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०३. शशिप्रभ देव - तीसरा भव

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शशिप्रभ देव तीसरा भव

-प्रथम दृश्य-
(मंच पर सामूहिक प्रार्थना)

स्वर्ग का दृश्य - इन्द्रसभा में अप्सरा का नृत्य। (बारहवें स्वर्ग में इन्द्रसभा लगी है। आज वहाँ चर्चा चल रही है कि आज हमारे स्वर्ग में मत्र्यलोक का एक तिर्यंच जीव हाथी की पर्याय से निकलकर शशिप्रभ देव के रूप में जन्म लेने वाला है।

सहस्रार इन्द्र - स्वर्गलोक के मेरे प्रिय देवों! देवियों! आज हमारे स्वर्ग में एक पुण्यशाली नए देव का आगमन होने वाला है, सो आप सब उसके स्वागत की तैयारी करें।

एक देव - स्वामी ! आप किस पुण्यशाली जीव की बात कर रहे हैं?

दूसरा देव - हाँ इन्द्रराज! यहाँ तो हमेशा ही अनेक देव-देवी जन्म लेते रहते हैं, लेकिन ऐसी चर्चा होते मैंने नहीं देखी। आज कौन से विशेष देव यहाँ आने वाले हैं?

सहस्रार इन्द्र - हाँ, बताता हूँ, वह वास्तव में विशेष ही है। अभी-अभी कुछ देर पहले ही मध्यलोक के आर्यखण्ड में सल्लकी नामक वन में एक हाथी का जीव सल्लेखनापूर्वक मरण कर अपना शरीर छोड़कर यहाँ शशिप्रभ देव के रूप में जन्म लेने वाला है।

इन्द्राणी - हे पुरन्दर! एक हाथी का जीव और देव?

इन्द्र - हाँ देवी! यही तो जैनधर्म की महिमा है। जो जीव अणुव्रती या महाव्रती है वह नियम से देवगति में ही आवेगा। इन्द्राणी - क्या वह दोबारा मनुष्य नहीं हो सकता है?

इन्द्र - नहीं देवी! देखो-अणुवद महव्वदाइं ण लहइ देवाउगं मोत्तुं। अर्थात् देवायु के सिवा अन्य आयु के बंध जाने पर यह जीव अणुव्रत और महाव्रत को ग्रहण नहीं कर सकता है और उस हाथी ने भी अरविंद मुनि से पंच अणुव्रत लिए थे और उसका पूरा पालन किया था।

तीसरा देव - देवराज! उसमें ऐसी क्या विशेषता है जो इतनी श्रद्धा से आप उसका नाम ले रहे हैं।

सहस्रार इन्द्र- मित्र! उसकी विशेषता यह है कि वह अब से सातवें भव में जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में तेईसवाँ तीर्थंकर होने वाला है।

-द्वितीय दृश्य-

निर्देशक - (स्वर्ग में सुन्दर सुसज्जित शैय्या बनी हुई है, शैय्या ऊपर चारों ओर से ढ़की हुई है। उसके अन्दर एक नवयुवक मानों सो रहा है। बाजे, नगाड़ों की ध्वनि हो रही है, पुष्पों की वर्षा तथा मन्द-मन्द वायु चल रही है कि तभी अनेक देव-देवी उस शैय्या के समीप पहुँचकर नमस्कार की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं)

शशिप्रभ देव - (शैय्या पर उठकर बैठे और आगे से शैय्या का पर्दा हटाया) ॐ नम: सिद्धेभ्य: (णमोकार मंत्रोच्चारण) (आश्चर्य से) ओह! मैं कौन हूँ? मैं कहाँ आ गया? यह सुन्दरता मैं कहाँ की देख रहा हूँ? ये सब मुझे नमस्कार क्यों कर रहे हैं?

देवगण - हम सभी देवों का प्रणाम स्वीकार करें, देव! स्वर्ग में आपका शुभागमन मंगलमय हो। आप यहाँ यह सब स्वर्ग का सौन्दर्य देख रहे हैंं। शशिप्रभ नामक देव के रूप में आपका यहाँ जन्म हुआ है।

शशिप्रभ देव - (अवधिज्ञान से सारी बातें जानकर) मैं हस्तीचर हूँ, ओहो!! यह स्वर्गपुरी है और यह अतुल वैभव।

देवगण - स्वामिन्! आप जिनशासन के प्रभाव से इस उत्तम लक्ष्मी को प्राप्त हुए हैं। आप उठिए और मंगल स्नान कीजिए, पुन: वस्त्रालंकार से भूषित होकर जिनेन्द्र भवन में जिनप्रतिमाओं की पूजन करिये। अनन्तर अपने वैभव का निरीक्षण कीजिए और उत्तम-उत्तम भोगों का अनुभव कीजिए।

एक देव -(समीप जाकर) हे स्वामिन्! आप पुण्यवान हैं, आपकी सदा विजय हो। हे नाथ! स्नान की सामग्री तैयार है।

शशिप्रभ देव -(चिन्तन मुद्रा में) ये देवांगनाएं, ये परिवार देव, यह सब पुण्य का प्रसाद है। मैंने गुरुदेव के द्वारा जो सम्यक्त्वरूपी रत्न और अणुव्रतरूपी निधि प्राप्त की थी उसी के फलस्वरूप यह तेजोधाम प्राप्त हुआ है। (शशिप्रभ देव ने भी अपनी प्रसन्नता से सबको प्रसन्न करते हुए यथोचित क्रिया करके पहले जिनपूजा की) (मंदिर का दृश्य दिखाकर देव को परिवार देवों के साथ पूजा करते हुए दिखावें) (पुन: मंदिर से अपनी देवसभा में आकर)

एक देव - देखिये मित्रराज! अब आपको मैं यहाँ की व्यवस्था बता रहा हूँ। हे देवोत्तम! स्वर्ग के ये दिव्य वस्त्र, माला, मुकुट, आभूषण आदि ग्रहण करें जो हमेशा खिले पुष्प के समान आपके शरीर पर शोभायमान रहेंगे।

शशिप्रभ देव - धन्यवाद देव साथी! मैं आपके स्नेह का आभारी हूँ। हम और आप सभी मिलकर यहाँ पर स्वर्गसुख का उपभोग करते हुए धर्माराधना करेंगे। क्योंकि धर्म से बढ़कर संसार में कोई वस्तु नहीं है। (देवियाँ आगे बढ़कर देव को नमस्कार कर वहीं खड़ी हो जाती हैं)

शशिप्रभ देव - (हाथ जोड़कर) हे प्रभो! जिस जिनधर्म के प्रभाव से मुझे यह सब लक्ष्मी प्राप्त हुई है, वह जिनधर्म सदा जयवन्त रहे।

-तृतीय दृश्य-

निर्देशक -(स्वर्ग के दिव्य सुखों को भोगते हुए कभी वह देव सुदर्शन मेरु पर जाकर सोलह चैत्यालयों की वंदना करता है, कभी वह नन्दीश्वर द्वीप में ५२ चैत्यालयों में पूजा करता है, कभी तीर्थंकरों के पंचकल्याणकों के अवसर पर भक्तिभाव से भाग लेता है, कभी चारणऋद्धिधारी मुनियों की वंदना करके उनके उपदेश सुनता है, कभी अपने सच्चे गुरु अरविंद मुनिराज की पूजा करता है। कभी मध्यलोक में आकर सम्मेदशिखर की वंदना करके असीम पुण्य संचित कर लेता है और कभी अपनी देवांगनाओं के साथ क्रीड़ा भवन में क्रीड़ा करता है) (यहाँ देव को सम्मेदशिखर आदि तीर्थों की वंदना करते हुए दिखावें)

-चतुर्थ दृश्य-

(अब शशिप्रभ देव की देवायु के छह माह शेष रह गए अत: वह अपनी आयु का अन्त समय समझकर धर्माराधना में विशेषरूप से लीन रहने लगा) शशिप्रभ देव - ओह! मेरी आयु का अन्त समय आ गया है। अब मुझे शीघ्र ही जिनधर्म की आराधना में विशेषरूप से तत्पर हो जाना चाहिए।

देवसाथी - प्रभो! आपका विचार अति उत्तम है। इस संसार में जो जीव जन्म लेता है उसका मरण अवश्यंभावी है। बस, आवश्यकता इतनी है कि अंत समय में हमारा हर क्षण जिनेन्द्रदेव की आराधना में लगा रहे।

शशिप्रभ देव - चलें मित्रवर! चलकर नन्दीश्वर, सुमेरु आदि जिनालयों की वंदना करते हैं।

देवसाथी - चलिए देवोत्तम! चलते हैं।

निर्देशक - (शशिप्रभ देव अपने देव साथियों के साथ जाकर जिनालयों की वंदना एवं पूजन आदि करते हैं) (इस प्रकार देखते-देखते छह माह बीतने लगे। जब आयु का अंत समय नजदीक आया तो वे चैत्यवृक्ष के नीचे पद्मासन मुद्रा में बैठ गये)

शशिप्रभ देव - ॐ सिद्धाय नम:, ॐ सिद्धाय नम:, ॐ सिद्धाय नम:।

(इस मंत्र का उच्चारण करते हुए उन्होंने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया और समाधि के प्रभाव से जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश के राजा विद्युत्गति से अग्निवेग नाम के पुत्र हुए।)इधर कुक्कुट सर्प मरकर नरक में चला गया। (यहाँ नरक के दु:खों का दृश्य भी दिखावें)