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दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

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०३. ज्ञान से लेकर आचरण का महत्त्व तक

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ज्ञान

मनुष्य ज्ञान से पदार्थों को जानता है, दर्शन से उन पर श्रद्धा करता है, चारित्र से कर्मों के आगमन को रोकता है और तप से आत्मा को शुद्ध करता है।

सम्यक् ज्ञान

जीवन में पहला स्थान ज्ञान का है और फिर दया का। सभी साधुवृंद इसी प्रकार संयम में स्थित होते हैं। अज्ञानी क्या कर सकता है? वह क्या जानेगा कि उसके लिए क्या हितकर है और क्या अहितकर?

ज्ञान क्या है?

ज्ञान उसे कहते है जिससे तत्त्व का बोध होता है, चित्त का निरोध होता है तथा जिससे आत्मा प्रकाशित होती है।

चारित्र विहीन ज्ञान

चारित्र विहीन ज्ञान व्यर्थ है और अज्ञानी की क्रिया व्यर्थ है। जैसे पंगु व्यक्ति वन में लगी हुई आग को देखते हुए भी भागने में असमर्थ होने से अंधा व्यक्ति दौड़ते हुए भी देखने में असमर्थ होने से जल मरता है।

ज्ञान और क्रिया

ज्ञान और क्रिया के संयोग से ही फल की प्राप्ति होती है, जैसे वन में पंगु और अंधा दोनों परस्पर सहयोग से, आग लगने पर भी बच निकलते हैं। केवल एक पहिये से रथ नहीं चलता।

आत्म—हित का मार्ग

(साधक) सुनकर ही आत्म—हित का मार्ग जान सकता है। सुनकर ही पाप या अहित को जाना जा सकता है। अत: सुनकर, हित और अहित दोनों को जानकर, जो मार्ग श्रेयस्कर हो, उसका भली —भाँति आचरण करना चाहिए।

नींव है सम्यग्दर्शन

सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान नहीं; ज्ञान के बिना चारित्र नहीं; चारित्र के बिना कर्मों का क्षय नहीं और कर्मों का क्षय हुए बिना निर्वाण नहीं।

सम्यक्त्व का लाभ

सम्यक्त्व प्राप्ति का लाभ तीनों लोकों की संपदा के लाभ से भी अधिक श्रेष्ठ है।.

कौन है सम्यग्दृष्टि ?

वह व्यक्ति ही सम्यग्दृष्टि है, जो जानता है कि क्या उपादेय (ग्रहण करने योग्य) और क्या हेय त्यागने योग्य है।

सम्यक्त्व से रहित

व्यक्ति को सम्यक्त्व प्राप्त किये बिना सहत्रों वर्षों तक उग्र तप करने पर भी बोधि प्राप्त नहीं होती।

शास्त्र—ज्ञान

जैसे धागा पिरोई हुई सुई गिर जाने पर भी गुम नहीं होता, वैसे ही शास्त्र ज्ञान युक्त व्यक्ति संसार में रहने पर भी नष्ट नहीं होता।

सिद्धि

ज्ञान से ध्यान की सिद्धि होती है। ध्यान से सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। निर्जरा का फल मोक्ष है। अत: सतत ज्ञानाभ्यास करना चाहिये।

श्रेयस्कर मार्ग

धर्म—श्रवण से ही आत्मा के हित और आत्मा के अहित का मार्ग जाना जाता है। दोनों मार्गों को जानकर, जो मार्ग आत्मा के लिए श्रेयस्कारी हो, उसका अनुकरण करें।

जीव का स्वरूप

जो जीव के स्वरूप को नहीं जानता, न अजीव के स्वरूप को जानता है, इस तरह इन दोनों का न जानने वाला, संयम को कैसे जानेगा?

चारित्रहीन व्यक्ति

शास्त्रों का अत्यधिक अध्ययन भी चारित्रहीन व्यक्ति के लिए किस काम का? क्या करोड़ों दीपक जला देने पर अंधे को कोई प्रकाश मिल सकता है?

आचरण का महत्त्व

तैरना जानते हुए भी यदि कोई व्यक्ति जल प्रवाह में गिरने पर हाथ पाँव न हिलाए, तो वह प्रवाह में डूब जाता है। धर्म को जानते हुए भी यदि वह उसका आचरण न करे तो संसार सागर को कैसे पार कर सकता?