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०५.वेद मार्गणा अधिकार

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वेद मार्गणा अधिकार

अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ द्वाभ्यां स्थलाभ्यां नवभिः सूत्रैः क्षेत्रानुगमे महाधिकारे वेदमार्गणाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले त्रिविधवेदानां क्षेत्रकथनप्रमुखेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले वेदरहितानां महासाधूनां क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘अवगद’’ इत्यादिसूत्रपंचकमिति पातनिका कथितास्ति ।
अधुना त्रिविधवेदसहितानां क्षेत्रकथनार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेदा पुरिसवेदा सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।६९।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।७०।।
णवुंसयवेदा सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।७१।।
सव्वलोए।।७२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्त्रीवेदाः स्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगताः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे संति, प्रधानीकृत-देवीस्त्रीवेदराशित्वात्। मारणान्तिक-उपपादगताः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे।
एवं पुरुषवेदानामपि वक्तव्यंं। विशेषेणात्र तैजस-आहारसमुद्घातौ स्तः, तयोर्वर्तमानाः जीवाः पुरुषवेदाः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे वर्तन्ते।
नपुंसकवेदिनो जीवाः स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादगताः सर्वलोके संति, आनन्त्यात्। वैक्रियिकसमुद्घातगताः तिर्यग्लोकस्यासंख्यातभागे, त्रसराशिग्रहणात्।
नपुंसकवेदाः एकेन्द्रियाः सर्वलोके तिलेषु तैलवत् व्याप्ताः संति इति ज्ञातव्यं।
एवं प्रथमस्थले त्रिविधवेदानां क्षेत्रप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति अपगतवेदानां क्षेत्रप्ररूपणाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
अवगदवेदा सत्थाणेण केवडिखेत्ते ?।।७३।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।७४।।
समुग्घादेण केवडिखेत्ते ?।।७५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे असंखेज्जेसु वा भागेसु सव्वलोगे वा।।७६।।
उववादं णत्थि।।७७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-चतुर्णां लोकानामसंखेयभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्येयभागे तिष्ठन्ति, अत्र संख्यात-उपशामक-क्षपकजीवानां ग्रहणं वर्तते ।
मारणान्तिकसमुद्घातगताः उपशामकाः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे। एवं दण्डगता अपि कपाटगताः अपि एवमेव। विशेषेण-तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे इति वक्तव्यं। प्रतरगताः लोकस्यासंख्यातेषु भागेषु, वातवलयेषु जीवप्रदेशाभावात्। लोकपूरणसमुद्घाते सर्वलोके, जीवप्रदेशैः अनवष्टब्धलोकप्रदेशाभावात्।
तत्रापगतवेदानां महासाधूनां उपपादं नास्ति, तत्रोत्पद्यमानजीवाभावात्।
तात्पर्यमेतत्-द्रव्यवेदेन पुरुषा एव केचित् भाववेदेन स्त्रीवेदाः नपुंसकवेदा वा भवितुं शक्यन्ते त एव मोक्षं गच्छन्ति, त एव महामुनयः नवमगुणस्थानस्यापगतवेदादुपरि वेदरहिताः उपशामकाः क्षपकाः वा तस्मिन् भवेऽन्यस्मिन् भवे वा सिद्ध्यन्ति इति ज्ञात्वा सम्यग्दर्शनं दृढीकर्तव्यं, किंच सम्यग्दृृष्टय एव द्रव्यपुरूषाः मोक्षाधिकारिणो भवन्ति।
एवं द्वितीयस्थले अपगतवेदानां क्षेत्रनिरूपणत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे क्षेत्रानुगमनाम षष्ठे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः समाप्तः ।

अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में नौ सूत्रों के द्वारा क्षेत्रानुगम नामके महाधिकार में वेदमार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में तीनों वेदों का क्षेत्र कथन करने की मुख्यता वाले ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में वेदरहित महासाधुओं का क्षेत्र निरूपण करने हेतु ‘‘अवगद’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका कही गई है।

अब तीनों प्रकार के वेद सहित जीवों का क्षेत्र कथन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुसार स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।६९।।

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीव उक्त पदों से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।७०।।

नपुंसकवेदी जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।७१।।

नपुंसकवेदी जीव उक्त पदों से सर्वलोक में रहते हैं।।७२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्त्रीवेदी जीव स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि यहाँ देवियों की स्त्रीवेदराशि प्रधान है। मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद को प्राप्त स्त्रीवेदी जीव तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में और मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं।

इसी प्रकार पुरुषवेदियों का क्षेत्र भी कहना चाहिए। यहाँ विशेष इतना है कि पुरुषवेदियों में तैजससमुद्घात और आहारकसमुद्घात पद भी हैं। उन पदों में वर्तमान पुरुषवेदी जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं।

नपुंंसकवेदी जीव स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद को प्राप्त सर्वलोक में रहते हैं, क्योंकि वे अनन्त हैं। वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त जीव तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं, क्योंकि यहाँ त्रसराशि का ग्रहण है।

नपुंसकवेदी एकेन्द्रिय जीव सर्वलोक में तिल में तेल के समान ठसाठस व्याप्त हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में तीनों वेदों का क्षेत्र प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब अपगतवेदियों का क्षेत्र प्ररूपण करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी जीव स्वस्थान से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।७३।।

अपगतवेदी जीव लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।७४।।

अपगतवेदी जीव समुद्घात की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।७५।।

अपगतवेदी जीव समुद्घात की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में अथवा असंख्यात बहुभागों में अथवा सर्वलोक में रहते हैं।।७६।।

अपगतवेदी जीवों में उपपाद पद नहीं होता है।।७७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अपगतवेदी जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं, क्योंकि यहाँ संख्यात उपशामक और क्षपक जीवों का ग्रहण किया गया है।

मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त उपशामक जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और अढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार दण्डसमुद्घात को प्राप्त केवली भगवान भी चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। कपाटसमुद्घात को प्राप्त जीवों का क्षेत्र भी इसी प्रकार है। विशेष इतना है कि वे तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में रहते हैं, ऐसा कहना चाहिए। प्रतरसमुद्घात को प्राप्त वे ही जीव लोक के असंख्यात बहुभागों में रहते हैं, क्योंकि इस अवस्था में वातवलयों में जीवप्रदेशों का अभाव रहता है। लोकपूरणसमुद्घात को प्राप्त केवली भगवान सर्वलोक में रहते हैं, क्योंकि जीव प्रदेशों से अनवष्टब्ध-अस्पर्शित लोकप्रदेशों का इस अवस्था में अभाव रहता है अर्थात् लोक के सम्पूर्ण प्रदेश उनके द्वारा स्पर्शित हो जाते हैं।

वहाँ वेदरहित महासाधुओं का उपपाद नहीं होता है, क्योंकि अपगतवेदियों में उत्पन्न होने वाले जीवों का अभाव पाया जाता है।

तात्पर्य यह है कि-द्रव्यवेद से जो पुरुष ही हैं, वे कदाचित् कोई यदि भाववेद से स्त्रीवेदी अथवा नपुंसकवेदी भी हैं, तो भी द्रव्यपुरुषवेदी ही मोक्ष को प्राप्त करते हैं। वे ही महामुनि नवमें गुणस्थान के ऊपर वेदरहित उपशामक अथवा क्षपक मुनिराज उसी भव में अथवा अगले भव में सिद्ध होते हैं यह जानकर अपने सम्यग्दर्शन को दृढ़ करना चाहिए, क्योंकि सम्यग्दृष्टी द्रव्यपुरुषवेदी ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में अपगतवेदियों का क्षेत्रनिरूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामके द्वितीय खण्ड में क्षेत्रानुगम नामके छठे महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार समाप्त हुआ।