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०४. द्वितीय महाधिकार-योगमार्गणा

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विषय सूची

द्वितीय महाधिकार-योगमार्गणा

अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ पंचस्थलैः अष्टाविंशतिसूत्रैः योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले पंचमनोयोगपंचवचनयोगधारिणां स्पर्शननिरूपणत्वेन जोगाणुवादेण ‘‘इत्यादि सूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले काययोगिनां औदारिक-औदारिकमिश्रयोगिनां स्पर्शनकथनेन ‘‘कायजोगीसु’’ इत्यादि द्वादश सूत्राणि। ततः परं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनकथनेन ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले आहारक-आहारकमिश्रकाययोगिनां षष्ठगुणस्थानवर्तिमुनीनां स्पर्शनक्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘आहारकाय’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनंतरं पंचमस्थले कार्मणकाययोगिनां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘कम्मइय’’ इत्यादिसूत्राणि षट् इति समुदायपातनिका।
अधुना पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगिनां मिथ्यादृष्टिस्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
जोगाणुवादेण पंचमणजोगि-पंचवचिजोगीसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।७४।।
अस्मिन् सूत्रे क्षेत्रानुयोगवत् स्पर्शनं ज्ञातव्यं।
पुनश्च एषामेव विशेष स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतार्यते-
अट्ठ चोद्दसभागा देसूणा, सव्वलोगो वा।।७५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। पंचमनोयोगि-पंचवचनयोगिमिथ्यादृष्टिभिः स्वस्थानस्वस्थानपरिणतैः त्रिलोकानाम-संख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। विहार-वेदना-कषाय-वैक्रियिक परिणतैः अष्ट चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः। घनलोकमष्टभागोनत्रिचत्वारिंशद्रूपैः छिन्नैकभागः, अधोलोवंâ सार्धचतुर्विंशतिरूपैः छिन्नैकभागः, ऊध्र्वलोकं अष्टभागोनसार्धाष्टादशरूपैः छिन्नैकभागः स्पृष्टः।
एतेषामुदाहरणं- (१) घनलोकः-३४३´३४३/८·८ रज्जुः।
(२) अधोलोकः-१९६ ´ ४९/२·८ रज्जुः।
(३) ऊध्र्वलोकः-१४७ ´ १४७/८·८ रज्जुः।
नरतिर्यग्लोकाभ्यां असंख्यातगुणः स्पृष्टः इति। मारणान्तिकपदेन सर्वलोकः स्पृष्टः।
एषामेव मनोवचनयोगिनां सासादनादिपंचमगुणस्थानपर्यन्तानां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा ओघं।।७६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रस्यार्थः सुगमः। विशेषतया-सासादनसम्यग्दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टीनां उपपादो नास्ति, उपपादेन सार्धं पंचमनोयोगपंचवचनयोगानां सहानवस्थानलक्षणविरोधात्।
एषामेव प्रमत्तादिसयोगिनां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
पमत्तसंजदप्पहुडि जाव सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं, लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।७७।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-एतेषां अष्टानां गुणस्थानानां यथा स्पर्शनानुयोगस्य ओघे त्रिकालमाश्रित्य प्ररूपणा कृता तथैवात्र ज्ञातव्या। यद्येवं, तदा सूत्रे ओघमिति किन्न प्ररूपितं? न तथा प्ररूपणया काययोगाविनाभाविसयोगि-चतुर्विधसमुद्घातक्षेत्रप्रतिषेधफलत्वात्।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम् ।
संप्रति काययोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगिकेवलिपर्यंतस्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रत्रयमवतरति-
कायजोगीसु मिच्छादिट्ठी ओघं।।७८।।
सासणसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव खीणकसायवीदराग छदुमत्था ओघं।।७९।।
सजोगिकेवली ओघं।।८०।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्राणां त्रयाणामपि अर्थः सुगमः। सयोगिकेवलिनां सूत्रस्य पृथक्करणे सयोगिकेवलिनां चत्वारः समुद्घाताः काययोगाविना भाविनः इति मंदमेधावि-जनावबोधनफलत्वात्।
एवं सामान्यकाययोगिस्पर्शननिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।


अथ योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में अट्ठाईस सूत्रों के द्वारा योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में पाँच मनोयोग एवं पाँच वचन योग के धारी जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र कहेंगे। उसके बाद द्वितीय स्थल में काययोगी जीवों में औदारिक एवं औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु ‘‘कायजोगीसु’’ इत्यादि बारह सूत्र हैं। उसके आगे तृतीय स्थल में वैक्रियिककाययोग एवं वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन बतलाने हेतु ‘‘वेउव्विय’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में आहारक और आहारकमिश्रकाययोगी छठे गुणस्थानवर्ती मुनियों का स्पर्शन क्षेत्र निरूपण करने हेतु ‘‘आहारकाय’’ इत्यादि एक सूत्र है। तदनंतर पंचमस्थल में कार्मणकाययोगी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन बतलाने वाले ‘‘कम्मइय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र कहने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुवाद से पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगियों में मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।७४।।

इस सूत्र के अनुसार उपर्युक्त मनोयोगी एवं वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीवों की स्पर्शनप्ररूपणा क्षेत्रानुयोग के समान जानना चाहिए।

पुनश्च इन्हीं जीवों का विशेष स्पर्शन निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह अथवा सर्वलोक का स्पर्श किया है।।७५।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है।

स्वस्थानस्वस्थानपदपरिणत पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने सामान्य लोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और मनुष्यक्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकपद से परिणत उक्त जीवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं, जो कि घनाकार लोक को आठवें भाग से कम तेतालीस () रूपों से विभक्त करने पर एक भाग अथवा अधोलोक को साढ़े चौबीस () रूपों से विभक्त करने पर एक भाग अथवा ऊध्र्वलोक को आठवें भाग से कम साढ़े अठारह () रूपों से विभक्त करने पर एक भाग स्पर्श किया है। इन सभी के उदाहरण देखें- घनलोक-राजु अधोलोक-राजु ऊध्र्वलोक-राजु इस प्रकार नरलोक तथा तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। मारणान्तिक पद से परिणत जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है।

अब उन्हीं मनोयोगी और वचनयोगी जीवों में सासादनगुणस्थान से लेकर पंचम गुणस्थान तक के जीवों का स्पर्शन कहने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती पाँचों मनोयोगी और पाँचों वचनयोगी जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान है।।७६।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। विशेषता यह है कि उपर्युक्त मनोयोगी और वचन योगी जीवों में सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपाद नहीं है। क्योंकि उपपाद के साथ पाँचों मनोयोग और पाँचों वचनयोगों का सहानवस्थानलक्षण से विरोध देखा जाता है।

अब उन्हीं मनोयोगी और वचनयोगियों में प्रमत्तसंयत से लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तक के जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती उक्त जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।७७।।

हिन्दी टीका-इन आठों गुणस्थानों की स्पर्शनानुयोगद्वार के ओघ में तीनों लोकों का आश्रय करके जैसी स्पर्शनप्ररूपणा की गई है, उसी प्रकार से यहाँ पर भी करनी चाहिए।

शंका-यदि ऐसा है, तो सूत्र में ‘ओघ’ ऐसा पद क्यों नहीं कहा?

समाधान-नहीं, क्योंकि उस प्रकार की प्ररूपणा काययोग के अविनाभावी सयोगिकेवली के चारों प्रकार के समुद्घातक्षेत्र के प्रतिषेध करने के लिए है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले चार सूत्रों का कथन पूर्ण हुआ।

अब काययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों से लेकर सयोगिकेवली पर्यन्त गुणस्थानवर्ती भगवन्तों का स्पर्शन प्ररूपण करने हेतु तीन सूत्रों का अवतार हो रहा है-

सूत्रार्थ-

काययोगियों में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान सर्वलोक है।।७८।।

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर क्षीणकषायवीतराग छद्मस्थ गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती काययोगी जीवों का स्पर्शन ओघ के समान है।।७९।।

काययोगी सयोगिकेवली का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान लोक का असंख्यातवाँ भाग, असंख्यात बहुभाग और सर्वलोक है।।८०।।

हिन्दी टीका-तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। इनमें विशेष बात यह है कि सयोगकेवलियों का सूत्र पृथक्रूप से कहने का अभिप्राय यह है कि सयोगकेवलियों में चारों समुद्घात (दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण) काययोग के साथ अविनाभावीरूप से पाये जाते हैं, यह बात मंदमेधावी जनों को संबोधित करने के लिए कही गई है।

इस प्रकार सामान्यकाययोगी जीवों का स्पर्शनक्षेत्र बतलाने वाले तीन सूत्रों का कथन पूर्ण हुआ।

औदारिककाययोगिस्पर्शनकथनाय मिथ्यादृष्ट्यपेक्षया सूत्रमवतरति-

ओरालियकायजोगीसु मिच्छादिट्ठी ओघं।।८१।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अत्र द्रव्यार्थिकनयप्ररूपणया ओघत्वं, पर्यायार्थिनयप्ररूपणया अस्ति विशेषः-औदारिककाययोगे निरुद्धे विहार-वैक्रियिकयोः अष्ट-चतुर्दशभागत्वानुपलंभात्। ततोऽत्र भेदप्ररूपणा क्रियते-स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-परिणतैः त्रिष्वपि कालेषु सर्वलोकः स्पृष्टः। उपपादोऽत्र नास्ति, औदारिककाययोगोपपादयोः सहानवस्थानलक्षणविरोधात्। वर्तमानकाले वैक्रियिकपदपरिणतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। अतीतानागतयोः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, द्वाभ्यां लोकानामसंख्यातगुणः, किंचात्र वायुकायिकवैक्रियिकस्पर्शनस्य प्राधान्यविवक्षास्ति। विहारपरिणतौदारिककाययोगिमिथ्यादृष्टिभिः वर्तमानकाले त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपाद, संख्यातगुणश्च स्पृष्टः। अतीतानागतयोः एवमेव।
सासादनानां स्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।८२।।
सत्त चोद्दसभागा वा देसूणा।।८३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः। विशेषतया-मारणान्तिकपरिणतैः सप्त चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। अत्र ईषत्प्राग्भारपृथिव्याः उपरिमबाहल्येण ऊनाः ज्ञातव्याः।
सम्यग्मिथ्यादृष्टिस्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सम्मामिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।८४।।
सूत्रं सुगमं।
असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतयोः औदारिककाययोगे स्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-
असंजदसम्मादिट्ठिहि संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।८५।।
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।८६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-शेषं पूर्ववत् ज्ञातव्यं। केवलं तु मारणान्तिकपरिणतैः षट् चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः, अच्युतकल्पादुपरि असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतयोः उपपादाभावात्।
प्रमत्तादिसयोगिकेवलिपर्यंतानां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
पमत्तसंजदप्पहुडि जाव सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।८७।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं वर्तते। केवलं तु-सयोगिकेवलिनि भगवति अस्मिन् औदारिकयोगे कपाट-प्रतर-लोकपूरणसमुद्घाताः न सन्ति एतदपि ज्ञातव्यं।
एवं औदारिककाययोगे सप्त सूत्राणि गतानि।
अधुना औदारिकमिश्रकाययोगे स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
ओरालियमिस्सकायजोगीसु मिच्छादिट्ठी ओघं।।८८।।
सूत्रं सुगमं। विशेषेण तु विहारवत्स्वस्थानवैक्रियिकपदयोरत्र योगे अभावोस्ति इति ज्ञातव्यं।


अब औदारिक काययोगियों का मिथ्यादृष्टि गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

औदारिक काययोगी जीवों में मिथ्यादृष्टियों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान सर्वलोक है।।८१।।

हिन्दी टीका-यहाँ द्रव्यार्थिक नय की प्ररूपणा की अपेक्षा से उक्त जीवों में ओघपना घटित होता है, किन्तु पर्यायार्थिकनय की प्ररूपणा की अपेक्षा कुछ विशेषता है-

औदारिक काययोग के निरुद्ध करने पर विहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिक पदों के स्पर्शन का क्षेत्र आठ बटे चौदह (८/१४) भाग नहीं पाया जाता है। इससे यहाँ पर भेदप्ररूपणा की जाती है। स्वस्थानस्वस्थान, वेदना, कषाय और मारणान्तिकपद से परिणत औदारिककाययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने तीनों ही कालों में सर्वलोक का स्पर्श किया है। यहाँ पर उपपादपद नहीं है, क्योंकि औदारिक काययोग और उपपादपद, इन दोनों का सहानवस्थानलक्षण विरोध है। वर्तमानकाल में वैक्रियिकपद से परिणत उक्त जीवों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवां भाग और मनुष्यक्षेत्र से असंख्यात गुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। अतीत और अनागत इन दोनों कालों में सामान्यलोक आदि तीनों लोकों का संख्यातवाँ भाग और नरलोक तथा तिर्यग्लोक इन दोनों लोकों से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है, क्योंकि यहाँ पर वायुकायिक जीवों के वैक्रियिक पद संबंधी स्पर्शनक्षेत्र की प्रधानता से विवक्षा की गई है। विहारवत्स्वस्थानपद से परिणत औदारिक काययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने वर्तमानकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। उन्हीं जीवों ने अतीतकाल और अनागतकाल में इसी प्रकार से सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

औदारिक काययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।८२।।

उक्त जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम सात बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।८३।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्र सुगम हैं। विशेषरूप से यह जानना है कि मारणान्तिक पद से परिणत उक्त सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के द्वारा कुछ कम सात बटे चौदह (७/१४) भाग स्पर्श किए गये हैं। यहाँ ईषत्प्राग्भार पृथिवी के उपरिम भाग के बाहल्यप्रमाण-मोटाई से कुछ कम क्षेत्र जानना चाहिए।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

औदारिक काययोगी सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है।।८४।।

सूत्र का अर्थ सरल है, इसलिए इसमें विशेष व्याख्यान नहीं किया है।

अब असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थानवर्ती औदारिककाययोगी जीवों का स्पर्शन निरूपण करने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

औदारिककाययोगी, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है।।८५।।

औदारिककाययोगी उक्त दोनों गुणस्थानवर्ती जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।८६।।

हिन्दी टीका-इन सूत्रों की अपेक्षा सम्पूर्ण कथन पूर्ववत् समझना चाहिए। केवल विशेषता यह है कि मारणान्तिक समुद्घात से सहित उक्त दोनों गुणस्थानवर्ती जीवों के द्वारा कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किए गये हैं। क्योंकि अच्युतकल्प से ऊपर असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीवों का उपपाद नहीं पाया जाता है। अर्थात् उससे ऊपर द्रव्यलिंगी मुनि ही उत्पन्न होते हैं।

अब प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर सयोगकेवली तक के जिनों का स्पर्शन बताने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती औदारिककाययोगी जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।८७।।

हिन्दी टीका-सूत्र सुगम है। इसमें केवल विशेष यह है कि सयोगकेवली गुणस्थान में औदारिककाययोग में कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घात नहीं होते हैं यह भी जानना चाहिए। वहाँ केवल एक दण्ड समुद्घात ही होता है। इस प्रकार औदारिक काययोग का वर्णन करने वाले सात सूत्रों का व्याख्यान पूर्ण हुआ।

अब औदारिकमिश्रकाययोग में स्पर्शन का निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

औदारिकमिश्रकाययोगियों में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान सर्वलोक है।।८८।।

हिन्दी टीका-सूत्र सरल है। विशेषरूप से यहाँ यह जानना चाहिए कि विहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिक समुद्घात इन दोनों पदों का इन औदारिकमिश्रकाययोगी जीवों में अभाव पाया जाता है।


सासादनादित्रिगुणस्थानेषु अस्मिन् योगे स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-

सासणसम्माइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठि-सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।८९।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। एतेषां वर्तमानप्ररूपणायां क्षेत्रवत् स्पर्शनं अस्ति। अतीतकाले स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-उपपादपरिणतौदारिकमिश्रसासादनैः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः स्पृष्टः। तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः कथं?
देवनारकमनुष्यतिर्यक्सासादनैः तिर्यग्मनुष्ययोरुत्पद्य शरीरं गृहीत्वा औदारिकमिश्रकाययोगेन सह सासादनगुणस्थानमुद्वहद्भिः अतीतकाले संख्यातांगुलबाहल्यरज्जुप्रतरं मध्यस्थितसमुद्रवज्र्यं सर्वं येन स्पृश्यते तेन तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः इति वचनं युज्यते। अत्र विहार-वैक्रियिक-मारणान्तिक-पदानि न सन्ति, एतेषामौदारिकमिश्रकाययोगेन सहानवस्थानविरोधात्।
उपपादपदमस्त्यपि, सासादनगुणस्थानेन सह अक्रमेण उपात्तभवशरीरप्रथमसमये उपपादोपलम्भात्।
मिथ्यादृष्टीनां पुनः मारणान्तिकोपपादपदे लभ्येते, अनंत: औदारिकमिश्रैकेन्द्रियापर्याप्तराशिः स्वस्थाने परस्थाने च अपक्रमणोपक्रमणं कुर्वन् लभ्यते इति।
स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-उपपादपरिणतैः असंयतसम्यग्दृष्टिभिः औदारिकमिश्रकाययोगिभिः अतीतकाले त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः।
कथं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागत्वं?
नैतत्, पूर्वं तिर्यग्मनुष्ययोः आयुः बंधयित्वा पश्चात् सम्यक्त्वं गृहीत्वा दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा बद्धायुष्केण भोगभूमिसंस्थानासंख्यातद्वीपेषु उत्पन्नैः भवशरीरग्रहणप्रथमसमये वर्तमानैः औदारिकमिश्रकाय-योगासंयतसम्यग्दृष्टिभिः अतीतकाले स्पर्शिततिर्यग्लोकस्य संख्यातभागोपलम्भात्।
कपाटगतैः सयोगिकेवलिभिः औदारिकमिश्रकाययोगे वर्तमानैः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः, अतीतेन तिर्यग्लोकात् संख्यातगुणः स्पृष्टः। अत्र कपाटक्षेत्रात् जगत्प्रतरोत्पादनविधानं ज्ञात्वा वक्तव्यं।
एवं काययोगि-औदारिक-औदारिकमिश्रकाययोगिनां गुणस्थानेषु स्पर्शनप्रतिपादनपराणि द्वादश सूत्राणि गतानि।
अधुना वैक्रियिककाययोगिनां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-
वेउव्वियकायजोगीसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।९०।।
अट्ठ तेरह चोद्दसभागा वा देसूणा।।९१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-उभयसूत्रयोरर्थः सुगमः।
स्वस्थानस्वस्थानपरिणतवैक्रियिकमिथ्यादृष्टिभिः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। विहारवत्-स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदपरिणतैः अष्ट चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः। उपपादो नास्ति। मारणान्तिकपरिणतैः त्रयोदश चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, अधोलोके षट्, उपरि सप्त रज्जवः। घनलोकमेकरूपस्य अष्टत्रयोदश भागोनसप्तविंशतिरूपैः खण्डितैकखंडं स्पृश्यन्ते इति प्रोत्तंâ भवति।
सासादनानां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठी ओघं।।९२।।
सूत्रं सुगमं, केवलं तु-मारणान्तिकसमुद्घातापेक्षया द्वादश चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः इति ज्ञातव्यं।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टि-स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सम्मामिच्छादिट्ठी असंजदसम्मादिट्ठी ओघं।।९३।।
सूत्रं सुगमंं वर्तते।
अधुना वैक्रियिकमिश्रयोगिस्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
वेउव्वियमिस्सकायजोगीसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिट्ठि-असंजद-सम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।९४।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। अस्मिन् योगेषु विहारवत्स्वस्थान-वैक्रियिक-मारणान्तिकपदानि न सन्ति। सासादनसम्यग्दृष्टीनां स्पर्शनं एवमेव वक्तव्यं। असंयतसम्यग्दृष्टीनां वानव्यन्तर-ज्योतिष्क-भवनवासिसु उत्पादो नास्ति अतः एषां वैक्रियिकमिश्रकायो नास्ति। सम्यग्दृष्टीनां उपपादपदयोग्य सौधर्मादिविमानानां तिर्यग्लोकस्यासंख्यातभागश्चैवावस्थानमस्ति।
एवं तृतीयस्थले वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्रयोगिनां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
अधुना आहारकाययोगिस्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
आहारकायजोगि-आहारमिस्सकायजोगीसु पमत्तसंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।९५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। एतयोः सूत्रयोः वर्तमानप्ररूपणा क्षेत्रवत्। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषायपरिणतैः आहारककाययोगिप्रमत्तसंयतैः अतीतकाले चतुर्णां लोकानाम-संख्यातभागः, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः स्पृष्टः। अस्मिन् उपपादवैक्रियिकपदे न स्तः। मारणान्तिकपरिणतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणः। आहारकमिश्रकाययोगिप्रमत्तसंयतैः स्वस्थान-वेदना-कषायपरिणतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रात् संख्यातभागश्च स्पृष्टः।
एवं चतुर्थस्थले आहारक-आहारकमिश्रयोगिस्पर्शनकथनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।


अब सासादनादि तीन गुणस्थानवर्ती जीवों का इस औदारिकमिश्रकाययोग में स्पर्शन का निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

औदारिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और सयोगिकेवली जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।८९।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। इन तीन ही गुणस्थान के स्पर्शन की वर्तमानकालिक प्ररूपणा क्षेत्र के समान है। स्वस्थानस्वस्थान, वेदना, कषायसमुद्घात और उपपादपद से परिणत औदारिकमिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

शंका-तिर्यग्लोक का संख्यातवां भागकैसे कहा?

समाधान-चूँकि देव, नारकी, मनुष्य और तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने (यथासंभव) तिर्यंच और मनुष्यों में उत्पन्न होकर शरीर को ग्रहण करके औदारिकमिश्रकाययोग के साथ सासादनगुणस्थान को धारण करते हुए अतीतकाल में बीच के समुद्र को छोड़कर संख्यात अंगुल बाहल्य वाले संपूर्ण राजुप्रतररूप क्षेत्र का स्पर्श किया है, इसलिए तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग यह वचन युक्तियुक्त है।

यहाँ पर विहारवत्स्वस्थान, वैक्रियिक और मारणान्तिक पद नहीं होते हैं, क्योंकि इन पदों का औदारिकमिश्रकाययोग के साथ अवस्थान का विरोध है। किन्तु उपपादपद होता है, क्योंकि सासादनगुणस्थान के साथ अक्रम से (युगपत्) उपात्त भवशरीर के प्रथम समय में उपपाद पाया जाता है। मिथ्यादृष्टि जीवों के भी मारणान्तिक और उपपादपद पाये जाते हैं क्योंकि अनन्तसंख्या वाले औदारिकमिश्रकाययोगी एकेन्द्रिय अपर्याप्त राशि, स्वस्थान और परस्थान में अपक्रमण और उपक्रमण करती हुई, जाती-आती पाई जाती है। स्वस्थानस्वस्थान, वेदना, कषायसमुद्घात और उपपादपद से परिणत औदारिकमिश्रकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का संख्यातवां भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और अढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

शंका-तिर्यग्लोक का संख्यातवां भागकैसे कहा?

समाधान-नहीं, क्योंकि पूर्व में तिर्यंच और मनुष्यों में आयु को बांधकर पीछे सम्यक्त्व को ग्रहण कर और दर्शनमोहनीय का क्षय करके बांधी हुई आयु के वश से भोगभूमि की रचना वाले असंख्यात द्वीपों में उत्पन्न हुए तथा भव-शरीर के ग्रहण करने के प्रथम समय में वर्तमान, ऐसे औदारिकमिश्रकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों के द्वारा अतीतकाल में स्पर्श किया गया क्षेत्र तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग पाया जाता है।

कपाटसमुद्घात को प्राप्त, औदारिकमिश्रकाययोग में वर्तमान सयोगिकेवलियों ने सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। अतीतकाल की अपेक्षा से तिर्यग्लोक से संख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। यहाँ पर कपाटसमुद्घातगत क्षेत्र की अपेक्षा से स्पर्शनक्षेत्र संबंधी जगत्प्रतर के उत्पादन का विधान जान करके कहना चाहिए। इस प्रकार काययोगी, औदारिककाययोग एवं औदारिकमिश्रकाययोग वाले जीवों का गुणस्थानों में स्पर्शन का प्रतिपादन करने वाले बारह सूत्र पूर्ण हुए।

अब वैक्रियिककाययोगी का स्पर्शन निरूपण करने हेतु दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगियों मेें मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।९०।।

वैक्रियिककाययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने तीनों कालों की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह और कुछ कम तेरह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।९१।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। स्वस्थानस्वस्थानपद से परिणत वैक्रियिककाययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवां भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और ढाईद्वीप मनुष्यलोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घातपद से परिणत उक्त जीवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं। यहाँ पर उपपादपद नहीं होता है, मारणान्तिकसमुद्घातपद से परिणत उक्त जीवों ने कुछ कम तेरह बटे चौदह (१३/१४) भाग स्पर्श किये हैं, जो कि मेरुतल से नीचे छहराजु और ऊपर सात राजु जानना चाहिए। घनाकार लोक को एक रूप के आठ बटे तेरह () भाग से कम सत्ताइस () रूपों से खंडित (विभक्त) करने पर एक खंड प्रमाण क्षेत्र का स्पर्श करते हैं, ऐसा अर्थ कहा गया समझना चाहिए।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिक काययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघस्पर्शन के समान है।।९२।।

सूत्र का अर्थ सुगम है। विशेष बात केवल यह है कि मारणांतिक समुद्घात की अपेक्षा उक्त जीवों ने बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग स्पर्श किये हैं ऐसा जानना चाहिए।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिककाययोगी सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन ओघ के समान है।।९३।।

सूत्र सरल है, इसलिए विशेष कथन नहीं किया जा रहा है।

अब वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों का स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों में मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।९४।।

हिन्दी टीका-सूत्र सुगम है। इस योग वाले जीवों के विहारवत्स्वस्थान, वैक्रियिक और मारणान्तिक समुद्घात पद नहीं होते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन भी इसी प्रकार जानना चाहिए। असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का वानव्यंतर, ज्योतिष्क और भवनवासी देवों में उपपाद नहीं होता है अत: उनके वैक्रियिकमिश्रकाययोग भी नहीं होता है। सम्यग्दृष्टि जीवों के उपपादपद के योग्य सौधर्म आदि विमानों का तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भाग में ही अवस्थान देखा जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वैक्रियिक और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब आहारककाययोगी जीवों का स्पर्शन कहने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवों में प्रमत्तसंयतों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।९५।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। इस सूत्र की वर्तमानकालिक प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा के समान है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घात से परिणत आहारककाययोगी प्रमत्तसंयत जीवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवां भाग और मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवां भाग स्पर्श किया है। इन आहारककाययोगियों में उपपाद और वैक्रियिक पद नहीं होते हैं। मारणान्तिक पद से परिणत आहारककाययोगी जीवों ने चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यक्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। स्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घात, इन पदों से परिणत आहारकमिश्रकाययोगी प्रमत्तसंयतों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवां भाग और मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवां भाग स्पर्श किया है।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी मुनियों के स्पर्शन का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

कार्मणकाययोगिमिथ्यादृष्टिस्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-

कम्मइयकायजोगीसु मिच्छादिट्ठी ओघं।।९६।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-उपपादपरिणतकार्मण काययोगिमिथ्यादृष्टिभिः त्रिष्वपि कालेषु येन सर्वलोकः स्पृष्टः, तेन सूत्रे ओघमिति उक्तं। अत्र विहारवत्स्वस्थान-वैक्रियिक-मारणान्तिकपदानि न सन्ति।
सासादनानां स्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।९७।।
एक्कारह चोद्दसभागा देसूणा।।९८।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रद्वयं सुगमं। विशेषेण तु-उपपादव्यतिरिक्तशेषपदानि न सन्ति। कार्मणकाययोगिविवक्षातः। उपपादे वर्तमानैः सासादनैः अधः पंच, उपरि षट् रज्जवः स्पृश्यन्ते इति एकादश चतुर्दशभागाः स्पर्शनक्षेत्रं भवति।
असंयतसम्यग्दृष्टिस्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-
असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।९९।।
छ चोद्दसभागा देसूणा।।१००।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे। अत्रापि उपपादपदमेकमेव। तिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टयः येनोपरि षट् रज्जून् गत्वा उत्पद्यन्ते, तेन स्पर्शनक्षेत्रप्ररूपणं षट्-चतुर्दशभागमात्रं भवति। अधः स्पर्शनं पञ्चरज्जुप्रमाणं न लभ्यते, नारकासंयतसम्यग्दृष्टीनां तिर्यक्षु उत्पादाभावात्।
संप्रति सयोगिकेवलिषु कार्मणयोगापेक्षया स्पर्शनकथनाय सूत्रावतारः क्रियते-
सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जाभागा सव्वलोगो वा।।१०१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। प्रतरगतकेवलिभिः लोकस्य असंख्याता भागाः स्पृष्टाः, लोकपर्यंतस्थितवातवलयेषु अप्रविष्टजीवप्रदेशत्वात्। लोकपूरणे सर्वलोकः स्पृष्टः, वातवलयेष्वपि प्रविष्टजीवप्रदेशत्वात्।
तात्पर्यमेतत्-‘‘जोगा पयडिपदेसा ट्ठिदिअणुभागा कसायदो होंति।’’ इति नियमेन योगनिमित्तेन यानि कर्माण्यास्रवन्ति तेषां संवरः कथं भवेत्तेषां निर्जराकरणार्थं यानि यानि कार्याणि तानि सर्वाणि गृहीतव्यानि सन्ति। यथा-‘‘स गुप्तिसमिति धर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः।।२।। तपसा निर्जरा च।।३।।’’१
एतयोः सूत्रयोः अनुसारेण तथैवाचरणं विधातव्यमेतदेव एतद्मार्गणापठनस्यसारं वर्तते।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखंडे चतुर्थग्रन्थे स्पर्शनानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिन्तामणि टीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः समाप्तः।


अब कार्मणकाययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी जीवों में मिथ्यादृष्टि जीवों की स्पर्शनप्ररूपणा ओघ के समान है।।९६।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। स्वस्थानस्वस्थान, वेदना, कषाय और उपपादपद से परिणत कार्मणकाययोगी मिथ्यादृष्टि जीवों ने तीनों ही कालों में चूँकि सर्वलोक का स्पर्श किया है, इसलिए सूत्र में ‘ओघ’ ऐसा पद कहा है। यहाँ कार्मणकाययोगी मिथ्यादृष्टियों के विहारवत्स्वस्थान, वैक्रियिक और मारणान्तिक समुद्घात इतने पद नहीं होते हैं।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन प्ररूपण करने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टियों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।९७।।

कार्मणकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने तीनों कालो की अपेक्षा कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।९८।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सरल है। विशेष बात यह है कि यहाँ पर उपपाद पद को छोड़कर शेष पद नहीं है, क्योंकि कार्मणकाययोग की विवक्षा की गई है। उपपादपद में वर्तमान सासादनसम्यग्दृष्टि जीव मेरु के मूलभाग से नीचे पांच राजु और ऊपर अच्युतकल्प तक छह राजु प्रमाण क्षेत्र का स्पर्शन करते हैं, इसलिए ग्यारह बटे चौदह (११/१४) भाग प्रमाण स्पर्श किया हुआ क्षेत्र हो जाता है।

अब असंयत सम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।९९।।

कार्मणकाययोगी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने तीनों कालों की अपेक्षा से कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किए है।।१००।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्र सुगम हैं।

यहाँ पर भी केवल उपपादपद ही होता है, तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि जीव चूँकि मेरुतल से ऊपर छह राजु जाकर के उत्पन्न होते हैं इसलिए स्पर्शनक्षेत्र की प्ररूपणा छट बटे चौदह (६/१४) भाग प्र्रमाण होती है। मेरुतल से नीचे पाँच राजु प्रमाण स्पर्शन क्षेत्र नहीं पाया जाता है, क्योंकि नारकी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का तिर्यंचों में उपपाद नहीं होता है।

अब सयोगिकेवली भगवन्तों में कार्मणकाययोग की अपेक्षा स्पर्शन का कथन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

कार्मणकाययोगी सयोगिकेवलियों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ बहुभाग और सर्वलोक स्पर्श किया है।।१०१।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है।

प्रतरसमुद्घात को प्राप्त केवलियों ने लोक के असंख्यात बहुभाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि प्रतरसमुद्घात के समय लोकपर्यंत स्थित वातवलयों में केवली भगवान के आत्मप्रदेश प्रवेश नहीं करते हैं। लोकपूरणसमुद्घात में सर्वलोक का स्पर्श किया है, क्योंकि लोेक के चारों ओर व्याप्त वातवलयों में भी केवली भगवान के आत्मप्रदेश प्रविष्ट हो जाते हैं।

तात्पर्य यह है कि ‘‘योग से प्रकृति और प्रदेश बंध होता है एवं कषाय के निमित्त से स्थिति और अनुभागबंध होते हैं’’ द्रव्यसंग्रह ग्रंथ में कथित इस नियम से योग के निमित्त से जिन कर्मों का आश्रव होता है उनका संवरकैसे हो सकता है? उनकी निर्जरा करने के लिए जो-जो कार्य करने आवश्यक हों उन सभी को ग्रहण करना चाहिए।

जैसे-‘‘वह संवर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र से होता है।।२।। तथा ‘‘तप के द्वारा निर्जरा और संवर दोनों होते हैं।।३।।’’ इन दोनों सूत्रों के अनुसार हम सभी को उसी प्रकार का आचरण करना चाहिए, यही इस मार्गणा के पढ़ने का सार है।

विशेषार्थ

-इस योगमार्गणा अधिकार में प्रमुखरूप से यद्यपि प्रत्येक योग वाले जीवों का स्पर्शन क्षेत्र यहाँ बतलाया गया है और कुल १७ योगों के वर्णन में एक सामान्य मनोयाग और एक सामान्य वचनयोग को लिया है जिसके अंदर चारों-चारों भेद समाविष्ट रहते हैं तथा काययोग के सात भेद बताये हैं, इसीलिए यहाँ १७ भेद हैं। पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने इस स्पर्शनानुगम की योगमार्गणा का उपसंहार करते हुए बताया है कि योग के निमित्त प्रकृति-प्रदेश नाम के कर्मबंध होते हैं और कषाय के निमित्त से स्थिति-अनुभाग बंध होते हैं। द्रव्यसंग्रह की टीका में श्री ब्रह्मदेवसूरि ने इसका और भी स्पष्टीकरण करते हुए कहा है कि-

‘‘निश्चयेन निष्क्रियाणामपि शुद्धात्मप्रदेशानां व्यवहारेण परिस्पन्दनहेतुर्योग:, तस्मात्प्रकृतिप्रदेशबन्धद्वयं भवतीति.........।’’

अर्थात् निश्चयनय से क्रियारहित शुद्ध आत्मा के प्रदेश हैं, व्यवहारनय से उन आत्मप्रदेशों के जो परिस्पंदन (चलायमान करने का) कारण है, उसको योग कहते हैं। उस योग से प्रकृति तथा प्रदेश नामक दो प्रकार का कर्म बंध होता है। दोष रहित परमात्मा की भावना (ध्यान) के प्रतिबंध करने वाले जो क्रोध आदि कषाय हैं उनके उदय से स्थिति और अनुभाग ये दो बंध होते हैं। यहाँ कोई शंका करता है कि आस्रव और बंध के होने में मिथ्यात्व, अविरति आदि कारण समान हैं। इसलिए आस्रव और बंध में क्या भेद है? उसका उत्तर दिया है कि यह शंका ठीक नहीं है क्योंकि प्रथम क्षण में जो कर्मस्कंधों का आगमन है, वह तो आस्रव है और कर्मस्कंधों के आगमन के पीछे द्वितीयक्षण में जो उन कर्मस्कंधों का जीव के प्रदेशों में स्थित होना है सो बंध है। यह भेद आस्रव और बंध में है क्योंकि योग और कषायों से प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभाग नामक चार बंध होते हैं इस कारण बंध का नाश करने के लिए योग तथा कषाय का त्याग करके अपनी शुद्ध आत्मा में भावना करनी चाहिए।

पुन: इन कर्मों के संवर के प्रकरण में तत्त्वार्थसूत्र के दो सूत्रों द्वारा कहा गया है कि ३ गुप्ति, ५ समिति, १० धर्म, १२ अनुप्रेक्षा, २२ परीषहजय और ५ प्रकार के चारित्ररूप, ६ प्रकार के सान्तर भेद वाले संयमरूप परिणामों के द्वारा कर्मागमन का निरोधरूप संवर होता है। सूत्र में आया हुआ ‘‘स’’ शब्द यह बतलाता है कि वह संवर गुप्ति आदि के द्वारा ही होता है और जल में डूबना, कपाल को ग्रहण करना, सिरमुण्डन, शिखाधारण आदि दीक्षा के चिन्हों को धारण करना, मस्तकछेदन, कुदेव आदि की पूजा आदि के द्वारा संवर नहीं हो सकता है क्योंकि जो कर्म राग, द्वेष आदि से उपार्जित होते हैं उनकी निवृत्ति विपरीत कारणों से हो सकती है।

यद्यपि दस प्रकार के धर्मों में तप का ग्रहण किया है और उसी से तप, संवर और निर्जरा का कारण सिद्ध हो जाता है लेकिन यहाँ पृथक्रूप से तप का ग्रहण इस बात को बतलाता है कि तप नवीन कर्मों के संवरपूर्वक कर्मक्षय का कारण होता है तथा तप संवर का प्रधान कारण है। परमात्म प्रकाश में कहा भी है-

दाणे लब्भइ भोउ पर, इंदत्तणु वि तवेण।

जम्मणमरणविवज्जियउ, पउ लब्भइ णाणेण।।

अर्थात् दान से भोग प्राप्त होते हैं, तप से परम इन्द्रत्व तथा ज्ञान से जन्म-जरा-मरण से रहित मोक्षपद प्राप्त होता है। एक ही तप इन्द्रादि पद को भी देता है और संवर तथा निर्जरा का कारण भी होता है, इसमें कोई विरोध नहीं है। एक पदार्थ भी अनेक कार्य करता है। जैसे-एक ही छत्र छाया भी करता है तथा धूप और पानी से भी बचाता है क्योंकि एक ही कारण के अनेक कार्य दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे-एक ही अग्नि क्लेदन (चावल को पकाना) आदि करने के कारण पावक कहलाती है, वस्तु को भस्मसात् करने से उसे दाहक कहते हैं उसी प्रकार एक ही तपश्चरण भी अभ्युदय और कर्मक्षय का कारण होता है, इसमें कोई विरोध नहीं है।

अर्थात् यहाँ तात्पर्य यह है कि योगों के निरोध से कर्मों का आना बंद हो जाता है इसलिए तप-संयम आदि के द्वारा योग के परिस्पन्दन को रोककर अपनी शुद्ध आत्मा का ध्यान करते हुए परम्परा से मोक्षप्राप्ति का लक्ष्य बनाना ही इस मार्गणा के पढ़ने का सार है।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खंड में चतुर्थग्रंथ में स्पर्शनानुगम नाम के चतुर्थ प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।