरज्झयण-कप्पववहार-कप्पाकप्प-महाकप्प-पुंडरीय-महापुंडरीय-णिसिहियाणं चोद्दसपइण्णयाण-मंगबज्झाणं च सावणमासबहुलपक्खजुगादिपडि—वयपुव्वदिवसे जेण रयणा कदा तेणिंदभूदि भडारओ वड्ढमाणजिणतित्थगंथकत्तारो। उत्तं च-
वासस्स पढममासे पढमे पक्खम्मि सावणे बहुले।
पाडिवदपुव्वदिवसे तित्थुप्पत्ती दु अभिजिम्मि१।।४०।।
संक्षिप्त शब्द रचना से सहित व अनन्त अर्थों के ज्ञान के हेतुभूत अनेक चिन्हों से संयुक्त बीजपद कहलाता है। अठारह भाषा व सात सौ लघु भाषा स्वरूप द्वादशांगात्मक उन अनेक बीजपदों के प्ररूपक अर्थकर्ता हैं तथा बीजपदों में लीन अर्थ के प्ररूपक बारह अंगों के कर्ता गणधर भट्टारक ग्रंथकर्ता हैं, ऐसा स्वीकार किया गया है। अभिप्राय यह है कि बीजपदों के जो व्याख्याता हैं वे ग्रंथकर्ता कहलाते हैं।
शंका-उक्त कर्ता की प्ररूपणा किसलिए की जाती है ?
समाधान-ग्रंथ की प्रमाणता को बतलाने के लिए कर्ता की प्ररूपणा की जाती है। राग, द्वेष व मोह से युक्त जीव यथोक्त अर्थों का प्ररूपक नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें सत्य वचन के नियम का अभाव है। इसी कारण उसकी प्ररूपणा की जाती है। वह इस प्रकार है-
पाँच महाव्रतों के धारक, तीन गुप्तियों से रक्षित, पाँच समितियों से युक्त, आठ मदों से रहित, सात भयों से मुक्त, बीज, कोष्ठ, पदानुसारी व सम्भिन्नश्रोतृत्व बुद्धियों से उपलक्षित, प्रत्यक्षभूत उत्कृष्ट अवधिज्ञान से असंख्यात लोक मात्र काल में अतीत, अनागत एवं वर्तमान परमाणु पर्यन्त समस्त मूर्त द्रव्य व उनकी पर्यायों को जानने वाले, तप्ततप लब्धि के प्रभाव से मल-मूत्र रहित, दीप्ततप लब्धि के बल से सर्वकाल उपवास युक्त होकर भी शरीर के तेज से दशोें दिशाओं को प्रकाशित करने वाले, सर्वौषधि लब्धि के निमित्त से समस्त औषधियों स्वरूप, अनन्त बल युक्त होने से हाथ की कनिष्ठ अंगुलि द्वारा तीनों लोकों को चलायमान करने में समर्थ, अमृतास्रव आदि ऋद्धियों के बल से हस्तपुट में गिरे हुए सब आहारों को अमृत स्वरूप से परिणमाने में समर्थ, महातप गुण से कल्पवृक्ष के समान, अक्षीणमहानस लब्धि के बल से अपने हाथों में गिरे हुए आहारों की अक्षयता के उत्पादक, अघोरतप ऋद्धि के माहात्म्य से जीवों के मन, वचन एवं कायगत समस्त कष्टों को दूर करने वाले, सम्पूर्ण विद्याओं के द्वारा सेवित चरणमूल से संयुक्त, आकाशचारण गुण से सब जीवसमूहों की रक्षा करने वाले, वचन एवं मन से समस्त पदार्थों के सम्पादन करने में समर्थ, अणिमादिक आठ गुणों के द्वारा सब देवसमूहों को जीतने वाले, तीनों लोकों के जनों में श्रेष्ठ, परोपदेश के बिना अक्षर व अनक्षररूप सब भाषाओं में कुशल, समवसरण में स्थित जन मात्र के रूप के धारी होने से ‘हमारी-हमारी भाषाओं से हम-हमको ही कहते हैं’ इस प्रकार सबको विश्वास कराने वाले तथा समवसरणस्थ जनों के कर्ण इन्द्रियों में अपने मुंह से निकली हुई अनेक भाषाओं के सम्मिश्रित प्रवेश के निवारक ऐसे गणधरदेव ग्रंथकर्ता हैं, क्योंकि ऐसे स्वरूप के बिना ग्रंथ की प्रमाणता का विरोध होने से धर्म-रसायन द्वारा समवसरण के जनों का पोषण बन नहीं सकता। यहाँ उपयुक्त गाथा-
गणधरदेव बुद्धि, तप, विक्रिया, औषध, रस, बल, अक्षीण, सुस्वरत्वादि ऋद्धियों तथा अवधि एवं मन:पर्यय ज्ञान से सहित होते हैं।।३८।।
अब वर्धमान जिनके तीर्थ में ग्रंथकर्ता को कहते हैं-
पाँच अस्तिकाय, छह जीवनिकाय, पाँच महाव्रत, आठ प्रवचनमाता अर्थात् पाँच समिति और तीन गुप्ति तथा सहेतुक बंध और मोक्ष।।३९।।
‘उक्त पाँच अस्तिकायादिक क्या हैं ?’ ऐसे सौधर्मेन्द्र के प्रश्न से संदेह को प्राप्त हुए पाँच सौ—पाँच सौ शिष्यों से सहित तीन भ्राताओं से वेष्टित, मानस्तंभ के देखने से ही मान से रहित हुए, वृद्धि को प्राप्त होने वाली विशुद्धि से संयुक्त, वर्धमान भगवान् के दर्शन करने पर असंख्यात भवों में अर्जित महान् कर्मों को नष्ट करने वाले, जिनेन्द्रदेव की तीन प्रदक्षिणा करके पाँच अंगों द्वारा भूमिस्पर्शपूर्वक वंदना करके एवं हृदय से जिन भगवान् का ध्यान कर संयम को प्राप्त हुए, विशुद्धि के बल से मुहूर्त के भीतर उत्पन्न हुए समस्त गणधर के लक्षणों से संयुक्त तथा जिनेन्द्रमुख से निकले हुए बीजपदों के ज्ञान से सहित ऐसे गौतम गोत्र वाले इन्द्रभूति ब्राह्मण द्वारा चूँकि आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, व्याख्याप्रज्ञप्तिअंग, ज्ञातृधर्मकथांग, उपासकाध्ययनांग, अन्तकृतदशांग, अनुत्तरोपपादिकदशांग, प्रश्नव्याकरणांग, विपाकसूत्रांग व दृष्टिवादांग, इन बारह अंगों की तथा सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्पाकल्प, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक व निषिद्धिका, इन अंगबाह्य चौदह प्रकीर्णकों की श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में युग के आदिम प्रतिपदा के पूर्व दिन में रचना की थी, अतएव इन्द्रभूति गणधरदेव भट्टारक वर्धमान तीर्थंकर जिनेन्द्रदेव के तीर्थ में ग्रंथकर्ता हुए।
कहा भी है-
वर्ष के प्रथम मास व प्रथम पक्ष में श्रावण कृष्ण प्रतिपदा के पूर्व दिन में अभिजित् नक्षत्र में तीर्थ की उत्पत्ति हुई।।४०।।
इस ग्रंथ में णमोकारमंत्र व चत्तारि मंगल पाठ अनादि निधन हैं और सभी पाठ श्री गौतमस्वामी प्रणीत हैं। श्री गौतमस्वामी ३० वर्ष तक भगवान के समवसरण में रहे हैं। उन्होंने ही इन चैत्यभक्ति व प्रतिक्रमण पाठ को रचा है। ये ही पाठ यहाँ दिये गए हैं चैत्यभक्ति पूर्ण है व शेष पाठ प्रतिक्रमण पाठ से उद्धृत हैं।
-जाप्य मंत्र-
१. ॐ ह्रीं अर्हं दिव्यध्वनिस्वामिने श्रीमहावीरतीर्थंकराय नम:।
२. ॐ ह्रीं श्रीगौतमगणधरस्वामिने नम:।
३. ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत—स्याद्वादनयर्गिभतद्वादशांगश्रुतज्ञानेभ्यो नम:।
श्री गौतम स्वामी स्तुति
नौमि गौतमस्वामिन् ! त्वां, वीरप्रभोर्गणीश्वरम्।
सर्र्विद्धधारिणं देवं, चतुज्र्ञानसमन्वितम्।।१।।
वीर दिव्यध्वनेर्हेतुं, गणाधीशं गणेशिनम्।
द्वादशांगस्य कर्तारं, सज्ज्ञानद्ध्र्यै नमाम्यहम्।।२।।