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०४. योगमार्गणा में अल्पबहुत्व

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विषय सूची

योगमार्गणा में अल्पबहुत्व

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ पंचभि: स्थलै: एकोनचत्वािंरशत्सूत्रै: योगमार्गणाधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगि-काययोगि-औदारिककाययोगिनामल्पबहुत्वकथनाय ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसप्तदशसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले औदारिकमिश्रकाययोगिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय ‘‘ओरालिय’’ इत्यादिषट्सूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनामल्पबहुत्वकथनाय ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादिसप्तसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले आहार-आहारमिश्रयोगिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय ‘‘आहार’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनश्च कार्मणकाययोगिनां अल्पबहुत्वकथनाय ‘‘कम्मइय’’ इत्यादिसप्तसूत्राणि इति समुदायपातनिका।
संप्रति योगमार्गणायां पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगि-काययोगि-औदारिककाययोगिनां उपशामक-क्षपक-सयोगिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-जोगाणुवादेण पंचमणजोगि-पंचवचिजोगि-कायजोगि-ओरालियकाय-जोगीसु तीसु अद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।१०५।।
उवसंतकसायवीदरागछदुमत्था तेत्तिया चेव।।१०६।।
खवा संखेज्जगुणा।।१०७।।
खीणकसायवीदरागछदुमत्था तेत्तिया चेव।।१०८।।
सजोगिकेवली पवेसणेण तेत्तिया चेव।।१०९।।
सजोगिकेवली अद्धं पडुच्च संखेज्जगुणा।।११०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतै: पूर्वोक्तसर्वयोगै: सह उपशमश्रेणिमारोहतां उत्कर्षेण चतु:पंचाशत्संख्या अस्ति, इति तुल्यत्वं प्ररूपितं। उपरिमगुणस्थानजीवै: क्षपकश्रेण्यारोहकै: ऊना इति स्तोका: प्ररूपिता:। एतेषां द्वादशानां अल्पबहुत्वानां प्रमाणं आनेतुं तिसृषु अद्धासु स्थितउपशमा: इति सूत्रे प्ररूपिता: सन्ति।
उपशान्ता एकादशमगुणस्थानवर्तिन: साधव: तावन्त एव।
क्षपका: अपूर्वकरण-अनिवृत्ति-सूक्ष्मसांपरायिका:, अष्टोत्तरशतपरिमाणत्वात् संख्यातगुणा:। क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था अपि एतावन्तश्चैव।
सयोगिकेवलिनश्च प्रवेशेन तावन्त: एव। येषु योगेषु सयोगिगुणस्थानं संभवति, तेषां चैवेदं अल्पबहुत्वं गृहीतव्यं। इमे सयोगिकेवलिन: कालं प्रतीत्य संख्यातगुणा भवन्ति। यथा ओघे कथितं तथा ज्ञातव्यं। तद्यथा-अष्टलक्ष-अष्टानवतिसहस्र-द्वयधिक-पंचशतप्रमाणा: कथ्यन्ते।

अथ योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पंचमस्थल में उनतालीस (३९) सूत्रों के द्वारा योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी और काययोगियों में औदारिक काययोगियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि सत्रह सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादित करने वाले ‘‘ओरालिय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: तृतीयस्थल में वैक्रियिककाययोगी एवं वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवों का अल्पबहुत्व कहने हेतु ‘‘आहार’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुनश्च कार्मणकाययोगी जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले ‘‘कम्मइय’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। अध्याय के प्रारंभ में सूत्रों की यह समुदायपातनिका हुई।

अब योगमार्गणा में पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, काययोगी और औदारिक काययोगियों में उपशामक, क्षपक एवं सयोगिकेवलियों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुवाद से पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, काययोगी और औदारिककाययोगियों में अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा परस्पर तुल्य और अल्प हैं।।१०५।।

उक्त बारह योग वाले उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थ जीव पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।१०६।।

उक्त बारह योग वाले उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१०७।।

उक्त बारह योग वाले क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ जीव पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।१०८।।

सयोगिकेवली जीव प्रवेश की अपेक्षा पूर्वोक्तप्रमाण ही हैं।।१०९।।

सयोगिकेवली संचयकाल की अपेक्षा संख्यातगुणित हैं।।११०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सूत्रोक्त सर्व योगों के साथ उपशमश्रेणी पर चढ़ने वाले उपशामक जीवों की संख्या उत्कर्ष से चौवन होती हैं, इसलिए उनकी तुल्यता कही है तथा उपरिम अर्थात् क्षपक श्रेणी संबंधी गुणस्थानवर्ती जीवों से कम होते हैं, इसलिए उन्हें अल्प कहा है। इस प्रकार पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, काययोगी और औदारिककाययोगी इन बारहों के अल्पबहुत्व का प्रमाण लाने के लिए अपूर्वकरण आदि तीनों गुणस्थानों में स्थित उपशामक मूलपद अर्थात् अल्पबहुत्व के आधार हुए।

ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती उपशान्तकषाय वाले महामुनियों की संख्यात उतनी ही है।

अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसांपरायिक गुणस्थानवर्ती क्षपक महामुनि एक सौ आठ संख्याप्रमाण होने से संख्यातगुणे हैं।

क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ महामुनियों की संख्या भी उतनी ही १०८ प्रमाण ही है।

सयोगिकेवली भगवान भी प्रवेश की अपेक्षा उतने ही हैं। जिन योगों में सयोगिकेवली गुणस्थान संभव होता है, उनके ही यह अल्पबहुत्व ग्रहण करना चाहिए। ये सयोगिकेवली भगवान काल की अपेक्षा संख्यातगुणित होते हैं। इनका कथन जिस प्रकार से गुणस्थान में किया है उसी प्रकार जानना चाहिए। वह इस प्रकार है-आठ लाख, अट्ठानवे हजार, पाँच सौ दो प्रमाण (८,९८,५०२) कहे गये हैं।

अधुना अप्रमत्तादि-अधस्तनमिथ्यादृष्टिगुणस्थानवर्तिनां अल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।१११।।

पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।११२।।

संजदासंजदा असंखेज्जगुणा।।११३।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।११४।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।११५।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।११६।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा, मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा।।११७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एषां सूत्राणामर्थ: सुगम: वर्तते। पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगि-असंयतसम्यग्दृष्टिभ्य: तेषां चैव योगानां मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा: सन्ति। अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग: ज्ञातव्य:। सामान्यकाययोगिनां औदारिककाययोगिनां च असंयतसम्यग्दृष्टिभ्य: तेषां चैव योगानां मिथ्यादृष्टय: अनंतगुणा: सन्ति एकेन्द्रियापेक्षया एव इमे इति ज्ञातव्यं। अत्र गुणकार: अभव्यसिद्धिकेभ्य: अनंतगुण: सिद्धपरमात्मकेभ्य: अपि अनंतगुण:, अनंतानि सर्वजीवराशिप्रथमवर्गमूलानि इति।
संप्रति एतेषां द्वादशानां सम्यक्त्वापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजद-पमत्तापमत्तसंजदट्ठाणे सम्मत्तप्पावहु-अमोघं।।११८।।
एवं तिसु अद्धासु।।११९।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।१२०।।
खवा संखेज्जगुणा।।१२१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतेषां गुणस्थानानां यथा पूर्वं गुणस्थानेषु उक्तं, तथैव अत्रापि अन्यूनाधिकं वक्तव्यं। एवं त्रिषु अपूर्वकरणादिगुणस्थानेषु। सर्वस्तोका: उपशमा:, क्षपका: संख्यातगुणा:। विवक्षितयोगोपशामकेभ्य: विवक्षितयोगानां क्षपका: संख्यातगुणा: ज्ञातव्या:।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनकाययोगिनां द्वादशानां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सप्तदशसूत्राणि।
अधुना औदारिकमिश्रकाययोगेषु गुणस्थानापेक्षाल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रषट्कमवतार्यते-ओरालियमिस्सकायजोगीसु सव्वत्थोवा सजोगिकेवली।।१२२।।
असंजदसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१२३।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१२४।।
मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा।।१२५।।
असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।१२६।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१२७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कपाटसमुद्घाते केवलिनां आरोहणावरोहणक्रियाव्यावृतचत्वािंरशत्जीवानां अवलंबनात् स्तोका जाता: औदारिकमिश्रकाययोगिन:। असंयतसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, देवनारकमनुष्येभ्य: आगत्य तिर्यग्मनुष्ययो: उत्पन्नानां असंयतसम्यग्दृष्टीनां औदारिकमिश्रयोगे सयोगिकेवलिभ्य: संख्यातगुणानां उपलंभात्।
सासादना: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: पल्योपमस्यासंख्यातभाग:।
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणा:, अत्र गुणकार:-अभव्यसिद्धिकै: अनंतगुण:, सिद्धैरपि अनंतगुण: ज्ञातव्य:।
चतुर्थगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दृष्टय: स्तोका:, दर्शनमोहनीयक्षयेणोत्पन्नश्रद्धानानां जीवानां अतिदुर्लभत्वात्। क्षयोपशमसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, क्षायोपशमिकसम्यक्त्वानां जीवानां बहूनामुपलंभात्। अत्र गुणकार: संख्याता: समया: ज्ञातव्या:।
एवं द्वितीयस्थले औदारिकमिश्रयोगे अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।

'अब अप्रमत्त से लेकर नीचे के मिथ्यादृष्टि गुणस्थान तक के जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवली से उपर्युक्त बारह योग वाले अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।१११।।

उक्त बारह योग वाले अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।११२।।

उक्त बारह योग वाले प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत जीव असंख्यातगुणित हैं।।११३।।

उक्त बारह योग वाले संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।११४।।

उक्त बारह योग वाले सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।११५।।

उक्त बारह योग वाले सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।११६।।

उक्त बारह योग वाले असंयतसम्यग्दृष्टियों से (पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी) मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं और (काययोगी तथा औदारिककाययोगी) मिथ्यादृष्टि जीव अनंंतगुणित हैं।।११७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगी असंयतसम्यग्दृष्टियों से उन्हीं योगों के मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं। जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग यहाँ गुणकार है, सामान्य काययोगी और औदारिककाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टियों से उन्हीं योगों के मिथ्यादृष्टि जीव अनंतगुणित हैं। एकेन्द्रियों की अपेक्षा ही ये जानना चाहिए। यहाँ गुणकार अभव्यसिद्धों से अनंतगुणित है, सिद्ध परमात्माओं से भी अनंतगुण हैं, जो सर्वजीवराशि के अनंतप्रथम वर्गमूल प्रमाण है।

अब इन बारह प्रकार के योग वालों का सम्यक्त्व की अपेक्षा अल्पबहुत्व प्रतिपादित करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

उक्त बारह योग वाले जीवों में असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व गुणस्थान के समान है।।११८।।

इसी प्रकार उक्त बारह योग वाले जीवों में अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थानों में सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व है।।११९।। उक्त बारह योग वाले जीवों में उपशामक जीव सबसे कम हैं।।१२०।।

उक्त बारह योग वाले उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सूत्रोक्त चारों गुणस्थानों का जिस प्रकार गुणस्थान में सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व कहा है, उसी प्रकार यहाँ पर भी हीनता और अधिकता रहित अर्थात् तत्प्रमाण ही अल्पबहुत्व कहना चाहिए। इसी प्रकार अपूर्वकरण आदि तीनों गुणस्थानों में अल्पबहुत्व जानना चाहिए। उपशामक जीव सबसे कम हैं। उनसे संख्यातगुणे क्षपक हैं। विवक्षित योग वाले उपशामकों से विवक्षित योग वाले क्षपक जीव संख्यातगुणे होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मन-वचन और काययोगी बारह प्रकार के जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले सत्रह सूत्र पूर्ण हुए।

अब औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों में गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों में सयोगिकेवली सबसे कम हैं।।१२२।।

औदारिकमिश्रकाययोगियों में सयोगिकेवली जिनों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१२३।।

औदारिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१२४।।

औदारिकमिश्रकाययोगियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तगुणित हैं।।१२५।।

औदारिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१२६।।

औदारिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।१२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कपाट समुद्घात के समय आरोहण और अवतरणक्रिया में संलग्न चालीस केवलियों के अवलम्बन से औदारिकमिश्रकाययोगियों में सयोगिकेवली सबसे कम हो जाते हैं। देव, नारकी और मनुष्यों से आकर तिर्यंच और मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले असंयतसम्यग्दृष्टि जीव औदारिकमिश्रकाययोग में सयोगिकेवली जिनों से संख्यातगुणित पाये जाते हैं।

सासादन जीव असंख्यातगुणे हैं। यहाँ पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है।

गुणकार क्या है ? मिथ्यादृष्टि जीव अनंतगुणे हैं। यहाँ अभव्यसिद्धों से अनन्तगुणित और सिद्धों से भी अनन्तगुणित राशि गुणकार है, ऐसा जानना चाहिए।

चतुर्थ गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं, क्योंकि दर्शनमोहनीयकर्म के क्षय से उत्पन्न हुए श्रद्धान वाले जीवों का होना अति दुर्लभ है।

क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं, क्योंकि क्षायोपशमिक सम्यक्त्व वाले जीव बहुत पाये जाते हैं। संख्यात समय यहाँ गुणकार है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में औदारिकमिश्रयोग में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते

संप्रति वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-वेउव्वियकायजोगीसु देवगदिभंगो।।१२८।।

वेउव्वियमिस्सकायजोगीसु सव्वत्थोवा सासणसम्मादिट्ठी।।१२९।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१३०।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१३१।।
असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।१३२।।
खइयसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।१३३।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यथा देवगतौ अल्पबहुत्वमुक्तं तथा वैक्रियिककाययोगिषु वक्तव्यं। शेषाणां सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।
असंयतसम्यग्दृष्टिस्थाने वैक्रियिकमिश्रकाययोगे उपशमसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका:, उपशमसम्यक्त्वेन सह उपशमश्रेण्यां मृतजीवानामतिस्तोकत्वात्। क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, उपशामकेभ्य: संख्यातगुणासंयतसम्यग्दृष्ट्यादिगुणस्थानेभ्य: संचयसंभवात्। वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, तिर्यग्भ्य: पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रवेदकसम्यग्दृष्टिजीवानां देवेषु उपपादसंभवात्। अत्र गुणकार: पल्योपमस्य असंख्यातभाग: मन्तव्य:।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्राणि सप्त गतानि।
संप्रति आहारक-आहारकमिश्रसंयतानामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-आहारकायजोगि-आहारमिस्सकायजोगीसु पमत्तसंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।१३५।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१३६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थ: सुगम:। उपशमसम्यग्दृष्टीनामत्र संभवाभावात् तेषामल्पबहुत्वं न कथितं।
किमर्थं उपशमसम्यक्त्वेन सह आहारकऋद्धिर्नोत्पद्यते ?
उपशमसम्यक्त्वकाले अत्यन्ताल्पे तदुत्पत्ते: संभवाभावात्। न च उपशमश्रेण्यां उपशमसम्यक्त्वेन सह आहारकद्र्धि: उपलभ्यते, तत्र प्रमादाभावात्। न च तत: अवतीर्यमाणस्य अयमृद्धि: उपलभ्यते, किंच यावन्मात्रेण कालेन आहारकद्र्धिरुत्पद्यते, उपशमसम्यक्त्वस्य तावन्मात्रकालमवस्थानाभावात्।
एवं चतुर्थस्थले आहारद्र्धिसंयतानामल्पबहुत्वं सम्यग्दर्शनापेक्षया प्रतिपादनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
कार्मणकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-कम्मइयकायजोगीसु सव्वत्थोवा सजोगिकेवली।।१३७।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१३८।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१३९।।
मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा।।१४०।।
असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।१४१।।
खइयसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१४२।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१४३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रतरलोकपूरणसमुुद्घातयो: उत्कर्षेण षष्टिमात्रसयोगिकेवलिनामुपलंभात् सर्वस्तोका: भवन्ति। चतुर्थगुणस्थाने सर्वस्तोका: उपशमसम्यग्दृष्टय:, उपशमश्रेण्यां उपशमसम्यक्त्वेन सह मृतसंयतानां संख्यातत्वात्। क्षायिकसम्यग्दृष्टय: कार्मणयोगे संख्यातगुणा:।
पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रक्षायिकसम्यग्दृष्टिभ्य: असंख्यातजीवा: विग्रहं किन्न कुर्वन्ति ?
न तावद् देवा: क्षायिकसम्यग्दृष्टय: असंख्याता: युगपत् म्रियन्ते, मनुष्येषु असंख्यातक्षायिकदृष्टिप्रसंगात्। न च मनुष्येषु असंख्याता म्रियन्ते, तत्रासंख्यातानां सम्यग्दृष्टीनामभावात्। न तिर्यञ्च: असंख्याता मारणान्तिकं कुर्वन्ति, तत्रायानुसारिव्ययत्वात्। तेन विग्रहगतौ क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संख्याताश्चैव भवन्ति। तथा संख्याता: सन्तोऽपि उपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: संख्यातगुणा:, उपशमसम्यग्दृष्टि-आयकारणात् क्षायिकसम्यग्दृष्टि-आयकारणस्य संख्यातगुणत्वात्।
वेदकसम्यग्दृष्टय: एभ्य: असंख्यातगुणा: भवन्ति। अत्र गुणकार: पल्योपमस्य असंख्यातभाग:, असंख्यातानि पल्योपमप्रथमवर्गमूलानि। प्रतिभागश्च क्षायिकसम्यग्दृष्टिराशिगुणितासंख्यातावलिकाप्रमाणं भवति।
एवं पंचमस्थले कार्मणकाययोगे गुणस्थानापेक्षयाल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।

अब वैक्रियिककाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियोें का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगियों में (संभव गुणस्थानवर्ती जीवों का) अल्पबहुत्व देवगति के समान है।।१२८।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१२९।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१३०।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१३१।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१३२।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१३३।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१३४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिस प्रकार का अल्पबहुत्व देवगति में कहा गया है उसी प्रकार की व्यवस्था वैक्रियिककाययोगियों में जानना चाहिए। शेष सूत्रों का अर्थ सुगम है।

असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में वैक्रियिकमिश्रकाययोग में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम होते हैं, क्योंकि उपशमसम्यक्त्व के साथ उपशमश्रेणी में मरे हुए जीवों का प्रमाण अत्यन्त अल्प होता है। क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव उनसे संख्यातगुणे हैं, क्योंकि उपशमश्रेणी में मरे हुए उपशामकों से संख्यातगुणित असंयतसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानों की अपेक्षा क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का संचय संभव है। उनसे असंख्यातगुणे अधिक वेदकसम्यग्दृष्टि होते हैं, क्योंकि तिर्यंचों से पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र वेदकसम्यग्दृष्टि जीवों का देवों में उत्पन्न होना संभव है। यहाँ गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग मानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वैक्रियिककाययोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी संयत महामुनियों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों में प्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१३५।।

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों में प्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१३६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। इन दोनों योगों में उपशमसम्यग्दृष्टि जीवों का होना संभव नहीं है, इसलिए उनका अल्पबहुत्व नहीं कहा है।

शंका-उपशमसम्यक्त्व के साथ आहारकऋद्धि क्यों नहीं उत्पन्न होती है ?

समाधान-क्योंकि, अत्यन्त अल्प उपशमसम्यक्त्व के काल में आहारकऋद्धि का उत्पन्न होना संभव नहीं है। न उपशमसम्यक्त्व के साथ उपशमश्रेणी में आहारकऋद्धि पाई जाती है, क्योंकि वहाँ पर प्रमाद का अभाव है। न उपशमश्रेणी से उतरे हुए जीवों के भी उपशमसम्यक्त्व के साथ आहारकऋद्धि पाई जाती है, क्योंकि जितने काल के द्वारा आहारकऋद्धि उत्पन्न होती है, उपशमसम्यक्त्व का उतने काल तक अवस्थान नहीं रहता है।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में सम्यग्दर्शन की अपेक्षा आहारकऋद्धि सम्पन्न संयतों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब कार्मणकाययोगी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु सात सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगियों से सयोगिकेवली जिन सबसे कम हैं।।१३७।।

कार्मणकाययोगियों में सयोगिकेवली जिनों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१३८।।

कार्मणकाययोगियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१३९।।

कार्मणकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव अनंतगुणित हैं।।१४०।।

कार्मणकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१४१।।

कार्मणकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१४२।।

कार्मणकाययोगियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रतर और लोकपूरण समुद्घात में अधिक से अधिक मात्र साठ सयोगिकेवली जिन पाये जाने के कारण उनकी संख्या सबसे कम होती है। चतुर्थ गुणस्थान में सबसे कम उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं, क्योंकि उपशमश्रेणी में उपशमसम्यक्त्व के साथ मरे हुए संयतों का प्रमाण संख्यात ही पाया जाता है। कार्मणकाययोग में क्षायिकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे होते हैं।

शंका-पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से असंख्यात जीव विग्रह क्यों नहीं करते हैं ?

समाधान-ऐसी आशंका पर आचार्य कहते हैं कि न तो असंख्यात क्षायिकसम्यग्दृष्टि देव एक साथ मरते हैं, अन्यथा मनुष्यों में असंख्यात क्षायिकसम्यग्दृष्टियों के होने का प्रसंग आ जायेगा। न मनुष्यों में ही असंख्यात क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव मरते हैं क्योंकि उनमें असंख्यात क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का अभाव है। न असंख्यात क्षायिकसम्यग्दृष्टि तिर्यंच ही मारणान्तिक समुद्घात करते हैं, क्योंकि उनमें आपके अनुसार व्यय होता है। इसलिए विग्रहगति में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यात ही होते हैं तथा संख्यात होते हुए भी वे उपशमसम्यग्दृष्टियों से संख्यातगुणित होते हैं, क्योंकि उपशमसम्यग्दृष्टियों के आय का कारण से क्षायिकसम्यग्दृष्टियों के आय का कारण संख्यातगुणा हैं।

वेदकसम्यग्दृष्टि इनसे असंख्यातगुणे होते हैं। यहाँ पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है, जो पल्योपम के असंख्यात प्रथम वर्गमूलप्रमाण है और प्रतिभाग क्षायिकसम्यग्दृष्टि राशि से गुणित असंख्यात आवली प्रमाण है।

इस तरह से पंचम स्थल में कार्मणकाययोग में गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व का कथन करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खंड में पंचम ग्रंथ के अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में योगमार्गणा नामका चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।