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०५.वेदमार्गणा अधिकार

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वेदमार्गणा अधिकार

अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन दशभिः सूत्रैः वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले त्रिवेदानां संख्या कथनत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्राष्टकं । तदनु द्वितीयस्थले अपगतवेदानां द्रव्यप्रमाण-प्रतिपादनत्वेन ‘‘अवगद-’’ इत्यादिसूत्रद्वयमिति पातनिका भवति।
अधुना त्रिविधवेदवतां संख्यानिरूपणाय सूत्राष्टकमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेदा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१०२।।
देवीहि सादिरेयं।।१०३।।
पुरिसवेदा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१०४।।
देवेहि सादिरेयं।।१०५।।
णवुंसयवेदा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१०६।।
अणंता।।१०७।।
अण्ताणंताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण।।१०८।।
खेत्तेण अणंताणंता लोगा।।१०९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-देवराशिं त्रयस्त्रिंशत्खण्डप्रमाणं कृत्वा तेभ्य: एकखण्डेऽपनीते देवीनां प्रमाणं भवति। पुनस्तत्र तिर्यग्मनुष्ययोः स्त्रीवेदराशिं प्रक्षिप्ते सर्वस्त्रीवेदराशिर्भवति, इति देवीभिः सातिरेकं कथ्यते।
देवराशिं त्रयस्त्रिंशत्खण्डप्रमाणं कृत्वा तत्रैकखण्डं देवानां पुरुषवेदप्रमाणं। पुनस्तत्र तिर्यग्मनुष्यपुरुष-वेदराशौ प्रक्षिप्ते सर्वपुरुषवेदप्रमाणं भवतीति देवेभ्यः सातिरेकप्रमाणं भवति।
नपुंसकवेदानां जीवानां संख्याः अनंतानंतप्रमाणाः एकेद्रियजीवराशिविवक्षित्वात्। अत्र मध्यमानंतानंत-संख्याः गृहीतव्याः न च उत्कृष्टानंतानंतसंख्या इति।
एवं प्रथमस्थले त्रिविधवेदानां संख्यानिरूपणत्वेन सूत्राण्यष्टौ गतानि।
संप्रति अपगतवेदानां द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
अवगदवेदा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।११०।।
अणंता।।१११।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र उत्कृष्टयुक्तानन्तं जघन्यमनंतानंतं चोल्लंघ्य अजघन्यानुत्कृष्टानन्तानन्ते अवस्थितस्य असंख्यातभागभूतापगतवेदराशिः अनंतानंतो भवतीति अविरुद्धाचार्योपदेशो वर्तते।
एवं द्वितीयस्थलेऽपगतवेदानां संख्याकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे द्रव्यप्रमाणानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः समाप्तः।


अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में दश सूत्रों के द्वारा वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में तीनों वेदों की संख्या का कथन करने हेतु ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि आठ सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में अपगतवेदियों का द्रव्यप्रमाण बतलाने वाले ‘‘अवगद’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब तीनों प्रकार के वेद वाले जीवों की संख्या का निरूपण करने हेतु आठ सूत्र अवतीर्ण होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुसार स्त्रीवेदी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।१०२।।

स्त्रीवेदी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा देवियों से कुछ अधिक है।।१०३।।

पुरुषवेदी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।१०४।।

पुरुषवेदी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा देवों से कुछ अधिक है।।१०५।।

नपुंसकवेदी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।१०६।।

नपुंसकवेदी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा अनन्त हैं।।१०७।।

नपुंसकवेदी जीव काल की अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत नहीं होते हैं।।१०८।।

नपुंसकवेदी जीव क्षेत्र की अपेक्षा अनन्तानन्त लोकप्रमाण हैं।।१०९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवराशि के तेंतीस खण्ड करके उनमें एक खण्ड के कम कर देने पर देवियों का प्रमाण होता है पुन: उसमें तिर्यंच व मनुष्य संबंधी स्त्रीवेद राशि को जोड़ देने पर सर्व स्त्रीवेदराशि होती है, इसीलिए ‘‘स्त्रीवेदी देवियों से कुछ अधिक है, ऐसा कहा है।

देवराशि के तेंतीसखण्डप्रमाण करके उनमें से एक खण्ड देवों का पुरुषवेदप्रमाण है। पुन: उसको तिर्यंच और मनुष्य की पुरुषवेदराशि में जोड़ देने पर सर्व पुरुषवेद का प्रमाण प्राप्त होता है। इसीलिए ‘‘पुरुषवेदियों से कुछ अधिक होता हे’’ ऐसा कहा है।

नपुंसकवेदी जीवों की संख्या अनन्तानन्त प्रमाण है, क्योंकि यहाँ एकेन्द्रिय जीवराशि की विवक्षा है। यहाँ ‘अनन्तानन्त’ शब्द से मध्यम अनन्तानन्त की संख्या ग्रहण करना चाहिए, उत्कृष्ट अनन्तानन्त की संख्या नहीं लेना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में तीनों वेद वाले जीवों की संख्या निरूपण करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

अब अपगतवेदियों का द्रव्यप्रमाण बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ?।।११०।।

अपगतवेदी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा अनन्त हैं।।१११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ उत्कृष्ट युक्तानन्त और जघन्य अनन्तानन्त का उलंघन करके अजघन्यानुत्कृष्ट अनन्तानन्त में जो संख्या उसके असंख्यातवें भाग प्रमाण होकर भी अपगतवेदराशि अनन्तानन्त हैं, ऐसा आगम से अविरुद्ध आचार्यों का उपदेश है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अपगतवेदियों की संख्या का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में द्रव्यप्रमाणानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार समाप्त हुआ।