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०४. द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में मनुष्यगति का वर्णन

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द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में मनुष्यगति का वर्णन

मनुष्यगतिनामान्तराधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन त्रयोदशसूत्रपर्यंतं मनुष्यगतिनाम तृतीयोऽन्तराधिकार: प्रारभ्यते। तेषु प्रथमस्थले सामान्यमनुष्याणां गुणस्थानव्यवस्थासु द्रव्यकालक्षेत्रै: प्रमाणप्रतिपादनत्वेन ‘‘मणुसगईए’’ इत्यादि सूत्रादारभ्य सूत्रपंचकमस्ति। तदनु द्वितीयस्थले पर्याप्तमनुष्येषु गुणस्थानं संख्यां च व्याख्यातुं ‘‘मणुसपज्जत्तेसु’’ इत्यादिसूत्रमादिं कृत्वा त्रीणि सूत्राणि। तदनंतरं तृतीयस्थले भावस्त्रीवेदमनुष्येषु गुणस्थानव्यवस्थायां संख्यानिरूपणपरत्वेन ‘‘मणुसिणीसु’’ इत्यादि सूत्रादारभ्य सूत्रद्वयं। तत: परं चतुर्थस्थले लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां संख्यासूचकत्वेन ‘‘मणुस अपज्जत्ता’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि वक्ष्यन्ते इति समुदायपातनिका व्याख्यानमास्ति।
अधुना मनुष्यगतौ सामान्यमनुष्याणां संख्याप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
मणुसगईए मणुस्सेसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।४०।।
मनुष्यगतौ मनुष्येषु पर्याप्तापर्याप्तेषु मिथ्यादृष्टयो जीवा द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने सति असंख्याता: इति उच्यन्ते।
पुन: कालापेक्षया मनुष्याणां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रावतार: क्रियते-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।४१।।
कालापेक्षया मिथ्यादृष्टयो मनुष्या: असंख्यातासंख्याताभ्यां अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभ्यां अपहृता भवन्ति।
क्षेत्रापेक्षया तेषां मनुष्याणां प्रमाणनिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-
खेत्तेण सेढीए असंखेज्जदिभागो। तिस्से सेढीए आयामो असंखेज्जाओ जोयण-कोडीओ। मणुसमिच्छाइट्ठीहि रूवा-पक्खित्तएहि सेढी अवहिरदि अंगुलवग्गमूलं तदियवग्गमूलगुणिदेण।।४२।।
क्षेत्रापेक्षया जगच्छ्रेण्या: असंख्यातभागप्रमाणा मनुष्यमिथ्यादृष्टि: जीवराशि:। तस्या: श्रेण्या: आयामोऽसंख्यातकोटियोजनप्रमाणं। सूच्यंगुलस्य प्रथमवर्गमूलं सूच्यंगुलस्य तृतीयवर्गमूलेन गुणिते सति यल्लब्धं भवेत् तत् शलाकारूपेण स्थापयित्वा रूपाधिकेन-सासादनादित्रयोदशगुणस्थानवर्तिजीवराशेरधिक-मनुष्यमिथ्यादृष्टिराशिना जगच्छ्रेणि: अपहृता भवति।
एषु त्रिषु सूत्रेषु पर्याप्तमनुष्याणां लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां योनिमतीमनुष्याणां च भेदो नास्ति, त्रयोऽपि भेदा: अंतर्भूता सन्तीति ज्ञातव्यं।,

अब मनुष्यगति नाम का तृतीय अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है।

अब चार स्थलों में तेरह सूत्रों के द्वारा मनुष्यगति नाम का तृतीय अन्तराधिकार प्रारम्भ हो रहा है। उसके अन्तर्गत प्रथम स्थल में सामान्य मनुष्यों की गुणस्थान व्यवस्था में द्रव्य-काल-क्षेत्र के द्वारा प्रमाण को बतलाने हेतु ‘‘मणुसगईए’’ इत्यादि सूत्र से आरम्भ करके पाँच सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में पर्याप्त मनुष्यों में गुणस्थान और उनकी संख्या का व्याख्यान करने के लिए ‘‘मणुसपज्जत्तेसु’’ इत्यादि सूत्र से प्रारम्भ करके तीन सूत्र हैं। तदनंतर तृतीय स्थल में भावस्त्रीवेदी मनुष्यों में गुणस्थान व्यवस्था में संख्या का निरूपण करने हेतु ‘‘मणुसिणीसु’’ इत्यादि सूत्र से आरम्भ करके दो सूत्र हैं। उसके आगे चतुर्थस्थल में लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों की संख्यासूचना की मुख्यता से ‘‘मणुस अपज्जत्ता’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इस प्रकार सूत्रोें की समुदाय पातनिका का व्याख्यान हुआ है।

यहाँ सर्वप्रथम मनुष्यगति में सामान्य मनुष्यों की संख्या का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति प्रतिपन्न मनुष्यों में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।४०।।

हिन्दी टीका-मनुष्यगति में पर्याप्त-अपर्याप्त मिथ्यादृष्टि मनुष्य द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर उनकी संख्या असंख्यात है, ऐसा उत्तर मिलता है।

पुनः काल की अपेक्षा मनुष्यों की संख्या का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।४१।।

हिन्दी टीका-मिथ्यादृष्टि मनुष्य काल की अपेक्षा असंंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों से अपहृत होते हैं।

यहाँ सारांश यह है कि द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कालप्रमाण की महत्ता पाई जाने के कारण अथवा कालप्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणीरूप विशेष संख्या का निरूपण करने वाला होने से कालप्रमाण की सूक्ष्मता ही समझनी चाहिए, शेष प्ररूपणा का कथन पहले के समान करना चाहिए ।

क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं मनुष्यों की संंख्या का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीवराशि हैं। उस श्रेणी का आयाम (अर्थात् जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागरूप श्रेणी का आयाम) असंख्यात करोड़ योजन है। सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को सूच्यंगुल के तृतीय वर्गमूल से गुणित करके जो लब्ध आवे, उसे शलाकारूप से स्थापित करके रूपाधिक (अर्थात् एकाधिक तेरह गुणस्थानवर्ती राशि से अधिक) मनुष्य मिथ्यादृष्टि राशि के द्वारा जगत्श्रेणी अपहृत होती है ।।४२।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा जगत् श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण मनुष्यों में मिथ्यादृष्टि जीवों की राशि है। उस श्रेणी का आयाम असंख्यात करोड़ योजनप्रमाण है। सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को सूच्यांगुल के तृतीय वर्गमूल से गुणित करने पर जो लब्ध आवे, उसको शलाकारूप से स्थापित करके रूपाधिक के द्वारा-एक अंक से अधिक सासादन आदि तेरह गुणस्थानवर्ती जीवराशि से अधिक मनुष्य मिथ्यादृष्टि राशि के द्वाारा जगत्श्रेणी अपहृत होती है।

इन तीनों सूत्रों मेें पर्याप्त मनुष्य, लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य और योनिमती मनुष्य(भावस्त्रीवेदी) इन तीनों ही प्रकार के मनुष्यों का कथन नहीं किया है सो इनको पूर्व प्रकरण के अनुसार इनमें अन्तर्भूत समझना चाहिए।

विशेषार्थ-

‘‘रूपाधिक मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीवराशि के द्वारा जगत्श्रेणी अपहृत होती है ’’ इस सूत्र में ‘रूवा ’यह बहुवचन निर्देश पाया जाता है, जिससे जाना जाता है कि यहाँ पर उक्त भागहार से जगत्श्रेणी के भाजित करने पर जो लब्ध आवे, उसमेें से एक अधिक तेरह गुणस्थानवर्ती जीवराशि अपनयनराशि है।

‘‘रूव पक्खित्तएहिं ’’ इस पद में व्याकरण के नियमानुसार जिसमें पूर्वनिपात हो गया है ऐसा बहुब्रीहि समास होने के कारण ‘‘रूप ’’ पद के बहुवचन से रहित होने के कारण भी उससे भी बहुत्व की उपलब्धि हो जाती है। ‘‘रूवं पक्खित्तएहिं’’ इस प्रकार एकवचन भी कहीं देखा जाता है तो भी कोई दोष नहीं आता है क्योेंकि बहुत जीवों का जाति द्वारा एकत्व देखने में आता है।

यहाँ पर जाति शब्द से चेतना आदि समान परिणामों का ग्रहण समझना चाहिए, इसलिए उक्त भागहार का जगत्श्रेणी में भाग देने पर जो लब्ध आवे, उसमें से एक अधिक तेरह गुणस्थानवर्ती जीवराशि के कम कर देने पर मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीवराशि का प्रमाण होता है, यह सिद्ध हो गया। सूच्यंगुल के प्रथम और तृतीय वर्गमूल का परस्पर गुणा करके जो लब्ध आवे, उसका जगत्श्रेणी में भाग देने पर एक अधिक मनुष्यराशि का प्रमाण आता है अतएव लब्ध में एक कम कर देने पर सामान्य मनुष्यराशि का प्रमाण होता है परन्तु प्रकृत में मिथ्यादृष्टि मनुष्यराशि लाना है, अतएव उक्त सामान्य मनुष्यराशि में से सासादन आदि तेरह गुणस्थानवर्ती मनुष्यराशि के प्रमाण को और कम कर देना चाहिए, तब मिथ्यादृष्टि मनुष्यराशि का प्रमाण प्राप्त होगा ।

जिस प्रकार दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टियों के खंडित आदि का कथन कर आए हैं, उसी प्रकार इस मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीवराशि के खंडित आदि का कथन करना चाहिए । इतना विशेष है कि यहाँ पर सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल से तृतीय वर्गमूल को गुणित करने पर अवहारकाल का प्रमाण होता है तथा मनुष्य मिथ्यादृष्टि राशि का प्रमाण लाने के लिए सर्वत्र एक अधिक तेरह गुणस्थानवर्ती जीवराशि का प्रमाण घटा देना चाहिए ।

संप्रति सासादनादिसंयतासंयतपर्यंतमनुष्याणां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रमवतरति-

सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा दव्वपमाणेण केवडिया? संखेज्जा।।४३।।

अत्र सूत्रे संख्याता इति सामान्येन उत्ते सति द्वापञ्चाशत्कोटिमात्रा: सासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। तेभ्यो द्विगुणा: सम्यग्मिथ्यादृष्टयो भवन्ति। असंयतसम्यग्दृष्टय: सप्तशतकोटिप्रमाणा: सन्ति। संयतासंयतानां प्रमाणं त्रयोदशकोट्य: सन्ति१।
केऽपि आचार्या: सासादनसम्यग्दृष्टीनां प्रमाणं पञ्चाशत्कोटिं कथयन्ति तेभ्य: द्विगुणं सम्यग्मिथ्या-दृष्टीनामिति। कथमेतत् आचार्यपरंपरागतत्वादिति।
उक्तं च-
तेरह कोडी देसे बावण्णं सासणे मुणेदव्वा।
मिस्से वि य तद्दुगुणा असंजदे सत्तकोडिसया।।
अहवा-
तेरह कोडी देसे पण्णासं सासणे मुणेयव्वा।
मिस्से वि य तद्दुगुणा असंजदे सत्तकोडिसया।।१
अधुना प्रमत्ताद्ययोगिकेवलिगुणस्थानपर्यंतमनुष्याणां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं।।४४।।
प्रमत्तसंयतादि-अयोगिकेवलिपर्यंतानां संख्या पूर्वोक्तगुणस्थानवद् ज्ञातव्या।
कुत:? मनुष्यगतिव्यतिरिक्तशेषगतौ प्रमत्तादिगुणस्थानानामसंभवात्।
एवं सामान्यमनुष्याणां संख्याप्रतिपादनत्वेन प्रथमस्थले पंच सूत्राणि गतानि।
संप्रति पर्याप्तमनुष्याणां मिथ्यादृष्टिमनुष्यसंख्यानिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
मणुसपज्जत्तेसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? कोडाकोडाकोडीए उवरि कोडाकोडाकोडाकोडीए हेट्ठदो छण्हं वग्गाणमुवरि सत्तण्हं वग्गाणं हेट्ठदो।।४५।।
मनुष्यपर्याप्तेषु मिथ्यादृष्ट्यो द्रव्यप्रमाणेन कियन्त? इति प्रश्ने सति कोटिकोटिकोटीनामुपरि कोटिकोटिकोटिकोटीनामध: षण्णां वर्गाणामुवरि सप्तानां वर्गाणामध: संख्यातप्रमाणा: पर्याप्तमनुष्या: सन्तीति।
संप्रति सासादनादिदेशसंयतमनुष्याणां संख्यानिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा दव्वपमाणेण केवडिया? संखेज्जा।।४६।।
सासादनगुणस्थानात् आरभ्य संयतासंयता: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? संख्याता इति ज्ञातव्या:। अत्र संगृहीतत्रिवेदत्वेन पर्याप्तभावेन च सामान्यमनुष्यपर्याप्तमनुष्यराश्यो: विशेषाभावात्।

अब सासादन गुणस्थान से संयतासंयत गुणस्थानपर्यन्त मनुष्यों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान मेें मनुष्य द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? संंख्यात हैं ।।४३।।

हिन्दी टीका-यहाँ सूत्र मेें ‘संख्याता’ यह सामान्य से कहने पर ‘‘बावन करोड़ मात्र सासादन सम्यग्दृष्टि जीव होते हैं’’ यह अर्थ होता है। इससे दो गुणे अर्थात् एक सौ चार करोड़ सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव होते हैं। असंयतसम्यग्दृष्टि जीव सात सौ करोड़ प्रमाण हैं तथा संयतासंयत मनुष्यों का प्रमाण तेरह करोड़ है।

कोई-कोई आचार्य सासादन सम्यग्दृष्टि मनुष्यों का प्रमाण पचास करोड़ मानते हैं, उससे दो गुनी संख्या-सौ करोड़ सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों की कहते हैं। ऐसा क्यों है ?

क्योंकि, आचार्य परम्परा से ऐसा ही कथन प्राप्त हो रहा है।

कहा भी है-

गाथार्थ-संयतासंयत में तेरह करोड़, सासादन में पचास करोड़, मिश्र में सासादन के प्रमाण से दूने और असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान में सात सौ करोड़ मनुष्य जानना चाहिए । अथवा दूसरी मान्यतानुसार देखें -

गाथार्थ-संयतासंयत में तेरह करोड़, सासादन में पचास करोड़, मिश्र में सासादन के प्रमाण से दूने और असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान में सात सौ करोड़ मनुष्य जानना चाहिए ।

अब प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगकेवली गुणस्थानपर्यन्त मनुष्यों का प्रमाण निरूपण करने हेतु सूत्र प्रस्तुत हो रहा है-

सूत्रार्थ-

प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में मनुष्य सामान्यप्ररूपणा के समान संख्यात हैं ।।४४।।

हिन्दी टीका-छठे गुणस्थान से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक के मनुष्यों की संख्या पूर्वाक्त गुणस्थानों के समान जानना चाहिए। क्यों ? क्योंकि मनुष्यगति को छोड़कर शेष तीन गतियों में प्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानों का होना असंभव है? अतः मनुष्यों में प्रमत्तसंयत आदि का प्रमाणप्ररूपण सामान्य प्ररूपणा के समान ही है।

इस प्रकार सामान्य मनुष्यों की संख्या के प्रतिपादन की मुख्यता से प्रथम स्थल मेें पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब पर्याप्त मनुष्यों में मिथ्यादृष्टि मनुष्यों की संख्या निरूपण हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्य पर्याप्तकों में मिथ्यादृष्टि मनुष्य द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? कोड़ा कोड़ाकोड़ी के ऊपर और कोड़ा कोड़ाकोड़ा कोड़ी के नीचे छह वर्गों के ऊपर और सात वर्गों के नीचे अर्थात् छठवें और सातवें वर्ग के बीच की संख्यातप्रमाण मनुष्य पर्याप्त होते हैं ।।४५।।

हिन्दी टीका-पर्याप्त मनुष्यों में द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि मनुष्यों की संख्या कितनी है? ऐसा प्रश्न होने पर उसका उत्तर देते हुए आचार्यदेव ने कहा है कि कोड़ा कोड़ाकोड़ी के ऊपर और कोड़ा कोड़ाकोड़ा कोड़ी के नीचे छह वर्गों के ऊपर और सात वर्गों के नीचे अर्थात् बीच की संख्यारूप पर्याप्त मनुष्यों की संख्या होती है।

अब सासादन गुणस्थान से लेकर देशसंयत गुणस्थान तक के मनुष्यों की संख्या निरूपण हेतु सूत्र अवतरित किया जा रहा है-

सूूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में पर्याप्त मनुष्य द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? संख्यात हैं ।।४६।।

हिन्दी टीका-सासादन सम्यग्दृष्टि नामक द्वितीय गुणस्थान से प्रारंभ करके संयतासंयत नामक पंचम गुणस्थानपर्यन्त मनुष्यों की संख्या द्रव्यप्रमाण से कितनी है ? ऐसा प्रश्न होने पर आचार्यश्रीभूूतबली स्वामी ने उत्तर दिया है कि उनकी संख्या संख्यातप्रमाण है ऐसा जानना चाहिए। यहाँ संगृहीत तीनों वेदों की अपेक्षा और पर्याप्तपने की अपेक्षा उक्त दोनों राशियों में कोई विशेषता नहीं है।

पुन: पर्याप्तमनुष्येषु प्रमत्तादिअयोगिकेवलिपर्याप्तमनुष्याणां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं।।४७।।

एतस्य सूत्रस्यार्थ: पूर्वं प्ररूपित: इति नात्रोच्यते।
एवं द्वितीयस्थले पर्याप्तमनुष्यसंख्याप्ररूपकानि त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अधुना भाववेदिमानुषीषु मिथ्यादृष्टिसंख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
मणुसिणीसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? कोडाकोडाकोडीए उवरि कोडाकोडा-कोडाकोडीए हेट्ठदो छण्हं वग्गाणमुवरि सत्तण्हं वग्गाणं हेट्ठदो।।४८।।
अस्य सूत्रस्य व्याख्यानं मनुष्यपर्याप्तसूत्रव्याख्यानेन तुल्यं। अंतरं तु एतत् यत्-पंचमवर्गस्य त्रिभागे पंचमवर्गे चैव प्रक्षिप्ते मानुषीणामवहारकालो भवति। तेन सप्तमवर्गस्य भागे कृते मानुषीणां द्रव्यं आगच्छति। लब्धसंख्याभ्य: स्वकत्रयोदशगुणस्थानप्रमाणे अपनीते मानुषीमिथ्यादृष्टिद्रव्यं भवति।
पुन: मानुषीषु सासादनादारभ्य अयोगिकेवलिपर्यंतानां संख्यानिरूपणाय सूत्रमवतरति-
मणुसिणीसु सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति दव्वपमाणेण केवडिया? संखेज्जा।।४९।।
मनुष्याणां ओघे कथितसासादनादीनां संख्यातभाग: सासादनादीनां गुणस्थानप्रतिपन्नानां प्रमाणं मानुषीषु भवति।
कुत:?
अप्रशस्तवेदोदयेन सह प्रचुरं सम्यग्दर्शनोपलम्भाभावात्।
एतदपि कथं ज्ञायते?
‘‘सव्वत्थोवा णवुंसयवेदअसंजदसम्माइट्ठिणो। इत्थिवेद असंजदसम्माइट्ठिणो असंखेज्जगुणा। पुरिसवेद-असंजदसम्माइट्ठिणो असंखेज्जगुणा।’’ इदि अप्पाबहुअसुत्तादो कारणस्स थोवत्तं जाणिज्जदे। तदो सासणसम्माइट्ठि आदीणं पि थोवत्तं सिद्धं हवदि। णवरि एत्तियं तेसिं पमाणमिदि ण णव्वदे, संपहि उवएसाभावादो१।’’
एवं तृतीयस्थले भाववेदिमानुषीसंख्याप्रतिपादनाय द्वे सूत्रे गते।
अधुना अपर्याप्तमनुष्यसंख्याप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
मणुसअपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।५०।।
अत्र निवृत्त्यपर्याप्तान् मुक्त्वा लब्ध्यपर्याप्तानां ग्रहणं कत्र्तव्यं।

पुनः पर्याप्त मनुष्यों में प्रमत्तसंयत से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थानपर्यन्त पर्याप्त मनुष्यों की संख्या प्रतिपादन के लिए सूत्र का अवतार होता है।-

सूत्रार्थ-

प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में पर्याप्त मनुष्य सामान्य प्ररूपणा के समान संख्यात हैं ।।४७।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अर्थ चूँकि पहले कह आए हैं, इसलिए यहाँ नहीं कहा जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में पर्याप्त मनुष्यों की संख्या बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए ।

अब भाववेदी मनुष्यिनियों मेें मिथ्यादृष्टियों की संख्या प्रतिपादन हेतु सूत्र कहा जा रहा है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यिनियों में मिथ्यादृष्टि द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? कोड़ा कोड़ाकोड़ी ऊपर और कोड़ा कोड़ाकोड़ा कोड़ी के नीचे छठे वर्ग के ऊपर और सातवें वर्ग के नीचे मध्य की संख्याप्रमाण हैं ।।४८।।

'हिन्दी टीका'-इस सूत्र का व्याख्यान मनुष्य पर्याप्त की संख्या प्रतिपादन करने वाले सूत्र के व्याख्यान के समान ही है। अन्तर केवल इतना है कि पंचम वर्ग के त्रिभाग को पाँचवें वर्ग में प्रक्षिप्त कर देने पर मनुष्यिनियों का प्रमाण लाने के लिए अवहारकाल होेता है। उस अवहारकाल से सातवें वर्ग के भाजित करने पर मनुष्यिनियों के द्रव्य का प्रमाण आता है। इस प्रकार जो मनुष्यिनियों की संख्या प्राप्त हो, उसमें से तेरह गुणस्थान के प्रमाण के घटा देने पर मिथ्यादृष्टि मनुष्यिनियों का प्रमाण होता है।

पुनः मनुष्यिनियों में सासादन से प्रारम्भ करके अयोगिकेवलीपर्यन्त संख्या निरूपण के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यिनियों में सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान मेें जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? संख्यात हैं ।।४९।।

हिन्दी टीका-मनुष्यों के गुणस्थान में कथित सासादन आदि गुणस्थानवर्तियों का संख्यातवां भाग सासादन आदि गुणस्थानप्रतिपन्न जीवों का प्रमाण मनुष्यिनियों मेें होता है।

प्रश्न-ऐसा कैसे?
उत्तर-क्योंकि, अप्रशस्त वेद के उदय के साथ प्रचुर जीवों को सम्यग्दर्शन का लाभ नहीं होता है।

प्रश्न-यह भी कैसे जाना जाता है?
उत्तर-‘‘नपुंसक वेदी असंयतसम्यग्दृष्टि जीव सबसे स्तोक हैं। स्त्रीवेदी असंयतसम्यग्दृष्टि जीव उनसे असंख्यातगुणे हैं और पुरुषवेदी असंयत सम्यग्दृष्टि उनसे असंख्यातगुणे हैं।’’इस अल्पबहुत्व के प्रपिपादन करने वाले सूत्र से स्त्रीवेदियों के अल्प होने का कारण जाना जाता है और इसी से सासादन सम्यग्दृष्टि आदिक के भी स्तोकपना सिद्ध हो जाता है परन्तु इतनी विशेषता है कि उन सासादन सम्यग्दृष्टि आदि योनिनियों का प्रमाण इतना है, यह नहीं जाना जाता है क्योंकि इस काल में यह उपदेश नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में भाववेदी मनुष्यिनियों की संख्या बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।५०।।

हिन्दी टीका-द्रव्यप्रमाण से अपर्याप्त-लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य कितने होते हैं? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर मिलता है कि उनकी संख्या असंख्यातप्रमाण होती है। यहाँ अपर्याप्त शब्द से निर्वृत्त्यपर्याप्त मनुष्यों को छोड़कर लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों को ही ग्रहण करना चाहिए।

पुन: कालापेक्षया एषामपर्याप्तानां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।५१।।

एतस्य सूत्रस्यार्थ: पूर्वं बहुश: प्ररूपित: इति पुन: न उच्यते।
अधुना क्षेत्रापेक्षया अपर्याप्तमनुष्यसंख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
खेत्तेण सेढीए असंखेज्जदिभागो। तिस्से सेढीए आयामो असंखेज्जाओ जोयणकोडीओ। मणुस-अपज्जत्तेहि रूवा-पक्खित्तेहि सेढिमवहिरदि अंगुलवग्गमूलं तदियवग्गमूलगुणिदेव।।५२।।
क्षेत्रापेक्षया जगच्छ्रेण्या: असंख्यातभागप्रमाणा लब्ध्यपर्याप्तमनुष्या: सन्ति। तस्या जगच्छ्रेण्यसंख्यात-भागरूपश्रेण्या: आयामोऽसंख्यातकोटियोजनप्रमाण:। सूच्यंगुलस्य तृतीयवर्गमूलेन गुणितं प्रथमवर्गमूलं शलाकारूपेण स्थापयित्वा रूपाधिकलब्ध्यपर्याप्तकमनुष्यै: जगच्छ्रेणि: अपहृता भवति।
तात्पर्यमेतत्-सामान्यमनुष्यप्रमाणेषु पर्याप्तमनुष्यराशिप्रमाणं अपनीय लब्ध्यपर्याप्तमनुष्यराशिप्रमाणं ज्ञातव्यं।
अत्रापि भागाभागं वक्ष्यामि-
मनुष्यराशे: असंख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा मनुष्यापर्याप्ता भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा मनुष्यिनीमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा मनुष्यपर्याप्तमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखंडा: असंयतसम्यग्दृष्ट्यो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखंडा: सम्यङ्मिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा: सासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखंडा: संयतासंयता भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा: प्रमत्तसंयता: भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा: अप्रमत्तसंयता: भवन्ति। एषामुपरि ओघवत् ज्ञातव्यं१।
अथवा सर्वपरस्थाने अल्पबहुत्वकथनं कर्तव्यं-
सर्वस्तोका: अयोगिकेवलिन:। चत्वार: उपशामका: संख्यातगुणा:। चत्वार: क्षपका: संख्यातगुणा:। सयोगिकेवलिन: संख्यातगुणा:। अप्रमत्तसंयता: संख्यातगुणा:। प्रमत्तसंयता: संख्यातगुणा:। संयतासंयता: संख्यातगुणा:। सासादनसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:। सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:। असंयतसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:। मनुष्यपर्याप्तमिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:। मनुष्यिनीमिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:। मनुष्यापर्याप्तअवहारकाल: असंख्यातगुण:। मनुष्यापर्याप्तद्रव्यमसंख्यातगुणं। उपरि यावत् लोक: इति तावत् ज्ञात्वा वक्तव्यं। मानुषीगुणस्थानप्रतिपन्नानां प्रमाणमेतावत् इति न निश्चितमस्ति, तस्मात् सर्वपरस्थानाल्पबहुत्वे तेषां प्ररूपणा न कृता२।
अत्र इदमपि ज्ञातव्यमस्ति-मनुष्याणां चत्वारो भेदा:-सामान्यमनुष्या: पर्याप्तमनुष्या: योनिमतीमनुष्या: अपर्याप्तमनुष्याश्चेति। तत्र सामान्यमनुष्येषु पर्याप्तापर्याप्ता: त्रिवेदाश्च अंतर्भवेन्ति। योनिमतीमनुष्येषु भावस्त्रीवेदधारका: पुरुषा अपि भवन्ति। चतुर्थभेदे लब्ध्यपर्याप्तमनुष्या एव। एतज्ज्ञात्वा मनुष्यपर्यायं संप्राप्य भेदाभेदरत्नत्रयं पालयित्वा निजात्मोपलब्धि: सिद्धि: विधातव्या इति।
एवं अपर्याप्तमनुष्यप्रतिपादकानि त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अनेन प्रकारेण स्थलचतुष्टयेन त्रयोदशभि: सूत्रै: मनुष्यगतिप्ररूपको
नाम तृतीयोऽन्तराधिकार: समाप्त:।

पुनः काल की अपेक्षा उन अपर्याप्त जीवों की संख्या के प्रतिपादन हेतु सूत्र का अवतार होता हैै-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।५१।।

इस सूत्र का अर्थ पूर्व में कई बार प्ररूपित कर चुके हैं, इसलिए यहाँ पुनःउसे नहीं कहा जा रहा है।

अब क्षेत्र की अपेक्षा अपर्याप्त मनुष्यों की संख्या का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य हैं। उस जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागरूप श्रेणी का आयाम असंख्यात करोड़ योजन है। सूच्यंगुल के तृतीय वर्गमूल गुणित प्रथम वर्गमूल को शलाकारूप से स्थापित करके रूपाधिक लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों के द्वारा जगत्श्रेणी अपहृत होती है ।।५२।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा जगत्श्रेणी के असंख्यातवाँ भागप्रमाण लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों की संख्या है। उस जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागरूप श्रेणी का आयाम असंख्यात करोड़ योजन प्रमाण है। सूच्यंगुल के तृतीय वर्गमूल के द्वारा गुणित किये गये प्रथम वर्गमूल को शलाकारूप से स्थापित करके रूपाधिक लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों के द्वारा जगत्श्रेणी अपहृत होती है।

तात्पर्य यह है कि सामान्य मनुष्यराशि के प्रमाण में से पर्याप्त मनुष्यराशि का प्रमाण घटा देने पर लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यराशि का प्रमाण जानना चाहिए।

यहाँ भी भागाभाग को कहते हैं-

मनुष्यराशि के असंख्यात खण्ड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण अपर्याप्त मनुष्य हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण मनुष्यिनी मिथ्यादृष्टि जीव हैं। शेष एक भाग के असंख्यात खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण मनुष्य पर्याप्त मिथ्यादृष्टि हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्य हैं। शेष एक भाग के संख्यात खण्ड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्य हैं। शेष एक भाग के संख्यात भाग करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण सासादन सम्यग्दृष्टि मनुष्य हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण संयतासंयत मनुष्य हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण प्रमत्तसंयत मनुष्य-मुनि हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण अप्रमत्तसंयत मनुष्य-मुनि हैं। इसके ऊपर सामान्यरूप से गुणस्थानों के समान व्यवस्था जानना चाहिए।

अथवा अब सर्व परस्थान मेें अल्पबहुत्व का कथन किया जा रहा है-

अयोगिकेवली नामक चौदहवें गुणस्थानवर्ती मनुष्यों की संख्या सबसे कम है, चारों गुणस्थानवर्ती उपशामक-आठवें, नवमें, दशवें और ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती उपशमश्रेणी चढ़ने वाले मुनिराजों की संख्या अयोगकेवलियों से संख्यातगुणी ज्यादा है। चारों गुणस्थानवर्ती क्षपकश्रेणी में चढ़ने वाले मुनियों की संख्या उपशामकों से संख्यातगुणी अधिक है। सयोगकेवली मनुष्यों की संख्या क्षपकश्रेणी से संख्यातगुणी है। अप्रमत्तसंयत मुनियों की संख्या सयोगियों से संख्यातगुणी अधिक है। प्रमत्तसंयत मनुष्य अप्रमत्तसंयत से संख्यातगुणे हैं। संयतासंयत मनुष्य प्रमत्तसंयतों से संख्यातगुणे अधिक हैं। सासादन सम्यग्दृष्टि मनुष्य संयतासंयतों से संख्यातगुणे हैं।

सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्य सासादन सम्यग्दृष्टियों से संख्यातगुणे हैं। असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्य सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से संख्यातगुणे अधिक होते हैं। मनुष्यपर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव असंयतसम्यदृष्टियों से संख्यातगुणे अधिक रहते हैं। मनुष्यिनी मिथ्यादृष्टि जीवोें की संख्या पर्याप्त मनुष्यों से संख्यातगुणी है। अपर्याप्त मनुष्यों का अवहारकाल मनुष्यिनी मिथ्यादृष्टियों से असंख्यातगुणा है। मनुष्य अपर्याप्तकों का द्रव्य उन्हीं के अवहारकाल से असंख्यातगुणा है। इसके ऊपर जहाँ तक लोक है, वहाँ तक जानकर अल्पबहुत्व का कथन करना चाहिए। गुणस्थानप्रतिपन्न मनुष्यिनियों का प्रमाण इतना है यह निश्चित नहीं है, इसलिए सर्व परस्थान अल्पबहुत्व का कथन करते समय गुणस्थान प्रतिपन्न उनके प्रमाण की प्ररूपणा नहीं की गई है।

यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि मनुष्यों के चार भेद हैं-सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य, योनिमती मनुष्य और अपर्याप्त मनुष्य। उनमें सामान्य मनुष्यों में ही पर्याप्त, अपर्याप्त और तीनों वेद अन्तर्भूत हो जाते हैं। योनिमती मनुष्यों-मनुष्यिनियों में भावस्त्रीवेदी पुरुष भी गर्भित रहते हैं। चतुर्थ अपर्याप्त भेद वाले मनुष्यों में लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य ही होते हैं। ऐसा जानकर मनुष्यपर्याय को प्राप्त करके भेदाभेद रत्नत्रय का पालन करके अपनी आत्मा की उपलब्धि-सिद्ध करना चाहिए, ऐसा अभिप्राय हुआ ।

इस प्रकार अपर्याप्तमनुष्यों का प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए ।

इस प्रकार से चार स्थलों में तेरह सूत्रोें के द्वारा मनुष्यगति का प्ररूपण करने वाला तृतीय अन्तराधिकार समाप्त हुआ ।