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०३. ध्यान

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३. ध्यान

‘‘उत्तम संहनन वाले का एक विषय में चित्तवृत्ति का रोकना ध्यान है जो अंतर्मुहूर्त काल तक होता है।’’

आदि के वङ्कावृषभ नाराच, वङ्कानाराच और नाराच ये तीनों संहनन उत्तम माने हैं। ये तीनों ही ध्यान के साधन हैं, किन्तु मोक्ष का साधन तो प्रथम संहनन ही है।

नाना पदार्थों का अवलम्बन लेने से चिंता परिस्पंदवती होती है। उसे अन्य अशेष मुखों से-विषयों से लौटाकर एक अग्र-एक विषय में नियमित करना एकाग्रचिन्ता निरोध कहलाता है। यही ध्यान है यह उत्कृष्ट भी एक मुहूर्त के भीतर ही तक होता है चूँकि इसके बाद एकाग्रचिन्ता दुर्धर ही है। चिन्ता के निरोध-अभाव-रूप होने से यह ध्यान असत्-शून्यरूप नहीं है प्रत्युत् ‘‘निश्चल अग्नि की शिखा के समान निश्चलरूप से अवभासमान ज्ञान ही ध्यान है।’’

‘‘जो एक चिन्ता का निरोध है वह तो ध्यान है और जो इससे भिन्न है वह भावना है। उसे विद्वान् लोग अनुप्रेक्षा अथवा अर्थ चिन्ता भी कहते हैं।’’ ध्यान के चार भेद हैं-आर्त, रौद्र, धम्र्य और शुक्ल। यह ध्यान प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो प्रकार भी हो जाता है। पापास्रव का कारण भूत अप्रशस्त है और कर्म दहन की सामथ्र्य से युक्त ध्यान प्रशस्त है। अन्यत्र भी कहा है-

‘‘जिस ध्यान में मुनि रागरहित हो जावें, वह प्रशस्त ध्यान है और वस्तु स्वरूप से अनभिज्ञ तथा राग द्वेष मोह से पीड़ित जीव की स्वाधीन प्रवृत्ति अप्रशस्त ध्यान है। यह बिना उपदेश के ही होता है क्योंकि यह अनादि वासना है।

‘‘धम्र्य और शुक्ल ये दो ध्यान मोक्ष के लिए कारण हैं और आर्तरौद्र ध्यान संसार के लिए कारण हैं।’’

आर्तध्यान -‘ऋतं’ अर्थात् दु:ख, अथवा ‘अर्दनमर्ति:’ अर्थात् पीड़ा है। इसमें होने वाला ध्यान ‘आर्तध्यान’ है। इसके चार भेद हैं-

विष वंटक शत्रु आदि अप्रिय पदार्थ अमनोज्ञ हैं। उनका संयोग होने पर ‘मैं क्या उपाय करूँ कि जिससे यह मुझसे दूर हो जावें’ ऐसा बार-बार चिंतन करना अनिष्ट संयोगज आर्तध्यान है।

स्वपुत्र, धन, स्त्री, आदि मनोज्ञ वस्तु के वियोग होने पर उसकी प्राप्ति की सतत चिन्ता करना इष्ट वियोगज आर्तध्यान है।

शरीर में वेदना के होने से उसके दूर करने हेतु बार-बार विचार करना तृतीय वेदनाजन्य आर्तध्यान है।

आगामी विषयों की प्राप्ति हेतु मन का उपयोग लगाना-चिन्ता करना सो निदान आर्तध्यान है।

‘‘यह आर्तध्यान पहले गुणस्थान से लेकर छठे तक हो सकता है। छठे में मात्र निदान आर्तध्यान नहीं है। बाकी तीन आर्तध्यान प्रमाद के उद्रेक से कदाचित् हो सकते हैं।’’

रौद्रध्यान - ‘रुद्र:’ अर्थात् आशय, इसका जो कर्म है अथवा जो से होता है वह रौद्रध्यान है। उसके भी चार भेद है-‘हिंसा, असत्य, चोरी और विषय संरक्षण के२ लिए सतत चिन्तन करना। इस प्रकार से इन चार के आश्रय से चार भेद रूप रौद्रध्यान है। यह पहले गुणस्थान से लेकर देशविरत गुणस्थान तक होता है।

‘‘देशविरत के रौद्रध्यान कैसे हो सकता है?’’

हिसादि के आवेश से या धन आदि के संरक्षण की परतंत्रता से कदाचित् देशव्रती के भी हो सकता है। किन्तु सम्यग्दर्शन की सामथ्र्य से उसका यह ध्यान नरक आदि दुर्गतियों का कारण नहीं है।’’

धर्मध्यान

धर्म से युक्त ध्यान धम्र्य ध्यान है। इसके भी चार भेद हैं-आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान। इनकी विचारणा के निमित्त मन को एकाग्र करना धर्मध्यान है।

उपदेश देने वाले का अभाव होने से, स्वयं मंदबुद्धि होने से, कर्मों का उदय होने से और पदार्थों के सूक्ष्म होने से इत्यादि कारणों से सर्वज्ञ प्रणीत आगम को प्रमाण मानकरके ‘यह इसी प्रकार है, क्योंकि जिन अन्यथावादी नहीं होते’ ऐसा गहन पदार्थों का भी श्रद्धान द्वारा अर्थ निश्चित करना आज्ञाविचय धम्र्य ध्यान है। अथवा स्वयं पदार्थों के रहस्य को जानता है और जो दूसरों को उसका प्रतिपादन करना चाहता है इसलिए जो स्वसिद्धान्त का समर्थन चिंतवन आदि है वह सभी आज्ञाविचय है।

मिथ्यादृष्टी जीव सर्वज्ञ प्रणीत मार्ग से विमुख हो रहे हैं, उन्हें सन्मार्ग का ज्ञान न होने से मोक्षार्थी पुरुषों को दूर से ही त्याग देते हैं। अथवा ये प्राणी मिथ्यादर्शन आदि से कैसे दूर हों, ऐास निरन्तर चिंतन करना अपायविचय धम्र्य ध्यान है।

ज्ञानावरण आदि कर्मों के उदय से होने वाले फल के अनुभव का बार-बार चिंतन करना विपाक विचय धम्र्यध्यान है।

लोक के आकार और स्वभाव का निरन्तर चिंतवन करना संस्थान विचय धम्र्यध्यान है।

इस प्रकार उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों से सहित ध्यान धम्र्य ध्यान है। यह अविरत सम्यग्दृष्टि से लेकर सातवें गुणस्थान तक होता है।

श्री वीरसेन स्वामी ने धवला में धम्र्य ध्यान को दशवें गुणस्थान तक भी माना है।

अन्यत्र ग्रंथों में संस्थान विचय धम्र्य के पिंडस्थ पदस्थ आदि चार भेद किये हैं, जो कि मन को बाह्य प्रपंचों से हटाने के लिए बहुत ही सहायक होते हैं।

इसमें आचार्य ने सबसे पहले ध्याता का लक्षण बतलाते हुए कहा है कि जो सर्वारंभ परिग्रह से रहित मुनि हैं, वे ही इन्द्रिय और मन पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सकते हैं। अन्य नहीं। गृहस्थी बेचारे नित्य ही सर्वारंभ में फसे हुए होने से ध्यान के अधिकारी नहीं है। यथा-‘‘कदाचित् आकाश के पुष्प और गधे के सींग हो सकते हैं परन्तु किसी भी देश या काल में गृहस्थाश्रम में ध्यान की सिद्धि नहीं हो सकती है।’’

इस हेतु से मुख्यतया मुनियों के लिए ध्यान सिद्धि का उपाय बताते हुए पहले आचार्य ने मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ इन चार भावनाओं के आश्रय लेने को कहा है ‘पुन: और अध्यात्म भावनाओं के भाने का उपदेश दिया है।

ध्यान के योग्य स्थानादि

स्थान - ध्यान के लिए बाधक स्थानों को छोड़कर उत्तम स्थानों के आश्रय लेने का उपदेश दिया है। ‘‘सिद्धक्षेत्र महातीर्थों पर, पुराणपुरुष तीर्थंकर आदि के जहाँ गर्भ जन्म आदि कल्याणक हुए हैं, ऐसे जो पवित्र पुण्य स्थान हैं। अथवा समुद्र के किनारे, वन में, पर्वत की चोटी पर इत्यादि निर्जन स्थानों में ध्यान की सिद्धि होती है।..........सिद्धकूट तथा कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्यालयों में महाऋद्धि के धारक महाधीर वीर संयमी सिद्धि की वांछा करते हैं। अभिप्राय यही है कि जहाँ उपयोग स्थिर हो सके और परिणाम राग-द्वेष से विक्षिप्त नहीं होवें, वही स्थान योग्य है।’’

आसन - ‘‘समाधि-ध्यान की सिद्धि के लिए काष्ठ के पट्टे पर, शिला पर अथवा भूमि पर वा बालू रेत में भले प्रकार स्थिर आसन लगाना चाहिए।’’

पर्यंक आसन, अद्र्धपर्यंक आसन, वङ्काासन, वीरासन, सुखासन, कमलासन और कायोत्सर्ग ये ध्यान के योग्य आसन होते हैं। जिस आसन पर मुनि सुखपूर्वक मन को निश्चल कर सके, वही आसन श्रेयस्कर है। वङ्कावृषभ नाराच संहनन काय वाले मुनि भयंकर से भयंकर उपसर्गों के आ जाने पर भी ध्यान से स्खलित नहीं होते हैं। हीन संहनन वालों को भी आसन स्थिर करने का अभ्यास करते हुए परीषह उपसर्गों को जीतने का अभ्यास करना चाहिए।

स्वामी -‘‘इस धर्मध्यान के स्वामी मुख्यरूप से अप्रमत्त मुनि सप्तम गुणस्थनवर्ती ही हैं और उपचार से प्रमत्तमुनि-छठें गुणस्थानवर्ती मुनि हैं। जो अप्रमत्तमुनि उत्तम संस्थान और उत्तम संहनन सहित, जितेन्द्रिय, स्थिर, पूर्ववेदी-द्वादशांग के वेत्ता, संवरवान् और धीर हैं वे ही सम्पूर्ण लक्षण से समन्वित ध्यान के अधिकारी हैं।

अथवा चौदहपूर्वों के ज्ञान से रहित भी श्रुतज्ञानी श्रेणी के नीचे सातवें गुणस्थान तक ध्यान के स्वामी होते हैं।

किन्हीं आचार्यों ने धर्म ध्यान के चार स्वामी भी माने हैं-अविरत-सम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्तविरत और अप्रमत्त विरत। अर्थात् उत्तम मध्यम और जघन्य की अपेक्षा से ये चारों गुणस्थान वाले भी धर्मध्यान के करने वाले होते हैं।’’

‘‘धर्मध्यान के चतुर्थ भेद-संस्थान विचय के पिंडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ये चार भेद माने गये हैं।’’

पिंडस्थ ध्यान-पिंडस्थ ध्यान में पार्थिवी, आग्नेयी, श्वसना, वारुणी और तत्त्वरूपवती ऐसी पाँच धारणाएँ होती हैं।

पार्थिवी धारणा

प्रथम ही योगी मध्यलोक में स्वयंभूरमण समुद्र पर्यंत जो तिर्यक्लोक है, उसके समान नि:शब्द, कल्लोल रहित, सपेद क्षीरसमुद्र का चिंतवन करें। उसके मध्यभाग में अमित पैâलती हुई दीप्ति से शोभायमान, पिघलाये हुए सुवर्ण की सी प्रभा वाले एक सहस्रदल के कमल का चिंतन करे। यह कमल जम्बूद्वीप के बराबर एक लाख योजन विस्तृत है, ऐसे सोचे। पुन: उस कमल के मध्य में सुवर्णाचल-मेरु के समान पीतरंग की प्रभा वाली कर्णिका का चिंतवन करे। उस कर्णिका में एक ऊँचा सिंहासन है। उस पर अपनी आत्मा को सुखरूप, शांत स्वरूप क्षोभरहित चिंतवन करे। मैं सम्पूर्ण रागद्वेषादि को क्षय करने में समर्थ हूँ, कर्म की संतान को नाश करने में उद्यमी हूँ। यह पार्थिवी धारणा का स्वरूप हुआ।

आग्नेयी धारणा

तत्पश्चात् योगी निश्चल अभ्यास में चिंतवन करे कि अपने नाभिमंडल में १६ ऊँचे-ऊँचे पत्रों का कमल है। उनमें क्रम से ‘‘अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ¸ ऌ ल¸ ए ऐ ओ औ अं अ:’’ ये सोलह अक्षर स्थित हैं और कर्णिका पर ‘‘र्ह’’ ऐसा महामंत्र विराजमान है। पुन: उस महामंत्र के रेफ से मंद-मंद धूम शिखा उठ रही है, अनन्तर उसमें से प्रवाहरूप स्पुâलिंगों की पंक्ति निकलने लगी, तत्पश्चात् उसमें से ज्वाला की लपटें उठने लगीं। पुन: वे लपटें बढ़ते हुए हृदय में स्थित कमल को जलाने लगी हैं। अर्थात् हृदय में अधोमुख आठ पांखुड़ी वाला एक कमल है उसके दलों पर क्रमश: आठ कर्म स्थित हैं। इस कमल को ‘र्ह’ बीजाक्षर से निकली हुई अग्नि ने जला दिया है। तब आठों कर्म जल चुके हैं, यह एक चैतन्य परिणामों की ही सामथ्र्य है।

उस कमल के जल जाने पर शरीर के बाह्य अग्नि त्रिकोणाकार हो गई है, यह ज्वाला के समूह से बडवानल के समान है तथा अग्निबीजाक्षर ‘र’ से व्याप्त और अंत में साथिया के चिन्हों से चिन्हित है। ऊध्र्व वायुमंडल से उत्पन्न धूम रहित कांचन सी प्रभा वाला यह त्रिकोणाकार है। इस प्रकार धगधगायमान पैâलती हुई अग्नि की लपटों से बाहर का अग्निमंडल अंतरंग की मंत्राग्नि को दग्ध कर रहा है। पुन: यह नाभिस्थ कमल और शरीर को भस्मीभूत करके जलाने योग्य वस्तु का अभाव होने से धीरे-धीरे अपने आप अग्नि शांत हो जाती है। यह आग्नेयी धारणा हुई।

श्वसना धारणा

तत्पश्चात् योगी आकाश में पूर्ण होकर विचरते हुए महावेगवान् और महाबलवान् वायुमंडल का चिंतवन करता है। यह पवन मेरु पर्वत को भी कंपित करने वाली है, मेघों के समूह को बिखेरती हुई, समुद्र को क्षुब्ध करती हुई, लोक के मध्य गमन करती हुई, दशों दिशाओं में संचरती हुई, जगत्रूपी घर में फैली हुई और पृथ्वीतल में प्रवेश करती हुई ऐसा चिंतवन करता है। पुन: जो शरीरादि की भस्म है, उसको इस वायुमंडल ने तत्काल उड़ा दिया। तत्पश्चात् यह स्थिर होकर शांत हो गई है। ऐसा चिंतवन करना मारुती धारणा है।

वारुणी धारणा

पुन: मुनिराज इन्द्रधनुष, बिजुली गर्जनादि चमत्कार सहित मेघों से भरे हुए आकाश का चिंंतवन करते हैं। ये मेघ अमृत से उत्पन्न मोती के समान उज्ज्वल बड़े-बड़े मोतियों से निरंतर धारारूप बरस रहे हैं। पुन: अद्र्धचंद्राकार मनोहर अमृतमल जल के प्रवाह से आकाश को बहाते हुए वरुणमंडल का चिंतवन करते हैं। दिव्यध्यान से उत्पन्न हुआ यह जल शरीर के जलाने से उत्पन्न हुई समस्त भस्म को धो देता है। यह वारुणी धारणा हुई।

तत्त्वरूपवती धारणा

अनंतर संयमी मुनि सप्त धातु रहित, पूर्ण चन्द्रमा के समान निर्मलप्रभा वाले, सर्वज्ञ समान अपने आत्मा का ध्यान करते हैं। हमारी आत्मा अतिशय से युक्त, सिंहासन पर आरूढ़, कल्याणकों की महिमा सहित, देवेन्द्रों से पूजित हैं। आठ कर्मों के विलय हो जाने से स्पुरायमान, अतिनिर्मल पुरुषाकार है। ऐसा चिंतवन करना तत्त्वरूपवती धारणा है।

इस प्रकार पिंडस्थ ध्यान के निश्चल अभ्यास से ध्यानी मुनि थोड़े ही काल में मोक्ष सुख को प्राप्त कर लेते हैं।

पदस्थ ध्यान

जिसको योगीश्वर अनेक पवित्र मंत्रों के अक्षर का अवलम्बन लेकर चिंतवन करते हैं, वह पदस्थ ध्यान है। इसमें सर्वप्रथम अनादि-सिद्धान्त में प्रसिद्ध वर्णमातृका का ध्यान करना चाहिए। चूँकि यह सम्पूर्ण वाङ्गमय की जन्मभूमि है।

वर्णमातृका ध्यान

ध्याता मुनि नाभिमंडल में स्थित सोलह दल वाले कमल की पांखुड़ियों पर क्रमश: ‘अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ¸ ऌ ल¸ ए ऐ ओ औ अं अ:’ इन सोलह स्वरों का चिंतवन करे। पुन: अपने हृदय स्थान में कर्णिका सहित चौबीस पांखुडी के कमल पर कर्णिका तथा पात्रों में क्रमश: क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न फ ब भ म’ इन पच्चीस अक्षरों का ध्यान करे। अनन्तर आठ पत्रों से विभूषित मुख कमल के प्रत्येक पत्र पर भ्रमण करते हुए ‘य र ल व श ष स ह’ इन आठ वर्णों का ध्यान करे।

इस प्रकार इन ४९ वर्ण मातृकाओं का ध्यान करने वाला साधु श्रुत समुद्र का पारगामी हो जाता है तथा क्षयरोग, अग्निमंदता, कुष्ठ, उदर रोग, कास, श्वास आदि रोगों को जीत लेता है और वचनसिद्धि, पूज्यता आदि गुणों का पुञ्ज हो जाता है।

मंत्रराज का ध्यान - ‘ऊध्र्वाधोरयुतं सविन्द सपरं’ ऐसा मंत्र ‘ह्र्र ँ’ है उसका ध्यान करते हैं। इसका कैसा' ध्यान करे-

सुवर्णमल कमल की कर्णिका पर विराजमान मल-कलंक रहित पूर्ण चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल, आकाश में गमन करते हुए तथा दिशाओं में व्याप्त होते हुए इस मंत्र का ध्यान करे। कितने लोग इस मंत्र को ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर और बुद्ध कहते हैं। वास्तव में जिनेन्द्र भगवान ही मानों मंत्रमूर्ति को धारण करके साक्षात् विराजमान हैं। धैर्यवान् योगी वुंâभक प्राणायाम से इस मंत्रराज को भौंह की लताओं में स्पुरायमान होता हुआ, मुख कमल में प्रवेश करता हुआ तालु के छिद्र में गमन करता हुआ, अमृतमय जल से झरता हुआ, नेत्र की पलकों पर स्पुरायमान होता हुआ, केशों में स्थिति करता हुआ ज्योतिषियों के समूह में भ्रमता हुआ, चन्द्रमा के साथ स्पद्र्धा करता हुआ, दिशाओं में संचरता हुआ, आकाश में उछलता हुआ, कलंग समूह को छेदता हुआ, संसार के भ्रम को दूर करता हुआ तथा मोक्ष स्थान को प्राप्त करता हुआ और मोक्षलक्ष्मी से मिलाप करता हुआ, ऐसा इसे ध्यावें।

इस मंत्राधिप के ध्यान में इतना तल्लीन हो जावे कि स्वप्न में भी इस मंत्र से च्युत न हो। ध्याता मुनि नासिका के अग्रभाग में अथवा भौहों के मध्य में इसको निश्चल करे।

इस मंत्रराज के ध्यान से अणिमा आदि सर्व ऋद्धियाँ प्रगट हो जाती हैं। दैत्यादि भी सेवा करने लगते हैं।

प्रणव मंत्र का ध्यान

‘ॐ’ मंत्र को चन्द्रमा के समान श्वेतवर्ण का चिंतवन करे। यह पंचपरमेष्ठी वाचक महामंत्र समस्त दु:खरूपी अग्नि को शांत करने में मेघ के समान है। इसको हृदय कमल की कर्णिका में अथव ललाट आदि में स्थापित करके ध्यावे।

अन्य मंत्रों का ध्यान

आठ पत्रों के कमल की कर्णिका पर ‘णमो अरहंताणं’ पुन: दिशाओं में क्रम से ‘णमो सिद्धाणं’, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं’ ये चार मंत्र और विदिशाओं के चार पत्रों पर ‘सम्यग्दर्शनाय नम:, सम्यग्ज्ञानाय नम:, सम्यक्चारित्राय नम:, सम्यक्पसे नम:’ इन चार मंत्र पदों का चिंतवन करे। इस प्रकार अष्टदल कमल और कर्णिका में नव मंत्रों को स्थापित कर ध्यान करे।

इस मंत्र के प्रभाव से योगीश्वर अनन्त क्लेश से छूटकर अनन्त सुख को प्राप्त कर लेते हैं।

हे मुने! तुम मंत्र पदों के स्वामी और मुक्तिमार्ग के प्रकाशक ऐसे ‘अ’ अक्षर को नाभिकमल में ‘सि’ अक्षर को मस्तक कमल पर, ‘आ’ अक्षर को कंठस्थ कमल में, ‘उ’ अक्षर को हृदय कमल पर और ‘सा’ अक्षर को मुखस्थ कमल पर ऐसे ‘असि आ उसा’ इन पाँच अक्षरों को पाँच स्थानों में चिन्तवन करो।

‘अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नम:’ इस षोडश अक्षर वाली महाविद्या का जो दो सौ बार जप करता है वह नहीं चाहते हुए भी एक उपवास के फल को प्राप्त कर लेता है। ऐसे ही ‘अरहंत सिद्ध’ इस षट् अक्षरी मंत्र का तीन सौ बार जप करने से, ‘अरहंत’ इस चार अक्षर ावले मंत्र का चार सौ बार जप करने से योगी एक उपवास के फल को प्राप्त कर लेता है।

‘सिद्ध’ यह दो अक्षरों का मंत्र समस्त द्वादशांग रूप श्रुतस्वंध का सार है। जो मुनि ‘अ’ एक अक्षरी मंत्र को पाँच सौ बार जपता है, वह एक उपवास के फल को प्राप्त कर लेता है। जो यह उपवास के फल का कथन है सो मात्र रुचि उत्पन्न कराने के लिए किंचित् मात्र कथन है किन्तु वास्मतव में इन मंत्रों का उत्तम फल स्वर्ग और मोक्ष ही है।

‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असि आ उसा नम:’ यह मंत्र भी द्वादशांग में सारभूत समझकर निकाला गया है। इसके निरन्तर अभ्यास से मुनि संसार बंधन को काट देते हैं।

‘चत्तारि मंगलं, अरहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो, धम्मो लोगुुत्तमा। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरहंतसरणं पवज्जामि, सिद्धसरणं पव्वज्जामि, साहु सरणं पव्वज्जामि, केवलिणपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि।’’

जो संयमी एकाग्र बुद्धि से इन मंगल, उत्तम और शरणभूत पदों का चिन्तवन करता है, वह मोक्ष लक्ष्मी का आश्रय लेता है और भी अनेकों मंत्र हैं जो कि गुरु के मुख से ही ग्रहण करने योग्य हैं। इन बहुत प्रकार के मंत्र पदों का ध्यान करके योगी मन को एकाग्र करने का अभ्यास बना लेता है तथा अनन्त पुण्य संचय करते हुए अनन्त पाप राशि को जला डालता है।

रूपस्थ ध्यान

इस रूपस्थ ध्यान में अरहंत भगवान् का ध्यान करना चाहिए। अरहंत भगवान् समवसरण में स्थित हैं बारह सभायें चारों ओर से घिरी हुई हैं। उनमें मध्य में सर्वज्ञ, वीतराग, परमेश्वर, देवाधिदेव सप्तधातु से रहित, दिव्य परमौदारिक उत्तम शरीर सहित, अचिन्त्य महिमाशाली अर्हंत भगवान् विराजमान हैं। समवसरण का विस्तृत वर्णन समझकर उसकी रचना बनाकर उसमें विराजमान जिनेन्द्र देव का ध्यान करना चाहिए।

रूपातीत ध्यान

इसके पश्चात् रूपस्थ ध्यान में जिसका चित्त स्थिरीभूत है ऐसा योगी अमूर्त, अजन्मा, इन्द्रियों के अगोचर, चिदाननदमय, शुद्ध, परमाक्षररूप आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा ही स्मरण करे, सो रूपातीत ध्यान है। प्रथम तो उस परमात्मा के गूणसमूहों को पृथक्-पृथक् विचारे पुन: उस परमात्मा के गुणों को और परमात्मा को गुण-गुणी में भेद न करके अभिन्न रूप विचारे। अनन्तर आप स्वयं उस परमात्मा में ही लीन हो जावे। परमात्मा के स्वभाव से एकरूप भावित मिला हुआ ध्यानी उस परमात्मा के गुणों से पूर्णरूप अपने आत्मा को करके फिर उसे परमात्मा में योजित करे। क्योंकि मेरी आत्मा और परमात्मा में शक्ति और व्यक्ति की अपेक्षा से समानता है। अर्थात् मेरी आत्मा भी शक्तिरूप से परमात्मा के समान ही है। ‘‘ऐसा अपने आपको परमात्मा में तन्मय करके एकमेक हो जावे, पुन: पृथक्पने का भान ही न रहें यह रूपातीत ध्यान है।’’

शुक्ल ध्यान

जिसमें शुचिगुण का संबंध है वह शुक्लध्यान है। यह श्रेणी चढ़ने के पहले अर्थात् सातवें गुणस्थान तक नहीं होता है। इसके भी चार भेद हैं-पृथक्त्व वितर्वâ, एकत्ववितर्वâ, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति औश्र व्युपरतक्रियानिवर्ति। आदि के दो ध्यान पूर्वविद्-श्रुतकेवली के होते हैं और अंत के दो ध्यान केवली के होते हैं। तीनों योग वाले के पहला ध्यान, तीनों में से किसी एक योग वाले के दूसरा ध्यान, काययोग वाले सयोग केवली के ही तीसरा और योगरहित अयोगकेवली के ही चौथा ध्यान होता है। गुप्ति, समिति आदि उपायों से युक्त मुनि जो कि भली प्रकार से परिकर्म करने वाले हैं वे ही संसार का नाश करने के लिए पूर्वोक्त चार प्रकार के धम्र्य ध्यान और शुक्ल ध्यान को करने में समर्थ होते हैं।

पृथक्त्व वितर्व

जिसमें पृथक्-पृथक्रूप से श्रुतज्ञान बदलता रहता है अर्थात् अर्थ, व्यंजन और योगों का संक्रमण होता रहता है वह पृथक्त्ववितर्व विचार शुक्लध्यान है। परिणामों की विशुद्धि से बढ़ता हुआ साधु मोहनीय कर्म की प्रकृतियों का उपशम अथवा क्षय करता हुआ इस ध्यान को करता है।

एकत्ववितर्व

पुन: समूलचूल मोहनीय को नाश करने की इच्छा करता हुआ साधु अनन्तगुणी विशुद्धि के बल से अर्थ, व्यंजन, योगों की संक्रान्ति से रहित होता हुआ निश्चल मन वाला वह इस एकत्ववितर्व ध्यान के बल से घातिया कर्मरूपी र्इंधन को भस्मसात् कर देता है।

तब तत्क्षण केवलज्ञानरूपी सूर्य प्रगट हो जाता है। वह केवली भगवान इन्द्रों द्वारा रचित समवसरण में विराजमान हो जाते हैं। इस पृथ्वी तल से पाँच हजार धनुष ऊपर चले जाते हैं और आकाश में अधर स्थित रहते हैं अर्थात् समवसरण में कमलासन से भी चार अंगुल अधर विराजमान रहते हैं। ये त्रिभुवन पूज्य भगवान उत्कृष्टरूप से कुछ कम एककोटि पूर्व वर्ष तक इस भुवन में विहार करके भव्यों को धर्म का उपदेश देते हैं।

सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति

जब आयु अन्तर्मुहूर्त मात्र शेष रहती है और शेष नाम आदि कर्मों की स्थिति कुछ अधिक रहती है, तो स्वभाव से केवली समुद्घात होता है जिससे स्थिति समान हो जाती है अन्यथा यदि चारों कर्मों की स्थिति बराबर है, तो वे सब प्रकार वचनयोग, मनोयोग और बादर काययोग का निरोधक करके सूक्ष्म काययोग के अवलम्बन से सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान को करते हैं।

व्युपरतक्रियानिवर्ति

इस ध्यान के सब प्रकार के योगों के निमित्त से होने वाली आत्मप्रदेश परिस्पन्दन रूप क्रिया का अभाव हो जाने से इसे व्युपरतक्रियानिवर्ति ध्यान कहते हैं। यह ध्यान आयोगकेवली के होता है। उस समय वे भगवान ध्यानातिशय रूप अग्नि के द्वारा सम्पूर्ण कर्म र्इंधन को जलाकर निर्वाण पद को प्राप्त कर लेते हैं। इस गुणस्थान का काल ‘अ इ उ ऋ ल¸’ इन पाँच ह्रस्वाक्षरों के उच्चारण के काल मात्र ही है। पुन: कर्मबंधन से छूटे हुए सिद्ध भगवान एक समय से ही लोकशिखर के अग्रभाग में जाकर विराजमान हो जाते हैं। चूँकि आगे अलोक में धर्मास्तिकाय का अभाव होने से वे आगे नहीं जा सकते हैं। ये सिद्ध परमेष्ठी निरंजन परमात्मा अनन्त-अनन्त काल तक अपने अनन्त सुख का उपभोग करते हुए परमानन्दमय परमतृप्त रहते हैं। फिर वापस संसार में कभी भी नहीं आते हैं।

विशेष-वर्तमान में उत्तम संहनन नहीं होने से शुक्लध्यान नहीं हो सकता है। धर्मध्यान ही होता है। उसमें भी अनेकों भेद होने से धर्मध्यानी दिगम्बर मुनियों में भी अनेकों भेद हो जाते हैं तथा धर्मशुक्ल की अपेक्षा भी इनमें अनेकों भेद माने जाते हैं।