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दिव्य शक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गाणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकेटनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

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०४.योग मार्गणा अधिकार

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योग मार्गणा अधिकार

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ पंचभि:स्थलैः सप्तदशसूत्रैः क्षेत्रानुगमे महाधिकारे योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनां क्षेत्रकथनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनु द्वितीयस्थले औदारिक-औदारिकमिश्रकाययोगिनां क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘कायजोगि’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। ततः परं तृतीयस्थले वैक्रियिककाय-वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनां क्षेत्रकथनपरत्वेन ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तदनंतरं चतुर्थस्थले आहारकाय-आहारआहारमिश्रयोगिनां क्षेत्रप्रतिपादनत्वेन ‘‘आहारकाय’’ इत्यादिसूत्रद्वयंं। तत्पश्चात् पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनां क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘कम्मइय-’’ इत्यादिना द्वे सूत्रे इति समुदायपातनिका।
इदानीं मनोवचनयोगिनां क्षेत्रप्रतिपादनार्थं सूत्रद्वयमवतार्यते-
जोगाणुवादेण पंचमणजोगी पंचवचिजोगी सत्थाणेण समुग्घादेण केवडिखेत्ते ?।।५२।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।५३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मनोयोगिनां वचनयोगिनां च षट्समुद्घाताः संति केवलिसमुद्घातं विहाय। उपपादपदं एषां नास्ति, तत्र काययोगं मुक्त्वा अन्ययोगाभावात्।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनां क्षेत्रकथननिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
अधुना औदारिक-औदारिकमिश्रकाययोगिनां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
कायजोगि-ओरालियमिस्सकायजोगी सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।५४।।
सव्वलोए।।५५।।
ओरालियकायजोगी सत्थाणेण समुग्घादेण केवडिखेत्ते ?।।५६।।
सव्वलोए।।५७।।
उववादं णत्थि।।५८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सामान्येन काययोगिनः एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यन्ताः स्वस्थान-समुद्घात-उपपादैश्च सर्वलोके संति। औदारिकमिश्रकाययोगिनश्चापि सर्वलोके संति। औदारिककाययोगिनोऽपि स्वस्थानापेक्षया समुद्घातैश्च सर्वलोके संति। तदेवोच्यते-स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिकपदैः सर्वलोके, सर्वत्र औदारिककाययोगिनो जीवाः अनन्ताः संति। विहारवत्स्वस्थानपदेन त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे तिष्ठन्ति, त्रसराशिं मुक्त्वान्यत्र विहाराभावात्। वैक्रियिक-तैजस-दण्ड-समुद्घातगताः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे। विशेषेण-तैजससमुद्घातगताःमानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे। औदारिककाययोगे कपाट-प्रतर-लोकपूरण-आहारपदानि न संति, औदारिककाययोगेन तेषां विरोधात्।
औदारिककाययोगे उपपादपदमपि नास्ति, अनेन योेगेन उपपादस्य विरोधात्।
एवं द्वितीयस्थले औदारिक-तन्मिश्रयोगिनां क्षेत्रकथनत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
संप्रति वैक्रियिक-तन्मिश्रयोगिनां क्षेत्रप्रतिपादनार्थ सूत्रषट्कमवतार्यते-
वेउव्वियकायजोगी सत्थाणेण समुग्घादेण केवडिखेत्ते ?।।५९।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।६०।।
उववादो णत्थि।।६१।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी सत्थाणेण केवडिखेत्ते ?।।६२।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।६३।।
समुग्घाद-उववादा णत्थि।।६४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदैः वैक्रियिककाय-योगिनः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे तिष्ठन्ति प्रधानीकृतज्योतिष्कराशित्वात्। मारणान्तिकसमुद्घातेन त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्याम-संख्यातगुणे संति। उपपादपदं अत्र नास्ति। अनेन योगेन उपपादस्य विरोधात्।
देवराशिसंख्यातभागमात्रवैक्रियिकमिश्रकाययोगिनः संति। वैक्रियिकमिश्रयोगे समुद्घाताः उपपादमपि न संति।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिक-तन्मिश्रयोगिनां क्षेत्रनिरूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
अधुना आहारकाययोगिनां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
आहारकायजोगी वेउव्वियकायजोगिभंगो।।६५।।
आहारमिस्सकायजोगी वेउव्वियमिस्सभंगो।।६६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्वस्थान-विहारवत्स्वस्थानपरिणताः आहारकाययोगिमुनयः चतुर्णां लोकानाम-संख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे । मारणान्तिकसमुद्घातगताः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे इति। आहारमिश्रकाययोगिनोऽपि चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे इति ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले आहारकमुनीनां क्षेत्रनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
कार्मणकाययोगिनां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
कम्मइयकायजोगी केवडिखेत्ते ?।।६७।।
सव्वलोए।।६८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कार्मणकाययोगिनां जीवराशिः यद्यपि अनंतसर्वजीवराशेः असंख्यातभागमात्रः तथापि सर्वलोकेऽस्ति इति ज्ञातव्यं।
एवं पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनां प्राणिनां क्षेत्रकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे क्षेत्रानुगमनाम षष्ठे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः समाप्तः ।

अथ योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में सत्रह सूत्रों के द्वारा क्षेत्रानुगम नाम के महाधिकार में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का क्षेत्र कथन करने हेतु ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में औदारिक एवं औदारिकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र निरूपण करने वाले ‘‘कायजोगि’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में वैक्रियिककाय एवं वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र कथन करने वाले ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र प्रतिपादन करने वाले ‘‘आहारकाय’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचम स्थल में कार्मणकाययोगी जीवों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु ‘‘कम्मइय’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका है।

अब मनोयोगी और वचनयोगियों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणानुसार पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीव स्वस्थान व समुद्घात की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।५२।।

पाँचों मनोयोगी व पाँचों वचनयोगी जीव उक्त पदों से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।५३।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोगी और वचनयोगी जीवों के केवलीसमुद्घात को छोड़कर छहों समुद्घात होते हैं। उनके उपपाद पद नहीं है, क्योंकि उनके केवल काययोग रहता है और अन्य योगों का अभाव पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का क्षेत्रनिरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब औदारिक एवं औदारिकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

काययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान, समुद्घात व उपपाद पद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।५४।।

काययोगी और औदारिकमिश्रकाययोगी जीव उक्त पदों से सर्वलोक में रहते हैं।।५५।।

औदारिककाययोगी जीव स्वस्थान व समुद्घात की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।५६।।

औदारिककाययोगी जीव स्वस्थान व समुद्घात की अपेक्षा सर्वलोक में रहते हैं।।५७।।

औदारिककाययोगी जीवों के उपपाद पद नहीं होता है।।५८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से काययोगी जीव एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद के साथ सर्वलोक में रहते हैं। औदारिकमिश्रकाययोगी जीव भी सर्वलोक में पाये जाते हैं। औदारिककाययोगी जीव भी स्वस्थान की अपेक्षा और समुद्घात के द्वारा सर्वलोक में रहते हैं। उसी के विषय में कहते हैं-स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और मारणान्तिकसमुद्घात की अपेक्षा उक्त जीव सर्वलोक में रहते हैं, क्योंकि सर्वत्र अवस्थान के अविरोधी औदारिक काययोगी जीव अनन्त हैं। विहारवत्स्वस्थान पद की अपेक्षा तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि त्रसराशि को छोड़कर उक्त जीवों का अन्य एकेन्द्रिय जीवों में विहार का अभाव है। वैक्रियिकसमुद्घात, तैजससमुद्घात और दण्डसमुद्घात को प्राप्त उक्त जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। विशेष इतना है कि तैजससमुद्घात को प्राप्त उक्त जीव मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं। औदारिककाययोग में कपाटसमुद्घात, प्रतरसमुद्घात, लोकपूरणसमुद्घात और आहारकसमुद्घात पद नहीं हैं, क्योंकि औदारिककाययोग के साथ उनका विरोध है अर्थात् इनके औदारिकमिश्रकाययोग रहता है।

औदारिक काययोग में उपपाद पद नहीं है, क्योंकि उस पद के साथ इसका विरोध पाया जाता है।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में औदारिक एवं औदारिकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब वैक्रियिककाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगी स्वस्थान और समुद्घात से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।५९।।

वैक्रियिककाययोगी जीव स्वस्थान व समुद्घात से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।६०।।

वैक्रियिककाययोगियों के उपपाद पद नहीं होता है।।६१।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी स्वस्थान की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।६२।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीव स्वस्थान की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।६३।।

उनके समुद्घात व उपपाद पद नहीं होता है।।६४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों से वैक्रियिक काययोगी जीव तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि यहाँ ज्योतिषी देवों की राशि की प्रधानता हैं। मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में तथा मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक की अपेक्षा असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। यहाँ उपपाद पद नहीं है, क्योंकि वैक्रियिक काययोग के साथ उपपाद पद का विरोध है।

देवराशि के संख्यातवें भागमात्र वैक्रियिकमिश्रकाययोगी हैं क्योंकि वैक्रियिकमिश्रकाययोग में समुद्घात और उपपाद पद भी नहीं होते हैं

इस प्रकार से तृतीय स्थल में वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब आहारककाययोगी जीवों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगियों के क्षेत्र का निरूपण वैक्रियिककाययोगियों के क्षेत्र के समान है।।६५।।

आहारकमिश्रकाययोगियों का क्षेत्र वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों के समान है।।६६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान और विहारवत्स्वस्थान क्षेत्र से परिणत आहारककाययोगी मुनि चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त उक्त जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। आहारक मिश्रकाययोगी मुनि भी चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में आहारक मुनियों का क्षेत्र निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब कार्मणकाययोगियों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।६७।।

कार्मणकाययोगी जीव सर्वलोक में रहते हैं।।६८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कार्मणकाययोगियों की जीवराशि यद्यपि अनंतसर्वजीवराशि के असंख्यातवें भागमात्र है, फिर भी वे सर्वलोक में पाए जाते हैं ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार से पंचम स्थल में कार्मणकाययोग वाले जीवों का क्षेत्र कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में क्षेत्रानुगम नाम के छठे महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।