Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०५.वेदमार्गणाधिकार

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


वेदमार्गणाधिकार

अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभि:स्थलै: अष्टादशसूत्रै: स्पर्शनानुगमे वेदमार्गणानाम् पंचमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले पुरुष-स्त्रीवेदानां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिना नव सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले नपुंसकवेदानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘णवुंसयवेदा’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत: परं अपगतवेदानां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘अवगद’’ इत्यादिसूत्रसप्तकमिति समुदायपातनिका भवति।
अधुना स्त्री-पुरुषवेदधारिणां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेद-पुरिसवेदा सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१२९।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१३०।।
अट्ठचोद्दसभागा देसूणा।।१३१।।
समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१३२।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१३३।।
अट्ठचोद्दसभागा देसूणा सव्वलोगो वा।।१३४।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१३५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१३६।।
सव्वलोगो वा।।१३७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानेन त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुण: स्पृष्ट:। अत्र वानव्यन्तरज्योतिष्काणां विमानै: रुद्धक्षेत्रं गृहीत्वा लोकस्य संख्यातभाग: साधयितव्य:। विहारवत्स्वस्थानै: पुन: अष्ट चतुर्दशभागा देशोना: स्पृष्टा:, देवीभि: सह देवानामष्ट चतुर्दशभागेषु अतीते काले संचारोपलंभात्।
वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदपरिणतै: अष्ट चतुर्दशभागा देशोना: स्पृष्टा:।
कुत: ?
देवीभि: सह अष्ट चतुर्दशभागेषु भ्रमन्तां देवानां सर्वत्र वेदना-कषाय-विक्रियाणामुपलंभात्। तैजसाहारसमुद्घातौ स्त्रीवेदे-भावस्त्रीवेदे मुनौ अपि न स्त:। पुरुषवेदे ओघवत् व्यवस्थास्ति।
मारणान्तिकसमुद्घातेन सर्वलोक: स्पृष्ट: स्त्रीवेदेन पुरुषवेदेन च, किंच तिर्यक्षु मनुष्येषु पुरुषवेदिनां स्त्रीवेदिनां सर्वलोके मारणान्तिकसंभवात्।
वा शब्द: किमर्थमत्र ?
समुच्चयार्थोऽस्ति। देवदेवीनां मारणान्तिकं गृह्यमाणे नव चतुर्दशभागा भवन्तीति ज्ञापनार्थं वा शब्द: प्ररूपित:।
उपपादेन सर्वदिशाभ्य आगत्य स्त्रीपुरुषवेदेषु उत्पद्यमानानामुपलंभात्। देवान् देवीश्चाश्रित्य भण्यमाने त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, षट् चतुर्दशभागा:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग: स्पृष्ट: इति ज्ञापनार्थं सूत्रे वा शब्द: गृहीतोऽस्ति।
एवं प्रथमस्थले स्त्रीपुरुषवेदिनां स्पर्शनकथनत्वेन नव सूत्राणि गतानि।
अधुना नपुंसकवेदानां स्पर्शनज्ञापनार्थं सूत्रद्वयमवतार्यते-
णवुंसयवेदा सत्थाण-समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१३८।।
सव्वलोगो।।१३९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादै: अतीतवर्तमानयो: सर्वलोक: स्पृष्ट:, नपुंसकवेदिभि: जीवै: अत्रैकेन्द्रियजीवानां विवक्षितत्वात्। विहारवत्स्वस्थान-वैक्रियिकसमुद्घाताभ्यां अतीते काले त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुण: स्पृष्ट:। नवरि वैक्रियिकपदेन त्रिलोकानां संख्यातभाग:, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुण: स्पृष्ट:, वायुकायिकानां विक्रियमाणानां पंच चतुर्दशभागमात्रस्पर्शनस्योपलंभात्। तैजसाहारौ भावनपुंसकेवेदेषु मुनिषु अपि न स्त:।
एवं द्वितीयस्थले नपुंसकवेदिनां स्पर्शननिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इदानीं अपगतवेदनां स्पर्शनकथनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-
अवगदवेदा सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१४०।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१४१।।
समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१४२।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१४३।।
असंखेज्जा वा भागा।।१४४।।
सव्वलोगो वा।।१४५।।
उववादं णत्थि।।१४६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। कपाटसमुद्घातगतै: तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग: संख्यातगुणो वा स्पृष्ट:। प्रतरगतानां स्पर्शनं-लोकस्यासंख्यातभागेषु बहुभाग: स्पृष्ट:, वातवलयेषु जीवप्रदेशानां प्रवेशाभावात्। लोकपूरणसमुद्घातापेक्षया सर्वलोक: स्पृष्ट:। उपपादं एषामपगतवेदानां नास्ति, अत्यन्ताभावेनापसारितत्वात्।
तात्पर्यमेतत्-षट्खण्डागमग्रन्थेषु सर्वत्र वेदमार्गणायां स्त्रीवेदा: नपुंसकवेदाश्च भाववेदिनोऽपि भवन्तीति ज्ञातव्यं।
एवं तृतीयस्थले अपगतवेदिनां स्पर्शननिरूपणत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे स्पर्शनानुगमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमती-कृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: समाप्त:।


अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब तीन स्थलों में अठारह सूत्रों के द्वारा स्पर्शनानुगम में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में पुरुषवेदी और स्त्रीवेदी जीवों का स्पर्शन कथन करने हेतु ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में नपुंसकवेदी जीवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु ‘‘णवुंसयवेदा’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में अपगतवेदी जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु ‘‘अवगद’’ इत्यादि सात सूत्र हैं, यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब स्त्रीवेद और पुरुषवेदधारी जीवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु नौ सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणानुसार स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीव स्वस्थान पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१२९।।

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।१३०।।

अतीतकाल की अपेक्षा उक्त जीवों ने स्वस्थान पदों से कुछ कम आठ बटे चौदह भागों का स्पर्श किया है।।१३१।।

स्त्रीवेदी व पुरुषवेदी जीव समुद्घातों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१३२।।

समुद्घात की अपेक्षा उक्त जीव लोक का असंख्यातवां भाग स्पर्श करते हैं।।१३३।।

अतीतकाल की अपेक्षा उक्त जीवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह भागों का अथवा सर्वलोक का स्पर्श किया है।। १३४।।

उपपाद पद की अपेक्षा स्त्रीवेदी व पुरुषवेदी जीवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।१३५।।

उपपाद पद की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।१३६।।

अथवा, उपपाद पद की अपेक्षा अतीतकाल में उक्त जीवों द्वारा सर्वलोक स्पृष्ट है।।१३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान से उक्त जीवों ने तीनों लोकों के असंख्यातवें भाग, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र का स्पर्श किया है। यहाँ वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों के विमानों से रुद्ध क्षेत्र को ग्रहण करके तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग सिद्ध करना चाहिए। पुन: विहारवत्स्वस्थान की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भागों का स्पर्श किया है, क्योंकि देवियों के साथ देवों का आठ बटे चौदह भागों में अतीतकाल की अपेक्षा गमन पाया जाता है।

वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों से परिणत स्त्रीवेदी व पुरुषवेदी जीवों द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं।

प्रश्न-क्यों ?

उत्तर-क्योंकि देवियों के साथ आठ बटे चौदह भाग में भ्रमण करने वाले देवों के सर्वत्र वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात पाये जाते हैं। तैजस और आहारक समुद्घात स्त्रीवेदी (भावस्त्रीवेद में) मुनि के भी नहीं होते हैं। पुरुषवेद में स्पर्शन की प्ररूपणाव्यवस्था गुणस्थान के समान होती है।

मारणान्तिकसमुद्घात की अपेक्षा पुरुषवेदी और स्त्रीवेदियों के द्वारा सर्वलोक स्पृष्ट है, क्योंकि तिर्यंच और मनुष्य पुरुषवेदी और स्त्रीवेदियों के सम्पूर्ण लोक में मारणान्तिक समुद्घात की संभावना पाई जाती है।

शंका-सूत्र में वा शब्द का प्रयोग किसलिए किया गया है ?

समाधान-वा शब्द का प्रयोग समुच्चय के लिए किया गया है। अथवा देव-देवियों के मारणान्तिक समुद्घात को ग्रहण करने पर नौ बटे चौदह भाग होते हैं, इस स्पर्शन विशेष के ज्ञान हेतु वा शब्द का प्रयोग किया गया है।

उपपाद पद की अपेक्षा सभी दिशाओं से आकर स्त्री व पुरुष वेदियों में उत्पन्न होने वाले जीव पाये जाते हैं। देवों और देवियों का आश्रय कर स्पर्शन के कहने पर तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, छह बटे चौदह भाग और तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग स्पृष्ट हैं, इसके ज्ञापनार्थ सूत्र में वा शब्द का ग्रहण किया गया है।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में भावस्त्री एवं पुरुषवेदी जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

अब नपुंसकवेदी जीवों का स्पर्शन कथन करने हेतु दो सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदी जीवों ने स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ?।।१३८।।

नपुंसकवेदी जीवों ने उक्त पदों से सर्वलोक स्पर्श किया है।।१३९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद पदों से अतीत व वर्तमानकाल की अपेक्षा नपुंसकवेदियों द्वारा सर्वलोक का स्पर्श किया गया है। क्योंकि यहाँ नपुंसकवेदी जीवों से एकेन्द्रिय जीवों का विवक्षा है। विहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिकसमुद्घात पदों से अतीतकाल में तीनों लोकों के असंख्यातवें भाग और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र का स्पर्श किया गया है। विशेषता इतनी है कि वैक्रियिक पद से तीनों लोकों के संख्यातवें भाग तथा मनुष्यलोक और तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र का स्पर्श किया गया है, क्योंकि विक्रिया करने वाले वायुकायिक जीवों के पाँच बटे चौदह भागमात्र स्पर्शन पाया जाता है। तैजस व आहारक समुद्घात भाव नपुंसकवेदी मुनियों के भी नहीं होते हैं।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में नपुंसकवेदी (भावनपुंसकवेदी) जीवों का स्पर्शन निरूपित करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब अपगतवेदियों का स्पर्शन बतलाने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी जीव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१४०।।

अपगतवेदी जीव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।१४१।।

उक्त जीवों ने समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ?।।१४२।।

उक्त जीवों ने समुद्घात की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१४३।।

अथवा उक्त जीवों द्वारा समुद्घात से लोक का असंख्यात बहुभाग स्पृष्ट है।।१४४।।'

अथवा सर्वलोक स्पृष्ट है।।१४५।।

अपगतवेदियों के उपपाद नहीं होता है।।१४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। कपाट समुद्घात को प्राप्त केवलियों के द्वारा तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग अथवा संख्यातगुणे क्षेत्र का स्पर्श किया जाता है। प्रतरसमुद्घात को प्राप्त जीवों का स्पर्शन-लोक के असंख्यात भागों में उनके द्वारा बहुभाग स्पृष्ट है, क्योंकि वातवलयों में जीवप्रदेशों के प्रवेश का अभाव पाया जाता है। लोकपूरण समुद्घात की अपेक्षा सम्पूर्ण लोक स्पृष्ट है। इन वेदरहित जीवों के उपपाद नहीं होता है, क्योंकि उनके वह उपपाद अत्यन्ताभावरूप से छूट चुका है।

तात्पर्य यह है कि-षट्खण्डागम ग्रंथों में सर्वत्र वेदमार्गणा में स्त्रीवेद वाले और नपुंसक वेद वाले भाववेदी भी होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में वेदरहित जीवों का स्पर्शन निरूपण करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा स्पर्शनानुगम नामके महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार समाप्त हुआ।