Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास टिकैतनगर-बाराबंकी में चल रहा है, दर्शन कर लाभ लेवें |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०४ - तत्वार्थसूत्र - चतुर्थ अध्याय के प्रश्न-उत्तर

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तत्वार्थ सूत्र प्रश्नोत्तरी

चतुर्थ अध्याय


प्र.१. देव कितने हैं ? बताईये।

उत्तर — ‘‘देवाश्चतुर्णिकाया:’’। देव चार निकाय वाले हैं

प्र.२. देव कौन कहलाते हैं ?
उत्तर — देवगति नामकर्म के उदय होने पर जो नाना प्रकार की बाह्य विभूति सहित द्वीप समुद्रादि स्थानों में इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं वे देव होते हैं।

प्र.३. निकाय शब्द से क्या आश है ?
उत्तर — देवगति नामकर्म के उदय की सामथ्र्य से जो संग्रह किये जाते हैं, वे ‘निकाय’ कहलाते हैं।

प्र.४. देवों के चार निकाय कौन से हैं ?
उत्तर — देवों के चार भेद (निकाय) है—भवनवासी, ज्योतिषी, व्यंतर और वैमानिकी।

प्र.५. चारों प्रकार के देवों के कौन सी लेश्यायें होती हैं ?
उत्तर — ‘‘आदित स्त्रिषु पीतान्तलेश्या:’’ आदि के ३ निकायों अर्थात् भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी में पीत पर्यंत चार लेश्या (कृष्ण, नील, कापोत, पीत) होती हैं।

प्र.६. चार निकायों के कितने भेद हैं ?
उत्तर — ‘‘दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पा: काल्पोपन्न पर्यंता:’’ काल्पोत्र देव तक के चार निकाय के देव क्रमश: दस, आठ, पांच और बारह भेद वाले हैं।

प्र.७. ‘कल्पोपत्र’ अर्थात् कौन से देव ?
उत्तर — वैमानिक देव ही कल्पोपन्न देव कहलाते हैं।

प्र.८. प्रत्येक निकाय के देवों में विशेष भेद कितने होते हैं ?
उत्तर — इंद्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीक प्रकीर्णका भियोग्य किल्विषकाश्चैकश: प्रत्येक निकाय के देवों में इंद्र, सामानिक, त्रायिंस्त्रशं, परिषद, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, अभियोग्य और किल्विषिक ये दस भेद होते हैं।

प्र.९. इंद्र कौन होते हैं ?
उत्तर — जो अन्य देवों में नहीं होने वाले असाधारण अणिमादि गुणों के संबंध से शोभते हैं, वे इंत्र कहलाते हैं।

प्र.१०. सामायिक देव कौन हैं ?
उत्तर — आज्ञा और ऐश्वर्य के सिवा जो आयु भोग, वीर्य, परिवार और उपभोग में समान है सामानिक देव कहलाते हैं।

प्र.११. त्रायस्त्रिंश देव कौन होते हैं ?
उत्तर — जो पिता, गुरु और उपाध्याय के समान सबसे बड़े हैं, जो मंत्री और पुरोहित हैं, वे त्रायस्तिंश कहलाते हैं।

प्र.१२. परिषद देवों का स्वरूप क्या है ?
उत्तर — जो सभा में मित्र और प्रेमीजनों के समान होते हैं परिषद कहलाते हैं।

प्र.१३. आत्मरक्षा देव कौन से होते हैं ?
उत्तर — जो अंगरक्षक के समान हैं वे आत्मरक्ष देव कहलाते हैं।

प्र.१४.कौन सी जाति के देव ऐरावत हाथी बनते हैं ?
उत्तर — आभियोग्य जाति के देव ऐरावत हाथी बनते है।

प्र.१५. क्या चारों ही निकाय के देव दस प्रकार के होते हैं ?

उत्तर —‘‘त्रायस्त्रिंशलोकपालवज्र्या व्यंतर ज्योतिष्का:।’’ व्यंतर और ज्योतिष देव के त्रायस्त्रिंश और लोकपाल भेद नहीं होते हैं ।

प्र.१६. चारों निकाय के देवों में कितने इंद्र होते हैं ?
उत्तर — ‘‘पूर्वयोद्वीन्द्रा:’’ प्रथम दो निकायों में दो—दो इन्द्र होते हैं अर्थात् भवनवासीऔर व्यंतरवासी देवों में दो—दो इंद्र हैं ।

प्र.१७. भवनवासी एंवम् व्यंतरवासी देवों के कुल इंद्रों की संख्या बताइये ।
उत्तर — भवनवासियों के २० तथा व्यंतरवासियों के १६ इंद्र है।

प्र.१८. देवों के कौन सा सुख है ?
उत्तर — ‘‘कायप्रवीचारा आ ऐशानात्’’ ऐशान स्वर्ग तक के देव काय से प्रवीचार करते हैं ।

प्र.१९. काय प्रवीचार से क्या आशय है ?
उत्तर — मैथुन के उपसेवन को कायप्रवीचार कहते हैं ।

प्र.२०. सानत्कुमार स्वर्ग से अच्युत स्वर्ग पर्यंत देवों का सुख कैसा है ?
उत्तर — ‘‘शेषा: स्पर्शरूप शब्दमन: प्रवीचारा:’’। शेष स्वर्ग के देवों—देवियों के स्पर्श से, रूप देखने से, शब्द सुनने से, और मन में स्मरण करने मात्र से काम सुख का अनुभव होता है।

प्र.२१. अच्युत स्वर्ग के आगे देवों का सुख कौन सा है ?
उत्तर — ‘‘परेऽप्रवीचारा:’’। अच्युत स्वर्ग से आगे के देव प्रवीचार रहित होते हैं ।

प्र.२२. भवनवासी देवों के कितने भेद हैं ?
उत्तर — ‘‘भवनवासिनोऽसुरनाग विद्युत्सुपर्णाग्निवातस्त नितोदधि द्वीप दिक्कुमारा:’’ भवनवासी देव दस प्रकार के होते हैं—

  1. असुरकुमार
  2. नागकुमार
  3. विद्युत्कुमार
  4. सुपर्णकुमार
  5. अग्निकुमार
  6. वातकुमार
  7. स्तनितकुमार
  8. उदधिकुमार
  9. द्वीपकुमार
  10. दिक्कुमार।

प्र.२३. भवनवासी देवों को भवनवासी क्यों कहा जाता है ?
उत्तर — क्योंकि ये देव भवनों में रहते हैं, इसलिये भवनवासी कहलाते हैं।

प्र.२४. व्यंतर देवों के कितने भेद हैं ?
उत्तर — ‘‘व्यंतरा: किन्नरविं पुरुष महारोगगंधर्व यक्ष राक्षस भूत पिशाचा:।’’ व्यंतर देवों के ८ भेद हैं

  1. किन्नर
  2. विंपुरुष
  3. महोरग
  4. गंधर्व
  5. यक्ष
  6. राक्षस
  7. भूत
  8. पिशाच ।

प्र.२५. ज्योतिषी देवों के कितने भेद हैं ?
उत्तर — ‘‘ज्योतिष्का: सूय्र्या चंद्रमसौग्रहनक्षत्र प्रकीर्णक तारकाश्च।’’ ज्योतिषी देव ५ प्रकार के होते हैं— (१) सूर्य (२) चंद्र (३) ग्रह (४) नक्षत्र (५) प्रकीर्णक तारे ।

प्र.२६.ज्योतिषी देवों की गमन स्थली कौन सी है ?
उत्तर — ‘‘मेरुप्रदक्षिण नित्यगतयो नृलोके’’ मेरु की प्रदक्षिणा देते हुए ज्योतिषी देव सदैव मनुष्य लोक में गमन करते रहते है।

प्र.२७.नृलोक से आप क्या आशय है ? इसका विस्तार कितना है ?
उत्तर — नृलोक से आशय मनुष्यलोक से है और इसका विस्तार ४५ लाख योजन है।

प्र.२८. ढाई द्वीप में सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की संख्या कितनी है ?
उत्तर — ढाई द्वीप में १३२ सूर्य , १३२ चंद्रमा ११६१६ ग्रह और ३६९६ नक्षत्र है।

प्र.२९. ज्योतिषी देवों के गमन से किसका ज्ञान होता है ?
उत्तर — ज्योतिषी देवों के गमन से व्यवहार काल का ज्ञान होता है। जैसा कि सूत्र में कहा गया है— ‘‘तत्कृत: कालविभाग’’ जिसका आशय है उन गमन करने वाले ज्योतिषियों के द्वारा किया हुआ कालविभाग है।

प्र.३०. कालविभाग अर्थात् कौन सा काल ?
उत्तर — समय, आवलि आदि व्यवहार काल का विभाग ही यहां काल विभाग है।

प्र.३१. काल के कितने भेद हैं ?

उत्तर — काल के २ भेद हैं — (१) निश्चयकाल (२) व्यवहारकाल।

प्र.३२.ढाई द्वीप के बाहर ज्योतिषी देवों की स्थिति क्या है ?
उत्तर — ‘‘बहिरवस्थिता:’’ मनुष्यलोक के बाहर जयोतिषी देव स्थिर है।

प्र.३३. चौथे निकाय के देव कौन से हैं ?
उत्तर — ‘‘वैमानिका:’’ चौथे निकाय के देव वैमानिक देव हैं।

प्र.३४. विमान कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर — विमान ३ प्रकार के होते हैं— (१) इंद्रक (२) श्रेणीबद्ध (३) प्रकीर्णक ।

प्र.३५. वैमानिक देव कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर — ‘‘कल्पोपन्न कल्वातीताश्च’’ वैमानिक देवों के २ भेद हैं— (१) कल्पोपन्न (२) कल्पातीत ।

प्र.३६. कल्पोपन्न देव कौन हैं ?
उत्तर — सोलहवें स्वर्ग तक के देव कल्पोपन्न कहलाते हैं ।

प्र.३७. कल्पातीत देव कौन—कौन हैं ?
उत्तर — सोलह स्वर्ग से ऊपर क्षेत्रवर्ती नव ग्रेवेयक, नव अनुदिश और पांच अनुत्तरवासी अहमिन्द्र देव कल्पातीत कहलाते हैं।

प्र.३८. वैमानिक देव कहाँ रहते हैं ?
उत्तर — ‘‘उपर्युपरि ।’’ वैमानिक देव ऊपर—ऊपर स्थित है।

प्र.३९. स्वर्ग कितने हैं ? नाम बताइये ।
उत्तर — स्वर्ग १६ हैं— सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांवत, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्त्रार तथा आनत और प्रमाणत।

प्र.४०. कितने कल्प विमानों में वैमानिक देव निवास करते हैं ?
उत्तर — ‘‘सौधर्मेशानसानत्कुमार माहेन्द्रब्रह्म ब्रह्मोत्तरलान्तव कापिष्ठ शुक्र महाशुक्र शतार सहस्त्रोरष्वानत प्राण तयोरारणाच्युतयोर्नवसु नवग्रैवेयकेषु विजय—वैजयंत जयन्ता पराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च।’’ सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र,ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर,लांतव, कापिष्ठ शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्त्रार तथा आनत—प्राणत, आरण—अच्युत, नौ गैवेयिक और विजय, वैजयंत, जयंत, अपराजित तथा सवार्थसिद्धि विमान में सभी देव निवास करते हैं ।

प्र.४१. सोलह स्वर्ग के कितने पटल हैं ?
उत्तर — सोलह स्वर्गों में ५२ पटल हैं ।

प्र.४२. नव गै्रवेयक कौन से हैं ?
उत्तर — सुदर्शन, अमोघ, सुबुद्ध पयोधर, सुभद्र, सुविशाल, सुमन, सौमनस और प्रियंकर ये ९ ग्रैवेयक हैं।

प्र.४३. नव अनुदिश कौन से हैं ?
उत्तर — आदित्य, अर्चि, अर्चिमाली, वैरोचन, प्रभास, अर्चिप्रभ, अर्चिमाध्य, अर्चिरावत, और अर्चिविशिष्ट ये नव अनुदिश हैं।

प्र.४४. पांच अनुत्तर कौन से हैं ?
उत्तर — विजय, वैजयंत, जयंत, अपराजित और सवार्थसिद्धि ये पांच अनुत्तर हैं ।

प्र.४५. सर्वार्थसिद्धि के देवों के बारे में बताईये ।
उत्तर — सर्वार्थसिद्धि का अर्थ है सर्व अर्थो की सिद्धि होना। सर्वार्थसिद्धि के देव एक भवावतारी होते है। देवों की जघन्य और उत्कृष्ठ आयु तैंतीस सागरोपम है।

प्र.४६. वैमाणिक देवों में परस्पर क्या विशेषता है ?
उत्तर — ‘‘स्थिति—प्रभाव सुखद्युतिलेश्याविशुद्धिन्द्रियावधि—वषयतोऽधिका:’’। स्थिति, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्या, विशुद्धि, इंद्रिय विषय और अवधि विषय की अपेक्षा ऊपर—ऊपर के देव अधिकता लिये है।

प्र.४७. वैमानिक देवों में ऊपर—ऊपर हीनता क्यों हैं ?

उत्तर —‘‘गति शरीर परिग्रहाभिमानतो हीना:’’। वैमानिक देवों में गति, शरीर परिग्रह और अीमान की अपेक्षा से क्रमश: ऊपर—ऊपर हीनता है।

प्र.४८. वैमानिक देवों में कौन सी लेश्या होती है ?
उत्तर — ‘‘पीत पद्मशुक्ल लेश्या द्वित्रिशेषेषु’’। कल्प युगलों में दो, तीन और शेष में क्रम से पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या होती है।

प्र.४९. कल्पसंज्ञा किनकी है ?
उत्तर — ‘‘प्राग्गैवेयकेभ्य: कल्पा:’’ गैवेयक के पहले तक कल्प हैं ।

प्र.५०. कल्प किसे कहते हैं ?
उत्तर — सौधर्म स्वर्ग से लेकर अच्युत स्वर्ग कल्प कहलाते हैं ये १६ हैं।

प्र.५१. कल्पातीत कौन हैं ?
उत्तर — नवग्रैवेयक, नव अनुदिश और पांच अनुत्तर विमान कल्पातीत कहलाते हैं ।

प्र.५२. लौकांतिक देव कहां रहते हैं ?
उत्तर — ‘‘ब्रह्मलोकालया लौकान्तिका:’’ लौकांतिक देवों का निवास स्थान ब्रह्मलोक है।

प्र.५३. लोकांतिक देवों को लौकान्तिक क्यों कहते हैं ?
उत्तर — लोकांतिक देव ब्रह्मलोक के अंत में निवास करते हैं, इसलिये उन्हें लौकांतिक देव कहते हैं।

प्र.५४. लौकांतिक देवों के भेद कौन से हैं ?
उत्तर — ‘‘सारस्वतादित्यवह्लयरुगण गर्द तोय तुषिताव्याबाधारिष्टाश्च।’’ सारस्वत, आदित्य, वह्रि, अरुण, गर्दतोय, अव्याबाध, और अरिष्ट ये लौकांन्तिक देव ८ प्रकार के हैं ।

प्र.५५. सारस्वत देव कौन है ?
उत्तर — जो चौदह पूर्व के ज्ञाता होते हैं वे सारस्वत कहलाते हैं ।

प्र.५६. आदित्य देव कौन हैं ?
उत्तर — देवमाता अदिति की संतान को आदित्य कहते हैं।

प्र.५७. वह्मि देव कौन हैं ?
उत्तर — ङ्का अग्नि के समान दैदीप्यवान हैं वे वह्मि कहलाते हैं ।

प्र.५८. अरुण देव कौन होते हैं ?
उत्तर — उदीयमान सूर्य के समान जिनकी कांति हो वे अरूण कहलाते हैं।

प्र.५९. गर्दतोय देव कैसे होते हैं ?
उत्तर — जिनके मुख से शब्द जल के प्रवाह की तरह निकले वे गर्ततोय हैं।

प्र.६०.तुषित देव कौन हैं ?
उत्तर — जो संतुष्ट होते हैं तथा जिनके विषय सुख की अभिलाषा नहीं होती वे तुषित होते हैं।

प्र.६१. अव्याबाध देव कैसे होते हैं ?
उत्तर — ङ्का कामादि बाधाओं से रहित होते हैं वे अव्याबाध देव होते हैं।

प्र.६२. अरिष्ट देव कौन हैं ?
उत्तर — जो अकल्याणप्रद कार्य नहीं करते है उनको अरिष्टदेव कहते हैं।

प्र.६३. लौकांतिक देवों का दूसरा नाम क्या है और इनकी कुल संख्या कितनी है ?

उत्तर— लौकांतिक देवों का दूसरा नाम देव ऋषि (बह्मर्षि) है। इनकी संख्या चार लाख सात हजार आठ सौ बीस होती है।

प्र.६४. वे कौन से देव हैं जिनमें लौकान्तिक देवों के समान निवारण प्राप्त करने की योग्यता है।
उत्तर—‘‘विजयादिषु द्विचरमा:’’ विजयादिक में दो चरम वाले देव होते हैं।

प्र.६५. द्विचरम वाले देव कौन—कौन से हैं।
उत्तर—विजय, वैजयंत, जयंत और अपराजित विमानवासी तथा नव अनुदिशों में रहने वाले जो अहमिन्द्र देव हैं वे द्विचरमा कहलाते हैं।

प्र.६६. द्विचरमा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर—द्विचरमा से तात्पर्य है कि मनुष्य के दो भव धारण करके मोक्ष चले जाते हैं।

प्र.६७. तीन पल्य की उत्कृष्ट आयु वाले तिर्यंच कौन हैं ?
उत्तर—‘‘ औपपादिक मनुष्येभ्य: शेषास्तिर्यग्योनय:’’ उपपाद जन्म वाले देव, नारकी और मनुष्यों के सिवाय सब संसारी तिर्यंच योनि वाले हैं।

प्र.६८. तिर्यंच जीवों के रहने का क्षेत्र कौन सा है ?
उत्तर— तिर्यंच सर्व लोक में रहते हैं ।

प्र.६९. भवनवासी देवों की आयु कितनी है ?
उत्तर—‘‘स्थितिरसुरनाग सुपर्णद्वीप शेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमाद्र्ध हीनमिता:’’ उत्कृष्ट आयु के मान से असुरकुमार देव की ढाई पल्य, द्वीपकुमार देव की दो पल्य तथा शेष छह, विद्युतकुमार, अग्निकुमार, वातकुमार, स्तनितकुमार, उदधिकुमार और दिक्कुमारों की उत्कृष्ट स्थिति डेढ़ पल्य है।

प्र.७०. सौधर्म और ऐशान देवों की उत्कृष्ट आयु कितनी है ?
उत्तर— सौधर्म और ऐशान देवों की उत्कृष्ट आयु दो सागर से कुछ अधिक है।

प्र.७१. ‘अधिके’ शब्द को सूत्र में किस अपेक्षा से लिया गया है ?
उत्तर—यहां अधिके शब्द घातायुष्क जीवों की अपेक्षा से है।

प्र.७२. अधिके शब्द के अनुसार घातायुष्क देवों की आयु अन्य देवों से कितनी अधिक है ?
उत्तर— घातायुष्क देवों की आयु अन्य देवों की अपेक्षा आधा सागर अधिक होती है।

प्र.७३. घातायुष्क से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर— जिन्होंने पहले ऊपर के स्वर्गों की आयु बांधी थी,किन्तु बाद में संक्लेष परिणाम होने से आयु में हृास होकर नीचे के स्वर्ग में उत्पन्न होने वाले जीव घातायुष्क कहलाते हैं।

प्र.७४.सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प में देवों की आयु कितनी है ?
उत्तर— ‘‘सानत्कुमार माहेन्द्रयो: सप्त।’’ सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प में सात सागर से कुछ अधिक उत्कृष्ठ आयु है।

प्र.७५. ब्रह्म कल्प अच्युत कल्प में देवों की आयु कितनी है ?
उत्तर—‘‘ त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु।’’ ब्रह्म ब्रह्मोत्तर में साधिक तीन से अधिक सात अर्थात् दस सागर । लांतव— कापिष्ठ में सात से अधिक सात अर्थात् चौदह सागर। शुक्र —महाशुक्र में नौ से अधिक सात अर्थात् सोलह सागर। शतार—सहस्रार में ग्यारह से अधिक सात अर्थात् अठारह सागर। आनत—प्राणत में तेरह से अधिक सात अर्थात् बीस सागर। आरण—अच्युत कल्प में पंद्रह से अधिक सात अर्थात् बाईस सागर उत्कृष्ट आयु है।

प्र.७६. ग्रैवेयक, अनुदिश व अनुत्तरों में देवों की आयु कितनी है ?
उत्तर— ‘‘आरणाच्युतादूध्र्वमेवैâकेन नवसुग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च’’ आरण—अच्युत स्वर्ग से ऊपर नवग्रैवेयकों में, विजय आदि चार विमान तथा नव अनुदिशों में और सर्वार्थसिद्धि विमान में एक— एक सागर बढ़ती हुई आयु है।

प्र.७७. नव ग्रैवेयक में देवों की आयु समझाईये।
उत्तर— प्रथम ग्रेवेयक में ३३ सागर, द्वितीय में २४ सागर, तृतीय में २५, चतुर्थ में २६, पंचम में २७, षष्ठम में २८, सप्तम में २९, अष्टम में ३० और नवम ग्रेवेयक में ३१ सागर आयु है।

प्र.७८. नव अनुदिशों अनुत्तरों तथा सर्वार्थसिद्धि के देवों की आयु बताईये।
उत्तर— नव अनुदिश में ३२ सागर, उत्कृष्ट आयु। अनुत्तरों में ३३ सागर, उत्कृष्ट आयु। सर्वार्थसिद्धि में मात्र ३३ सागर उत्कृष्ट आयु ही होती है।

प्र.७९. एक पल्य में कितने वर्ष होते हैं ?
उत्तर— एक पल्य में असंख्यात वर्ष होते हैं ।

प्र.८०. एक सागर में कितने वर्ष होते हैं ?
उत्तर— दस कोड़ाकोड़ी पल्यों का एक सागर होता है।

प्र.८१. सौधर्म और ईशान स्वर्ग में देवों की जघन्य आयु कितनी है ?
उत्तर— ‘अपरापल्योपममधिकम्’ सौधर्म और ईशान स्वर्ग में देवों की जघन्य आयु एक पल्य से अधिक है।

प्र.८२. अन्य स्वर्गों में देवों की जघन्य आयु कितनी है ?
उत्तर— अन्य स्वर्गों में आगे—आगे पूर्व की उत्कृष्ट स्थिति अनन्तर—अनन्तर की जघन्य स्थिति है।

प्र.८३.सभी स्वर्गों के देवों की जघन्य स्थिति स्पष्ट कीजिये।
उत्तर— (अ) ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट आयु एक पल्य कुछ अधिक है जो सौधर्म और ईशान देवों की जघन्य आयु है। (ब) सौधर्म और ईशान की जो दो सागर कुछ अधिक उत्कृष्ट आयु है वह सानत्कुमार, माहेन्द्र स्वर्ग की जघन्य आयु है। (स) यही क्रम आगे आगे के स्वर्गों में चलता है, (द) सर्वार्थसिद्धि में जघन्य आयु नहीं होती है।

प्र.८४. नारकी जीवों की जघन्य आयु कितनी है ?
उत्तर— ‘नारकाणां च द्वितीयादिषु’ दूसरी आदि भूमियों में नारकी जीवों की पूर्व—पूर्व की उत्कृष्ठ आयु ही अनन्तर—अनन्तर की जघन्य आयु है।

प्र.८५.नारकी जीवों की आयु स्पष्ट कीजिये ।
उत्तर— (अ) रत्नप्रभा भूमि में उत्कृष्ट आयु एक सागर है वह शर्वâराप्रभा की जघन्य आयु है। (ब) शर्वरा प्रभा में जो उत्कृष्ट स्थिति तीन सागर है वह बालुका प्रभा की जघन्य आयु है। (स) इसी प्रकार आगे—आगे के नरकों की आयु जानें।

प्र.८६. प्रथम नरक में जघन्य स्थिति कितनी है ?
उत्तर— नरक की प्रथम भूमि में जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष है। सूत्र है — ‘दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम्’ ।

प्र.८७. भवनवासी देवों की जघन्य स्थिति कितनी है ?
उत्तर— ‘भवनेषु च’ अर्थात् भवनवासियों में भी जघन्य आयु दस हजार वर्ष है ।

प्र.८८. व्यंतर देवों की जघन्य स्थिति कितनी है ?
उत्तर— ‘व्यंतराणां च’। व्यंतर देवों की जघन्य स्थिति भी दस हजार वर्ष है।

प्र.८९. व्यंतर देवों की उत्कृष्ट स्थिति कितनी है ?
उत्तर— ‘परापल्योपममधिकम्’ व्यंतर देवों की उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है।

प्र.९०. ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट स्थिति कितनी है ?
उत्तर— ‘ज्योतिष्काणां च’। ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है।

प्र.९१. ज्योतिषी देवों की जघन्य स्थिति कितनी है ?
उत्तर— ‘तदष्टभागोऽपरा।’ ज्योतिषी देवों की जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थिति का आठवां भाग है।

प्र.९२. समस्त लौकान्तिक देवों की स्थिति कितनी है ?
उत्तर— ‘लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम्’ समस्त लौकान्तिक देवों की स्थिति आठ सागर है।

प्र.९३. लौकान्तिक देवों के कौनसी लेश्या होती है ?
उत्तर— समस्त लौकान्तिक देवों की शुक्ल लेश्या होती है ।

प्र.९४. लौकान्तिक देवों के शरीर की ऊँचाई कितनी होती है ?

उत्तर— समस्त लौकान्तिक देवों के शरीर की ऊँचाई पांच हाथ होती है।