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०५. इन्द्रियमार्गणा में एकेंद्रिय से पंचेंद्रिय तक जीवों का कालनिरूपण

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विषय सूची

इन्द्रियमार्गणा में एकेंद्रिय से पंचेंद्रिय तक जीवों का कालनिरूपण

अथ इंद्रियमार्गणाधिकार:

अथ स्थलषट्केन द्वात्रिंशत्सूत्रैः इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारः कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्यैकेन्द्रियजीवानां कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि त्रीणि सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियभेदप्रभेदसहितानां समयप्रतिपादनप्रकारेण ‘‘बादर’’ इत्यादि नव सूत्राणि। ततः परं तृतीयस्थले सूक्ष्मैकेन्द्रियजीवभेदप्रभेदकथनमुख्यत्वेन ‘‘सुहुमएइंदिया’’ इत्यादि नव सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले विकलत्रयजीवानां कालनिरूपणत्वेन ‘‘बीइंदिया’’ इत्यादि षट्सूत्राणि। पुनः पंचमस्थले पंचेन्द्रियाणां स्थितिकथनमुख्यत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि सूत्रचतुष्टयं। ततश्च षष्ठस्थले पंचेन्द्रियापर्याप्तजीवानां कालनिरूपणत्वेन ‘‘पंचिंदियअपज्जत्ता’’ इत्यादि एकं सूत्रं इति समुदायपातनिका।
अधुना एकेन्द्रियजीवकालकथनाय सूत्रमवतरति-इंदियाणुवादेण एइंदिया केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।१०७।।
सूत्रं सुगमं।
एकजीवजघन्यकालप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१०८।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-द्वीन्द्रियादिषु एकतरस्य एकेन्द्रियेषु उत्पद्य सर्वजघन्यमेकेन्द्रियकालं स्थित्वा द्वीन्द्रियादिषु उत्पन्नस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रैकेन्द्रियकालोपलंभात्।
एकजीवोत्कृष्टकालकथनाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१०९।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-द्वीन्द्रियादिषु एकतरः कश्चिद् जीवः एकेन्द्रियेषु उत्पद्य अतिबहुवंâ कालं यदि तिष्ठति तर्हि आवलिकायाः असंख्यातभागमात्राणि चैव पुद्गलपरिवर्तनानि तिष्ठति।
कुतः?
एतस्मात् उपरि अवस्थानशत्तेरभावात्।
एवं प्रथमस्थले सामान्यैकेन्द्रियकालकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति बादरैकेन्द्रियजीवानां नानाजीवकालप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-बादरएइंदिया केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।११०।।
एकजीवजघन्यकालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१११।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-द्वीन्द्रियादेः सूक्ष्मैकेन्द्रियस्य वा बादरैकेन्द्रियेषु सर्वजघन्यायुष्केषु उत्पद्य द्वीन्द्रियादिषु गतस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रबादरैकेन्द्रियभवस्थितेरुपलम्भात्।


अथ इन्द्रिय मार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब छह स्थलों में बत्तीस सूत्रों के द्वारा इन्द्रिय मार्गणा नामका द्वितीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य एकेन्द्रिय जीवों का काल कथन करने की मुख्यता वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में अनेक भेद-प्रभेद सहित बादरएकेन्द्रिय जीवों का समय प्रतिपादन करने वाले ‘‘बादर’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। उसके आगे तृतीयस्थल में सूक्ष्य एकेन्द्रिय जीवों के भेद-प्रभेद कथन की मुख्यता वाले ‘‘सुहुमएइंदिया’’ इत्यादि नव सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में विकलत्रय जीवों का काल बतलाने वाले ‘‘वेइंदिया’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: पंचम स्थल मेें पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति बतलाने हेतु ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके बाद छठे स्थल में पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों का काल निरूपण करने वाला ‘‘पंचिंदिय अपज्जत्ता’’ इत्यादि एक सूत्र है। इस प्रकार यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

विशेष—

ज्ञानमती को नित नमूँ, ज्ञानकली खिल जाय।

ज्ञानज्योति की चमक में, जीवन मम मिल जाय।।

षट्खण्डागम ग्रंथ की संस्कृत टीका के इस प्रकरण का हिन्दी अनुवाद करते समय मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई कि पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने आज वैशाख कृष्णा दूज (वीर निर्वाण संवत् २५३३, ४ अप्रैल २००७) को अपने ५२ वें आर्यिका दीक्षा दिवस की पवित्र तिथि में षट्खंडागम के १६ वें गंथ की टीका पूर्ण की और सम्पूर्ण सूत्रों (६८४१) पर ३१०७ पृष्ठों की सरल संस्कृत टीका लेखन का कार्य संपन्न करके उन्होंने परम आल्हाद के साथ कृतकृत्यता का अनुभव किया।

इस अवसर पर मैंने हस्तिनापुर-जम्बूद्वीप स्थित कमल मंदिर में विराजमान भगवान महावीर (जहाँ माताजी ने टीका लिखकर पूर्ण किया है) के चरणों में यही प्रार्थना की कि मुझे भी इन टीका ग्रंथों के शीघ्र अनुवाद की शक्ति प्राप्त हो, ताकि स्वाध्यायी भक्तों को इन ग्रंथों के स्वाध्याय का लाभ मिल सके।

आज १२०० वर्षों के बाद (धवला टीकाकर्ता श्री वीरसेनाचार्य के पश्चात् ) पुन: वर्तमान में इक्कीसवीं सदी का सौभाग्य जागृत हुआ है कि इस महान् सूत्र ग्रंथ पर लेखनी चलाने की अपूर्व क्षमता पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को प्राप्त हुई जिसे भारतीय साहित्य भंडार को अमूल्य निधि का लाभ समझना चाहिए।

जैनागम गंथों में वर्णन है कि ‘सुलोचना’ नामकी आर्यिका माताजी को ग्यारह अंगरूपी श्रुतज्ञान का लाभ प्राप्त हुआ था। यथा—‘‘एकादशांगभृज्जाता सार्यिकापि सुलोचना’’। इसी प्रकार से महान ज्ञान को धारण करने वाली ब्राह्मी, सुन्दरी, चंदना आदि आर्यिका माताएँ भी अंगज्ञानरूप श्रुत में पारंगत अवश्य रही हैं। उसी ज्ञान का किंचित् अंश षट्खंडागम की इस टीका में समझना चाहिए।

अब एकेन्द्रिय जीवों का काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

इन्द्रिय मार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।१०७।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब एक जीव का जघन्य काल प्रतिपादित करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा एकेन्द्रिय जीवों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१०८।।

हिन्दी टीका—एकेन्द्रिय से रहित अन्य द्वीन्द्रियादिक जीव का एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर, सर्वजघन्य एकेन्द्रिय जीव की आयु के कालप्रमाण रह करके, पुन: एकेन्द्रियों से भिन्न अन्य द्वीन्द्रियादि जीव में उत्पन्न होने वाले जीव के क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण एकेन्द्रिय जीव का काल पाया जाता है।

अब एक जीव का उत्कृष्ट काल बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है–

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा एकेन्द्रिय जीवों का उत्कृष्ट काल अनंतकालात्मक असंख्यात पुद्गलपरिर्वतन है।।१०९।।

हिन्दी टीका—एकेन्द्रियों से भिन्न अन्य कोई जीव एकेन्द्रियोें में उत्पन्न होकर यदि अत्यधिक काल रहता है, तो आवली के असंख्यातवें भागमात्र ही पुद्गलपरिवर्तन रहता है।

प्रश्न—क्यों?

उत्तर—क्योंकि इस उक्त काल से ऊपर एकेन्द्रियों में रहने की शक्ति का अभाव है। इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य एकेन्द्रिय जीवों के काल कथन की मुख्यता वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब बादर एकेन्द्रिय जीवों में नाना जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

बादर एकेन्द्रिय जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।११०।।

अब एक जीव का जघन्यकाल प्ररूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

एक जीव की अपेक्षा बादर एकेन्द्रिय जीवों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१११।।

हिन्दी टीका—किसी अन्य द्वीन्द्रियादि जीव का अथवा सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव का सर्व जघन्य आयु वाले बादर एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर पुन: अन्य द्वीन्द्रियादि मेें उत्पन्न हुए जीव के क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण बादर एकेन्द्रिय जीवों की भवस्थिति पाई जाती है।

एकजीवोत्कृष्टकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति

एकजीवोत्कृष्टकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीओ।।११२।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अंगुलस्य असंख्यात भागः अनेकविकल्पः इति कृत्वा प्रतरावलिकादि-अधस्तनविकल्पानां प्रतिषेधं कृत्वा उपरिमविकल्पग्रहणार्थं ‘असंख्यातासंख्यातानि’ इति निर्देशः कृतः। प्रतरपल्यादिउपरिमविकल्पप्रतिषेधार्थं सूत्रे ‘अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी’ निर्देशः कृतः। अनैकेन्द्रियः सूक्ष्मैकेन्द्रियः वा बादरैकेन्द्रियेषु उत्पद्य तत्र यदि सुष्ठु दीर्घकालं तिष्ठति तर्हि असंख्यातासंख्याते अवसर्पिणी-उत्सर्पिण्यौ तिष्ठतः। पुनः निश्चयेन अन्यत्र गच्छति इति यदुक्तं भवति।
कर्मस्थितिमावलिकायाः असंख्यातभागेन गुणिते बादरस्थितिः जाता इति परिकर्मवचनेन सह एतत्सूत्रं विरुध्यते?
नैतस्य अवक्षिप्तत्वं, सूत्रानुसारि परिकर्मवचनं न भवतीति तस्यैव अवक्षिप्तत्वप्रसंगात् ।
एवं बादरैकेन्द्रियकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि अभूवन्।
अधुना बादरैकेन्द्रिपर्याप्तनानाजीवकालप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-बादरेइंदियपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।११३।।
सूत्रं सुगममेतत्।
एकजीवजघन्यकालनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।११४।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-क्षुद्रभवग्रहणं संख्यातावलिमात्रं, एकं मुहूर्तं षट्षष्टिसहस्र-त्रिशत-षट्त्रिंशद्रूपमात्रखण्डानि कृत्वा एकखण्डमात्रत्वात्। एतदपि कथं ज्ञायते?
तिण्णि सया छत्तीसा, छावट्ठि सहस्स चेव मरणाइं।
अंतोमुहुत्तकाले, तावदिया होंति खुद्दभवा।।१।।
इति गाथासूत्रादेव ज्ञायते।
मुहूर्तस्य एतावद्भागः संख्यातावलिमात्रः इति कथं ज्ञायते?
आवलिय अणागारे, चक्खिंदिय-सोद-घाण-जिब्भाए।
मणवयणकायफासे, अवायईहासुदुस्सासे।।१।।
केवलदंसण-णाणे, कसायसुक्केक्कए पुधत्ते य।
पडिवादुवसामेंतय, खवेंतए संपराए य।।२।।
माणद्धा कोधद्धा, मायद्धा तह चेव लोभद्धा।
खुद्दभवग्गहणं पुण, किट्टीकरणं च बोद्धव्वं।।३।।
इति गाथासूत्रेभ्य एव ज्ञायते।
अंतर्मुहूर्तं अपि संख्यातावलिमात्रं चैव, ततः अंतर्मुहूर्तक्षुद्रभवग्रहणकालयोः द्वयोः नास्ति कोऽपि विशेषः, इति अंतर्मुहूर्तवचनं सूत्रार्थं संदेहमुत्पादयति?
नास्ति संदेहोऽस्मिन्, ‘‘क्षुद्रभवग्रहणं’’ इति अकथयित्वा अंतर्मुहूर्तमिति भणितजिनाज्ञायाः तयोर्विशेषोऽस्तीति अवगम्यते। तथा ‘घातक्षुद्रभवग्रहणात्’ बादरैकेन्द्रियपर्याप्तजीवस्य जघन्यायुः संख्यातगुणमिति भणितवेदनाकालविधानसंबंधि-अल्पबहुत्वद्वाराच्च।
बादरैकेन्द्रियपर्याप्तव्यतिरिक्तः कश्चिद् जीवः सर्वजघन्यायुःबादरैकेन्द्रियपर्याप्तकेषु उत्पद्य अन्यत्र गतः, तस्य बादरैकेन्द्रियपर्याप्तस्य जघन्यकालः लभ्यते इति भणितं भवति।
अन्यत्रापि उक्तं-‘‘एकं जीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणं।
तत्कीदृशमिति चेत्?
उक्तलक्षणमुहूर्तमध्ये तावदेकेन्द्रियो भूत्वा कश्चिद् जीवः षट्षष्टिसहस्रद्वात्रिंशदधिक शतपरिमाणानि (६६१३२) जन्ममरणानि अनुभवति, तथा स एव जीवः तस्यैव मुहूर्तस्य मध्ये द्वित्रिचतुरिन्द्रियपंचेन्द्रियो भूत्वा यथासंख्यमशीतिषष्टि-चत्वारिंशत्-चतुर्विंशतिजन्ममरणान्यनुभवति। सर्वेऽप्येते समुदिताः क्षुद्रभवाः एतावन्त एव भवन्ति-६६३३६।
यदा यैवान्तर्मुहूर्तस्य मध्ये एतावन्ति जन्ममरणानि भवन्ति तदैकस्मिन्नुच्छ्वासे अष्टादश जन्ममरणानि लभ्यन्ते। तत्रैकस्य क्षुद्रभवसंज्ञा।’’


अब एक जीव का उत्कृष्ट काल बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा बादर एकेन्द्रिय जीवों का उत्कृष्टकाल अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी प्रमाण है।।११२।।

हिन्दी टीका—अंगुल का असंख्यातवां भाग अनेक विकल्परूप है, इसलिए प्रतरावली आदि अधस्तन विकल्पों का प्रतिषेध करके उपरिम विकल्पों को ग्रहण करने के लिए सूत्र में ‘असंख्यातासंख्यात’ ऐसा निर्देश किया। प्रतर, पल्य आदि उपरिम विकल्पों के प्रतिषेध करने के लिए अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी इस पद का निर्देश किया है। अनेकेन्द्रिय अर्थात् अन्य द्वीन्द्रियादि अथवा सूक्ष्म एकेन्द्रिय कोई जीव बादर एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर, वहाँ पर यदि अति दीर्घकाल तक रहता है, तो असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी तक रहता है। पुन: निश्चय से अन्यत्र चला जाता है, ऐसा अर्थ कहा गया समझना चाहिए।

शंका—कर्मस्थिति को आवली के असंख्यातवें भाग से गुणा करने पर बादर स्थिति होती है, इस प्रकार के परिकर्म वचन के साथ यह सूत्र विरोध को प्राप्त होता है?

समाधान—परिकर्म के साथ विरोध होने से इस सूत्र के अवक्षिप्तता (विरुद्धता) नहीं प्राप्त होती है, किन्तु परिकर्म का उक्त वचन सूत्र का अनुसरण करने वाला नहीं है, इसलिए उसके ही विरोधपने का प्रसंग आता है। इस प्रकार बादर एकेन्द्रिय जीवों के कथन की मुख्यता वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीवों का काल प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।११३।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब एक जीव का जघन्यकाल निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों का जघन्य काल अंतर्मुहूर्त है।।११४।।

हिन्दी टीका—क्षुद्रभवग्रहण का काल संख्यात आवली प्रमाण होता है, क्योंकि, एक मुहूर्त का छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीस रूपप्रमाण खंड करने पर एक खंड प्रमाण क्षुद्रभव का काल होता है।

शंका—यह कैसे जाना है?

समाधान—(गाथार्थ)—एक अन्तर्मुहूर्त काल के छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीस मरण होते हैं, और इतने ही क्षुद्रभव होते हैं।।१।।

इस गाथासूत्र से जाना जाता है कि क्षुद्रभव का काल अन्तर्मुहूर्त का छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीसवां भाग है।

शंका—मुहूर्त का छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीसवां भाग संख्यात आवलीप्रमाण होता है, यह कैसे जाना?

समाधान—गाथार्थ—अनाकार दर्शनोपयोग का जघन्य काल आगे कहे जाने वाले सभी पदों की अपेक्षा सबसे कम है।(तथापि वह संख्यात आवलीप्रमाण है।) इससे चक्षुरिन्द्रिय संबंधी अवग्रहज्ञान का जघन्य काल विशेष अधिक है। इससे श्रोेत्रेन्द्रियजनित अवग्रहज्ञान, इससे घ्राणेन्द्रियजनित अवग्रहज्ञान, इससे जिह्वेन्द्रिय जनित अवग्रहज्ञान, इससे मनोयोग, इससे वचनयोग, इससे काययोग, इससे स्पर्शनेन्द्रियजनित अवग्रहज्ञान, इससे अवायज्ञान, इससे ईहाज्ञान, इससे श्रुतज्ञान और इससे उच्छ्वास, इन सबका जघन्यकाल क्रमश: उत्तरोत्तर विशेष-विशेष अधिक है।।१।।

तद्भवस्थ केवली के केवलज्ञान और केवलदर्शन तथा सकषाय जीव के शुक्ललेश्या, इन तीनों का जघन्य काल (परस्पर सदृश होते हुए भी) उच्छ्वास के काल से विशेष अधिक है। इससे एकत्ववितर्कअवीचार शुक्लध्यान, इससे पृथक्त्ववितर्वâवीचार शुक्ल ध्यान, इससे उपशमश्रेणी से गिरने वाले सूक्ष्मसाम्परायसंयत, इससे उपशम श्रेणी पर चढ़ने वाले सूक्ष्मसाम्पराय संयत और इससे क्षपकश्रेणी पर चढ़ने वाले सूक्ष्मसाम्परायसंयत, इन सबका जघन्य काल क्रमश: उत्तरोत्तर विशेष-विशेष अधिक है।।२।।

क्षपक सूक्ष्मसाम्पराय के जघन्य काल से मानकषाय, इससे क्रोधकषाय, इससे मायाकषाय, इससे लोभकषाय और इससे लब्ध्यपर्याप्त जीव के क्षुद्रभवग्रहण का जघन्य काल क्रमश: उत्तरोत्तर विशेष-विशेष अधिक है। क्षुद्रभवग्रहण के जघन्य काल से कृष्टीकरण का जघन्य काल विशेष अधिक है, ऐसा जानना चाहिए।।३।।

इन तीन गाथासूत्रों से जाना जाता है कि क्षुद्रभव का काल भी संख्यात आवलीप्रमाण होता है।

शंका—अंतर्मुहूर्त भी तो संख्यात आवली प्रमाण ही होता है, इसलिए अंतर्मुहूर्त और ‘‘क्षुद्रभवग्रहण’’ काल, इन दोनों में कोई भेद नहीं है। अतएव यह अंतर्मुहूर्त का वचनरूप सूत्रार्थ संदेह को उत्पन्न करता है?

समाधान—इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि, सूत्र में ‘‘क्षुद्रभवग्रहण’’ ऐसा पाठ न करके अंतर्मुहूर्त ऐसा वचन कहने वाली, जिन आज्ञा से उन दोनों में भेद जाना जाता है। तथा घातक्षुद्रभवग्रहणकाल से बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव की जघन्य आयु संख्यातगुणी है इस प्रकार कहे गये वेदनाकालविधानसंबंधी अल्पबहुत्वद्वार से भी जाना जाता है।

बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक से व्यतिरिक्त किसी जीव के सर्व जघन्य आयुवाले बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकों में उत्पन्न होकर, पुन: अन्य पर्याय में चले जाने पर, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त का जघन्य काल पाया जाता है, ऐसा अर्थ कहा गया समझना चाहिए। अन्यत्र तत्त्वार्थवृत्ति ग्रंथ में भी कहा है-

एक जीव की अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।

प्रश्न—क्षुद्रभवग्रहण का क्या स्वरूप है?

उत्तर—पूर्व कथित लक्षण वाले अंतर्मुहूर्त के मध्य में कोई एकेन्द्रिय होकर छ्यासठ हजार एक सौ बत्तीस (६६१३२) बार जन्म मरण के दु:ख का अनुभव करता है। वही जीव अंतर्मुहूर्त के मध्य में दो इन्द्रिय के अस्सी (८०), तीन इन्द्रिय के साठ (६०), चतुरिन्द्रिय के चालीस (४०) और पंचेन्द्रिय के चौबीस (२४) बार जन्म-मरण को प्राप्त होता है। इस प्रकार अंतर्मुहूर्त में होने वाले सारे जन्म-मरणों की गणना छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीस है।

जब एक अंतर्मुहूर्त में छ्यासठ हजार तीन सौ छत्तीस बार जन्म-मरण होते हैं, तब एक श्वास में अठारह बार जन्म-मरण करता है। उसमें एक भव (जन्म) की क्षुद्रभव संज्ञा है।


संप्रति उत्कृष्टकालकथनाय सूत्रावतारो भवति

संप्रति उत्कृष्टकालकथनाय सूत्रावतारो भवति-उक्कस्सेण संखेज्जाणि वाससहस्साणि।।११५।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-पृथिवीकायिकेषु द्वाविंशतिवर्षसहस्राणि उत्कृष्टायुः सूत्रसिद्धमस्ति।
बादरैकेन्द्रियपर्याप्तभवस्थितिः असंख्यातवर्षमात्रा किं न भवति?
न भवति, तत्रासंख्यातवारं एकजीवस्य उत्पत्तेरसंभवात्।
यदि कश्चिद् जीवः बादरैकेन्द्रियेषु उत्कृष्टसंख्यातप्रमाणवारं अथवा तस्य संख्यातभागमात्रवारं उत्पद्यते तर्हि असंख्यातवर्षाणि भवन्ति?
न भवन्ति, संख्यातानि वर्षसहस्राणि इति सूत्रस्यान्यथानुपपत्तेः, अतः तत्प्रायोग्यसंख्यातवारोत्पत्तिसिद्धेः।
अविवक्षितः कश्चिद् जीवः बादरैकेन्द्रियपर्याप्तकेषु संख्यातानि वर्षसहस्राणि उत्कृष्टेन तत्र भ्रमित्वा पुनः अविवक्षितेषु निश्चयेन उत्पद्यते इति भणितं भवति।
अधुना बादरैकेन्द्रियापर्याप्तनानाजीवकालकथनाय सूत्रमवतरति-बादरेइंदियअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।११६।।
एकजीवजघन्यकालकथनाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।११७।।
सूत्रं सुगमं।
एकजीवोत्कृष्टकालप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।११८।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। अविवक्षितेन्द्रियवान् कश्चिद् जीवः बादरैकेन्द्रिय-अपर्याप्तकेषु उत्पद्य यद्यपि संख्यातसहस्रवारं तत्रैव उत्पद्यते, तर्हि अपि तेषु सर्वेषु अंतर्मुहूर्तेषु एकत्रीकृतेषु अपि एकमुहूर्तप्रमाणाभावात्। एवं द्वितीयस्थले बादरैकेन्द्रियभेदानां पर्याप्तापर्याप्तानां कालकथनमुख्यत्वेन नव सूत्राणि गतानि।
संप्रति सामान्यसूक्ष्मैकेन्द्रियनानाजीवकालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-सुहुमएइंदिया केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।११९।।
सूत्रं सुगमं।
एकजीवजघन्यकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१२०।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अविवक्षितैंद्रियस्य सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तेषु सर्वजघन्यकालं स्थित्वा अविवक्षितैन्द्रियं गतस्य क्षुद्रभवग्रहणोपलंभात्।
उत्कृष्टकालकथनाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा।।१२१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अविवक्षितैन्द्रियेभ्यः आगत्य सूक्ष्मैवेंद्रियेषु उत्पद्य असंख्यातलोकप्रमाणमात्रं तेषां उत्कृष्टभवस्थितिं तत्र गमयित्वा अविवक्षितइन्द्रियं गच्छति।
कुतः?
हेतुस्वरूपजिनवचनोपलंभात्।
सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तनानाजीवकालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-सुहुमेइंदियपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।१२२।।
सूत्रं सुगमं।
एकजीवजघन्यकालप्ररूपणाय सूत्रमवतार्यते-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तजीवानां जघन्यायुःकालप्रमाणमात्रमन्तर्मुहूर्तं अत्र गृहीतव्यं।
अत्र क्षुद्रभवग्रहणं किं न गृह्यते?
न, लब्ध्यपर्याप्तजीवान् मुक्त्वा अन्यत्र क्षुद्रभवस्य संभवाभावात्।
उत्कृष्टकालकथनाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१२४।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तानां उत्कृष्टकालमपि अंतर्मुहूर्तमेव। यदि एकायुःकर्मस्थितिः संख्यातावलिकाः, तर्हि संख्यातवारमसंख्यातवारं वा तत्रैव पुनः पुनः उत्पद्यमानस्य दिवस-पक्ष-मास-ऋतु-अयन-संवत्सरादिकालः किं न लभ्यते?
न, तावद्वारं तत्रोत्पत्तेः असंभवात्।
सोऽपि कथं ज्ञायते?
अंतर्मुहूर्तवचनस्यान्यथानुपपत्तेः। एकजीवस्य जघन्यायुःस्थितिकालात् तस्यैव उत्कृष्टभवस्थितिकालः संख्यातगुणः, नानायुःस्थितिसमूहनिष्पन्नत्वात्।

अब उन्हीं जीवों की उत्कृष्ट काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों का उत्कृष्ट काल संख्यात हजार वर्ष है।।११५।।

हिन्दी टीका—पृथिवीकायिक जीवों में उत्कृष्ट आयु बाईस हजार वर्ष प्रमाण होती है ऐसा सूत्र से सिद्ध है।

प्रश्न—बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीवों की भवस्थिति असंख्यातवर्ष प्रमाण क्यों नहीं होती है?

उत्तर—नहीं होती है, क्योंकि उनमें असंख्यातबार एक जीव की उत्पत्ति असंभव है।

शंका—यदि कोई जीव बादर एकेन्द्रियों में उत्कृष्ट संख्यातप्रमाण बार अथवा उसके संख्यातवें भागप्रमाण बार उत्पन्न होता है, तो भी असंख्यात वर्ष तो हो ही जाते हैं?

समाधान—नहीं होते हैं, क्योंकि बादर एकेन्द्रिय जीवों का उत्कृष्ट काल ‘संख्यात हजार वर्ष प्रमाण हैं’ यह सूत्र वचन नहीं बन सकता है। इसलिए तत्प्रायोग्य-उनके योग्य संख्यातबार ही बादर एकेन्द्रियों की उत्पत्ति सिद्ध होती है।

अविवक्षित कोई जीव बादर एकेन्द्रिय पर्याप्तकों में उत्पन्न होकर संख्यात-सहस्र वर्ष प्रमाण अधिक से अधिक काल तक उनमें परिभ्रमण करके पुन: अविवक्षित जीवों में निश्चय से उत्पन्न होता है,यह अर्थ कहा गया समझना चाहिए।

अब बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त नाना जीवों के काल का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है–

सूत्रार्थ—

बादर एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।११६।।

अब एक जीव का जघन्यकाल कहने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।११७।।

सूत्र का अर्थ सरल है।

अब एक जीव का उत्कृष्ट काल प्रतिपादित करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

उक्त जीवों का उत्कृष्ट काल अंतर्मुहूर्त है।।११८।।

हिन्दी—सूत्र का अर्थ सरल है। अविवक्षित इन्द्रियवाला कोई जीव बादर एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर यद्यपि संख्यात सहस्रबार उन-उनमें ही उत्पन्न होता है, तथापि उन सभी अंतर्मूहूर्तों के एकत्रित करने पर भी एक मुहूर्तप्रमाण का अभाव है, अर्थात् फिर भी पूरा एक मुहूर्त नहीं होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में बादर एकेन्द्रिय भेद वाले पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों के काल कथन की मुख्यता वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

अब सामान्य सूक्ष्म एकेन्द्रिय नाना जीवों का काल प्ररूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ—

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।११९।।

सूत्र का अर्थ सरल है।

एक जीव का जघन्य काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१२०।।

हिन्दी टीका—अविवक्षित इंद्रिय वाले जीव सूक्ष्म एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों में सर्व जघन्य काल रह करके अविवक्षित इन्द्रिय वाले जीवों में गये हुए क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण जघन्य काल पाया जाता है।

अब उत्कृष्ट काल का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

उक्त जीवों का उत्कृष्ट काल असंख्यात लोक प्रमाण है।।१२१।।

हिन्दी टीका—अविवक्षित अन्य इन्द्रिय वाले जीवों से आकर सूक्ष्म एकेन्द्रियों में उत्पन्न होकर कोई जीव असंख्यातलोकप्रमाण उनकी उत्कृष्ट भवस्थिति को वहाँ बिताकर अन्य इन्द्रिय वाले जीवों में चला जाता है।

ऐसा कैसे जाना जाता है?

क्योंकि इस प्रकार के हेतुस्वरूप जिनवचन पाये जाते हैं।

अब सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक नाना जीवों का काल बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

सूक्ष्म एकेन्द्रियपर्याप्तक जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।१२२।।

सूत्र का अर्थ सरल है।

अब एक जीव के जघन्य काल का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित किया जा रहा है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्य काल अंतर्मुहूर्त है।१२३।।

हिन्दी टीका—सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों की जघन्य आयु के कालप्रमाण मात्र अंतर्मुहूर्त काल को यहाँ ग्रहण करना चाहिए।

प्रश्न—यहाँ क्षुद्रभवग्रहण क्यों नहीं किया गया है?


उत्तर—नहीं, क्योंकि लब्ध्यपर्याप्तक जीवों को छोड़कर अन्यत्र क्षुद्रभव का होना संभव नहीं है।

अब उत्कृष्ट काल का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित हो रहा है—

सूत्रार्थ—

सूक्ष्म एकेन्द्रियपर्याप्तक जीवों का उत्कृष्टकाल अंतर्मुहूर्त है।।१२४।।

हिन्दी टीका—सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों का उत्कृष्ट काल भी अंतर्मुहूर्त ही है।

शंका—यदि एक आयुकर्म की स्थिति संख्यात आवली प्रमाण है, तब संख्यातबार या असंख्यातबार वहाँ पर ही पुन: पुन: उत्पन्न होने वाले जीव के दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, अथवा संवत्सर आदि प्रमाण स्थितिकाल क्यों नहीं पाया जाता है?

समाधान—नहीं, क्योंकि उतने बार उस पर्याय में उत्पत्ति होना असंभव है।

शंका—यह भी कैसे जाना जाता है?

समाधान—अन्यथा सूत्र में ‘अंतर्मुहूर्त’ ऐसा वचन नहीं हो सकता था, इस अन्यथानुपपत्ति से जाना जाता है।

एक जीव की जघन्य आयुस्थिति के काल से उसी की उत्कृष्ट संसार स्थिति का काल संख्यात गुणा होता है, क्योंकि वह नाना आयुस्थितियों के समूह से निष्पन्न होता है।


सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तनानाजीवकालकथनाय सूत्रमवतरति

सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तनानाजीवकालकथनाय सूत्रमवतरति-सुहुमे इंदियअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।१२५।।

सूत्र सुगमं।
एकजीवकालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१२६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-पर्याप्तजीवानां जघन्यायुर्भिः लब्ध्यपर्याप्तजीवानां जघन्यायुःसंख्यातगुणहीनमिति प्रतिपादनार्थं क्षुद्रभवग्रहणस्योपदेशात्।
उत्कृष्टकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१२७।।
सूत्रं सुगमं, पूर्वमेव बहुशः प्ररूपितत्वात्।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मैवेंद्रियजीवानां सामान्य-पर्याप्त-अपर्याप्तानां कालनिरूपणत्वेन नवसूत्राणि गतानि।
संप्रति विकलत्रयाणां कालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-बीइंदिया तीइंदिया चउरिंदिया बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदियपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।१२८।।
सूत्रं सुगमं।
एकजीवापेक्षया एषां कालकथनाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं अंतोमुहुत्तं।।१२९।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियाणां जघन्यकालः क्षुद्रभवग्रहणं, तत्र लब्ध्यपर्याप्तानां संभवात्। पर्याप्तानां अंतर्मुहूर्तं तत्र क्षुद्रभवग्रहणस्य संभवाभावात्।
एकजीवोत्कृष्टकालकथनाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण संखेज्जाणि वाससहस्साणि।।१३०।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-त्रीन्द्रियाणामेकोनपंचाशद्दिवसाः उत्कृष्टायुःस्थितिप्रमाणं, चतुरिन्द्रियाणां षण्मासाः, द्वीन्द्रियाणां द्वादशवर्षाः। एताः एकजीवापेक्षया आयुः स्थितयः एताभिः नात्र कार्यमस्ति, भवस्थितेरधिकारात्।
काः भवस्थितिः नाम?
आयुःस्थितिसमूहः भवस्थितिः कथ्यते।
यदि एवं, तर्हि असंख्यातानि वर्षसहस्राणि भवस्थितिः किं न भवति?
नैष दोषः, असंख्यातवारं संख्यातवर्षसहस्रविरोधिसंख्यातवारं वा तत्रोत्पत्तेः संभवाभावात्। अविवक्षितेन्द्रियेभ्यः आगत्य विवक्षितेन्द्रयेषु उत्पद्य संख्यातानि वर्षसहस्राणि चैव हिंडति, असंख्यातानि न परिभ्रमति इति उक्तं भवति।
अधुना लब्ध्यपर्याप्तविकलत्रयाणां नानाजीवकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिय अपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।१३१।।
सूत्रं सुगमं।


अब सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्तक नाना जीवों का काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

सूक्ष्म एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।१२५।।

सूत्र का अर्थ सरल है।

अब एक जीव का काल प्ररूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१२६।।

हिन्दी टीका—पर्याप्त जीवों की जघन्य आयु से लब्ध्यपर्याप्तक जीवों की जघन्य आयु संख्यातगुणी हीन होती है, इसका प्रतिपादन करने हेतु सूत्र में क्षुद्रभवग्रहण का उपदेश दिया गया है।

अब उत्कृष्ट काल का निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

उक्त जीवों का उत्कृष्टकाल अंतर्मुहूर्त है।।१२७।।

पहले अनेक बार प्ररूपण करने के कारण यह सूत्र सुगम है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों में सामान्य, पर्याप्त और अपर्याप्त भेद वाले जीवों का कालनिरूपण करने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

अब विकलत्रय जीवों का काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीव तथा द्वीन्द्रियपर्याप्तक, त्रीन्द्रियपर्याप्तक और चतुरिन्द्रियपर्याप्तक जीव कितने काल तक होेते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।१२८।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब एक जीव की अपेक्षा उनका काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्य काल क्रमश: क्षुद्रभवग्रहण और अंतर्मुहूर्त प्रमाण है।।१२९।।

हिन्दी टीका—द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों का जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है, क्योंकि उनमें लब्ध्यपर्याप्तक जीवों की संभावना है। पर्याप्तक जीवों का काल अंतर्मुहूर्त है, क्योंकि पर्याप्तकों में क्षुद्रभवग्रहण की संभावना नहीं है।

अब एक जीव के उत्कृष्ट काल का कथन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का उत्कृष्टकाल संख्यात हजार वर्ष है।।१३०।।

हिन्दी टीका—तीन इन्द्रिय जीवों की उनंचास दिवस उत्कृष्ट आयुस्थिति का प्रमाण है, चारइन्द्रिय जीवों की उत्कृष्ट आयुस्थिति छह महिना है और दो इन्द्रिय जीवों की उत्कृष्ट स्थिति बारह वर्ष है। ये आयुकर्म की स्थितियाँ एक जीव की अपेक्षा कही गई हैं, इनसे यहाँ पर कोई कार्य नहीं है। क्योंकि यहाँ पर भवस्थिति का अधिकार है।

प्रश्न-भवस्थिति क्या है?

उत्तर-आयु के स्थितिसमूह को भवस्थिति कहते हैं।

शंका—यदि ऐसा है, तो असंख्यात हजार वर्षप्रमाण भव स्थिति क्यों नहीं होती है?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि असंख्यात बार अथवा संख्यात वर्ष सहस्र के विरोधी संख्यातबार भी उनमें उत्पत्ति होने की संभावना का अभाव है। अविवक्षित इन्द्रियवाले जीवों से आ करके विवक्षित इन्द्रियवाले जीवों में उत्पन्न होकर संख्यात सहस्र वर्ष ही भ्रमण करता है, असंख्यात वर्ष भ्रमण नहीं करता है, ऐसा अर्थ कहा हुआ समझना चाहिए।

अब लब्ध्यपर्याप्तक विकलत्रय जीवों में नाना जीवों का काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

द्बीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।१३१।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

एकजीवापेक्षया जघन्योत्कृष्टकालनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते

एकजीवापेक्षया जघन्योत्कृष्टकालनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१३२।।

उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१३३।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमः। विशेषेण तु-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियाणाम् लब्ध्यपर्याप्तानां यथाक्रमेण अन्तरविरहिताः अशीति-षष्टि-चत्वािंरशद् लब्ध्यपर्याप्तभवाः। यद्यपि एतावद्वारं एको जीवः तत्रतनोत्कृष्टस्थित्याः उत्पद्यते, तह्र्यपि तद्भवस्थितिकालसमासः अंतर्मुहूर्तश्चैव।
कथमेतज् ज्ञायते?
अंतर्मुहूर्तोपदेशान्यथानुपपत्तेः। अन्यथानुपपत्त्या एव ज्ञायते यत् तेषां भवानां संकलनमन्तर्मुहूर्तमात्रमेव भवतीति।
एवं चतुर्थस्थले विकलत्रयपर्याप्तापर्याप्तानां जघन्योत्कृष्टकालप्रतिपादनत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
अधुना पंचेन्द्रियाणां नानाजीवैकजीवजघन्योत्कृष्टकालप्रतिपादनत्वेन त्रीणि सूत्राणि अवतरन्ति-पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।१३४।।
एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१३५।।
उक्कस्सेण सागरोवमसहस्साणि पुव्वकोडिपुधत्तेणब्भहियाणि, सागरोवम-सदपुधत्तं।।१३६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सामान्यपंचेन्द्रियाणां पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाभ्यधिकानि सागरोपमसहस्राणि, पंचेन्द्रियपर्याप्तानां सागरोपमशतपृथक्त्वं।
एतस्योदाहरणं-कश्चिद् एको जीवः एकेन्द्रियात् विकलेन्द्रियेभ्यो वा आगत्य सामान्यपंचेन्द्रिय-पर्याप्तपंचेन्द्रिययोः उत्पद्य स्वकस्थितिं स्थित्वा अन्येन्द्रियजीवं गतः। एकस्यैव सागरोपमसहस्रस्य स्वकान्तर्गतबहुत्वं दृष्ट्वा ‘‘सागरोवमसहस्साणि’’ इति सूत्रे बहुवचननिर्देशः कृतः।
पंचेन्द्रियसासादनाद्ययोगिपर्यंतानां समयनिरूपणाय सूत्रमवतार्यते-सासणसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं।।१३७।।
सूत्रं सुगमं वर्तते।
एवं पंचमस्थले पंचेन्द्रियाणां कालनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
संप्रति लब्ध्यपर्याप्तपंंचेन्द्रियकालकथनाय सूत्रमवतरति-पंचिंदियअपज्जत्ता बीइंदियअपज्जत्तभंगो।।१३८।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-नानाजीवं प्रतीत्य सर्वकालः। एकजीवं प्रतीत्य जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणं, उत्कृष्टेन अंतर्मुहूर्तमित्यादिना भेदाभावात्। केवलं तु-पंचेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तकेषु निरंतरोत्पद्यमानभववाराःचतुर्विंशतयो भवन्ति।
तात्पर्यमेतत्-पंचेन्द्रियाणां समग्रतामवाप्य पर्याप्तको भूत्वाधुना जैनेश्वरीं वाणीं लब्ध्वा प्रमादं परिहृत्य कथमपि भेदाभेदरत्नत्रयाराधना एवं कर्तव्या, यतः पुनः अस्मिन्ननंतसंसारे कदाचिदपि एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेषु लब्ध्यपर्याप्तकेषु च जन्म न भवेत् आजवंजवपरिभ्रमणं च शीघ्रमेव छिद्येतेति।
एवं लब्ध्यपर्याप्तपंचेन्द्रियसमयनिरूपणपरं एकं सूत्रं गतं।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखण्डे चतुर्थग्रन्थे कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारः समाप्तः।


अब एक जीव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल का निरूपण करने हेतु दो सूत्रों का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है।।१३२।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट काल अंतर्मुहूर्त है।।१३३।।

हिन्दी टीका—दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। विशेष बात यह है कि द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीव के यथाक्रम से अंतर रहित होकर अस्सी, साठ, चालीस, लब्ध्यपर्याप्तक भव होते हैं। यद्यपि इतने बार एक जीव उनकी उत्कृष्ट स्थिति में उत्पन्न होता है, तो भी उनकी भवस्थिति के काल का जोड़ अंतर्मुहूर्त मात्र ही होता है।

शंका—यह कैसे जाना जाता है?

समाधान—अन्यथा सूत्र में अंतर्मुहूर्त का उपदेश नहीं हो सकता था। इस अन्यथानुपपत्ति से जाना जाता है कि उन भवों का जोड़ अंतर्मुहूर्त मात्र ही होता है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में विकलत्रय पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों के जघन्य और उत्कृष्ट काल का प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब पंचेन्द्रियों में नाना जीव तथा एक जीव के जघन्य और उत्कृष्ट काल का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं—

सूत्रार्थ—

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों में मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्व काल होते हैं।।१३४।।

एक जीव की अपेक्षा उक्त जीवों का जघन्य काल अंतर्मुहूर्त प्रमाण है।१३५।।

उक्त जीवों का उत्कृष्टकाल पूर्व कोटी पृथक्त्व से अधिक सागरोपम सहस्र और सागरोपमशत- पृथक्त्व प्रमाण है।।१३६।।

हिन्दी टीका—सामान्य पंचेन्द्रिय जीवों का उत्कृष्टकाल पूर्व कोटी पृथक्त्व से अधिक सागरोपम सहस्र है, तथा पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों का उत्कृष्ट काल सागरोपमशत पृथक्त्व है।

अब इन का उदाहरण कहते हैं—कोई एक जीव एकेन्द्रिय या विकलेन्द्रिय से आकर पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों में उत्पन्न होकर अपनी स्थिति तक रहकर अन्य इन्द्रिय को चला गया। एक ही सागरोपमसहस्र के अपने अंतर्गत बहुत्व को देखकर ‘सागरोपम सहस्साणि’ ऐसा सूत्र में बहुवचन का निर्देश किया गया है।

अब पंचेन्द्रियों में सासादन सम्यग्दृष्टि से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान पर्यन्त जीवों का समय बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

सासादन सम्यग्दृष्टि से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक के जीवों का काल गुणस्थान के समान है।।१३७।।

इस सूत्र का अर्थ सुगम है।

इस प्रकार पंचमस्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का काल निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब लब्ध्यपर्याप्तक पंचेन्द्रिय जीवों का काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है—

सूत्रार्थ—

पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवों का काल द्वीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के काल के समान है।।१३८।।

हिन्दी टीका—नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल है, एक जीव की अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है, उत्कृष्ट काल अंतर्मुहूर्त है इत्यादिक रूप से कोई भेद नहीं है। विशेष बात यह है कि पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में लगातार-निरंतर उत्पन्न होने के भव चौबीस बार होते हैं।

तात्पर्य यह है कि हम सभी को पाँचों इन्द्रियों की समग्रता—परिपूर्णता प्राप्त करके पर्याप्तपने को पाकर अब जिनेन्द्र भगवान की वाणी को ग्रहण करके प्रमाद छोड़कर किसी भी तरह से भेदाभेद रत्नत्रय की आराधना इस प्रकार करना चाहिए जिससे पुन: इस अनंतसंसार में कभी भी एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रिय आदि पर्यायों में एवं लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था में जन्म न लेना पड़े तथा शीघ्र ही यह संसार परिभ्रमण समाप्त हो जावे।

इस प्रकार लब्ध्यपर्याप्तक पंचेन्द्रिय जीवों का समय निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में चतुर्थ ग्रंथ में कालानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।

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