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०४. वेदिका निर्माण विधि

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अथ चतुर्थः परिच्छेदः

अथ मण्डपविधानं वेदीनिर्वर्तनं च ।।

अनुष्टुप छंदः- अंकुरार्पणतः पश्चात् द्वितीयेऽहनि शोभने ।
कृत्वा वास्तुबलिं सर्व-मंडपानि प्रसाधयेत् ।। 1 ।।

नांदीमंगलतः पूर्वं, दिवसेषु कियत्स्वपि।
यष्ट्राहूय च सम्मान्य, प्रार्थितो याजकोत्तमः ।। 2 ।।

सज्जयित्वोपकरणं, याजको यज्ञसिद्धये ।
सम्यक्शांतिविधिं कृत्वा, कारयेन्मंडपादिकम् ।। 3 ।।

खात्वा विशोध्य संपूर्य, समीकृत्य पवित्रिते ।
भूभागे मंडपं कार्यं, पूगक्षीरद्रुमादिभिः ।। 4 ।।

जिनधामाग्रतो मूल-वेदीमंडपमिष्यते।
त्र्यादित्रिवद्र्धिष्णु-चतुर्विंशत्यंतकरप्रमम् ।। 5 ।।

तन्मध्ये नवमे भागे, वेदी निर्वत्र्यते बुधैः ।
 एकाद्यष्टांत्यहस्तैः सा, प्रमिता वेदिकाष्टधा ।। 6 ।।

क्रमान्नंदा सुनंदा च, प्रबुद्धा सुप्रभाभिधा ।
मंगला कुमुदा च स्याद्विमला पुंडरीकिका ।। 7 ।।

सा सर्वाष्टविधा वेदी, स्वस्वव्याससमायतिः ।
 भवेद् व्यासषडंशोच्चा, चतुरस्त्रेशदिक्प्लवा ।। 8 ।।

तास्विष्टा वेदिका काचिद्विधेयामेष्टिकादिभिः ।
तन्निर्माणविधिः सर्वस्तद्विधौ वर्णयिष्यते ।। 9 ।।

तस्याश्चतुर्दिक्षुहस्त-विस्तारायामगाधकम् ।
चतुरस्रं चतुर्मात्र, मेखलात्रयकुंडकम् ।। 10 ।।

तत्पुरस्ताच्चतुद्र्वारं, चतुरस्रं सभाह्नयम् ।
सप्तद्वात्रिंशदाद्यंत-हस्तप्रमितमंडपम् ।। 11 ।।

मूलवेद्याः प्रतीच्यां तु, दीक्षाग्रहणमंडपम् ।
 उचितायामविष्कंभं, स्याच्चतुस्तंभसंभृतम् ।। 12 ।।

ईशानदिशि तन्मूल-वेदीमंडपतो भवेत्।
मंडपं तत्समं वेदी-कर्णमात्राध्वसंगतम् ।। 13 ।।

ग्रामस्येशानदिशि वा जन्माभिषवमंडपम् ।
तत्समं कारयेद्धीमान्देशकालानुरोधतः ।। 14 ।।

तत्रैव मंडपे प्रत्यक्प्रदेशे ब्रह्मभागतः ।
चतुरस्रं चतुःस्तंभं, सर्वावयवसुंदरम् ।। 15 ।।

जलनिर्गमनोपेतं, वेदिकापरिवेष्टितम् ।
उचितायामविष्कंभं, भवेत्स्नपनमंडपम् ।। 16 ।।

तत्र या वेदिका सैव, भवेदीशानवेदिका ।
ब्रह्मांशात्पुरतः कार्या, कलशन्यासवेदिका ।। 17 ।।

तन्मंडपात्प्रतीच्यां तु, विधेयं होममंडपम् ।
ततोपि च प्रतीच्यां स्या-दंकुरारोपलक्षणम् ।। 18 ।।

तयोस्तु लक्षणं सर्वं, तत्प्रयोगेभिधास्यते ।
क्वचित्तत्रोचितोद्देशे, भवेच्छान्तिकमंडपम् ।। 19 ।।

सुप्रभावेदिकायोग्यं, तन्मध्ये सैव वेदिका ।
पूर्वाद्यष्टदिशास्वेत-द्वेद्याः सोमदिशि क्रमात् ।। 20 ।।

नवग्रहाणां होमार्थं, नवकुंडानि कल्पयेत् ।
चतुरस्रमथाश्वत्थ-दलाभं चार्धचंद्रकम् ।। 21 ।।

त्रिकोणं वर्तुलं पंच-कोणं षट्कोणकं तथा ।
अष्टकोणं धनूरूप-मथाहीन्द्रदिगंतरे ।। 22 ।।

नवग्रहाणामेकं स्यादप्कुंडं चतुरस्रकम् ।
सर्वं तु हस्तमात्रं स्याद्धनुःसार्धकरप्रमम् ।। 23 ।।

धनुषश्चार्धचंद्रस्य, व्यासो हस्तत्रिभागतः ।
विमानस्य चतुर्दिक्षु, चतुरस्राणि कल्पयेत् ।। 24 ।।

कुंडानि मंडपं योग्यं, तत्प्रत्यक्सिद्धविष्टरम् ।
एवं प्रागेव निर्माप्य, समस्तं मंडपादिकम् ।। 25।।

नांदीदिनात्तृतीयेऽन्हि, कृत्वा शांतिकसंविधिम् ।
सन्मान्य शिल्पिनः कृत्वा, वास्तुदेवबलिं ततः ।। 26 ।।

विचित्रवसनैः सर्व-मंडपानि प्रसाधयेत् ।
ध्वजैश्च सल्लकीरंभास्तंभैरपि दलस्रजा ।। 27 ।।

चतुद्र्वारोध्र्वकोणस्थ-शुभ्रकुंभाष्टकेन च।
तोरणैर्भूरिसौंदर्य-नानारत्नांशुकांचितैः ।। 28 ।।

प्रलंबमुक्तालंबूष-हारस्रक्तारकोत्करैः ।
भूरिपुष्पोपहारेण, चारुचंदनचर्चया ।। 29 ।।

मुक्तास्वस्तिकविन्यासै, रंगावलिविशेषकैः ।
कलशादर्शभृंगार-यवारैश्च विरूढकैः।। 30 ।।

दर्भमालिकया धूप-घटैरन्यैश्च मंगलैः।
मंडपं भूषयेत् सर्वं, बुधः चित्तप्रसत्तये।। 31 ।।

एवं विधीयते यच्च, मंडपस्य प्रसाधनम् ।
तदेव हि बुधाः प्राहु-र्यज्ञशालाप्रवेशनम् ।। 32 ।।

अंकुरारोपण विधि करने के बाद दूसरे दिन शुभमुहूर्त में वास्तुबलि-वास्तुपूजा करें, सर्वमंडप अलंकृत करें। नांदीमंगल विधि से पूर्व प्रतिष्ठा कराने वाले यजमान, प्रतिष्ठाचार्य भी यज्ञसिद्धि के लिये सर्व उपकरण तैयार करके प्रथम ही शांतिविधि-शांतिविधान करावें पुनः मंडप, वेदी आदि के निर्माण करावें। मंडप बनाने के स्थल में भूमि खोदकर उसका शोधन करके पुनः उसे भर देवें व समान-समतल कर देवें। ऐसे पवित्र स्थान में क्षीर-वृक्ष, उदुंबर आदि लकड़ियों से मंडप तैयार करावें।

जिनमंदिर के सामने मूलवेदी मंडप बनवावें, वह मंडप तीन, छह, नव, बारह इस तरह वृद्धि करे चैबीस हाथ प्रमाण। इतना लंबा, चैड़ा होना चाहिये। इसके नीचे में नवमें भाग में वेदी बनावें, वह आठ हाथ ही होवे।

प्रतिष्ठासारोद्धार में लिखा है- ‘‘कम से कम तीन हाथ का मंडप होना चाहिये और एक हाथ की वेदी बनाना चाहिये यह संक्षेप विधि है और अधिक विधि करनी हो तो तीन-तीन हाथ बढ़ाते जाना अर्थात् छह हाथ का मंडप और दो हाथ की वेदी करना। इस तरह सबसे अधिक चैबीस हाथ का मंडप (36 फुट लगभग) और आठ हाथ की वेदी बनाना चाहिये यह विस्तार विधि करने के समय जानना।’’

इस वेदी के आठ भेद हैं- नंदा, सुनंदा, प्रबृद्धा, सुप्रभा, मंगला, कुमुदा, विमला और पुंडरीका। वेदी का जो व्यास हो उतनी ही लंबाई होनी चाहिये और व्यास के छठे भाग प्रमाण ऊंचाई हो, वेदी चैकोन होवे और ईशान दिशा में होवे। इन आठ वेदियों में से कोई भी एक वेदी कच्ची ईंटों से बनवावें। इस वेदी को बनवाने की सर्वविधि ‘वेदी विधान’ के प्रकरण में कही जाएगी।

इस वेदी की चारों दिशाओं में एक हाथ लंबा और एक हाथ चैड़ा और एक हाथ गहरा इस प्रकार चैकोन कुंड बनावें जिसमें तीन कटनी होवें। उसके सामने चार द्वारों वाला चैकोन ऐसा सभामंडप बनवावें, यह सभा मंडप सात हाथ से लेकर बत्तीस हाथ पर्यंत होना चाहिये। मूलवेदी और पश्चिम में दीक्षामंडप बनवावें। यह मंडप योग्य लंबा, चैड़ा और चार खंभों से सहित होना चाहिये।। 1 से 12।।

ईशान दिशा में मूलवेदी मंडप के समान ही मंडप बनाना चाहिये, यह मंडप वेदी के ईशान कोण से लेकर नैऋतकोणपर्यंत, जो वेदी का प्रमाण है, उतना होना चाहिये।

नगर की ईशान दिशा में देश, काल के अनुसार जन्माभिषेक मंडप बनवावें। वह भी उपर्युक्त प्रमाण वाला होना चाहिये। इस मंडप के ब्रह्मभाग-पश्चिमभाग में चैकोन, सुंदर, पानी निकलने के साधन से सहित ऐसी वेदी से युक्त, चार खंभे वाला यथायोग्य लंबा ऐसा स्नपन-अभिषेक मंडप बनवावें। इस मंडप में जो वेदी है, उसे ‘ईशानवेदी’ कहते हैं।

ब्रह्मांश के सामने कलश स्थापित करने के लिये एक वेदिका बनावें। इस मंडप की पश्चिम दिशा में होम मंडप बनावें और उसके भी पश्चिम में अंकुरारोपण मंडप तैयार करवावें। इस होम मंडप और अंकुरार्पण मंडप के सर्वलक्षण उन-उन की प्रयोगविधि में कहा जावेगा। इन दोनों मंडपों के निकट यथायोग्य स्थान में शांतिविधिमंडप होना चाहिये।

उपर्युक्त-सुप्रभा वेदी के योग्य उस मध्य में वही वेदी है। इस वेदी की आठों दिशाओं में क्रम से नवग्रह के होम के लिये क्रम से नव कुंड होना चाहिये। 1. सूर्यग्रह का चैकोन कुंड

2. चंद्रग्रह का पीपल के पान के आकार का

3. मंगल ग्रह का अर्ध चंद्राकार

4. बुधग्रह का त्रिकोण

5. गुरुग्रह का वर्तुलाकार

6. शुक्रग्रह का पंचकोण

7. शनिग्रह का षट्कोण

8. राहुग्रह का अष्टकोण और

9. केतुग्रह का धनुषाकार इस प्रकार नवग्रह हवन के लिये नौ कुंड तैयार करवावें और एक जलहोम कुंड बनवावें जो कि चैकोन होवे।

जिस दिन नांदीमंगल विधि की है, उससे तीसरे दिन शांति विधि करे। पुनः सर्वशिल्पि लोगों का सत्कार करके वास्तुबलि नाम से विधि संपन्न करें। सर्वमंडपों को चित्र-विचित्र वस्त्रों से सुसज्जित करें। ध्वजायें लगावें, साल्लकी, केला आदि के स्तंभ खड़े करे, चारों तरफ मालायें लटकावें। मंडप के चारों दरवाजों में दो-दो, ऐसे आठ कुंभों की स्थापना करें। तोरण बांधें, मोतियों का चूर्ण बिखरावें, चंदन के छींटे दिलावें, पुष्पों से सजावें, स्वस्तिक आदि बनवावें और सुंदर-सुंदर रंगोली बनवावें। कलश, दर्पण, भंगार, यवारक-उगे अंकुरे, विरूढ़क-द्विदल धान्य के अंकुर, दाभ की मालायें, धूपघट और अन्य भी मंगल पदार्थों से मंडप को सुशोभित करें। इसे ही विद्वान् लोग ‘यज्ञशाला प्रवेशन’ यह नाम देते हैं ।। 13 से 32।।

अस्य यज्ञशालाविधेः प्रयोगः

तत्रादौ पूजामुखविधिः पूर्ववत्कर्तव्यः ।। (प्रारंभ में पूर्ववत् पूजामुख विधि करें)

इन्द्रव्रजा- स्नानादिसिद्धस्तवनावसानं, पूजामुखं तद्विधिना विधाय।

निःशेषविघ्नप्रतिघातनार्थं, श्रीशांतियंत्रार्चनमारभेऽहम्।।1।।

प्रस्तावनपुष्पांजलिः। (पुष्पांजलि क्षेपण करें)। अथ वक्ष्यमाणविधिना क्षेत्रपालवास्तुदेवबलिं वायुमेघाग्निदेवानामर्चनापूर्वकं तैर्भूमिशोधनं नागतर्पणं दर्भन्यासं भूम्यर्चनं च क्रमेण विदध्यात् ।। वेद्यां मंगलमालिखार्चितेत्यादिना चूर्णानि स्थापयेत् ।। (भूमिशोधन विधि करके वेदी में पूर्व मंत्रों से पंचवर्णी चूर्ण स्थापित करें)

अथ पूजा

(अनंतर मंडप में चूर्णों से अष्टदल कमल बनाकर चार द्वार सहित चैकोन मंडल बनावें। कर्णिका में अर्हंत, पूर्वादि दिशाओं के चार दलों में सिद्धादि परमेष्ठी, चार विदिशा के दलों में मंगल, लोकोत्तम, शरण और केवलीप्रणीत धर्म लिखें। पुनः आठ दल कमल में जयादिदेवी, चैकोन मंडलों में दिक्पाल और सोम दिक्पाल के ऊपर पूर्वादि दिशा में सूर्यादिग्रहों को लिखें, ग्रहमंडल के मध्य केतुग्रह लिखें अनंतर विघ्नशमन हेतु सबकी आराधना करे।)

गद्य-अथातः समुचितोद्देशपरिकल्पितषोडशस्तंभसंभृतचतुरस्रसमुचितोत्सेधायामविस्तारविराजिते। चंद्रोपकमुक्ता- फललंबूषादिविविधमंडनाभिमंडितशांतिकयागमंडलाराधनामंडपे । मध्येमंडपं रुचिरतरचूर्णैरष्टदलकमलमुपात्तचतुद्र्वार- चतुरस्रमंडलं समालिख्य, तत्कर्णिकामध्ये अर्हत्परमेष्ठिनस्तत्पूर्वादिदिशासु अपरपरमेष्ठिनः, तदाग्नेयाद्यन्तरेषु मंगलादीन्सिद्ध- भट्टारकोपरिष्टादयोगकेवलिचरमसमयसंभविसंपूर्णरत्नत्रयरूपधर्मं तद्बहिरष्टदलेषु जयादिदेवीः, चतुरस्रमंडले दिक्पालकान्, सोमदिक्पालकोपरि पूर्वादिदिक्षु सूर्यादिग्रहान् ग्रहमंडलमध्ये केतुग्रहं च, सर्वानिमान्मंत्ररूपान्निधाय, सर्वविघ्नानामनुत्पत्त्यर्थं उपशमनार्थं सम्यगिदानीमाराधयामहे ।।

ॐ परमब्रह्मणे नमो नमः स्वस्ति स्वस्ति जीव जीव नंद नंद वद्र्धस्व वद्र्धस्व विजयस्व विजयस्व अनुशाधि अनुशाधि पुनीहि पुनीहि पुण्याहं पुण्याहं मांगल्यं मांगल्यं पुष्पांजलिः ।।

अथ वक्ष्यमाणविधिना शब्दब्रह्मावर्जनं परब्रह्माधिवासनं पंचपरमेष्ठिपूजनं मंगललोकोत्तमशरणाघ्र्यप्रदानं धर्मपूजां च अनादिसिद्धमंत्रेण पुष्पजपंविदध्यात्।। (आगे कही विधि से शब्दब्रह्म की पूजा, परब्रह्म की अधिवासना, पंचपरमेष्ठी पूजन, मंगललोकोत्तम आदि की पूजा करके अनादिसिद्धमंत्र का पुष्पों से जाप करें) आर्याछंदः- पंचपरमेष्ठिनस्ते, मंगललोकोत्तमाश्च शरणानि।

धर्मोपि कर्णिकायां, समर्चिताः सन्तु नः सुखदाः।। 2।। (पूर्णाघ्र्यः)

ॐ ह्रीं अर्हत्परमेष्ठ्यादिभ्योऽघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। अघ्र्यमंत्रः ।।

अथ वक्ष्यमाणविधिना गद्यपद्यमंत्रवाक्यैः जयादिदेवीसमर्चनं, दिक्पालार्चनं नवग्रहपूजाविधिं नवग्रहहोमं च क्रमेण यथाविधि विदध्यात् (आगे कही गई विधि से क्रम से जयादिदेवी पूजा, दिक्पालार्चना, नवग्रहपूजा और नवग्रह होम करे)। नवग्रहहोमे तावज्जलहोमविधानम् ।। नवग्रह में जलहोम विधि कहते हैं)

वसंततिलकाछंदः- कुंडात्परस्तात्परिमृष्टदेशे, सुविष्टरं न्यस्य सुदृष्टमृष्टम्।

तत्रोपविष्टोस्म्यथ पश्चिमास्यः, पर्यंकतो वाम्बुरुहासनाद्वा।। 3।।

ॐ क्षीं भूः शुध्यतु स्वाहा ।।ॐ ह्रीं अर्हं क्षीं ठं आसनं निक्षिपामि स्वाहा ।। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: णिसिहि आसने उपविशामि स्वाहा। इंद्रवज्रा- तीर्थांबुपूर्णोज्ज्वलशातकुंभ-कुंभस्य नालाद्गलितेन वारा। कुंडं शुभं सर्वममत्रमत्र, द्रव्यं च सिंचामि समंत्रमेव।। 4।। ॐ ह्रीं नमः सर्वज्ञाय सर्वलोकनाथाय धर्मतीर्थकराय श्रीशांतिनाथाय परमपवित्राय पवित्रतरजलेन होमकुंडशुद्धिं करोमि स्वाहा ।। वक्ष्यमाणमंत्रैः कुंडमभ्यर्चयेत् । (यहां हवन के पूर्व की विधि करें)। (जौ, तिल और शालिधान्य मिलाकर आगे के नवग्रहों के मंत्रों से सात-सात बार इन तीन धान्यों की मुट्ठी लेकर जलकुंड में क्षेपण करें।)

उपजाति- यवैस्तिलैः शालिभिरेव सप्त-सप्तस्वमुष्टिप्रमितैर्विशुद्धैः । होमं विधास्यामि समंत्रमंभः, कुंडे ग्रहाणामिह सुप्रसत्त्यै ।। 5।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् आदित्यमहाग्रह! अस्माकं1 शिवं कुरु कुरु स्वाहा । एवं सोमादिष्वपि।

 
ॐ ह्रीं ह्र: फट् सोममहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् मंगलमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।
 
ॐ ह्रीं ह्र: फट् बुधमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।
 
ॐ ह्रीं ह्र: फट् गुरुमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।
 
ॐ ह्रीं ह्र: फट् शुक्रमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् शनिमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् राहुमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् केतुमहाग्रह!....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

शार्दूलविक्रीडितं- सूर्यः शौर्यगुणं शशी कुशलतां, सन्मंगलं मंगलो । बुद्धिं तत्त्वबुधां बुधो वितरता-ज्जीवः शुभोज्जीवनम्।।

शुक्रः शुक्लतरं यशोतिविमलं, मंदोप्यमंदश्रियम् । राहुर्बाहुबलं महार्घमहितः, केतुर्महाकेतुताम्।।6।।

इष्टप्रार्थनाय पुष्पांजलिः।

अथाग्निहोमविधानम्

(अग्निहोम की विधि कहते हैं)

उपजाति- अभ्यच्र्य कुंडं परिधिं विधाय, परिस्तृतिं चानलमेघयुक्तम्।

संस्थाप्य संधुक्ष्य कुशाग्रकीलैः, साक्षात्कृदेकां समिधं जुहोमि।।7।।

प्रकृतक्रमविध्यवधानाय पुष्पांजलिः। ॐ नीरजसे नमः जलं। शीलगंधाय नमः गंधं। अक्षताय नमः अक्षतं। विमलाय नमः पुष्पं। परमसिद्धाय नमः चरुं। ज्ञानोद्योताय नमः दीपं। श्रुतधूपाय नमः धूपं। अभीष्टफलदाय नमः फलं।। इति मेखलातले कुंडानामर्चनम् ।। (अष्टद्रव्य से कुंडों की पूजा करें, यहां हवन की पूर्व विधि करें)

ॐ नमोऽर्हते भगवते सत्यवचनसंदर्भाय केवलदर्शनप्रज्वलनाय पूर्वोत्तराग्रेण दर्भपरिधिमुदुंबरसमित्परिधिं च करोमि स्वाहा । इत्यनेन परिधिस्थापनम् (होमकंुड में समिधा स्थापित करें) ।।

ॐ नमोऽर्हते भगवते सत्यवचनसंदर्भाय केवलदर्शनप्रज्वलनाय पूर्वोत्तरहोमकुंडानां मध्ये शुष्कदर्भपरिस्तरणं करोमि स्वाहा । इति परिस्तरणस्थापनम् (सूखी डाभ स्थापित करें) ।।

ॐ ह्रीं स्वस्तये श्रीमंतं पवित्रतरगार्हपत्यमग्नीन्द्रं स्थापयामि स्वाहा । (अग्नि की स्थापना करें)

जैनेन्द्रवाक्यैरिव सुप्रसन्नैः, संशुष्कदर्भाग्रगताग्निकीलैः।

कुंडस्थिते सेंधनशुद्धवन्हौ, संधुक्षणं सांप्रतमातनोमि।।8।।
उसहायि जिणे पणमामि सया, अमलो विरजो वरकप्पतरू।
स अ कामदुहा मम रक्ख सया, पुरुविज्जुणुहि पुरुविज्जुणुहि।।9।।

ॐ ॐ ॐ ॐ रं रं रं रं स्वाहा इत्यग्निं संधुक्षयेत्। (अग्नि को संधुक्षित करें)

ॐ वैश्वानरजातवेद, इहावलोकिताक्ष सर्वकर्माणि साधय साधय स्वाहा ।।

अनेन गार्हपत्याग्नींद्रस्य संनिधीकरणार्थं एकसमिदाहुतिं विदध्यात् ।। (गार्हपत्य अग्नि में एक समिधा की आहुति देवें)

(आक, ढाक, खैर, चिरचिटा, वट, उदुंबर, सफेद कीकर, दूब और डाभ इनकी समिधा से क्रम से पृथक्-पृथक् एक-एक ग्रहों के एक-एक कुंडांे में आहुति देवें।)

अर्कः पलाशः खदिरो मयूरो-प्यश्वत्थफल्गू च शमी च दूर्वा।

कुशोप्यमीषां समिधो जुहोमि, ग्रहप्रसादार्थमिहाग्निकुंडे।।10।।

अनुष्टुपछंदः- प्राक्कृते चतुरस्रेत्र, कुंडे संस्थापितेऽनले। घृतप्लुतार्कसमिधो, हुत्वार्कं सुप्रसादये।।11।।
ॐ ह्रीं ह्र: फट् आदित्यमहाग्रह अस्माकं1 शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

(इस मंत्र से सूर्यग्रह कुंड में आक की समिधा घी में डुबोकर डालें)

आग्नेयकोणक्लृप्तेऽग्नि-कुंडेश्वत्थदलोपमे। पलाशसमिधः साज्या, हुत्वा सोमं प्रसादये।।12।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् सोममहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

(इस मंत्र से सोमग्रह कुंड में घी में डुबोकर पलाश की समिधा डालें)

अपाच्यामर्धचंद्राभ-वन्हिकुंडे घृतप्लुताः। खादिरीः समिधो हुत्वा, तोषयामि कुजग्रहम्।।13।।

ॐ ह्रीं ह्र:फट् कुजमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

(इस मंत्र से मंगलग्रहकुंड में खैर की समिधा घी में डुबोकर डालें)

नैऋत्यां दिशि क्लृप्तेऽत्र, त्रिकोणे वन्हिकुंडके। साज्यापामार्गसमिधो, जुहुयां बुधतृप्तये।।14।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् बुधमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

(इस मंत्र से अपामार्ग-चिरचिटा की समिधा घी में डुबोकर डालें)

प्रतीच्यां वृत्तकुंडेग्नौ, हुत्वा गव्यघृताप्लुताः। बोधिद्रुमस्य समिधः, प्रीणयामि बृहस्पतिम्।।15।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् बृहस्पतिमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

(इस मंत्र से वट की समिधा घी में डुबोकर गुरुग्रह के कुंड में डाले)

वायव्यां पंचकोणाग्नि-कुंडे हुत्वा घृतांचिताः। उदुंबरस्य समिधो, भार्गवं सुप्रसादये।।16।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् शुक्रमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा ।

(इस मंत्र से शुक्रग्रह के कुंड में उदुंबर-गूलर की समिधा घी में डुबोकर डालें)

उदग्गतेत्र षट्कोण-कुंडेग्नौ सर्पिराप्लुताः। शम्यास्तु समिधो हुत्वा, प्रीणयामि शनैश्चरम्।।17।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् शनिमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

(इस मंत्र से शनिग्रह कुंड में शमीवृक्ष की समिधा घी में डुबोकर डालें)

ऐशान्यां दिशि निर्वृत्ते, कुंडेऽस्मिन्नष्टकोणके। दूर्वा घृतप्लुता हुत्वा, राहुं संतर्पयाम्यहम्।।18।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् राहुमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा।

(इस मंत्र से राहुग्रह के कुंड में दूब की समिधा घी में डुबोकर आहुति देवें)

पाशिदक्षिणभागस्थे, धनुराकारकुंडके। कुशानाज्यप्लुतान्हुत्वा, केतुमेतं धिनोम्यहम्।।19।।

ॐ ह्रीं ह्र: फट् केतुमहाग्रह....... शिवं कुरु कुरु स्वाहा । (इस मंत्र से केतुग्रह कुंड में डाभ की समिधा घी में डुबोकर आहुति देवें) इत्थं सारसपर्ययाद्य महिता यूयं प्रसन्नाः स्थ नः, सांगास्ताद्विकलापि मोहमुखतो युष्मत्प्रसादादियम्। सर्वज्ञाध्वरविघ्नमाघ्नत द्रुतं सर्वेऽपि दिक्पालकाः,पूर्णागां विधिपूर्तिपूर्णफलदां पूर्णाहुतिं वोऽर्पये।। पूर्णाघ्र्यम्।। (पूर्णाघ्र्य देवें)

गद्य-अथात्र मंडले स्नपनपीठे निवेश्य जिनचतुर्विंशतिं प्रागुक्तविधिना संस्नाप्याभ्यर्चयेत् ।। छत्रचामरादिविभवशालिनीं भृंगारकलशहस्तजनमुक्ताम्बुधारापूतपुरोधरां अग्रतो नृत्यत्कलशांङ्गनां जिनार्चामनुयांतः शक्राः, महातूर्यस्वनैः भव्यजनजयजयकोलाहलैः सह स्नानोदकचरुपुष्पाक्षतादिभिब्र्रह्ममंत्रेण सर्वमंडपब्रह्मस्थाने, दिक्पालमंत्रेण दिक्षु दिक्पालबलिं दत्वा, तत्क्षेत्रे सर्वत्र स्नानोदकादिभिः सर्वदिशं पूरयंतो बलिमंत्रेण त्रिवारं बलिभ्रमणं कुर्यात् ।। ब्रह्ममंत्रदिक्पालमंत्राः प्रागेवोक्ताः ।। अयं तु बलिमंत्रः (ये बलिमंत्र-पूजाविधि के मंत्र हैं) ॐ अर्हद्भ्यो नमः। सिद्धेभ्यो नमः। सूरिभ्यो नमः । पाठकेभ्यो नमः । सर्वसाधुभ्यो नमः । ¬ अतीतानागत- वर्तमानत्रिकालगोचरानंतद्रव्यपर्यायात्मकवस्तुपरिच्छेदक-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राद्यनेकगुणगणाधारपंचपरमेष्ठिभ्यो नमः।। पुण्याहं पुण्याहं प्रीयंतां प्रीयंतां वृषभादिमहतिमहावीरवर्धमानपर्यंतपरमतीर्थकरदेवाः तत्समयपालिन्योऽप्रतिहतचक्र- चक्रेश्वरीप्रभृतिशासनदेवताः गोमुखप्रभृतिचतुर्विंशतियक्षदेवताः आदित्यचंद्रमंगलबुधवृहस्पतिशुक्रशनिराहुकेतुप्रभृत्यष्टा- शीतिग्रहाः, वासुकिशंखपालकर्कोटकपद्मकुलिशान्नतक्षकमहापद्मजयविजयनागाः देवनागयक्षगंधर्वब्रह्मराक्षसभूतव्यंतर प्रभृतिभूताश्च। सर्वेप्येते जिनशासनवत्सलाः, ऋष्यार्यिकाश्रावकश्राविकायष्ट्रयाजकराजमंत्रिपुरोहितसामंतरक्षक- प्रभृतिसमस्तलोकसमूहस्य शांतिवृद्धिपुष्टितुष्टिक्षेमकल्याणस्वायुरारोग्यप्रदा भवंतु। सर्वसौख्यप्रदाश्च संतु। देशे राष्ट्रे, पुरेषु च सर्वदैव चोरारिमारीतिदुर्भिक्षावग्रहविघ्नौघदुष्टग्रहभूतशाकिनीप्रभृत्यशेषानि प्रलयं यांतु । राजा विजयी भवतु । प्रजासौख्यं भवतु । राजप्रभृतिसमस्तलोकाः सततं जिनधर्मवत्सलाः पूजादानव्रतशील- महामहोत्सवप्रभृतिषु उद्यता भवंतु। चिरकालं नंदंतु । यत्र स्थिता भव्यप्राणिनः संसारसागरं लीलयोत्तीर्यानुपमं सिद्धसौख्यमनंतकालमनुभवंतु । इतश्चाशेषप्राणिगणशरणभूतं जिनशासनं नंदत्विति स्वाहा ।। इत्यनेन बलिमंत्रेण बलिं त्रिवारं विहारयेत् । इति द्वितीयदिने यज्ञशालाप्रवेशविधानं ।। (इन मंत्रों को बोलते हुये तीन बार बलि को घुमावें अर्थात् यज्ञभाग-पूजा द्रव्य लेकर भगवान को भी लेकर प्रदक्षिणा देवें, इस प्रकार दूसरे दिन यज्ञशाला प्रवेश विधि हुई।)

तृतीय दिन की विधि-मूलवेदिका व ईशानवेदिका निर्माण विधि

अनुष्टुप्छंदः- अंकुरार्पणतश्चान्हि, तृतीये मूलवेदिकां । निर्वर्तयेत्तदैशान-वेदिकामपि तद्यथा ।। 20 ।।


लघुशान्तिकमाराध्य, यंत्रशांतिकमंडपे । वेदीं निर्वत्र्य संकल्प-पूर्वकं तदनंतरम् ।। 21 ।।

सर्वौषधिपंचरत्न-मिश्रतीर्थाम्बुपूरितान् । पंचाममृण्मयान्कुंभान्दधिदूर्वाक्षतांचितान् ।। 22।।

वेदिकाग्रे विनिक्षिप्य, समभ्यच्र्याधिवासयेत् । अनादिसिद्धमंत्रेण, पृथगेकैकवारतः ।। 23।।

वेद्यां मध्यमगर्ते च, कोणगर्भचतुष्टये । निक्षिपेत्क्रमशस्तत्र, श्रीखंडमपि कुंकुमम् ।। 24।।

जीवंतौ पितरौ यासां, श्वसुरौ ताभिरादरात्। पतिपुत्रवतीभिस्तान्कुंभानिंद्रो निवेशयेत् ।। 25।।

मध्यगर्तेऽग्निकोणादिचतुष्टयमिति क्रमात् । ताभिस्तान्स्थापयेत्कंुभान्शंखनादे समुद्यति ।। 26 ।।

पद्यार्थ - अंकुरारोपण के तीसरे दिन मूलवेदिका और ईशानवेदिका का निर्माण करावें। उसकी विधि यह है- यंत्रशांतिमंडप में लघुशांतिक-लघुशांतिविधान की आराधना करके वेदी बनवावें। उस वेदी के सामने कच्ची मिट्टी के पांच कुंभ रखें, उनमें सर्वौषधिचूर्ण मिश्रित तीर्थोदक डालें, प्रत्येक में एक-एक रत्न डालें, कलशों के बाहर दही, दूध, अक्षत लगावें। आगे लिखे अनादिसिद्ध मंत्रों से कलशों की पूजा करके वेदी बनाते समय मध्य के गड्ढे में एक कलश स्थापित करावें और चारों कोणों के गड्ढों में एक-एक कलश रखावें। जिनके माता-पिता, सास, ससुर जीवित हैं ऐसी पति और पुत्र वाली सौभाग्यवती स्त्रियों से प्रतिष्ठाचार्य इन कच्चे कुंभों की स्थापना करावें। ।। 20 से 25।।

पहले मध्य के गर्त में पुनः आग्नेय कोण, नैऋत्य, वायव्य और ईशान कोण में रखावें। उस समय शंखनाद करावें और बाजे बजवावें। इन कलशों के ऊपर उन्हींह्रीं महिलाओं से एक-एक कच्ची ईटें रखवावें, इन ईंटों को भी अनादिमंत्र से मंत्रित करके रखावें।।26।।

तेषामुपरि विन्यस्येत्, पंचाप्यामेष्टिकाः पृथक् । अनादिमंत्रैरध्यास्य, ताभिरेव निवेशयेत् ।। 27 ।।

तथा निर्वत्र्य चैशान-वेदीं सन्मान्य शिल्पिनः । ब्रह्मदिक्पालबल्यन्ते, त्रिवारं कारयेद्बलिम् ।। 28 ।।

इसी प्रकार से ईशान वेदी निर्माण में भी विधि करके वेदी बनवाकर शिल्पी-कारीगरों को सम्मानित करें। पुनः ब्रह्मबलि, दिक्पाल बलि अंत में पूर्वकथित बलिमंत्रों से तीन बार बलिभ्रमण करावें।। 27 से 28।। अस्य वेदीनिर्वर्तनविधेः प्रयोगः ।। अब वेदी बनवाने की विधि बताते हैं- लघुशांतियंत्राराधनं। तदुपरि जिनार्चाभिषेकं च पूर्ववद्विदध्यात् । (लघु शांतियंत्राराधना करके जिनप्रतिमा का अभिषेक करें।)

णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं । णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं । णमो लोए सव्वसाहूणं ।।

चत्तारि मंगलं-अरिहंत मंगलम्। सिद्ध मंगलं। साहु मंगलं। केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा-अरिहंत लोगुत्तमा। सिद्ध लोगुत्तमा। साहु लोगुत्तमा। केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि-अरिहंत सरणं पव्वज्जामि। सिद्ध सरणं पव्वज्जामि। साहु सरणं पव्वज्जामि। केवलिपण्णत्तोे धम्मो सरणं पव्वज्जामि।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असि आउसा शांतिं कुरु कुरु स्वाहा ।।

अनेन अनादिसिद्धमंत्रेण पंचाममृण्मयान्कुंभान्पृथगेकवारं अभिमंत्रयेत् (इस अनादिसिद्धमंत्र से पांच कच्चे कलशों को मंत्रित करें।) ।।

ह्रीं नमोऽर्हद्भ्यः स्वाहा ।

ॐ ह्रीं नमः सिद्धेभ्यः स्वाहा ।।

ॐ ह्रीं नमः सूरिभ्यः स्वाहा ।

ॐ ह्रीं नमः पाठकेभ्यः स्वाहा ।

ॐ ह्रीं नमः सर्वसाधुभ्यः स्वाहा ।

पंचेष्टकाभिर्जिनादिमंत्रैरधिवासयेत् (इन पांच मंत्रों से पांच कच्ची ईंटें मंत्रित करें।) ततः शिल्प्यादीन्प्रतोष्य पूर्ववत् त्रिवारं जिनधाम परीत्य वेद्या ब्रह्मप्रदेशे ब्रह्मबलिं, दिक्षु दिक्पालबलिं पूर्वोक्ततन्मंत्रैः कृत्वा तत्क्षेत्रे सर्वत्र पूर्वोक्तबलिमंत्रेणैव बलिं त्रिवारं विहारयेत् । इति वेदीनिर्वर्तनविधानम्। (इसके बाद कारीगरों को संतुष्ट करके तीन बार जिनमंदिर की प्रदक्षिणा देकर वेदी के ब्रह्मस्थान में ब्रह्मबलि, आठों दिशाओं में दिक्पालबलि को पूर्वकथित मंत्रों से करके उस क्षेत्र में सर्वत्र पूर्वकथित बलिमंत्र से ही बलि को तीन बार विहार करावें)।

मोहध्वांत विदारणं विशदविश्वोद्भासिदीप्तिश्रियम्। सन्मार्ग प्रतिभासकं विबुधसंदोहामृतापादकम्।।

श्रीपादं जिनचंद्रशांत शरणंसद्भक्तिमाने मिते। भूयस्तापहरस्यदेव भवतो भूयात्पुनर्दर्शनम्।।
(पंचांग नमस्कार करें।)
इत्यर्हत्प्रतिष्ठासारसंग्रहे नेमिचन्द्रदेवविरचिते प्रतिष्ठातिलक-
नाम्नि मण्डपविधानवेदीनिर्वर्तनविधानं
नाम चतुर्थः परिच्छेदः।