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०४. काय मार्गणाधिकार

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विषय सूची

'काय_मार्गणाधिकार'

अथ कायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन सप्तसूत्रैः कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले स्थावरकायजीवानां क्षेत्रप्ररूपणत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले त्रसकायजीवानां क्षेत्रप्रतिपादनत्वेन ‘‘तसकाइय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं वक्ष्यते इति समुदायपातनिका।
अधुना पृथिवीकायिकादिजीवानां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतार्यते श्रीभूतबलिभट्टारकेण-
कायाणुवादेण पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया, बादरपुढविकाइया बादरआउकाइया बादरतेउकाइया बादरवाउकाइया, बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरा तस्सेव अपज्जत्ता, सुहुमपुढविकाइया सुहुमआउकाइया सुहुमतेउकाइया सुहुमवाउकाइया तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता य केवडि खेत्ते? सव्वलोगे।।२२।।
सूत्रस्यार्थः सुगमः।
सूत्रकथित षड्विंशतिविधाः स्थावरकायजीवराशयः सामान्यकथनेन सर्वलोके निवसन्ति। विशेषापेक्षया कथ्यंते-
स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादगताः पृथिवीकायिकाः सूक्ष्मपृथिवीकायिकाः तेषां पर्याप्ताः अपर्याप्ताः, अप्कायिका: सूक्ष्माप्कायिकाः तेषामेव पर्याप्ताः अपर्याप्ताः, तेजस्कायिकाः सूक्ष्मतेजस्कायिकाः तेषामेव पर्याप्ताः अपर्याप्ताः, वायुकायिकाः सूक्ष्मवायुकायिकाः तेषामेव पर्याप्ताः अपर्याप्ताश्च इमे षोडशजीवराशयः पूर्वोक्त स्वस्थानादिपंचस्थानगताः सर्वलोके तिष्ठन्ति, उक्तराशीनां परिमाणस्य असंख्यातलोकप्रमाणत्वात्।
वैक्रियिकसमुद्घातगततेजस्कायिकराशिः पंचानां लोकानामसंख्यातभागे क्षेत्रे तिष्ठति। वैक्रियिकसमुद्-घातगतवायुकायिकराशिः चतुर्लोकानामसंख्यातभागप्रमाणे क्षेत्रे वसति, अयं वायुकायिकराशिः मानुषक्षेत्रापेक्षया कियत् क्षेत्रे विहरति एतन्न ज्ञायते।
स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातगता बादरपृथिवीकायिकाः तेषामेव अपर्याप्ताः जीवाः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातगुणे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे च क्षेत्रे निवसन्ति। किं च इमे बादरपृथिवीकायिकाः अपर्याप्ताश्च पृथिवीमाश्रित्य एव निवसन्ति। अतः इमाः पृथिव्यः जगत्प्रतरप्रमाणेन कथयन्ति-
तत्र प्रथमपृथिवी एकरज्जुविष्कंभा सप्तरज्जुदीर्घा एकलक्षाशीतिसहस्रयोजनबाहल्या। इयं घनफलापेक्षया स्वबाहल्यस्य सप्तमभागबाहल्यं जगत्प्रतरप्रमाणं भवति। अस्यायमर्थः-प्रथमपृथिवी दक्षिणोत्तरयोः सप्तरज्जुः, पूर्वपश्चिमयोः एकरज्जुः एकलक्षाशीतिसहस्रयोजनबाहल्या अस्ति।
द्वितीया पृथिवी सप्तमभागोन-द्विरज्जुविष्कंभा सप्तरज्जु-आयता द्वात्रिंशद्योजनसहस्रबाहल्या अस्ति। इयं घनफलापेक्षया चतुर्लक्षषोऽशसहस्रयोजनानां एकोनपंचाशद्-भागबाहल्यं जगत्प्रतरप्रमाणमस्ति।
तृतीयपृथिवी एकरज्ज्वाः सप्तभागेषु द्विभागोन त्रिरज्जुविष्कंभा सप्तरज्जुआयता अष्टाविंशतिसहस्रयोजन-बाहल्या। इयं पंचलक्षद्वात्रिंशत्सहस्रयोजनानां एकोनपंचाशद्भागबाहल्यरूपं जगत्प्रतरप्रमाणमस्ति।
चतुर्थपृथिवी एकरज्ज्वाः सप्तभागेभ्यः त्रिभागोन-चतुःरज्जुविष्कंभा सप्तरज्जुआयता चतुर्विंशति-सहस्रयोजनबाहल्या। इयं घनफलापेक्षया षड्लक्षयोजनानां एकोनपंचाशद्भागबाहल्यरूपं जगत्प्रतर-प्रमाणमस्ति।
पंचमपृथिवी एकरज्जुसप्तभागेभ्यः चतुर्भागोनपंचरज्जुविष्कंभा सप्तरज्जुआयता विंशतिसहस्रयोजनबाहल्या। घनफलापेक्षया षड्लक्षविंशतिसहस्रयोजनानां एकोनपंचाशद्भागबाहल्यरूप-जगत्प्रतरप्रमाणमस्ति।
षष्ठपृथिवी एकरज्ज्वाः सप्तभागेभ्यः पंचभागोन-षड्रज्जुविष्कंभा सप्तरज्जु-आयता षोडशसहस्रयोजन-बाहल्या। घनफलापेक्षया पंचलक्षद्विनवतिसहस्रयोजनानां एकोनपंचाशद्भागबाहल्यरूप जगत्प्रतरप्रमाणं भवति।
सप्तमपृथिवी एकरज्जु-सप्तभागेभ्यः षड्भागोन-सप्तरज्जुविष्कंभा सप्तरज्जु-आयता अष्टसहस्रयोजन-बाहल्या। घनफलापेक्षया त्रिलक्षचतुश्चत्वारिंशत्सहस्रयोजनानां एकोनपंचाशद्भागबाहल्यरूप-जगत्प्रतरप्रमाणं भवति।
अष्टमपृथिवी सप्तरज्जु-आयता एकरज्जुविष्कंभा अष्टयोजनबाहल्या, इयं घनफलापेक्षया एकयोजनस्य सप्तमभागाधिकएकयोजन बाहल्यं जगत्प्रतरप्रमाणं भवति।
एतेषां सर्वेषां एकत्रीकृते तिर्यग्लोकबाहल्येभ्यः संख्यातगुणितबाहल्यं जगत्प्रतरं भवति। अत्र असंख्याताः लोकमात्राः पृथिवीकायिकाः तिष्ठन्ति। तेन तिर्यग्लोकात् संख्यातगुणा इति सिद्धम्।
एतैः पदैः लोकस्य असंख्यातभागे तिष्ठन्तः बादरपृथिवीकायिकाः सूत्रेण ‘‘सव्वलोगे चिट्ठंति’’ इति उक्ताः तत्कथं घटते?
नैतत्, मारणान्तिक-उपपादपदे प्रतीत्य तथोपदेशात्। मारणान्तिक-उपपादगताः सर्वलोके१।
एवं बादराप्कायिकानां तेषामपर्याप्तानां च वक्तव्यमस्ति।
अत्र एषः विशेषो ज्ञातव्यः-
प्रथमपृथिवीतः सप्तमपृथिवीपर्यंताः इमाः सप्त पृथिव्यः नरकभूमयः उच्यन्ते। अष्टमपृथिवी तु ईषत्प्राग्भारा नाम्ना अस्ति अस्यां मध्ये सिद्धशिला वर्तते।


अथ कायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो स्थलों में सात सूत्रों के द्वारा कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में स्थावरकाय जीवों का क्षेत्र प्ररूपण करने की मुख्यता से ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र कहेंगे। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में त्रसकायिक जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने वाले ‘‘तसकाइय’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे, यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब पृथिवीकायिक आदि जीवों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए श्रीभूतबली भट्टारक स्वामी सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणा के अनुवाद से पृथिवीकायिक, अप्कायिक, तैजस्कायिक, वायुकायिक जीव तथा बादर पृथिवीकायिक, बादर अप्कायिक, बादर तैजस्कायिक, बादरवायुकायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीव तथा इन्हीं पाँच बादरकायसम्बन्धी अपर्याप्तजीव, सूक्ष्मपृथिवीकायिक, सूक्ष्मअप्कायिक, सूक्ष्म तैजस्कायिक, सूक्ष्म वायुकायिक और इन्हीं सूक्ष्मों के पर्याप्त और अपर्याप्त जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ? सर्वलोक मेें रहते हैं ।।२२।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। सूत्र में वर्णित छब्बीस प्रकार की स्थावरकायिक जीवराशियाँ सामान्य कथन के अनुसार सम्पूर्ण लोक में निवास करती हैं तथा विशेष कथन के अनुसार उनका वर्णन करते हैं-स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद को प्राप्त हुए पृथिवीकायिक और सूक्ष्मपृथिवीकायिक तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीव, अप्कायिक और सूक्ष्म अप्कायिक तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीव, तैजस्कायिक और सूक्ष्म तैजस्कायिक तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीव, वायुकायिक और सूक्ष्म वायुकायिक तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त ये सोलह प्रकार के जीव सर्वलोक में रहते हैं क्योेंकि उक्त राशियों का परिमाण असंख्यात लोकप्रमाण है। वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुई तैजस्कायिकराशि पाँचों लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहती है। वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुई वायुकायिकराशि सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहती है। वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुई वायुकायिक राशि मानुषक्षेत्र की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहती है, यह नहीं जाना जाता है। स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात को प्राप्त हुए बादर पृथिवीकायिक और उन्हीं के अपर्याप्त जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में, तिर्यग्लोक से संख्यातगुणे क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। चूंकि बादर पृथिवीकायिक जीव और उन्हीं के अपर्याप्त जीव पृथिवी का आश्रय लेकर ही रहते हैं, इसलिए इन पृथिवियों को जगत्प्रतर के प्रमाण से कहते हैं। उनमें से एक राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और बीस हजार योजन कम दो लाख योजन मोटी पहली पृथिवी है। यह घनफल की अपेक्षा अपने बाहल्य के सातवें भाग जगत्प्रतरप्रमाण है। इसका अर्थ यह है कि पहली पृथ्वी दक्षिण और उत्तर में सात राजू है, पूर्व-पश्चिम में एक राजू है और एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी है।

दूसरी पृथिवी एक राजु के सात भागों में से एक भाग कम दो राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और बत्तीस हजार योजन मोटी है । यह घनफल की अपेक्षा चार लाख सोलह हजार योजनों के उनंचासवें भाग बाहुल्य जगत्प्रतर प्रमाण है।

तीसरी पृथिवी एक राजु के सात भागोें में से दो भाग कम तीन राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और अट्ठाईस हजार योजन मोटी है। यह घनफल की अपेक्षा पाँच लाख बत्तीस हजार योजनों के उनंचासवें भाग बाहल्यरूप जगत्प्रतर प्रमाण है।

चौथी पृथिवी एक राजु के सात भागोें में से तीन भाग कम चार राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और चौबीस हजार योजन मोटी है। यह घनफल की अपेक्षा छह लाख योजनों के उनंचासवें भाग बाहल्यरूप जगत्प्रतर प्रमाण है।

पाँचवीं पृथिवी एक राजु के सात भागों में से चार भाग कम पाँच राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और बीस हजार योजन मोटी है। यह घनफल की अपेक्षा छह लाख बीस हजार योजनों के उनंचासवें भाग बाहल्यरूप जगत्प्रतर प्रमाण है।

छठी पृथिवी एक राजु के सात भागों में से पाँच भाग कम छह राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और सोलह हजार योजन मोटी है। यह घनफल की अपेक्षा पाँच लाख बानवे हजार योजनों के उनंचासवें भाग बाहल्यरूप जगत्प्रतर प्रमाण है।

सातवीं पृथिवी एक राजु के सात भागोें में से छह भाग कम सात राजु चौड़ी, सात राजु लम्बी और आठ हजार योजन मोटी है। यह घनफल की अपेक्षा तीन लाख चवालीस हजार योजनों के उनंचासवें भाग बाहल्यरूप जगत्प्रतर प्रमाण है।

आठवीं पृथिवी सात राजु लम्बी, एक राजु चौड़ी और आठ योजन मोटी है। यह घनफल की अपेक्षा एक योजन के सात भाग करने पर उनमें से सातवां भाग अर्थात् एक भाग अधिक एक योजन बाहल्यरूप जगत्प्रतर प्रमाण है।

इन सबको एकत्रित करने पर तिर्यग्लोक के बाहल्य से संख्यातगुणे बाहल्यरूप जगत्प्रतर होता है। इन पृथिवियों में असंख्यात लोकप्रमाण पृथिवीकायिक जीव रहते हैं, इसलिए वे तिर्यग्लोक से संख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, यह सिद्ध हुआ।

शंका-इन पदों की अपेक्षा बादर पृथिवीकायिक जीव जब कि लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं, तो वे ‘सर्वलोक में रहते हैं’ ऐसा जो सूत्र द्वारा कहा गया है, वह कैसे घटित होता है ?

समाधन-नहीं, क्योंकि मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद की अपेक्षा ‘बादर पृथिवीकायिक जीव सर्वलोक में रहते हैं’ इस प्रकार का उपदेश दिया गया है।

इसी प्रकार बादर जलकायिक जीवों का एवं उन्हीं अपर्याप्त जीवों का कथन करना चाहिए। यहाँ यह विशेष जानना चाहिए कि- प्रथम पृथिवी से सातवीं पृथिवी तक ये सातों पृथिवियाँ नरकभूमियाँ कहलाती हैं।

आठवीं पृथिवी का नाम ईषत् प्राग्भार है, इसके बीच में सिद्धशिला रहती है।

उक्तं च त्रिलोकसारे-

तिहुवणमुड्ढारूढा, ईसिपभारा धरट्ठमी रूंदा।

दिग्घा इगिसगरज्जू, अडयोजनपमिदबाहल्ला।।५५६।।
तम्मज्झे रूप्पमयं, छत्तायारं मणुस्समहिवासं।
सिद्धक्खेत्तं मज्झड-वेडं कमहीण बेहुलियं।।५५७।।
उत्ताणट्ठिदमंते पत्तं व तणु तदुवरि तणुवादे।
अट्ठगुणड्ढा सिद्धा, चिट्ठंति अणंतसुहतित्ता।।५५८।।
कश्चिदाह-पृथिवीषु सर्वत्र जलं नोपलभ्यते, अतोऽप्कायिकाः सर्वत्र पृथिवीषु न भवन्ति इति चेत्?
आचार्यः प्राह-बादरनामकर्मोदयेण बादरत्वमुपगतानां अनुपलंभानामपि सर्वपृथिवीषु अस्तित्व-विरोधाभावात्।
एवं उपर्युक्तप्रकारेण बादरतेजस्कायिकानां तस्यैव अपर्याप्तानां च ज्ञातव्यं भवति, तत्रास्ति विशेषः-एषां वैक्रियिकपदमस्ति, इमे च पंचानां लोकानामसंख्यातभागे तिष्ठन्ति।
तेजस्कायिका बादरा सर्वपृथिवीषु भवन्तीति कथं ज्ञायते?
आगमात् ज्ञायते, यत् बादरतेजस्कायिकाः सर्वपृथिवीषु सन्ति।
एवं उपर्युक्तप्रकारेण बादरवायुकायिकानां तेषां अपर्याप्तानां च पदानि वक्तव्यानि। अस्ति विशेषः-स्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातगतानां बादरवायुकायिक-बादरवायुकायिकापर्याप्तानां त्रिलोकानाम-संख्यातभागप्रमाणं क्षेत्रमस्ति, नरतिर्यग्लोकाभ्यां असंख्यातगुणितक्षेत्रं च। वैक्रियिकसमुद्घातप्राप्ताः बादरवायुकायिकाः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे निवसन्ति, किन्तु अत्र मनुष्यक्षेत्रं न ज्ञायते। सर्वेषां अपर्याप्तजीवानां वैक्रियिकपदं नास्ति।
बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीराः तेषामपर्याप्ताः जीवाः, बादरनिगोदप्रतिष्ठितास्तेषामेवापर्याप्ताः जीवाः, बादरपृथिवीकायिकजीवसदृशाः एव।


त्रिलोकसार ग्रंथ में कहा है-

गाथार्थ-तीन लोक के मस्तक पर आरूढ ईषत्प्राग्भार नाम वाली आठवीं पृथिवी है, इसकी चौड़ाई और लम्बाई क्रम से एक एवं सात राजुु तथा बाहल्य आठ योजनप्रमाण है।।५५६।।

इस आठवीं पृथिवी के ठीक मध्य में रजतमय छत्राकार अर्थात् ‘‘उत्तानस्थित पात्रमिव चषकमिवेत्यर्थः’’ (माधवचन्द्र त्रैविद्यदेवकृत टीकानुसार) सीधे रखे कटोरे के समान और मनुष्य क्षेत्र के व्यासप्रमाण (पैंतालीस लाख योजन) सिद्धक्षेत्र है। जिसकी मध्य की मोटाई आठ योजन है और अन्यत्र क्रम-क्रम से हीन होती हुई अन्त में सीधे रखे हुए कटोरे के समान मोटाई रह गई है। इस सिद्धक्षेत्र के ऊपरवर्ती तनुवातवलय में सम्यक्त्ववादि आठ गुणों से युक्त और अनन्तसुख से तृप्त सिद्ध परमेष्ठी स्थित हैं।।५५७, ५५८।।

भावार्थ-तात्पर्य यह है कि ऊध्र्वलोक में स्थित सर्वार्थसिाद्ध इन्द्रक विमान के ध्वजादण्ड से बारह योजन ऊपर जाकर अर्थात् तीनलोक के मस्तक पर आरूढ़ ईषत्प्राग्भार संज्ञा वाली अष्टमी पृथिवी है । इसकी चौड़ाई एक राजु, लम्बाई(उत्तर-दक्षिण) सात राजु एवं मोटाई आठ योजनप्रमाण है तथा इतनी विशाल आठवीं पृथिवी के ठीक मध्य भाग में ४५ लाख योजन व्यासप्रमाण सिद्धक्षेत्र-सिद्धोें का निवास स्थान सिद्धशिला है अर्थात् उतने मात्र क्षेत्र में अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठी विराजमान हैं और आगे भी अनन्तकाल तक मोक्ष जाने वाले सभी अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठी वहीं जाकर विराजमान होंगे। इस सिद्धशिला के अतिरिक्त आठवीं पृथिवी के शेष भाग में अनन्त एकेन्द्रिय निगोदिया जीव रहते हैं। उनमें ही हम लोग अनेकों बार आठवीं पृथ्वी पर जा चुके हैं किन्तु कर्मों को नष्ट करके सिद्ध बनकर कभी भी वहाँ नहीं गये हैं। वहाँ एक बार जाने के बाद पुनः कभी वापस संसार में यह जीव नहीं आता है, इसलिए अब वहाँ जाने हेतु ही हम सभी को तप, संयम आदि पालन कर कर्म नष्ट करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। यहाँ कोई शंका करता है कि-

पृथिवियों में सर्वत्र जल नहीं पाया जाता है, इसलिए जलकायिक जीव पृथिवियों में सर्वत्र नहीं रहते हैं?

आचार्य इस शंका का समाधान करते हैं-

बादर नामकर्म के उदय से बादरपने को प्राप्त हुए जलकायिक जीव सब पृथिवियों में नहीं रहते हुए भी उसका सर्व पृथिवियों में अस्तित्व होने में कोई विरोध नहीं आता है।

इस प्रकार उपर्युक्त विधि से अर्थात् बादर जलकायिक और उन्हीं के अपर्याप्त जीवोें के समान बादर तेजस्कायिक और उन्हीं के अपर्याप्त जीवों का स्वस्थानस्वस्थान आदि पूर्वोक्त पदों में कथन करना चाहिए। उसमें विशेषता यह है कि इन बादरतेजस्कायिक जीवोें के वैक्रियिकसमुद्घात पद भी होता है और वे पाँचों लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।

प्रश्न-बादर तेजस्कायिक जीव सभी पृथिवियों में रहते हैं, यह कैसे जाना जाता है ?
उत्तर-आगम ग्रंथोें से यह जाना जाता है कि बादर तेजस्कायिक जीव सर्व पृथिवियों में रहते हैं। इसी प्रकार बादर वायुकायिक जीव एवं उन्हीं अपर्याप्त जीवों के पदों का उपर्युक्त प्रकार से कथन करना चाहिए। इसमें विशेषता यह है कि स्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात को प्राप्त हुए बादर वायुकायिक और बादर वायुकायिक अपर्याप्त जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और तिर्यग्लोक तथा मनुष्यलोक इन दो लोकों से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुए बादर वायुकायिक जीव सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भाग-प्रमाण क्षेत्र में रहते हैं किन्तु यहाँ मनुष्यक्षेत्र नहीं जाना जाता है कि उसके कितने भाग में रहते हैं। सभी अपर्याप्त जीवों में वैक्रियिक समद्घात पद नहीं होता है। बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर और उन्हीं के अपर्याप्त जीव तथा बादर निगोद प्रतिष्ठित और उन्हीं के अपर्याप्त जीव, बादर पृथिवीकायिक जीवों के समान हैं।

अधुना बादरपृथिवीकायिकादिजीवानां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-

बादरपुढविकाइया बादरआउकाइया बादरतेउकाइया बादरवणप्फदिका-इयपत्तेयसरीरा पज्जत्ता केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।२३।।

बादरपृथिवीपर्याप्ता: स्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातगताः चतुर्लोकानामसंख्येयभागे, सार्धद्वयद्वीपाद-संख्यातगुणे च तिष्ठन्ति।
मारणान्तिक-उपपादगताः त्रिलोकामसंख्येयभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे च तिष्ठन्ति। एवं बादरजलकायिकपर्याप्ताः। बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरपर्याप्ताः वेदनाकषायस्वस्थानेषु तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे। एतेषां राशीनां पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रा जगत्प्रतराणि प्रतरांगुलेन खण्डयित्वा एकखण्डमात्रप्रमाणं भवति।
अत्र कश्चिदाह-प्रत्येकशरीरपर्याप्त जघन्यावगाहनत: द्वीन्द्रियपर्याप्त-जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा इति कथं ज्ञायते?
आचार्यदेव: समाधत्ते-वेदनाक्षेत्रविधाने उक्तावगाहनादण्डकात् इति।
अधुना ‘वेदनाक्षेत्रविधाने’ कथितावगाहनादण्डकानि उच्यन्ते-
१. सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तजीवस्य जघन्यावगाहना सर्वतः स्तोका।

२. सूक्ष्मवायुकायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

३. सूक्ष्मतेजस्कायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

४. सूक्ष्माप्कायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

५. सूक्ष्मपृथिवीकायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

६. बादरवायुकायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

७. बादरतेजस्कायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

८. बादराप्कायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

९. बादरपृथिवीकायिक-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१०. बादरनिगोदजीव-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

११. निगोदप्रतिष्ठितजीव-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१२. बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीर-अपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१३. द्वीन्द्रियापर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१४. त्रीन्द्रियापर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१५. चतुरिन्द्रियापर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१६. पंचेन्द्रियापर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१७. सूक्ष्मनिगोदनिर्वृत्तिपर्याप्तजीवस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

१८. सूक्ष्मनिगोदनिर्वृत्त्यपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका:।

१९. सूक्ष्मनिगोदनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका:।

२०. सूक्ष्मवायुकायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

२१. सूक्ष्मवायुकायिक-निर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

२२. सूक्ष्मवायुकायिक-निर्वृत्तिपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

२३. सूक्ष्मतेजस्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

२४. सूक्ष्मतेजस्कायिक निर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

२५. सूक्ष्मतेजस्कायिक-निर्वृत्ति पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

२६. सूक्ष्माप्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

२७. सूक्ष्माप्कायिक-निर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

२८. सूक्ष्माप्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

२९. सूक्ष्मपृथिवीकायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

३०. सूक्ष्मपृथिवीकायिकनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

३१. सूक्ष्मपृथिवीकायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

३२. बादरवायुकायिकनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

३३. बादरवायुकायिकनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

३४. बादरवायुकायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

३५. बादरतेजस्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

३६. बादरतेजस्कायिकनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

३७. बादरतेजस्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

३८. बादराप्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

३९. बादराप्कायिकनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४०. बादराप्कायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४१. बादरपृथिवीकायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

४२. बादरपृथिवीकायिकनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४३. बादरपृथिवीकायिकनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४४. बादरनिगोदनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

४५. बादरनिगोदनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४६. बादरनिगोदनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४७. निगोदप्रतिष्ठितपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

४८. निगोदप्रतिष्ठितनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

४९. निगोदप्रतिष्ठित-निर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना विशेषाधिका।

५०. बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीर-निर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

५१. द्वीन्द्रियनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना असंख्यातगुणा।

५२. त्रीन्द्रियनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना संख्यातगुणा।

५३. चतुरिन्द्रियनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना संख्यातगुणा।

५४. पंचेंद्रियनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना संख्यातगुणा।

५५. त्रीन्द्रियनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

५६. चतुरिन्द्रियनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

५७. द्वीन्द्रियनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

५८. बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

५९. पंचेन्द्रियनिर्वृत्ति-अपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

६०. त्रीन्द्रियनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

६१. चतुरिन्द्रियनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

६२. द्वीन्द्रियनिर्वृत्ति-पर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

६३. बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीरनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

६४. पंचेन्द्रियनिर्वृत्तिपर्याप्तस्य उत्कृष्टावगाहना संख्यातगुणा।

एवं चतुषष्टिअवगाहना: क्रमेण कथिता:।
अत्र सूक्ष्मात् सूक्ष्मस्य अवगाहनागुणाकारो आवल्याः असंख्येयभागः। सूक्ष्मात् बादरस्य अवगाहना-गुणाकार: पल्योपमस्य असंख्येयभागः। बादराद् सूक्ष्मस्य अवगाहनागुणाकारः आवल्याः असंख्येयभागः। बादराद् बादस्य अवगाहनागुणाकारः पल्योपमस्य असंख्येयभागः। बादराद् बादरस्य अवगाहनागुणाकारः संख्याताः समयाः।
अत्र बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरपर्याप्तस्य जघन्यावगाहना घनांगुलस्य असंख्येयभागः इत्युत्ते भवतु नामेदं, प्रतरांगुलभागहारात् घनांगुलभागहारः संख्यातगुणः इति कुतः ज्ञायते?
‘तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे’ इति गुरुपदेशात् ज्ञायते। एतस्मात् चैव बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरस्य अवगाहनायां जीवबहुत्वं च ज्ञातव्यम्।
कश्चिदाह-बादरनिगोदप्रतिष्ठितपर्याप्ताः सूत्रे किमिति नोक्ताः?
आचार्यः प्राह-नैतत्, तेषां प्रत्येकशरीरेषु अंतर्भावात्।
बादरतेजस्कायिकपर्याप्ताः स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगताः पंचानां लोकानामसंख्यातभागे। मारणान्तिक-उपपादगताः चतुर्लोकानामसंख्येयभागे, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणे क्षेत्रे च तिष्ठन्ति।
अत्र चतुःषष्टिकोष्टकान्तर्गताः चतुःषष्टि-अवगाहनाः ज्ञातव्याः।


अब बादर पृथिवीकायिक आदि जीवों को क्षेत्र निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव, बादर जलकायिक पर्याप्त जीव, बादर तैजस्कायिक पर्याप्त जीव और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं ।।२३।।

हिन्दी टीका-स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात को प्राप्त हुए बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद को प्राप्त हुए बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में तथा मनुष्य और तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। बादर जलकायिक पर्याप्त जीव भी स्वस्थानस्वस्थान आदि पदों में इसी प्रकार रहते हैं। बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त जीववेदना, कषाय, स्वस्थानपद में स्थित हुए तिर्यग्लोक के संख्यातभाग में रहते हैं। पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण जगत्प्रतरों को प्रतरांगुल से खंडित करके जो एक भाग लब्ध आवे, उतना इन राशियों का प्रमाण है।

यहाँ कोई शंका करता है कि प्रत्येक शरीर पर्याप्त जीवों की जघन्य अवगाहना से ही द्वीन्द्रियपर्याप्त जीवों की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है, यह कैसे जाना जाता है?

आचार्यदेव इसका समाधान करते हैं-वेदनाक्षेत्र विधान में कहे गए अवगाहनादण्डक से जाना जाता है कि प्रत्येक शरीर पर्याप्त जीवों की जघन्य अवगाहना से द्वीन्द्रिय पर्याप्त जीवों की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

अब ‘वेदनाक्षेत्र विधान’ में कहे गये अवगाहनादण्डकों का वर्णन करते हैं-

१. सूक्ष्म निगोद अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना सबसे स्तोक है।

२. इससे सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

३. इससे सूक्ष्म तैजस्कायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

४. इससे सूक्ष्म जलकायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

५. इससे सूक्ष्म पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

६. इससे बादर वायुकायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

७. इससे बादर तैजस्कायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

८. इससे बादर जलकायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

९. इससे बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१०. इससे बादर निगोद अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

११. इससे निगोद प्रतिष्ठित अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१२. इससे बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१३. इससे द्वीन्द्रिय अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१४. इससे त्रीन्द्रिय अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१५.इससे चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१६. इससे पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है

१७. इससे सूक्ष्म निगोद निवृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

१८. इससे सूक्ष्म निगोद निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

१९. इससे सूक्ष्म निगोद निर्वृत्तिपर्याप्त की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२०. इससे सूक्ष्म वायुकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

२१. इससे सूक्ष्म वायुकायिक निवृत्तिअपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२२. इससे सूक्ष्म वायुकायिक निवृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२३. इससे सूक्ष्म तैजस्कायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

२४. इससे सूक्ष्म तैजस्कायिक निवृत्तिअपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२५. इससे सूक्ष्म तैजस्कायिक निवृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२६. इससे सूक्ष्म जलकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

२७. इससे सूक्ष्म जलकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२८. इससे सूक्ष्म जलकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

२९. इससे सूक्ष्म पृथिवीकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

३०.इससे सूक्ष्म पृथिवीकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

३१. इससे सूक्ष्म पृथिवीकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

३२. इससे बादर वायुकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

३३. इससे बादर वायुकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

३४. इससे बादर वायुकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

३५. इससे बादर तैजस्कायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

३६. इससे बादर तैजस्कायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

३७. इससे बादर तैजस्कायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

३८. इससे बादर जलकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

३९. इससे बादर जलकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४०. इससे बादर जलकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४१. इससे बादर पृथिवीकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

४२.इससे बादर पृथिवीकायिक निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४३. इससे बादर पृथिवीकायिक निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४४. इससे बादर निगोद निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

४५. इससे बादर निगोद निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४६. इससे बादर निगोद निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४७. इससे निगोद प्रतिष्ठित पर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

४८. इससे निगोद प्रतिष्ठित निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

४९. इससे निगोद प्रतिष्ठित निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है।

५०. इससे बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

५१. इससे द्वीन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।

५२. इससे त्रीन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना संख्यातगुणी है।

५३. इससे चतुरिन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना संख्यातगुणी है।

५४. इससे पंचेन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की जघन्य अवगाहना संख्यातगुणी है।

५५.इससे त्रीन्द्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

५६. इससे चतुरिन्द्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

५७.इससे द्वीन्द्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

५८.इससे बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

५९.इससे पंचेन्द्रिय निर्वृत्त्यपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

६०.इससे त्रीन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

६१. इससे चतुरिन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

६२. इससे द्वीन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

६३. इससे बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

६४. इससे पंचेन्द्रिय निर्वृत्तिपर्याप्त जीव की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यातगुणी है।

इस प्रकार चौंसठ अवगाहनादण्डक क्रम से कहे गये हैं-

यहाँ एक सूक्ष्म जीव से दूसरे सूक्ष्म जीव की अवगाहना का गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। सूक्ष्मजीव से बादर जीवों की अवगाहना का गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। बादर जीव से सूक्ष्म जीव की अवगाहना का गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। बादर जीव से अन्य बादर जीव की अवगाहना का गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। बादर से बादर की अवगाहना का गुणकार संख्यात समय है अर्थात् बादर पर्याप्त द्वीन्द्रिय जीव की जघन्य अवगाहना से बादर पर्याप्त त्रीन्द्रिय आदि जीवों की अवगाहना का गुणकार संख्यात समय है।

शंका-यहाँ पर बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त की जघन्य अवगाहना घनांगुल के असंख्यातवें भाग कही है, सो वह भले ही रही आवे, किन्तु प्रतरांगुल के भागहार से घनांगुल का भागहार संख्यातगुणा होता है, यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-‘तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में रहते हैं’ इस प्रकार के गुरुपदेश से जाना जाता है कि प्रतरांगुल के भागहार से घनांगुल का भागहार संख्यातगुणा है तथा उक्त इसी गुरुपदेश से बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर की अवगाहना में जीवों की अधिकता भी जाननी चाहिए।

यहाँ कोई प्रश्न करता है कि सूत्र में बादर निगोदप्रतिष्ठित पर्याप्त जीव क्यों नहीं कहे?

आचार्यदेव इस का समाधान देते हैं कि यह कोई दोष नहीं है क्योंकि बादर निगोदप्रतिष्ठित पर्याप्त जीवों का प्रत्येक शरीर पर्याप्त वनस्पतिकायिक जीवों में अन्तर्भाव हो जाता है।

स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैकियिकसमुद्घातगत बादर तैजस्कायिक पर्याप्त जीव पांचोें लोकों के असंख्यातवें भाग में रहते हैं। मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादगत वे ही बादर तैजस्कायिक जीव चारों लोकों के असंख्यातवें भाग में और मनुष्यलोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं।

यहाँ चौंसठ कोष्ठकों के अन्तर्गत चौंसठ प्रकार की अवगाहनाएँ जानना चाहिए।

चौंसठ अवगाहनों का यंत्र

(गाथा ९७ से गाथा १०१)
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बादरवायुकायिकानां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-

बादरवाउक्काइयपज्जत्ता केवडि खेत्ते? लोगस्स संखेज्जदिभागे।।२४।।

स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादगताः बादरवायुकायिकपर्याप्ताः त्रिलोकानां संख्यातभागे, द्वाभ्यां लोकाभ्यां असंख्यातगुणे।
बादरवायुकायिकपर्याप्तराशिः मारणान्तिक-उपपादपदाभ्यां सर्वलोके कथं न भवति?
न भवति, किंच रज्जुप्रतरमुखेन पंचरज्जुआयामेन स्थितक्षेत्रे चैव प्रायेण तेषामुत्पत्तित्वात्।
अन्यक्षेत्रांंतरं गत्वा उत्पद्यमानजीवानां अतिस्तोकत्वं कथमवगम्यते? ‘‘बादरवाउक्काइयपज्जत्ता लोगस्स संखेज्जदिभागे’’ इति सूत्रादवगम्यते। अन्यथा सूत्रस्य पृथक् आरंभो निरर्थको भवेत् बादरवायु-अपर्याप्तेषु अंतर्भावोऽपि भवेत्, किन्तु नैतत् अतएव एतत्सूत्रं सार्थकमेव।
वैक्रियिकसमुद्घातगताः चतुर्लोकानामसंख्येयभागे। सार्धद्वयद्वीपस्य व्यवस्था न विज्ञायते।
संप्रति वनस्पतिकायिकनिगोदजीवानां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
वणप्फदिकाइय-णिगोदजीवा बादरा सुहुमा पज्जत्तापज्जत्ता केवडि खेत्ते? सव्वलोगे।।२५।।
वनस्पतिकायिकजीवाः, निगोदजीवाः, वनस्पतिकायिकबादरजीवाः, वनस्पतिकायिकसूक्ष्मजीवाः, वनस्पतिकायिकबादरपर्याप्तजीवाः, वनस्पतिकायिकबादर-अपर्याप्तजीवाः, वनस्पतिकायिकसूक्ष्मपर्याप्तजीवाः, वनस्पतिकायिकसूक्ष्म-अपर्याप्तजीवाः, निगोदबादरपर्याप्तजीवाः, निगोदबादरअपर्याप्तजीवाः, निगोदसूक्ष्म-पर्याप्तजीवाः, निगोदसूक्ष्म-अपर्याप्तजीवाश्च कियत् क्षेत्रे तिष्ठन्ति?
सर्वलोके तिष्ठन्ति।
वनस्पतिकायिकाः सूक्ष्मवनस्पतिकायिकाः एषां पर्याप्ताः अपर्याप्ताश्च स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणन्तिक-उपपादगताः इमे सर्वलोके निवसन्ति। एवमेव निगोदजीवाः सूक्ष्मनिगोदजीवाः एषां पर्याप्ताः अपर्याप्ताश्च सर्वलोके निवसन्ति।
स्वस्थान-वेदनासमुद्घातगताः बादरवनस्पतिकायिकाः बादरनिगोदजीवाश्च तेषां पर्याप्ताः अपर्याप्ताश्च त्रिलोकानामसंख्यातभागे, तिर्र्यग्लोकस्य संख्यातगुणे मानुषक्षेत्रस्यासंख्यातगुणे क्षेत्रे च तिष्ठन्ति।
मारणान्तिक-उपपादगताश्च इमे बादरजीवाः सर्वलोके निवसन्ति। उपयुक्ताः सर्वे बादरजीवाः पृथिवीं आश्रित्य एव तिष्ठन्ति, अतो लोकस्य असंख्यातभागे निवसन्ति।
एतत् कथं ज्ञायते?
एतद्गुरुपदेशाद् ज्ञायते, यत् बादरवनस्पतिकायिकजीवा पृथिवीराश्रित्य एव तिष्ठन्ति।
एवं प्रथमस्थले पंचविधस्थावरकायजीवानां क्षेत्रनिरूपणपरं सूत्रचतुष्टयं गतम्।


अब बादर वायुकायिक जीवों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ? लोक के संख्यातवें भाग मेंं रहते हैं।।२४।।

हिन्दी टीका-स्वस्थान, वेदना, कषाय, मारणान्तिक समुद्घात एवं उपपाद पद को प्राप्त बादरवायुकायिक पर्याप्त जीव तीनों लोकों के संख्यातवें भाग में और दो लोकों (तिर्यग्लोक एवं मनुष्यलोक) के असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं।

शंका-बादर वायुकायिक पर्याप्तराशि लोक के संख्यातवें भागप्रमाण हैै, जब वह मारणान्तिकसमुद्घात उपपाद पदों को प्राप्त हो, तब वह सर्वलोक मेें क्यों नहीं रहती है ?

समाधान-नहीं रहती है, क्योेंकि राजुप्रतरप्रमाण मुख से और पांच राजु आयाम से स्थित क्षेत्र में ही प्रायः करके उन बादर वायुकायिक पर्याप्त जीवों की उत्पत्ति होती है।

शंका-अन्य क्षेत्रान्तर को जाकर उत्पन्न होने वाले बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव अत्यन्त थोड़े हैं, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव लोक के संख्यातवें भाग में रहते हैं, इस सूत्र से जाना जाता है। यदि ऐसा न माना जावे, तो इस सूत्र का पृथक आरंभ निरर्थक हो जाएगा, क्योंकि फिर तो उनका बादर वायुकायिक अपर्याप्तों में अन्तर्भाव हो जायेगा किन्तु ऐसा नहीं है अतः यह सूत्र सार्थक ही है। वैक्रियिक समुुद्घातगत बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव सामान्यलोक आदि चार लोेकों के असंख्यातवें भाग में रहते हैं। अढ़ाईद्वीप से अधिक क्षेत्र में रहते हैं या कम में, यह जाना नहीं जाता है।

अब वनस्पतिकायिक निगोद जीवोें का क्षेत्र बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वनस्पतिकायिक जीव, निगोदजीव, वनस्पतिकायिक बादरजीव, वनस्पतिकायिक सूक्ष्मजीव, वनस्पतिकायिक बादर पर्याप्त जीव, वनस्पतिकायिक बादर अपर्याप्त जीव, वनस्पतिकायिक सूक्ष्म पर्याप्त जीव, वनस्पतिकायिक सूक्ष्म अपर्याप्त जीव, निगोद बादर पर्याप्त जीव, निगोद बादर अपर्याप्त जीव, निगोद सूक्ष्म पर्याप्त जीव और निगोद सूक्ष्म अपर्याप्त जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? सर्वलोक में रहते हैं ।।२५।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अभिप्राय यह है कि एकेन्द्रिय स्थावर जीवों में वनस्पतिकायिक जीव, निगोदिया जीव, वनस्पतिकायिक बादर जीव, वनस्पतिकायिक सूक्ष्मजीव, वनस्पतिकायिक बादर पर्याप्त जीव, वनस्पतिकायिक बादर अपर्याप्त जीव, वनस्पतिकायिक सूक्ष्म पर्याप्त जीव, वनस्पतिकायिक सूक्ष्म अपर्याप्त जीव, निगोद बादर पर्याप्त जीव, निगोद बादर अपर्याप्त जीव, निगोद सूक्ष्म पर्याप्त जीव और निगोद सूक्ष्म अपर्याप्त जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर प्राप्त होता है कि वे सम्पूर्ण लोक में रहते हैं।

वनस्पतिकायिक जीव, सूक्ष्मवनस्पतिकायिक तथा उनके पर्याप्त-अपर्याप्त जीव, स्वस्थान, वेदना, कषाय, मारणांतिक समुद्घात और उपपाद पद को प्राप्त सभी जीव सम्पूर्ण लोक में रहते हैं। इसी प्रकार निगोदजीव और सूक्ष्म निगोद जीव तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीव सर्वलोक में रहते हैं, ऐसा जानना चाहिए। स्वस्थान और वेदना समुद्घात बादर वनस्पतिकायिक और बादर निगोद जीव तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक से संख्यातगुणे और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। मारणांतिक समुद्घात और उपपादगत ये सब बादर जीव सर्वलोक में रहते हैं। बादर जीव पृथिवियों का ही आश्रय लेकर रहते हैं, इसलिये वे लोक के असंख्यातवें भाग मेें रहते हैं।

शंका-यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-यह बात गुरु के उपदेश से जानी जाती है क्योंकि बादर वनस्पतिकायिक जीव पृथिवियों के ही आश्रय से रहते हैं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में पाँच प्रकार के स्थावरकायिक जीवोें का क्षेत्र निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।


अधुना त्रसजीवानां क्षेत्रप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारः क्रियते-

तसकाइय-तसकाइयपज्जत्तएसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।२६।।

सूत्रं सुगमं।
त्रसकायिक-त्रसकायिकपर्याप्तमिथ्यादृष्टयः स्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-समुद्घातगताः त्रिलोकानामसंख्येयभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्येयभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे। मारणान्तिक-उपपादगताः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे क्षेत्रे तिष्ठन्ति। शेषगुणस्थानानां व्यवस्था पंचेन्द्रियभंगवत् ज्ञातव्या।
सयोगिकेवलिनां क्षेत्रप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-
सजोगिकेवली ओघं।।२७।।
सूत्रं सुगमं वर्तते।
त्रसापर्याप्तानां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
तसकाइय-अपज्जत्ता पंचिंदिय अपज्जत्ताणं भंगो।।२८।।
त्रसकायिक-लब्ध्यपर्याप्तजीवानां क्षेत्रं पंचेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तक्षेत्रवत् ज्ञातव्यम््।
तात्पर्यमेतत्-एषां षट्कायजीवानां क्षेत्राणि ज्ञात्वा मनोवचनकायैः कृतकारितानुमोदनैश्च तेषां हिंसा त्यक्तव्या, अनेन जीवदयाप्रतिपालनेनैव मोक्षमार्गः सुलभो भवति।
एवं द्वितीयस्थले त्रसकायजीवानां क्षेत्रनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
एवं षट्खंडागमप्रथमखंडे तृतीयग्रन्थे क्षेत्रानुगमनाम्नि तृतीय-प्रकरणे गणिनीज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां कायमार्गणानामतृतीयोऽधिकारः समाप्तः।


अब त्रसजीवोें का क्षेत्र प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त जीवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर आयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ? लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं ।।२६।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है।

त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घातगत जीव सामान्यलोक आदि तीनों लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। मारणांतिक समुद्घात और उपपादगत त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव तीनों लोकों के असंख्यातवें भाग में तथा मनुष्यलोक और तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। शेष गुणस्थानवर्ती त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त जीवों का क्षेत्र पंचेन्द्रिय जीवों के क्षेत्रों के समान जानना चाहिए।

अब सयोगिकेवली भगवन्तों का क्षेत्र बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवली का क्षेत्र ओघनिरूपित सयोगिकेवली के क्षेत्र के समान है।।२७।।

सूत्र का अर्थ सुगम है, इसलिए यहाँ विशेष वर्णन नहीं किया जा रहा है।

अब त्रसकायिक अपर्याप्त जीवों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

त्रसकायिक लब्ध्यपर्याप्त जीवों का क्षेत्र पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों के क्षेत्र के समान है।।२८।।

हिन्दी टीका-त्रसकायिक लब्ध्यपर्याप्तक जीवों का क्षेत्र पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के क्षेत्र के समान जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि इन छहों काय वाले जीवों का क्षेत्र जानकर हम सभी को मन, वचन, काय से तथा कृत, कारित, अनुमोदनापूर्वक उन सभी जीवों की हिंसा का त्याग करना चाहिए। उस त्याग के द्वारा जीवदयारूप धर्म का प्रतिपालन करने से ही मोक्षमार्ग सुलभ होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में त्रसकायिक जीवोें का क्षेत्र निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

विशेषार्थ-

इस कार्यमार्गणा अधिकार में पंचस्थावर एवं त्रसकायिक जीवों का क्षेत्र बताया गया है कि ये सभी जीव सम्पूर्ण लोक के भीतर अपनी-अपनी योग्यतानुसार रहते हैं तथा इस प्रकार की चौरासी लाख योनियों में अनादिकाल से भ्रमण करते हुए हम सभी ने अनन्त पर्यायों को प्राप्त किया है पुनः अब महान पुण्योदय से त्रसकाय में मनुष्यपर्याय प्राप्त हुई है उसका सदुपयोग करते हुए अणुव्रत एवं महाव्रतों को धारण करके मोक्षमार्ग को साकार करने की प्र्रेरणा आचार्यों ने प्रदान की है इसीलिए षट्कायिक जीवों का विशेष व्याख्यान जानना आवश्यक होता है।

गोम्मटसार जीवकाण्ड में आचार्य श्रीनेमिचंद्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने एक मात्र स्पर्शन इन्द्रिय को प्राप्त करने वाले नित्यनिगोदिया जीव का स्वरूप बताया है-

अत्थि अणंता जीवा, जेहिं ण पत्तो तसाण परिणामो।

भावकलंकसुपउरा, णिगोदवासं ण मुंचंति ।।

अर्थ-ऐसे अनन्तानन्त जीव हैं कि जिन्होंने त्रसों की पर्याय अभी तक कभी भी नहीं पाई है और जो निगोद अवस्था मेें होने वाले दुर्लेश्यारूप परिणामों से अत्यंत अभिभूत रहने के कारण निगोदस्थान को कभी नहीं छोड़ते हैं।

अभिप्राय यह है कि निगोद के दो भेद होते हैं-एक नित्यनिगोद और दूसरा चतुर्गति निगोद (इतर निगोद)। इनमें से जिन्होंने कभी त्रसपर्याय को प्राप्त कर लिया हो, उन्हें चतुर्गति निगोद कहते हैं और जिन जीवों ने अनादिकाल से अभी तक कभी भी त्रसपर्याय को नहीं पाया है अथवा जो भविष्य मेें भी कभी त्रसपर्याय को नहीं पाएंगे, उनको नित्यनिगोद जीव कहते हैं। यहाँ नित्य शब्द के दोनों ही अर्थ होते हैं-एक तो अनादि और दूसरा अनादि अनन्त। इन दोनों प्रकार के जीवों की संख्या अनन्तानन्त है। तीनलोक के चित्र में सातवें नरक के नीचे एक राजुप्रमाण क्षेत्र में इन नित्य निगोदिया जीवों का स्थान दर्शाया जाता है अर्थात् वह स्थान निगोदिया जीवों की खान समझना चाहिए। वहाँ इतनी प्रचुर मात्रा मेें वे जीव रहते हैं कि छह महीना आठ समय में छह सौ आठ जीवों के उसमें से निकलकर मोक्ष चले जाने पर भी उसकी संख्या में कोई कमी नहीं आती है। उन निगोदिया जीवों की स्थिति के बारे में पं. दौलतराम जी ने छहढाला में कहा है -

एक श्वांस में अठ-दस बार, जन्म्यो मर्यो भर्यो दुख भार ।

निकसि भूमि जल पावक भयो, पवन प्रत्येक वनस्पति थयो।।

अर्थात् वे निगोदिया जीव एक स्वांस वाले समय में अठारह बार जनम-मरण करते हैं, यही उनकी नियति है, ऐसा समझकर निगोद में जाने से बचने हेतु हम सभी को पुरुषार्थ करना चाहिए।

इन एकेन्द्रिय निगोद जीवों के अतिरिक्त यह जीव न जाने कितनी बार पंच स्थावरों मेंं, विकलत्रयों में तथा पंचेन्द्रिय होकर भी नरकगति, पशुगति आदि के दुःखों को अनादिकाल से सहन कर रहा है तथा औदारिक-वैक्रियिक आदि शरीरों को धारण करके अपने विविध रूपों को प्रगट कर रहा है। इन छहों काय के जीवों का आकार बताते हुए गोम्मटसार में कहा है-

मसुरंबुबिन्दु सूई, कलावधयसण्णिहो हवे देहो।

पुढवी आदिचउण्हं, तरुतसकाया अणेयविहा ।।

अर्थ-पृथिवीकायिक जीवों का शरीर मसूर के समान, जलकायिक का जलबिन्दु सदृश, अग्नि जीवों का सुइयों के समूह सदृश, वायुकायिक का ध्वजा सदृश होता है। वनस्पति और त्रसकायिक जीवों का शरीर अनेक प्रकार का होता है।

जिस प्रकार कोई भारवाहक पुरुष कावड़ी के द्वारा भार ढोता है उसी प्रकार यह जीव कायरूपी कावड़ी के द्वारा कर्मभार को ढो रहा है। जैसे मलिन स्वर्ण अग्नि के द्वारा सुसंस्कृत होकर बाह्य और अभ्यंतर दोनों प्रकार के मल से रहित हो जाता है, उसी प्रकार ध्यान के द्वारा यह जीव भी शरीर और कर्मबन्ध दोनों प्रकार के मल से रहित होकर सिद्ध परमात्मा बन जाता है।

यद्यपि यह काय मल का बीज और मल की योनिस्वरूप अत्यन्त निंद्य है, कृतघ्न के समान है, फिर भी इसी काय से रत्नत्रयरूपी निधि प्राप्त की जा सकती है अतः इस काय को संयमरूपी भूमि में बो करके मोक्षफल को प्राप्त कर लेना चाहिए। स्वर्गादि अभ्युदय तो भूसे के सदृश स्वयं ही मिल जाते हैं इसलिए संयम के बिना एक क्षण भी नहीं रहना चाहिए, यही कायमार्गणा का सार है।

इस प्रकार षट्खंडागम ग्रंथ के प्रथम खंड में तृतीय ग्रंथ में क्षेत्रानुगम नामक तृतीय प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिन्तामणि टीका

में कायमार्गणा नामक तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।