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०४.योगमार्गणाधिकार

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विषय सूची

योगमार्गणाधिकार

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ पंचभि: स्थलै: त्रिंशत्सूत्रै: स्पर्शनानुगमे योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तत: परं द्वितीयस्थले काययोगिनां औदारिकयोगिनां च स्पर्शननिरूपणत्वेन ‘‘कायजोगि’’ इत्यादि सूत्रपंचकं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले वैक्रियिककाययोगिनां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादिसूत्रदशकं। तदनंतरं चतुर्थस्थले आहारकाययोगिनां स्पर्शननिरूपणत्वेन ‘‘आहार’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तत: परं पंचमस्थले कार्मणयोगिनां स्पर्शनकथनमुख्यत्वेन ‘‘कम्मइय’’ इत्यादिना सूत्रद्वयमिति समुदायपातनिका भवति।
अधुना पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगिनां स्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-
जोगाणुवादेण पंचमणजोगि-पंचवचिजोगी सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।९९।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१००।।
अट्ठचोद्दसभागा वा देसूणा।।१०१।।
समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१०२।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१०३।।
अट्ठचोद्दसभागा देसूणा सव्वलोगो वा।।१०४।।
उववादो णत्थि।।१०५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानेनार्पितजीवै: त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग: तिर्र्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। एष वा शब्दस्यार्थ:। विहारवत्स्वस्थानेन चतुर्दशभागेषु अष्टभागा देशोना: स्पृष्टा:, अष्टरज्जुबाहल्यलोकनाल्यां मनोवचनयोगिनां विहारोपलंभात्।
आहारतैजसपदाभ्यां चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभाग: स्पृष्ट:। वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातै: अष्टचतुर्दशभागा: देशोना: स्पृष्टा:, अष्टरज्ज्वायतलोकनाल्यां सर्वत्रातीते काले वेदना-कषायविक्रियमाणानां उपलंभात्। मारणान्तिकेन सर्वलोक: स्पृष्ट:।
मनोवचनयोगानामुपपादभावात् एषां योगसहितानामुपपादो नास्ति।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनयोग-सहितानां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रसप्तकं गतम्।
इदानीं काययोगिनां औदारिकमिश्रौदारिककाययोगिस्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
कायजोगि-ओरालियमिस्सकायजोगी सत्थाण-समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१०६।।
सव्वलोगो।।१०७।।
ओरालियकायजोगी सत्थाणसमुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१०८।।
सव्वलोगो।।१०९।।
उववादं णत्थि।।११०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिकपदै: वर्तमानातीतकालयो: इमे सामान्यकाय-योगिन: औदारिकमिश्रयोगिनश्च सर्वलोकं स्पृशंति, सर्वत्र गमनागमनावस्थानं प्रति विरोधाभावात्। विहार वत्स्वस्थान-वैक्रियिकपदाभ्यां वर्तमानक्षेत्रवत्। अतीतेन अष्टचतुर्दशभागा: देशोना: स्पृष्टा:। वैक्रियिकपदेन त्रयाणां लोकानां संख्यातभाग:। तैजसाहारपदाभ्यां चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभाग: स्पृष्ट:।
अत्र वाशब्देन विना कथमेषोऽर्थोऽत्र व्याख्यायते ?
नैष दोष:, एतस्य सूत्रस्य देशामर्शकत्वात्।
विहारवत्स्वस्थान-वैक्रियिक-तैजसाहारपदानि औदारिकमिश्रे न सन्ति।
औदारिककाययोगिभि: स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिकपदै: वर्तमानातीतकालयो: सर्वलोक: स्पृष्ट:, विहारवत्स्वस्थानेन वर्तमानक्षेत्रवत्। इदं सूत्रं देशामर्शकं कृत्वा सर्वमिदं व्याख्यानं सूत्रारूढं कर्तव्यं। उपपादकाले औदारिककाययोगस्याभावात् अत्र उपपादमपि नास्ति।
एवं द्वितीयस्थले औदारिकयोगसहितानां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।


अथ योगमार्गणा अधिकार

अब पाँच स्थलों में तीस सूत्रों के द्वारा स्पर्शनानुगम में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में मनोयोगी एवं वचनयोगी जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में सामान्य काययोगी एवं औदारिककाययोगी जीवों का स्पर्शन निरूपण करने हेतु ‘‘कायजोगि’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में वैक्रियिक काययोगियों का स्पर्शन बतलाने वाले ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि दश सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में आहारककाययोगियों का स्पर्शन निरूपण करने वाले ‘‘आहार’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: पंचमस्थल में कार्मणकाययोगियों का स्पर्शन कथन करने वाले ‘‘कम्मइय’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगी जीवों का स्पर्शन प्ररूपण करने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणानुसार पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।९९।।

पूर्वोक्त जीव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।१००।।

अथवा उक्त जीव स्वस्थान पदों से कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।।१०१।।

पूर्वोक्त जीवों द्वारा समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।१०२।।

पूर्वोक्त जीवों द्वारा समुद्घात की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।१०३।।

अथवा उन्हीं जीवों द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग या सर्व लोक स्पृष्ट हैं।।१०४।।

पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगी जीवों के उपपाद पद नहीं होता है।।१०५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान से सहित जीवों के द्वारा तीनों लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। यह ‘वा’ शब्द का अर्थ है। विहारवत्स्वस्थान के द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट है, क्योंकि आठ राजू बाहल्ययुक्त लोकनाली में मनोयोगी-वचनयोगी जीवों का विहार पाया जाता है।

आहारकसमुद्घात और तैजससमुद्घात पदों की अपेक्षा चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मानुषक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है। वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों से कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि आठ राजु आयत लोकनाली में सर्वत्र अतीतकाल में वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात पाये जाते हैं। मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा सर्वलोक स्पृष्ट है।

मनोयोगी और वचनयोगी जीवों के उपपाद का अभाव होने से इन योगसहित जीवों के उपपाद नहीं है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मनो-वचनयोग सहित जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब काययोगी जीवों में औदारिककाय और औदारिकमिश्रकाययोगियों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

काययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१०६।।

उपर्युक्त जीव उक्त पदों से सर्वलोक स्पर्श करते हैं।।१०७।।

औदारिक काययोगी जीव स्वस्थान और समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१०८।।

औदारिककाययोगी जीव स्वस्थान व समुद्घात की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्श करते हैं।।१०९।।

औदारिककाययोग में उपपाद पद नहीं होता है।।११०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात पदों से वर्तमान व अतीतकालों में ये सामान्य काययोगी एवं औदारिकमिश्रकाययोगी जीव सर्वलोक का स्पर्श करते हैं, क्योंकि उन जीवों के सर्वत्र गमनागमन और अवस्थान में कोई विरोध नहीं है। विहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिक समुद्घात पदों से वर्तमान क्षेत्र के समान है और अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भागों का स्पर्श किया है। वैक्रियिक पद की अपेक्षा तीन लोकों के संख्यातवें भाग का स्पर्श किया है। तैजस समुद्घात और आहारकसमुद्घात पदों से चार लोकों के असंख्यातवें भाग व मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग का स्पर्श किया है।

शंका-यहाँ प्रस्तुत सूत्र में वा शब्द के बिना यहाँ इस अर्थ का व्याख्यान कैसे किया जाता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह सूत्र देशामर्शक है।

विहारवत्स्वस्थान, वैक्रियिकसमुद्घात, तैजससमुद्घात और आहारकसमुद्घात पद औदारिकमिश्रयोग में नहीं होते हैं।

स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और मारणान्तिक समुद्घात पदों से औदारिककाययोगी जीवों ने वर्तमान और अतीतकालों में सर्वलोक का स्पर्श किया है। विहारवत्स्वस्थान से वर्तमान काल की अपेक्षा स्पर्शन का निरूपण क्षेत्र के समान है। यह सूत्र देशामर्शक करके यह सम्पूर्ण व्याख्यान सूत्रारूढ़ करना चाहिए। उपपाद काल में औदारिककाययोग का अभाव होने से वहाँ उपपाद नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में औदारिककाययोग सहित जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रदशकमवतार्यते-

वेउव्वियकायजोगी सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१११।।

लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।११२।।
अट्ठचोद्दसभागा देसूणा।।११३।।
समुग्घादेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।११४।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।११५।।
अट्ठ-तेरहचोद्दसभागा देसूणा।।११६।।
उववादं णत्थि।।११७।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।११८।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।११९।।
समुग्घाद-उववादं णत्थि।।१२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वैक्रियिकयोगिभि: स्वस्थानै: लोकस्यासंख्यातभाग:, वर्तमानकालप्रधानत्वात्। अतीतकाले एतै: त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। विहारवत्स्वस्थानेन अष्टचतुर्दशभागा: स्पृष्टा:, अष्टरज्जुबाहल्यलोकनाल्यां वैक्रियिककाययोगेन देवानां विहारोपलंभात्। एतेनैव तृतीयनरकपर्यंतं गत्वा देवा: नारकान् संबोधयन्ति।
वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदै: अष्टचतुर्दशभागा: स्पृष्टा:। मारणान्तिकेन त्रयोदशचतुर्दशभागा देशोना: स्पृष्टा:।
कुत: ?
मेरुमूलादुपरि सप्त अध: षड्रज्जु-आयामलोकनालिमापूर्य वैक्रियिककाययोगेनातीते काले कृतमारणान्तिकजीवानामुपलंभात्। एषां उपपादं नास्ति, तत्र वैक्रियिककाययोगाभावात्।
वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनां विहारवत्स्वस्थानं नास्ति।
कश्चिदाशंकते-भवतु नाम, मारणान्तिकोपपादयोरभाव:, एतयोद्र्वयोर्वैक्रियिकमिश्रकाययोगेन सह विरोधाभावात्। वैक्रियिकस्यापि तत्राभावो भवतु, अपर्याप्तकाले तदसंभवात्। न पुन: वेदना-कषाययोस्तत्रासंभव:, नारकेषु अपर्याप्तकाले एव तयोरुपलंभात् ?
अत्र परिहरति आचार्यदेव:-भवतु नाम नारकेष्वपर्याप्तकाले तयोर्वेदनाकषाययो: संभव:, किन्तु तत्र स्वस्थानक्षेत्रादधिवंâ क्षेत्रं न लभ्यते इति तयो: प्रतिषेध: कृत:।
किमिति न लभ्यते ?
जीवप्रदेशानां तत्र शरीरत्रिगुणविस्फुरणाभावात्।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिक-तन्मिश्रयोगधारिणां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन दश सूत्राणि गतानि।
अधुना आहारकाययोगिनां स्पर्शनकथनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
आहारकायजोगी सत्थाण-समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१२१।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१२२।।
उववादं णत्थि।।१२३।।
आहारमिस्सकायजोगी सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१२४।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१२५।।
समुग्घाद-उववादं णत्थि।।१२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वर्तमानस्पर्शनं क्षेत्रवत्। अतीतापेक्षया स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषायपदै: चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभाग: स्पृष्ट:। मारणान्तिकेन चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुण: स्पृष्ट:। अत्रोपपादं नास्ति, अत्यन्ताभावेनापसारितत्वात्। आहारमिश्रकाययोगे विहारवत्स्वस्थानं नास्ति। समुद्घातोपपादौ च न स्त:, अत्यन्ताभावेन निराकृतत्वात्।
एवं चतुर्थस्थले आहार-तन्मिश्रयोगसहितानां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
कार्मणकाययोगसहितानां स्पर्शनकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
कम्मइयकायजोगीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१२७।।
सव्वलोगो।।१२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘‘विग्रहगतौ कर्मयोग:’’ इति निमित्तेन सर्वस्य संसारिप्राणिन: विग्रहगतौ कार्मणकाययोगोऽस्ति इति ते जीवा सर्वलोकं स्पृशन्ति।
तात्पर्यमेतत्-ये केचिन्महापुरुषा: पंचेन्द्रियाणि संयम्य स्वमनोमर्कटं वशीकुर्वते त एव योगं निरुध्य अयोगिनो भूत्वा सर्वकर्माणि निहन्ति, सिद्धालयं गत्वानन्तानंतकालं सुखमनुभवन्तीति योगमार्गणास्पर्शनपठनस्य फलं ज्ञातव्यं।
तीर्थकराणां योगनिरोधकालं च शास्त्रे श्रूयते-
आद्यश्चतुर्दशदिने विनिवृत्तयोग:, षष्ठेन निष्ठितकृतिर्जिनवर्धमान:।
शेषा विधूतघनकर्मनिबद्धपाशा, मासेन ते यतिवरास्त्वभवन् वियोगा:१।।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे क्षेत्रानुगमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार समाप्त:।


अब वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु दश सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगी जीव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१११।।

वैक्रियिककाययोगी जीव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।११२।।

अतीतकाल की अपेक्षा वैक्रियिककाययोगी जीव कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।।११३।।

उक्त जीव समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।११४।।

उक्त जीव समुद्घात की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।११५।।

उक्त जीव अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह और तेरह बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।।११६।।

वैक्रियिककाययोगी जीवों में उपपाद पद नहीं होता है।।११७।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।११८।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।११९।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों के समुद्घात और उपपाद नहीं होते हैं।।१२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वैक्रियिककाययोगी जीवों के द्वारा स्वस्थानपदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया गया है, क्योंकि वहाँ वर्तमानकाल की प्रधानता है। अतीतकाल में इनके द्वारा तीनों लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया गया है। विहारवत्स्वस्थान की अपेक्षा आठ बटे चौदह भागों का स्पर्श किया है, क्योंकि आठ राजू मोटी लोकनाली में वैक्रियिककाययोग से देवों का विहार पाया जाता है। इसी कारण से तृतीय नरक पर्यन्त जाकर देवगण नारकियों को सम्बोधन प्रदान करते हैं।

वेदना-कषाय और वैक्रियिकपदों के द्वारा जीव आठ बटे चौदह भाग का स्पर्श करते हैं। मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा कुछ कम तेरह बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।

ऐसा क्यों है ?

क्योंकि मेरुमूल से ऊपर सात और नीचे छह राजू आयाम वाली लोकनाली को पूर्ण करके वैक्रियिककाययोग के साथ अतीतकाल में मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त जीव पाये जाते हैं। उन जीवों का उपपाद नहीं है, क्योंकि वहाँ वैक्रियिककाययोग का अभाव है।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों के विहारवत्स्वस्थान नहीं है।

यहाँ कोई शंका करता है कि- वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों के मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद पदों का अभाव भले ही हो, क्योंकि इन दोनों का वैक्रियिकमिश्रकाययोग के साथ विरोध का अभाव है। इसी प्रकार वैक्रियिकसमुद्घात का भी उनके अभाव भले ही होवे, क्योंकि अपर्याप्तकाल में वैक्रियिकसमुद्घात का होना असंभव है। किन्तु वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों की उनमें असंभावना नहीं है, क्योंकि नारकियों के ये दोनों समुद्घात अपर्याप्तकाल में ही पाये जाते हैं ? यहाँ आचार्यदेव इस शंका का परिहार करते हैं कि- नारकियों के अपर्याप्तकाल में वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों की संभावना भले ही हो, किन्तु उनमें स्वस्थान क्षेत्र से अधिक क्षेत्र नहीं पाया जाता है। इसी कारण उनका प्रतिषेध किया है।

शंका-स्वस्थान क्षेत्र से अधिक क्षेत्र वहाँ क्यों नहीं पाया जाता है ?

समाधान-क्योंकि उनमें जीव प्रदेशों के शरीर से तीन गुने बिस्फुरण का अभाव है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रयोगधारी जीवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने वाले दश सूत्र पूर्ण हुए।

अब आहारककाययोगियों का स्पर्शन बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगी जीव स्वस्थान और समुद्घात पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१२१।।

आहारककाययोगी जीव उक्त पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।१२२।।

आहारककाययोगी जीवों के उपपाद पद नहीं होता है।।१२३।।

आहारकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१२४।।

आहारकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।१२५।।

आहारकमिश्रकाययोगी जीवों के समुद्घात और उपपाद पद नहीं होते हैं।।१२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वर्तमानकाल का स्पर्शन क्षेत्रप्ररूपणा के समान है। अतीतकाल की अपेक्षा स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों से आहारककाययोगी जीवों के द्वारा चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मानुषक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया गया है। मारणान्तिक समुद्घात से चार लोकों के असंख्यातवें भाग और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणे क्षेत्र का स्पर्श किया है। यहाँ उपपाद पद नहीं है, क्योंकि वह अत्यन्ताभाव रूप से बहुत ही दूर है। आहारकमिश्रकाययोग में विहारवत्स्वस्थान नहीं है। समुद्घात और उपपाद नहीं होते हैं, क्योंकि यहाँ भी वे अत्यन्तभाव से निराकृत-बहुत दूर हैं।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में आहारक और आहारकमिश्रकाययोग सहित जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब कार्मणकाययोग सहित जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी जीव कितने क्षेत्र को स्पर्श करते हैं ?।।१२७।।

कार्मणकाययोगियों द्वारा सर्वलोक का स्पर्श किया जाता है।।१२८।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘‘विग्रहगति में कार्मणकाययोग रहता है’’ इस निमित्त से सभी संसारी प्राणी के विग्रहगति में कार्मणकाययोग होता है। इस प्रकार वे जीव सम्पूर्ण लोक का स्पर्श करते हैं।

तात्पर्य यह है कि-जो कोई महापुरुष पाँचों इन्द्रियों को संयमित करके अपने मनरूपी बन्दर को वश में कर लेते हैं, वे ही योगों का निरोध करके अयोगी होकर सर्वकर्मों को नष्ट करते हैं और सिद्धालय में जाकर वहाँ अनन्तानन्त काल तक सुख का अनुभव करते हैं, ऐसा योगमार्गणा के अन्तर्गत स्पर्शनानुगम प्रकरण के पढ़ने का फल जानना चाहिए।

जैसा कि तीर्थंकरों के योग निरोध का काल शास्त्र में सुना जाता है- श्लोकार्थ-भगवान ऋषभदेव चौदह दिन का योग निरोध करके सिद्ध हुए एवं भगवान महावीर बेला दो दिन का योग निरोध करके मोक्ष को प्राप्त हुए। शेष बाइस तीर्थंकरों ने एक-एक माह का योग निरोध करके अघातिया कर्मों का नाश करके मोक्षधाम को प्राप्त किया है।।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा स्पर्शनानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में योगमार्गणा नामक चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।