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दिव्य शक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गाणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकेटनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

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०३. संक्षेप प्रत्याख्यान अधिकार-

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संक्षेपप्रत्याख्यान अधिकार

अध्याय ३

प्रश्न—संक्षेप प्रत्याख्यान अधिकार के मंगलाचरण में किनको नमस्कार किया है ?

उत्तर—

एस करंमि पणामं जिणवरवसहस्स वड्ढमाणस्स।
सेसाणं च जिणाणं सगणगणधराणं च सव्वेिंस।।१०८।।

जिनवर में प्रधान ऐसे वर्धमान भगवान को, शेष सभी तीर्थंकरों को और गण सहित सभी गणधर देवों को प्रमाण किया है।

प्रश्न—पापों का किस प्रकार प्रत्याख्यान करते हैं ?

उत्तर—

सव्वं पाणारंभं पच्चक्खामि अलीयवयणं च।
सव्वमदत्तादाणं मेहूणपरिग्गहं चेव।।१०९।।

सम्पूर्ण प्राणीिंहसा, असत्य वचन, सम्पूर्ण अदत्त ग्रहण, मैथुन तथा परिग्रह को भी मैं छोड़ता हूँ।

प्रश्न—सामायिक व्रत का स्वरूप और परिणाम शुद्धि किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

सम्मं मे सव्वभूदेसु वेरं मज्झं ण केणइ।
आसाए वोसरित्ताणं समािंध पडिवज्जए।।११०।।
सव्वं आहारवििंह सण्णाओ आसए कसाए य।
सव्वं चेय ममिंत्त जहामि सव्वं खमावेमि।।१११।।

मेरा सर्व प्राणियों में समताभाव है मेरा किसी के साथ वैर नहीं है। संपूर्ण धनादिकों की आशाओं को छोड़कर मैं शुभ परिणाम रूप समाधि को धारण करता हूँ। अन्न पानादि सर्व आहार विधि को, आहार आदि संज्ञाओं को, आशाओं और कषायों को तथा सम्पूर्ण ममत्व को भी मैं छोड़ता हूँ तथा सभी से क्षमा कराता हूँ।

प्रश्न—मोक्ष सुख कब मिलता है ?

उत्तर—

सव्वो गुणगणणिलओ मोक्खसुहे सिघं हेदु।
सव्वो चाउव्वण्णो ममापराधं।। कुन्द. मूला.।।

सर्व गुणों का घर जब यह आत्मा होता है, रत्नत्रय की प्राप्ति होती है। तब शीघ्र मोक्ष सुख का हेतु होता है। अर्थात् इसे रत्नत्रय की प्राप्ति हो जाती है। यह चतुर्वर्ण संघ जो मुझ से अपराध आज तक हुए हैं उनकी क्षमा करो। ऐसी उनसे प्रार्थना करता हूँ।

प्रश्न—प्रत्याख्यान किसे कहते है ?

उत्तर—अन्न जल का त्याग करना प्रत्याख्यान है।

प्रश्न—मरण की संदेहावस्था में प्रत्याख्यान किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

एदम्हि देशयाले उवक्कमो जीविदस्स जदि मज्झं।
एदं पच्चक्खाणं णित्थिण्णे पारणा हुज्ज।।११२।।

आकस्मिक शरीर त्याग के काल में यदि मेरे प्राण बच गये तो मेरी आहार में प्रवृत्ति होगी। मैं आहार ग्रहण करूँगा। अर्थात् जितने काल की मर्यादा करके मैंने आहार त्याग का व्रत लिया है उतना काल समाप्त होने पर मेरे देह का पतन नहीं हुआ तो मैं आहार ग्रहण करूँगा, अन्यथा नहीं।

प्रश्न—मरण की निश्चयावस्था में सर्व प्रत्याख्यान किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

सव्वं आहारवििंह पच्चक्खामि पाणयं वज्ज।
उविंह च वोसरामि य दुविहं तिविहेण सावज्जं।।११३।।

पेय पदार्थों को छोड़कर सम्पूर्ण आहरविधि का मैं त्याग करता हूँ और मन वचन कायपूर्वक दोनों प्रकार की उपाधि का भी त्याग करता हूँ।

प्रश्न—उत्तमार्थ विधि किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

जो कोई मज्झ उवही सब्भंतवाहिरो य हवे।
आहारं च सरीरं जावज्जीवा य वोसरे।।११४।।

जो कुछ भी मेरा अभ्यन्तर और बाह्य परिग्रह है उसको तथा आहार और शरीर को मैं जीवनभर के लिए छोड़ता हूँ।

प्रश्न—सब जीवों की शरण कौन है ?

उत्तर—

जम्मालीणा जीवा तरंति संसारसायरमणंतं।
तं सव्वजीवसरणं णंददु जिणसासणं सुइरं।।११५।।
जा गदी अरहंताणं णिट्ठिदट्ठाणं च जा गदी।
जा गदी वीदमोहाणं सा मे भवदु सस्सदा।।११६।।

जिसका आश्रय लेकर जीव अनंत संसार समुद्र को पार के लते हैं, सभी जीवों का शरणभूत वह जिनशासन चिरकाल तक वृद्धिगत होवें। अर्हंतों की जो गति है और सिद्धों की जो गति है तथा वीतमोह जीवों की जो गति है वही गति मेरी सदा होवें।

प्रश्न—पण्डितमरण श्रेष्ठ क्यों है ?

उत्तर—

एगं पंडियमरणं िंछदइ जाईसयाणि बहुगाणि।
तं मरणं मरिदव्वं जेण मदं सुम्मदं होदि।।११७।।

जिस कारण एक पण्डित मरण अनेक प्रकार के सैकड़ों भवों को नष्ट कर देता है और जिस मरण के द्वारा मरण प्राप्त करने से पुन: मरण नहीं होता है किन्तु सुमरण हो जाता है अर्थात् पुन: जन्म ही नहीं होता है। अत: पण्डितमरण श्रेष्ठ है।

प्रश्न—समाधि मरण से कितने भव में मोक्ष की प्राप्ति होती है ?

उत्तर—

एगम्हि य भवगहणे समाहिमरणं लहिज्ज जदि जीवो।
सत्तट्ठभवग्गहणे णिव्वाणमणुत्तरं लहदि।।११८।।

यदि जीव एक भव में समाधिमरण को प्राप्त कर लेता है तो वह सात या आठ भव लेकर पुन: सर्वश्रेष्ठ निर्वाण को प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न—दु:ख का कारण क्या है?

उत्तर—

णत्थि भयं मरणसमं जम्मणसमयं ण बिज्जदे दुक्खं।
जम्मणमरणादंवं छिदि ममिंत्त सरीरादो।।११९।।

शरीर, जन्म और मरण दु:ख का कारण है क्योंकि मरण के समान अन्य कोई भाग नहीं है और जन्म के समान अन्य कोई दु:ख ्नाहीं है अत: जन्म मरण के कष्ट के निमित्त ऐसे शरीर के ममत्व को छोड़ो।

प्रश्न—आराधना में तीन प्रतिक्रमण कौन से हैं ?

उत्तर—

पढमं सव्वदिचारं बिदियं तिविहं हवे पडिक्कमणं।
णाणस्स परिच्चयणं जावज्जीवाय मुत्तमट्ठं च।।१२०।।

तप काल के समय में जो दोष लगे हैं उनका प्रतिक्रमण। यह प्रथम सर्वातिचार प्रतिक्रमण है। तीन प्रकार के आहार का त्याग करते हैं उस समय दूसरा त्रिविध आहार त्याग प्रतिक्रमण करते हैं। आमरण पानी का त्याग करते हैं उस समय तीसरा उत्तर्मािथक प्रतिक्रमण करते हैं। प्रतिक्रमण के चार भेद भी हैं।

योगप्रतिक्रमण : मनोयोग, वचनयोग और काययोग का त्याग करना योग प्रतिक्रमण है।

इंद्रियप्रतिक्रमण : पाँच प्रकार के स्पर्शनादि इन्द्रियों का व्यापार रोकना, अपने स्पर्शनादि विषयों में नहीं जाने देना इंद्रियप्रतिक्रमण है।

शरीर प्रतिक्रमण : औदारिकादि शरीर कृश करना।

कषाय प्रतिक्रमण : अनंतानुबंध्यादि सोलह कषायों का तथा हास्यरत्यादि नौ—नौ कषायों का त्याग करना अर्थात् इनको कृश करना।

प्रश्न—मुंडन कितने प्रकार के हैं ?

उत्तर—

पंचवि इंदियमुंडा वचमुंडा हत्थपायमणमुंडा।
तणुमुंडेण वि सहिया दस मुंडा वण्णिया समए।।१२१।।

दस मुंडन हैं : पाँच इन्द्रिय मुंडन, वचनमुंडन और शरीर मुण्डन से सहित हस्त, पाद एवं मनोमुण्डन ऐसे दश मुण्डन आगम में कहे गये हैं।

इन्द्रिय मुंडन : पाँचों इन्द्रिय विषयों के व्यापार से इन्द्रियों को अलग करना ये इन्द्रिय मुण्डन हैं।

वचन मुंडन : अप्रासंगिक प्रलाप रूप वचन का खण्डन या रोकना वचन मुण्डन है।

हस्त और पाद मुंडन : अप्रशस्त रूप से हाथ और पैर का संकोचन नहीं करना और न फैलाना।

मनोमुंडन : मन को अप्रशस्त चिंतन से रोकना।