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दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

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०४.योगमार्गणा अधिकार

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योगमार्गणा अधिकार

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन अष्टादशसूत्रैः द्रव्यप्रमाणानुगमे योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः प्रारभ्यते । तत्र तावत् प्रथमस्थले मनोयोगिवचनयोगिनां संख्यानिरूपणत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रषट्कं । तदनु द्वितीयस्थले औदारिक-औदारिकमिश्र-कार्मणकाययोगिनां संख्याकथनत्वेन ‘‘कायजोगि-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनंतरं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां द्रव्यप्रमाणनिरूपणत्वेन ‘‘वेउव्विय-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। ततः परं चतुर्थस्थले आहारकमुनीनां द्रव्यप्रमाणकथनत्वेन ‘‘आहार’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयमिति समुदायपातनिका।
अधुना पंचमनोयोगिपंचवचनयोगिनां द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
जोगाणुवादेण पंचमणजोगी तिण्णिवचिजोगी दव्वपमाणेण केवडिया ?।।८४।।
देवाणं संखेज्जदिभागो।।८५।।
वचिजोगि-असच्चमोसवचिजोगी दव्वपमाणेण केवडिया ?।।८६।।
असंखेज्जा।।८७।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।८८।।
खेत्तेण वचिजोगि-असच्चमोसवचिजोगीहि पदरमवहिरदि अंगुलस्स संखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण।।८९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सामान्यमनोयोगि-सत्यमनोयोगि-असत्यमनोयोगि-उभयमनोयोगि-अनुभय-मनोयोगिन:, सत्यवचनयोगि-असत्यवचनयोगि-उभयवचनयोगिनश्च इमे अष्टविधा योगमार्गणासहिताः देवानां संख्यातभागाः। सामान्यवचनयोगि-अनुभयवचनयोगिनोः असंख्याता भवन्ति।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनां संख्यानिरूपणत्वेन सूत्राणि षड् गतानि।
संप्रति औदारिककाययोगि-कार्मणकाययोगिनां द्रव्यप्रमाणनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
कायजोगि-ओरालियकायजोगि-ओरालियमिस्सकायजोगि-कम्मइय-कायजोगी दव्वपमाणेण केवडिया ?।।९०।।
अणंता।।९१।।
अणंताणंताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण।।९२।।
खेत्तेण अणंताणंता लोगा।।९३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सामान्येन काययोगिनः औदारिक-औदारिकमिश्रकाययोगिनः कार्मणकाययोगिनश्च जीवाः एकेन्द्रियवनस्पतिकायिकजीवापेक्षया अनंतानंता भवन्ति। अत्र मध्यमानंतानंतप्रमाणं गृहीतव्यं।
एवं द्वितीयस्थले औदारिकादियोगसहितानां संख्यानिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम् ।
वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनोः द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
वेउव्वियकायजोगी दव्वपमाणेण केवडिया ?।।९४।।
देवाणं संखेज्जदिभागूणो।।९५।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी दव्वपमाणेण केवडिया।।९६।।
देवाणं संखेज्जदिभागो।।९७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-देवेषु पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगि-वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनां राशयः देवानां संख्यातभागमात्रा भवन्ति, एताः देवराशिभ्यः अपनीते अवशेषं वैक्रियिककाययोगिप्रमाणं भवति।
संख्यातवर्षसहस्रोपक्रमणकालसंचितसंख्यातखण्डे कृते एकखण्डं वैक्रियिकमिश्रराशिप्रमाणं भवति।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिककाययोगसहितानां द्रव्यप्रमाणकथनत्वेन सूत्राणि चत्वारि गतानि।
अधुना आहारककायसहितानां द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
आहारकायजोगी दव्वपमाणेण केवडिया ?।।९८।।
चदुवण्णं।।९९।।
आहारमिस्सकायजोगी दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१००।।
संखेज्जा।।१०१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-आहारककाययोगिमुनयः द्रव्यप्रमाणापेक्षया चतुःपञ्चाशद् भवन्ति। आहारकमिश्रयोगिनः चतुःपंचाशत् संख्याभ्यन्तरे एव भवन्ति न च बहिः। आचार्यपरंपरागतोपदेशेन पुनः इमे सप्तविंशतिप्रमाणा भवन्ति ।
एवं चतुर्थस्थले योगमार्गणायां आहारकयोगिमुनीनां संख्याकथनत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे द्रव्यप्रमाणानुगमे गणिनी- ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः समाप्तः।


अथ योगमार्गणा अधिकार

अब चार स्थलों में अठारह सूत्रों के द्वारा द्रव्यप्रमाणानुगम में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों की संख्या निरूपण करने वाले ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: आगे द्वितीय स्थल में औदारिक-औदारिकमिश्र और कार्मणकाययोगी जीवों की संख्या का कथन करने वाले ‘‘कायजोगि’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तदनंतर तृतीय स्थल में वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का द्रव्यप्रमाण निरूपण करने हेतु ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके आगे चतुर्थ स्थल में आहारक मुनियों का द्रव्यप्रमाण कथन करने वाले ‘‘आहार’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब पाँचों मनोयोगी एवं पाँचों वचनयोगियों का द्रव्यप्रमाण प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणानुसार पाँच मनोयोगी और सत्य, असत्य व उभय ये तीन वचनयोगी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।८४।।

पाँच मनोयोगी और तीन वचनयोगी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा देवों के संख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।८५।।

सामान्य वचनयोगी और असत्यमृषा अर्थात् अनुभय वचनयोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।८६।।

सामान्य वचनयोगी और असत्यमृषावचनयोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं।।८७।।

सामान्य वचनयोगी और असत्यमृषावचनयोगी काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।८८।।

क्षेत्र की अपेक्षा सामान्य वचनयोगी और असत्यमृषावचनयोगियों द्वारा सूच्यंगुल के संख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है।।८९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य मनोयोगी, सत्यमनोयोगी, असत्यमनोयोगी, उभयमनोयोगी और अनुभयमनोयोगी जीवों के तथा सत्यवचनयोगी, असत्यवचनयोगी और उभयवचनयोगी इन आठ प्रकार की योगमार्गणा से सहित देवों का द्रव्यप्रमाण संख्यातवाँ भाग है। सामान्य वचनयोगी और अनुभय वचनयोगी जीवों का द्रव्यप्रमाण असंख्यात होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों की संख्या का निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब औदारिककाययोगी और कार्मणकाययोगी जीवों का द्रव्यप्रमाण निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

सामान्य काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी और कार्मण-काययोगी, द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।९०।।

उक्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा अनन्त है।।९१।।

उक्त जीव काल की अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत नहीं होते हैं।।९२।।

उक्त जीव क्षेत्र की अपेक्षा अनन्तानन्त लोकप्रमाण हैं।।९३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से काययोगी जीव तथा औदारिक-औदारिकमिश्रकाययोगी एवं कार्मणकाययोगी जीव एकेन्द्रिय वनस्पतिकायिक जीवों की अपेक्षा अनन्तानन्त होते हैं। यहाँ अनन्तानन्त से मध्यम अनन्तानन्त का प्रमाण ग्रहण करना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में औदारिक आदि योग सहित जीवों की संख्या का निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का द्रव्यप्रमाण प्रतिपादित करने हेतु चार सूत्र अवतीर्ण किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।९४।।

वैक्रियिककाययोगी देवों के संख्यातवें भाग कम है।।९५।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।९६।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा देवों के संख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।९७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवों में पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी राशियाँ देवों के संख्यातवें भागप्रमाण होती हैं। इन राशियों को देवराशि में से घटा देने पर अवशेष वैक्रियिक काययोगियों का प्रमाण होता है। संख्यात वर्षसहस्र में होने वाले उपक्रमणकालों में संचित देवराशि के संख्यात खण्ड करने पर उनमें से एक खण्ड वैक्रियिकमिश्रकाययोगी राशि का प्रमाण होता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वैक्रियिककाययोगसहित जीवों का द्रव्यप्रमाण कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब आहारककाययोग सहित जीवों का द्रव्यप्रमाण प्रतिपादित करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।९८।।

आहारककाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा चौवन हैं।।९९।।

आहारकमिश्रकाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।१००।।

आहारकमिश्रकाययोगी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा संख्यात हैं।।१०१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारककाययोगी मुनि द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा चौव्वन होते हैं।

आहारकमिश्रकाययोगी चौव्वन संख्या के भीतर ही होते हैं, बाहर नहीं अर्थात् उससे अधिक नहीं होते हैं। आचार्य परम्परा से आये हुए उपदेश के अनुसार पुन: ये सत्ताईस संख्या प्रमाण होते हैं।

इस तरह से चतुर्थ स्थल में योगमार्गणा में आहारककाययोगी मुनियों की संख्या का कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में द्रव्यप्रमाणानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।