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०४-योगमार्गणाधिकार

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योगमार्गणाधिकार

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन त्रयोविंशतिसूत्रै: अल्पबहुत्वानुगमे चतुर्थोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्येन योगमार्गणायामल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘जोगा-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले द्वितीयप्रकारेण विशेषेणवाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादिना एकोनविंशतिसूत्राणीति समुदायपातनिका भवति।
इदानीं योगमार्गणायामल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
जोगाणुवादेण सव्वत्थोवा मणजोगी।।१०७।।
वचिजोगी संखेज्जगुणा।।१०८।।
अजोगी अणंतगुणा।।१०९।।
कायजोगी अणंतगुणा।।११०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोगिन: सर्वस्तोका: देवानां संख्यातभागप्रमाणत्वात्। तेभ्यो वचनयोगिन: संख्यातगुणा:। एभ्योऽनन्तगुणा: अयोगिन:, अत्र गुणकार: अभव्यसिद्धिकैरनन्तगुणो भवति। एभ्यश्चानन्तगुणा: काययोगिन:, अत्र गुणकार: सिद्धेभ्योऽभव्यसिद्धिकेभ्य: सर्वजीवप्रथमवर्गमूलादपि अनंतगुणोऽस्ति।
एवं प्रथमस्थले सामान्यतयाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
अधुना विशेषेणाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय एकोनविंशतिसूत्राण्यवतार्यन्ते-
अत्र सिद्धान्तचिंतामणिटीकाभि: सह सूत्राणि कथ्यन्ते-
सव्वत्थोवा आहारमिस्सकायजोगी।।१११।।
आहारकायजोगी संखेज्जगुणा।।११२।।
को गुणकार: ?
द्वे रूपे इति।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी असंखेज्जगुणा।।११३।।
गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग:।
सच्चमणजोगी संखेज्जगुणा।।११४।।
स्वभावात्।
मोसमणजोगी संखेज्जगुणा।।११५।।
सत्यमनोयोगकालात् मृषामनोयोगकालस्य संख्यातगुणत्वात् सत्यमनोयोगपरिणमनवारेभ्य: मृषामनोयोगपरिणमनवाराणां संख्यातगुणत्वाद् वा।
सच्च-मोसमणजोगी संखेज्जगुणा।।११६।।
असच्च-मोसमणजोगी संखेज्जगुणा।।११७।।
मणजोगी विसेसाहिया।।११८।।
अत्र कियन्मात्रविशेष: ?
सत्य-मृषा-सत्यमृषामनोयोगिमात्रो विशेषोऽत्र ज्ञातव्य:।
सच्चवचिजोगी संखेज्जगुणा।।११९।।
मनोयोगिकालात् वचनयोगिकालस्य संख्यातगुणत्वात् मनोयोगवारेभ्य: सत्यवचनयोगवाराणां संख्यातगुणत्वाद्वा।
मोसवचिजोगी संखेज्जगुणा।।१२०।।
सच्चमोसवचिजोगी संखेज्जगुणा।।१२१।।
वेउव्वियकायजोगी संखेज्जगुणा।।१२२।।
सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।
असच्चमोसवचिजोगी संखेज्जगुणा।।१२३।।
द्वीन्द्रियपर्याप्तजीवानां ग्रहणात्, अनुभयवचनयोगिन: संख्यातगुणा: सन्ति।
वचिजोगी विसेसाहिया।।१२४।।
कियन्मात्रेण ?
सत्य-मृषा-उभयवचनयोगिमात्रेण विशेषेणाधिका: सन्ति।
अजोगी अणंतगुणा।।१२५।।
अत्र गुणकार:, अभव्यजीवैरनन्तगुणोऽस्ति।
कम्मइयकायजोगी अणंतगुणा।।१२६।।
ओरालियमिस्सकायजोगी असंखेज्जगुणा।।१२७।
अत्र गुणकार: अन्तर्मुहूर्तं।
ओरालियकायजोगी संखेज्जगुणा।।१२८।।
कायजोगी विसेसाहिया।।१२९।।
कियन्मात्रविशेष: ?
शेषकाययोगिमात्रो विशेषो ज्ञातव्य:।
एवं द्वितीयस्थलेऽल्पबहुत्वकथनत्वेन एकोनविंशतिसूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडेऽल्पबहुत्वानुगमे महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम-चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।


अथ योगमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में तेईस सूत्रों के द्वारा अल्पबहुत्वानुगम में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य से योगमार्गणा में अल्पबहुत्व का कथन करने वाले ‘‘जोगा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में द्वितीय प्रकार से विशेषरूप से अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादि उन्नीस सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका है।

अब योगमार्गणा में अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुसार मनोयोगी जीव सबसे स्तोक हैं।।१०७।।

मनोयोगियों से वचनयोगी जीव संख्यातगुणे हैं।।१०८।।

वचनयोगियों से अयोगी जीव अनन्तगुणे हैं।।१०९।।

अयोगियों से काययोगी अनन्तगुणे हैं।।११०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-योगमार्गणा के अन्तर्गत मनोयोगी जीव सबसे कम हैं, क्योंकि वे देवों के संख्यातवेें भाग हैं। वचनयोगी जीव मनोयोगियों से संख्यात गुणे हैं, उनसे अनन्तगुणे अयोगी भगवान हैं, यहाँ गुणकार अभव्यसिद्धों से अनन्तगुणा होता है। इनसे अनन्तगुणे काययोगी जीव हैं, यहाँ गुणकार अभव्यसिद्धिकों, सिद्धों और सभी जीवों के प्रथम वर्गमूल से भी अनन्तगुणा है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्यरूप से अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब विशेषरूप से अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने हेतु उन्नीस सूत्र अवतरित होते हैं-

यहाँ सिद्धान्तचिंतामणिटीका के साथ सूत्रों का कथन करते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारकमिश्रकाययोगी सबसे कम हैं।।१११।।

आहारकमिश्र काययोगियों से आहारकाययोगी संख्यातगुणे हैं।।११२।।

यहाँ गुणकार कितना है ? गुणकार दो रूप है।

सूत्रार्थ-

आहारकाययोगियों से वैक्रियिक मिश्रकाययोगी असंख्यातगुणे है।।११३।।

यहाँ गुणकार जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग है।

सूत्रार्थ-

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों से सत्यमनोयोगी संख्यातगुणे हैं।।११४।।

ऐसा स्वभाव से है।

सूत्रार्थ-

सत्य मनोयोगियों से मृषामनोयोगी संख्यातगुणे हैं।।११५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्योंकि सत्यमनोयोग के काल की अपेक्षा मृषामनोयोग का काल संख्यातगुणा है, अथवा सत्यमनोयोग के परिणमनवारों की अपेक्षा मृषामनोयोग के परिणमनवार संख्यातगुणे हैं।

सूत्रार्थ-

मृषामनोयोगियों से सत्य-मृषामनोयोगी संख्यातगुणे हैं।।११६।।

सत्य-मृषामनोयोगियों से असत्य-मृषामनोयोगी संख्यातगुणे हैं।।११७।।

असत्य-मृषामनोयोगियों से मनोयोगी विशेष अधिक हैं।।११८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ विशेष कितना है ? सत्य, मृषा और सत्य-मृषा मनोयोगियों के बराबर विशेष का प्रमाण यहाँ जानना चाहिए।

सूत्रार्थ-

मनोयोगियों से सत्यवचनयोगी संख्यातगुणे हैं।।११९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्योंकि मनोयोगी जीवों के काल से वचनयोगी जीवों का काल संख्यातगुणा है, अथवा मनोयोगवारों से सत्यवचनयोगवार संख्यातगुणे अधिक हैं।

सूत्रार्थ-

सत्यवचनयोगियों से मृषावचनयोगी संख्यातगुणे हैं।।१२०।।

मृषावचनयोगियों से सत्य-मृषावचनयोगी संख्यातगुणे हैं।।१२१।।

सत्य-मृषावचनयोगियों से वैक्रियिककाययोगी संख्यातगुणे हैं।।१२२।। सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है।

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगियों से असत्य-मृषावचनयोगी संख्यातगुणे हैं।।१२३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दो इन्द्रिय पर्याप्त जीवों का ग्रहण होने से यहाँ अनुभय वचनयोगी जीवों की संख्या संख्यातगुणी मानी है।

सूत्रार्थ-

असत्य-मृषावचनयोगियों से वचनयोगी विशेष अधिक हैं।।१२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कितने मात्र विशेष अधिक हैं ? ऐसा पूछने पर उत्तर दिया है कि सत्य-मृषा और उभयवचनयोगी मात्र से विशेषअधिक हैं।

सूत्रार्थ-

वचनयोगियों में अयोगी अनन्तगुणे हैं।।१२५।।

यहाँ गुणकार अभव्यजीवों से अनन्तगुणा है।

सूत्रार्थ-

अयोगियों से कार्मणकाययोगी अनन्तगुणे हैं।।१२६।।

कार्मणकाययोगी से औदारिकमिश्रकाययोगी असंख्यातगुणे हैं।।१२७।। यहाँ गुणकार अन्तर्र्मुहूर्त मात्र है।

सूत्रार्थ-

औदारिकमिश्रकाययागियों से औदारिककाययोगी संख्यातगुणे हैं।।१२८।।

औदारिककाययोगियों से काययोगी विशेष अधिक हैं।।१२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कितने मात्र विशेष अधिक हैं ?

शेष काययोगी मात्र विशेष अधिक हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में अल्पबहुत्व का कथन करने वाले उन्नीस सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में अल्पबहुत्वानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।