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०५. द्वितीय महाधिकार- गतिमार्गणा में देवगति का वर्णन

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द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में देवगति का वर्णन

'अथ देवगतिनाम चतुर्थोऽन्तराधिकार: कथ्यते

अनंतरं स्थलपंचकेन एकविंशतिसूत्रपर्यंतं देवगतिनाम चतुर्थोन्तराधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत्प्रथमस्थले सामान्येन देवानां संख्यां गुणस्थानं च निरूपयितुं ‘‘देवगईए’’ इत्यादिसूत्रमादिं कृत्वा सूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले भवनवासिदेवानां संख्यानिरूपणत्वेन ‘‘भवणवासि’’ इत्यादिसूत्रादारभ्य सूत्रचतुष्टयं। तत: परं तृतीयस्थले व्यंतरदेवानां गुणस्थानेषु संख्याप्रतिपादनत्वेन ‘‘वाणवेंतर’’ इत्यादिसूत्रादारभ्य चत्वारि सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले ज्योतिष्कदेवानां संख्यादिनिरूपणत्वेन ‘‘जोइसिय’’ इत्यादिना सूत्रमेकं। तदनु पंचमस्थले कल्पवासिकल्पातीतदेवानां गुणस्थानानि संख्यां निरूपणपरत्वेन ‘‘सोहम्मीसाण’’ इत्यादिना अष्टौ सूत्राणि कथ्यन्ते। इति समुदायपातनिका।
अधुना देवगतौ देवेषु मिथ्यादृष्टिदेवानां संख्यानिर्धारणार्थं सूत्रमवतरति-
देवगइए देवेसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।५३।।
देवगतिप्रतिपन्नदेवेषु मिथ्यादृष्टयो द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? असंख्याता:।
किमसंख्यातं नाम?
एकैकरूपे अपनीयमाने यो राशि: समाप्यते सोऽत्रासंख्यात: मन्तव्य:। य: पुन: न समाप्यते स: राशि: अनन्तो नाम।
यदि एवं तर्हि व्ययसहितसक्षयाद्र्धपुद्गलपरिवर्तकालोऽपि असंख्यातो जायते?
भवतु नाम।
कथं पुन: तस्याद्र्धपुद्गलपरिवर्तस्यानन्तव्यपदेश:?
नैतत्, तस्य उपचारनिबंधनत्वात्।
‘‘तं जहा-अणंतस्य केवलणाणस्स विसयत्तादो अद्धपोग्गलपरियट्टकालो वि अणंतो होदि।
अहवा जं संखाणं पंचिंदियविसओ तं संखेज्जं णाम। तदो उवरि जमोहिणाणविसओ तमसंखेज्जं णाम। तदो उवरि जं केवलणाणस्सेव विसओ तमणंतं णाम[१]।’’
अधुना कालापेक्षया सूक्ष्मतरप्ररूपणार्थं सूत्रस्यावतार: क्रियते-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।५४।।
कालापेक्षया मिथ्यादृष्टयो देवा: असंख्यातासंख्याताभि: अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभि: अपहृता भवन्ति।
संप्रति क्षेत्रापेक्षया तेषामेव प्रमाणनिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
खेत्तेण पदरस्स वेछप्पण्णंगुलसयवग्गपडिभागेण।।५५।।
क्षेत्रापेक्षया जगत्प्रतरस्य षट्पञ्चाशदधिकद्विशतांगुलानां वर्गरूपप्रतिभागेन मिथ्यादृष्टिदेवानां राशिर्भवति। षट्पंचाशदुत्तरद्विशतसूच्यंगुलस्य वर्गरूपभागहारेण जगत्प्रतरे भाजिते सति मिथ्यादृष्टिदेवानां राशिरागच्छति।
उक्तं चान्यत्र-
‘‘देवगतौ देवा मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येया: श्रेणय: प्रतरासंख्येयभागप्रमिता:[२]।’’

अब देवगति नाम का चतुर्थ अन्तराधिकार कहते हैं-

मनुष्यगति के व्याख्यान के पश्चात् पाँच स्थल के द्वारा इक्कीस सूत्रपर्यंत देवगति नाम का चतुर्थ अन्तराधिकार प्रारंभ किया जा रहा है। उसमें प्रथम स्थल में सामान्य से देवों की संख्या और गुणस्थान निरूपण करने के लिए ‘‘देवगईए’’ इत्यादि सूत्र से प्रारंभ करके चार सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में भवनवासी देवों की संख्या निरूपण की मुख्यता से ‘‘भवणवासि’’ इत्यादि सूत्र से आरम्भ करके चार सूत्र कहेंगे। उसके आगे तृतीय स्थल में व्यन्तर देवों की गुणस्थानों में संख्या बतलाने हेतु ‘‘वाणवेंतर’’ इत्यादि सूत्र से प्रारंभ करके चार सूत्र वर्णित हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में ज्योतिषी देवों की संख्या आदि के निरूपण की मुख्यता से ‘‘जोइसिय’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके बाद पंचमस्थल में कल्पवासी और कल्पातीत देवों के गुणस्थान और संख्या का निरूपण करने वाले ‘‘सोहम्मीसाण’’ इत्यादि आठ सूत्र कहेंगे। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

अब देवगति में देवों में मिथ्यादृष्टि देवों की संख्या का निर्धारण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

देवगति प्रतिपन्न देवों में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? असंख्यात हैं ।।५३।।

हिन्दी टीका-देवगति मेें उत्पन्न होने वाले देवों में मिथ्यादृष्टि देवों की संख्या कितनी है ? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर मिलता है कि वे असंख्यात हैं।

प्रश्न-असंख्यात किसे कहते हैं ?

उत्तर-एक-एक संख्या के घटाते जाने पर जो राशि समाप्त हो जाती है, वह राशि यहाँ असंख्यात मानी गई है और जो राशि कभी समाप्त नहीं होती है, वह अनन्त कहलाती है।

प्रश्न-यदि ऐसा है तो व्यय सहित होने से नाश को प्राप्त होने वाला अर्धपुद्गल परिवर्तन काल भी असंख्यात हो जाएगा ?

उत्तर-उसे असंख्यातपना प्राप्त हो जाए, तो होने दो।

प्रश्न-तब तो उस अर्धपुद्गल परिवर्तनरूप काल को अनन्त संज्ञा कैसे दी गई है ?

उत्तर-ऐसा नहीं है, क्योंकि अर्धपुद्गलपरिवर्तनरूप काल को जो अनन्त संज्ञा दी गई है, वह उपचार मात्र है।

वह इस प्रकार स्पष्ट किया जाता है-केवलज्ञान का विषय चूँकि अनन्तरूप है, इसलिए अर्धपुद्गल परिवर्तन काल भी अनन्तरूप है ऐसा माना जाता है।

अथवा जो संख्या पाँचों इन्द्रियों का विषय है, वह संख्यात है। उसके ऊपर जो संख्या अवधिज्ञान का विषय है, वह असंख्यात है। उसके ऊपर जो केवलज्ञान के विषय भाव को ही प्राप्त होती है, वह अनन्त है।

अब काल की अपेक्षा अत्यंतसूक्ष्म प्ररूपणा को बतलाने के लिए सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।५४।

हिन्दी टीका-काल की अपेक्षा से मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के द्वारा अपहृत होते हैं।

अब क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं मिथ्यादृष्टि देवों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा जगत्प्रतर के दो सौ छप्पन अंगुलों के वर्गरूप प्रतिभाग से देव मिथ्यादृष्टि राशि आती है, अर्थात् दो सौ छप्पन सूच्यंगुल के वर्गरूप भागहार का जगत्प्रतर में भाग देने पर देव मिथ्यादृष्टि जीवराशि आती है ।।५५।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा जगत्प्रतर के दो सौ छप्पन अंगुलों के वर्गरूप प्रतिभाग से मिथ्यादृष्टि देवों की राशि आती है। दो सौ छप्पन सूच्यंगुल के वर्गरूप भागहार का जगत्प्रतर में भाग देने पर मिथ्यादृष्टि देवों की राशि निकलती है।

अन्यत्र भी कहा है-

‘‘देवगति में मिथ्यादृष्टि देवों की असंख्यात श्रेणियाँ जगत्प्रतर के असंख्यातभागप्रमाण होती हैं। ’’

अधुना सासादनादिदेवानां प्रमाणप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-

सासणसम्माइट्ठि-सम्मामिच्छाइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठीणं ओघं।।५६।।

देवगतौ सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टीनां प्रमाणं ओघवत् पल्योपमस्यासंख्यात-भागप्रमाणं ज्ञातव्यं। सामान्येन इदं प्रमाणं भवति, किंतु पर्यायार्थिकनयापेक्षया विशेषोऽस्त्येव, अन्यथा शेषगतिसंबंधिजीवानां एतत्त्रयगुणस्थानवत्र्तिनामभावो भविष्यति। नैतत् शक्यं। एवं सामान्येन देवानां संख्याप्रतिपादनपराणि चत्वारि सूत्राणि गतानि।
अगे्र भवनवासिदेवानां मिथ्यादृष्टिराशिनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
भवणवासियदेवेसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।५७।।
भवनवासिदेवेषु मिथ्यादृष्टयोऽसंख्याता: भवन्ति।
कालक्षेत्रापेक्षया तेषामेव संख्यानिरूपणाय सूत्रद्वयमवतारयति सूरिवर्य:-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।५८।।
खेत्तेण असंखेज्जाओ सेढीओ पदरस्स असंखेज्जदिभागो।। तेसिं सेढीणं विक्खंभसूई अंगुलं अंगुलवग्गमूलगुणिदेण।।५९।।
कालापेक्षया असंख्यातासंख्यात-अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभि: इमे देवा: अपहृता: भवन्ति।
क्षेत्रापेक्षया इमे भवनवासिमिथ्यादृष्टिदेवा: असंख्यातजगच्छ्रेणिप्रमाणा: सन्ति। इमा: असंख्यात-जगच्छ्रेणय: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभागप्रमाणा:। तासां असंख्यातजगच्छ्रेणीनां विष्कंभसूची सूच्यंगुलं सूच्यंगुलस्य प्रथमवर्गमूलेन गुणिते यावत्प्रमाणं लभ्येत तावत्प्रमाणास्ति।
संप्रति एषामेव देवानां गुणस्थानत्रयसंख्याप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
सासणसम्माइट्ठि-सम्मामिच्छाइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठिपरूवणा ओघं।।६०।।
एषां सासादनादित्रयगुणस्थानवत्र्तिनां भवनवासिनां संख्या पूर्वोक्तगुणस्थानवद् ज्ञातव्या भवति। द्रव्यार्थिकनयमवलम्ब्य ओघेन सह एकत्वदर्शनात्। पर्यायार्थिकनयापेक्षया अस्ति विशेष:। तदग्रे भणिष्यन्ति आचार्यवर्या:।
एवं द्वितीयस्थले भवनवासिनां गुणस्थानेषु संख्यां व्यवस्थापत्सूत्रचतुष्टयं गतं।
अधुना व्यंतरदेवानां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रत्रयं कथ्यते आचार्यदेवेन-
वाणवेंतरदेवेसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।६१।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।६२।।
एतयोद्र्वयो: सूत्रयो: अर्थ: सुगमोऽस्ति।
खेत्तेण पदरस्स संखेज्जजोयणसदवग्गपडिभाएण।।६३।।
क्षेत्रापेक्षया जगत्प्रतरस्य संख्यातशतयोजनानां वर्गरूपप्रतिभागेन वानव्यन्तरदेवानां मिथ्यादृष्टि-राशिरागच्छति-संख्यातशतयोजनानां वर्गरूपभागहारेण जगत्प्रतरे भाजिते सति यल्लब्धं भवेत् तावन्तो वानव्यन्तरदेवा: भवन्ति।
सासादनादिगुणस्थाने संख्यानिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्माइट्ठि-सम्मामिच्छाइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठी ओघं।।६४।।
सूत्रस्यार्थ: सुगम:। अत्रापि पर्यायार्थिकनयेन भेदोऽस्ति। किंच संग्रहविस्तररुचिशिष्यानुग्रहार्थं द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिक-नययोव्र्यापारो भवति[३]
एवं वानव्यंतरदेवानां गुणस्थानव्यवस्थायां प्रमाणप्रतिपादनपराणि चत्वारि सूत्राणि गतानि।
अधुना ज्योतिष्कदेवसंख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
जोइसियदेवा देवगईणं भंगो।।६५।।
देवगतिप्रतिपन्नसामान्यदेवानां यावत्प्रमाणं कथितं ज्योतिष्कदेवास्तावन्त एव। ज्योतिष्कदेवेषु चतुर्णां गुणस्थानानां प्रमाणप्ररूपणा देवौद्यप्ररूपणाभि: तुल्या। एष निर्देश: द्रव्यार्थिकनयमवलम्ब्य कृत:, पर्यायार्थिकनयस्यावलम्बनेन अस्ति विशेष:। तद्यथा-वानव्यन्तरादिशेषसर्वे देवा ज्योतिष्कदेवानां संख्यातभागमात्रा भवन्ति।
एवं चतुर्थस्थले ज्योतिष्कदेवसंख्यानिरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतम्।

अब सासादन सम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानवर्ती देवों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि सामान्य देवों का द्रव्यप्रमाण ओघप्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग है ।।५६।।

हिन्दी टीका-देवगति में सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती देवों का प्रमाण गुणस्थान के समान पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण जानना चाहिए। सामान्य से यह प्रमाण होता है, किन्तु पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा कुछ विशेषता है। अन्यथा शेष तीन गतियों से सम्बन्धित इन गुणस्थानवर्ती जीवों का अभाव हो जाएगा किंतु ऐसा शक्य नहीं है।

इस प्रकार सामान्य से देवों की संख्या प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

आगे भवनवासी देवों में मिथ्यादृष्टि देवों की राशि का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

भवनवासी देवों में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं।।५७।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अभिप्राय यह है कि मिथ्यादृष्टि भवनवासी देव असंख्यात होते हैं ।

काल और क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं देवों की संख्या निरूपण के लिए आचार्यदेव दो सूत्रों को अवतरित करते हैं-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि भवनवासी देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।५८।।

सूत्रार्थ-

'क्षेत्र की अपेक्षा भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात जगत्श्रेणीप्रमाण हैं, जो असंख्यात जगत्श्रेणियाँ जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। उन असंख्यात जगत्श्रेणी की सूची, सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल से गुणित करके जो लब्ध आवे, उतनी है ।।५९।'

हिन्दी टीका-काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के द्वारा ये देव अपहृत होते हैं।

क्षेत्र की अपेक्षा ये भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात जगच्छ्रेणीप्रमाण हैं। ये असंख्यात जगत्श्रेणियाँ जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। उन असंख्यात जगत्श्रेणियों की विष्कंभसूची सूच्यंगुल को सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल से गुणित करने पर जितना प्रमाण प्राप्त होता है, उतनी भवनवासी मिथ्यादृष्टियों की विष्कंभसूची है।

अब उन्हीं भवनवासी देवों के आगे के तीनों गुणस्थानों की संख्या का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि भवनवासी जीवों की प्ररूपणा सामान्य प्ररूपणा के समान है ।।६०।।

हिन्दी टीका-इन सासादनादि तीनों गुणस्थानवर्ती भवनवासी देवों की संख्या पूर्वोक्त गुणस्थानों के समान ही जानना चाहिए। द्रव्यार्थिकनय का अवलम्बन लेकर ओघप्ररूपणा के साथ गुणस्थानप्रतिपन्न भवनवासी प्ररूपणा की एकता अर्थात् समानता देखी जाती है किन्तु पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा दोनों प्ररूपणाओं में विशेषता है। उस विशेषता को आगे आचार्यदेव कहेंगे।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में भवनवासी देवों के गुणस्थानों की संख्या को बताने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब व्यंतरदेवों की संख्या को प्रतिपादित करने हेतु आचार्यदेव तीन सूत्रों का कथन करते हैं-

सूत्रार्थ-

वानव्यंतर देवोें में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? असंख्यात हैं।।६१।।

काल की अपेक्षा वानव्यंतर देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं।।६२।।

इन दोनों सूत्रों का सरल है, इसलिए यहाँ अधिक स्पष्टीकरण नहीं किया जा रहा है।

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा जगत्प्रतर के संख्यात सौ योजनों के वर्गरूप प्रतिभाग से वानव्यंतर मिथ्यादृष्टि राशि आती है, अर्थात् संख्यात सौ योजनों के वर्गरूप भागहार का जगत्प्रतर में भाग देने पर जो लब्ध आवे, उतने वान व्यन्तर मिथ्यादृष्टि देव हैं ।।६३।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा जगत्प्रतर के संख्यात सौ योजनों का वर्गरूप प्रतिभाग करने पर वानव्यंतर जाति के देवोंं में मिथ्यादृष्टियों की राशि प्राप्त होती है अर्थात् संख्यात सौ योजन के वर्गरूप भागहार का जगत्प्रतर में भाग देने पर जो लब्ध आता है, उतनी संख्या व्यंतर मिथ्यादृष्टि देवों की होती है।

अब सासादन आदि गुणस्थानों में उन्हीं देवों की संख्या निरूपण हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि व्यंतरदेव सामान्य प्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं ।।६४।।

हिन्दी टीक-सूत्र का अर्थ सरल है। यहाँ भी पर्यायार्थिक नय से भेद है। दूसरी बात यह है कि संग्रहरुचि (संक्षेपरुचि)और विस्तार रुचि वाले शिष्यों पर अनुग्रह करने के लिए द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक इन दोनों नयों का व्यापार होता है-दोनों नयों के द्वारा संक्षेप और विस्तारपूर्वक कथन किया जाता है क्योंकि इसके बिना असमानता का प्रसंंग प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार व्यंतर देवों की गुणस्थान व्यवस्था मेें प्रमाण का प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र समाप्त हुए।

अब ज्योतिष्क देवों की संख्या बतलाने हेतु सूत्र का अवतरण होता है-

सूत्रार्थ-

सामान्यरूप से देवगति में जितने भंग हैं, उतनी ही संख्या ज्योतिषी देवों की है।।६५।।

हिन्दी टीका-देवगति प्रतिपन्न सामान्य देवों की जितनी संख्या कही है, ज्योतिष्क देव उतने ही प्रमाण हैं।

ज्योतिष्कदेवों में चारों गुणस्थानों की प्रमाण प्ररूपणा सामान्य देवोें के गुणस्थानों के समान है। ऐसा निर्देश द्रव्यार्थिकनय के आधार से किया है किन्तु पर्यायार्थिकनय के अवलम्बन से कथन करने पर उसमें जो विशेषता है, वह इस प्रकार है-

वाणव्यंतर आदि शेष सम्पूर्ण देव ज्योतिषी देवों के संख्यातवें भाग हैं।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में ज्योतिषी देवों की संख्या निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

संप्रति कल्पवासिदेवसंख्यानिरूपणाय सूत्रमवतरति-

सोहम्मीसाणकप्पवासियदेवेसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।६६।।

सूत्रस्यार्थ: सुगमो वर्तते।
कालापेक्षया तेषामेव प्रमाणनिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।६७।।
अस्यापि अर्थ: सुगम: वर्तते।
कश्चिदाह-‘‘सर्वत्र सूक्ष्म-सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतमभेदेन त्रिविधा प्ररूपणा किमर्थं प्ररूप्यते?
तस्योत्तरं दीयते-नैष दोष:, तीव्र-मंद-मध्यमबुद्धिसत्त्वानुग्रहार्थत्वात्। अन्यथा जिनानां सर्वसत्त्वसमानत्व विरोधो भवेत्। न पुनरुक्तदोषोऽपि जिनवचने संभवति, मंदबुद्धिसत्त्वानुग्रहार्थता एतस्य साफल्यात्[४]।’’
क्षेत्रापेक्षया एषामेव देवानां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
खेत्तेण असंखेज्जाओ सेढीओ पदरस्स असंखेज्जदिभागो। तासिं सेढीणं विक्खंभसूई अंगुल-विदियवग्गमूलं तदियवग्गमूलगुणिदेण।।६८।।
क्षेत्रापेक्षया सौधर्मैशानकल्पवासिदेवा: मिथ्यादृष्टय: असंख्यातजगत्श्रेणिप्रमाणा: सन्ति। तदसंख्यात-जगच्छ्रेणीनां प्रमाणं जगत्प्रतरस्यासंख्यातभागं। तासां असंख्यातजगच्छ्रेणीनां विष्कंभसूची, सूच्यंगुलस्य द्वितीयवर्गमूलं तृतीयवर्गमूलेन गुणिते सति यावल्लब्धा भवेत् तावत्प्रमाणा एव।
एषामेव देवानां सासादनादिगुणस्थानेषु प्रमाणनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्माइट्ठि-सम्मामिच्छाइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठी ओघं।।६९।।
सौधर्मैशानस्वर्गदेवा: सासादनादय: गुणस्थानवत् प्रमाणै: सन्ति। एतत्कथनमपि द्रव्यार्थिकनयापेक्षया एव। पर्यायार्थिकनयापेक्षया अग्रे निरूपयिष्यन्ते।
अधुना तृतीयस्वर्गात् द्वादशस्वर्गपर्यंतदेवानां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
सणक्कुमारप्पहुडि जाव सदार-सहस्सारकप्पवासियदेवेसु जहा सत्तमाए पुढवीए णेरइयाणं भंगो।।७०।।
यथा सप्तम्यां पृथिव्यां नारकाणां प्ररूपणा कथिता तथैव सनत्कुमारादारभ्य शतारसहस्रारपर्यंत-कल्पवासिदेवेषु मिथ्यादृष्टिदेवानां प्ररूपणास्ति। सामान्यकथनमेतत्, अग्रे आचार्यपरंपरागतोपदेशेन विशेषप्ररूपणा क्रियते।
सानत्कुमारमाहेन्द्रस्वर्गयो: जगच्छ्रेण्या: भागहारो जगच्छ्रेण्या: अध: एकादशवर्गमूलं। ब्रह्मब्रह्मोत्तर-स्वर्गयो: जगच्छ्रेण्या: भागहारो जगच्छ्रेण्या: नवमवर्गमूलं। लांतवकापिष्ठयो: सप्तमवर्गमूलं। शुक्रमहाशुक्रयो: पंचमवर्गमूलं। शतारसहस्रारकल्पयो: चतुर्थवर्गमूलं भागहारो भवति। सासादनादीनां प्रमाणप्ररूपणापि सप्तमपृथिव्या: प्ररूपणया समाना। विशेषप्ररूपणा पुरत: कथयिष्यते।

अब कल्पवासी देवों की संख्या का कथन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सौधर्म और ऐशान कल्पवासी देवों में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।६६।।

सूत्र का अर्थ सरल है, इसलिए यहाँ विस्तृत कथन नहीं किया जा रहा है।

अब काल की अपेक्षा उन्हीं देवों का प्रमाण निरूपित करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा सौधर्म और ऐशान कल्पवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।६७।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अर्थ भी सुगम है। यहाँ कोई श्ांका करता है-

सर्वत्र सूक्ष्म,सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम के भेद से तीन प्रकार की प्ररूपणा क्यों बताई जा रही हैं ?

इसका उत्तर देते हैं-

यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि तीव्र बुद्धि वाले, मंदबुद्धि वाले और मध्यमबुद्धि वाले प्राणियों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से तीन प्रकार की प्ररूपणा कही हैं । अन्यथा-ऐसा न मानने पर ‘‘जिनेन्द्रदेव सभी जीवों में समान परिणामी होते हैं’’ इस कथन में विरोध आ जाएगा। जिनेन्द्र भगवान के वचनों मेें पुनरुक्त दोष भी संभव नहीं है, क्योेंकि मन्दबुद्धि वाले शिष्यों का अनुग्रह करने हेतु पुनः पुनः कथन करने की सफलता आवश्यक होती है।

अब क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं देवों की संख्या बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा सौधर्म और ऐशान कल्पवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण हैं जो असंख्यात जगत्श्रेणियों का प्रमाण जगत्प्रतर के असंख्यातवें भाग है। इन असंख्यात जगत्श्रेणियों की विष्कंभसूची, सूच्यंगुल के द्वितीय वर्गमूल को तृतीय वर्गमूल से गुणा करने पर जितना लब्ध आवे, उतनी है ।।६८।।'

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के कल्पवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण हैं। उन असंख्यात जगत्श्रेणियों का प्रमाण जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागमात्र है। उन असंख्यात जगत्श्रेणियों की विष्कंभसूची,सूच्यंगुल के द्वितीय वर्गमूल को तृतीय वर्गमूल से गुणा करने पर जितनी संख्या की उपलब्धि होती है, उतनी संख्या ही सौधर्म-ईशान स्वर्ग के कल्पवासी मिथ्यादृष्टि जीवों की संख्या मानी गई है।

अब इन्हीं कल्पवासी देवों का सासादन आदि गुणस्थानों में प्रमाण निरूपित करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि,सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि सौधर्म-ऐशान कल्पवासी देव सामान्य प्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं ।।६९।।

हिन्दी टीका-सौधर्म-ऐशान स्वर्ग के देव सासादन आदि गुणस्थानोें के समान प्रमाण वाले होते हैं। यह कथन भी द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा ही है। पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा उनका निरूपण आगे करेंगे।

अब तृतीय स्वर्ग से लेकर बारहवें स्वर्ग तक उत्पन्न होने वाले देवों की संख्या का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

जिस प्रकार सातवीं पृथिवी में नारकियों की प्ररूपणा कही गई है, उसी प्रकार सनत्कुमार से लेकर शतार और सहस्रार स्वर्ग तक कल्पवासी देवों में उसी मिथ्यादृष्टि देवों की प्ररूपणा है ।।७०।।

हिन्दी टीका-जिस प्रकार सातवीं नरकपृथिवी में नारकियों की प्ररूपणा कही गई है उसी प्रकार सानत्कुमार स्वर्ग से प्रारंभ करके सहस्रारस्वर्गपर्यन्त कल्पवासी देवों में मिथ्यादृष्टि देवों की प्ररूपणा है। सामान्य कथन यह है, पुनःआचार्य परम्परा से आगत उपदेश के द्वारा विशेष प्ररूपणा आगे कहेंगे।

सानत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्ग में जगत्श्रेणी का भागहार जगत्श्रेणी के नीचे ग्यारहवाँ वर्गमूल है। ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्ग में जगत्श्रेणी का भागहार जगत्श्रेणी का नवमाँ वर्गमूल है। लांतव और कापिष्ठ कल्प में जगत्श्रेणी का भागहार जगत्श्रेणी का सातवां वर्गमूल है। शुक्र और महाशुक्र कल्प में जगत्श्रेणी का भागहार जगत्श्रेणी का पाँचवां वर्गमूल है। शतार और सहस्रार कल्प में जगत्श्रेणी का भागहार जगत्श्रेणी का चौथा वर्गमूल है। सानत्कुमार से लेकर सहस्रार पर्यन्त दश स्वर्गों तक सासादन सम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानवर्ती देवों के प्रमाण की प्ररूपणा भी सातवीं नरकपृथिवी के सासादनसम्यग्दृष्टि आदि जीवों के प्रमाण की प्ररूपणा के समान है। विशेष प्ररूपणा का कथन आगे करेंगे।

संप्रति आनतादिस्वर्गनिवासिकल्पवासिदेवेषु नवग्रैवेयकविमानवासिकल्पातीतदेवेषु च मिथ्यादृष्टयादि सम्यग्दृष्टिपर्यंतानां प्रमाणप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-

आणद-पाणद जाव णवगेवेज्जविमाणवासियदेवेसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि दव्वपमाणेण केवडिया? पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो। एदेहि पलिदोवममवहिरदि अंतोमुहुत्तेण।।७१।।

आनतप्राणतारणाच्युतदेवेभ्य आरभ्य नवग्रैवेयकविमानवासिदेवेषु मिथ्यादृष्ट्यादिअसंयतसम्यग्दृष्टिपर्यंता: देवा: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? पल्योपमस्यासंख्यातभागा: एतैरूपर्युक्तजीवराशिभि: अंतर्मुहूर्तेन पल्योपम: अपहृतो भवति।
संप्रति अनुदिशविमानादारभ्य अपराजितपर्यंतेषु सम्यग्दृष्टीनां प्रमाणप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-
अणुद्दिस जाव अवराइदविमाणवासियदेवेसु असंजदसम्माइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो। एदेहि पलिदोवममवहिरदि अंतोमुहुत्तेण।।७२।।
अनुदिशविमानादारभ्य अपराजितविमानवासिदेवेषु असंयतसम्यग्दृष्टिदेवा: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने सति पल्योपमस्य असंख्यातभाग:। एतैरुपर्युक्तजीवराशिभि: अंतर्मुहूर्तेन पल्योपम: अपहृतो भवति। नव अनुदिशविमानेषु विजयवैजयंतजयंतापराजितविमानेषु च सर्वे देवा: सम्यग्दृष्टय एव भवन्ति।
सर्वार्थसिद्धिविमानवासिदेवानां संख्यानिरूपणाय सूत्रावतार: क्रियते-
सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा दव्वपमाणेण केवडिया? संखेज्जा।।७३।।
सर्वार्थसिद्धिविमानवासिदेवा: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने सति संख्याता: इति उच्यन्ते। इमे मनुष्यिनीराशिभ्य: त्रिगुणा: सन्ति।
अधुना भागाभागं ब्रवीति-
सर्वदेवराशे: संख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: ज्योतिष्कदेवमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: वानव्यन्तरमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा: भवनवासिमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते बहुभागा: सौधर्मैशानमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। एवमेव सानत्कुमारादारभ्य शतारसहस्रारकल्पवासिदेवपर्यंतमिथ्यादृष्टयो ज्ञातव्या: भवन्ति। पुनश्च शतारसहस्रारमिथ्यादृष्टिप्रमाणस्यानंतरं य: एकभाग: शेष: अस्ति, तस्यैकभागस्य असंख्यातखण्डे कृते बहुभागा: सौधर्मैशान असंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: सम्यग्मिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते बहुभागा: सासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। एवं सनत्कुमारमाहेन्द्रस्वर्गात् आरभ्य सहस्रारस्वर्गपर्यंतं ज्ञातव्यं भवति।
तत: सहस्रारस्वर्गात् अग्रे ज्योतिष्क-वाणव्यंतर-भवनवासिदेवपर्यंतं एवमेव क्रम: ज्ञातव्य:।
पुन: भवनवासिसासादनसम्यग्दृष्टिप्रमाणस्यानंतरं य एक भाग: शेषोऽस्ति, तस्य शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा: आनत-प्राणत असंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुखण्डा: आरणाच्युतासंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। एवं नेतव्यं यावदुपरिमोपरिमग्रैवेयक इति।
उपरिमोपरिमग्रैवेयकासंयतसम्यग्दृष्टिप्रमाणस्यानंतरं य एकभाग: शेषोऽस्ति, तस्य संख्यातखण्डे कृते तत्र बहुभागा: आनत-प्राणत मिथ्यादृष्टयो भवंति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: आरणाच्युतमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। एवं नेतव्यं यावदुपरिमोपरिमग्रैवेयक इति। अस्योपरिमोपरिमग्रैवेयकमिथ्यादृष्टिप्रमाणस्यानंतरं य एकभाग: शेष: तस्यैकभागस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: अनुदिशासंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते बहुभागा: विजय-वैजयंतजयंतापराजितसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: आनतप्राणतसम्यग्मिथ्या-दृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: आरणाच्युत-सम्यग्मिथ्यादृष्टयो भवन्ति। एवं नेतव्यं यावदुपरिमोपरिमग्रैवेयक इति।
उपरिमोपरिमग्रैवेयकसम्यग्मिथ्यादृष्टिप्रमाणस्यानंतरं य एकभाग: शेष: तस्यैकभागस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: आनतप्राणत सासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातखण्डे कृते बहुभागा: आरणाच्युतसासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। एवं नेतव्यं यावदुपरिममध्यमग्रैवेयकसासादनसम्यग्दृष्टि: इति। एवं उपरिममध्यमग्रैवेयकसासादनसम्यग्दृष्टिप्रमाणस्यानंतरं य एकभाग: शेषस्तस्यैकभागस्य असंख्यातखण्डे कृते तत्र बहुभागा: उपरिमोपरिमग्रैवेयकसासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति।
शेष एकखण्डप्रमाणा: सर्वार्थसिद्धिअसंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। एवं भागाभागं समाप्तम्[५]
एवं सौधर्मादिसर्वार्थसिद्धिपर्यंतदेवानां प्रमाणनिरूपणपरत्वेन अष्टौ सूत्राणि गतानि।
एवं पंचभि: स्थलै: एकविंशतिसूत्रै: देवगतिप्रमाणप्ररूपको नाम चतुर्थोऽन्तराधिकार: समाप्त:।

अब आनत आदि स्वर्गों के निवासी कल्पवासी देवों में एवं नवग्रैवेयक विमानों में रहने वाले कल्पातीत देवों में मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक देवों की प्रमाण प्ररूपणा के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

आनत और प्राणत से लेकर नवगै्रवेयक तक विमानवासी देवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान मेें जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं। इन उपर्युक्त जीवराशियों के द्वारा अन्तर्मुहूर्त से पल्योपम अपहृत होता है ।।७१।।

हिन्दी टीका-आनत-प्राणत,आरण-अच्युत स्वर्ग के देवों से आरंभ करके नवग्रैवेयक विमानवासी देवों में मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टिपर्यन्त चारों गुणस्थानवर्ती देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने होते हैं? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर प्राप्त होता है कि उनकी संख्या पल्योपम के असंख्यातवें भाग है। इन उपर्युक्त जीवराशियों से अन्तर्मुहूर्त के द्वारा पल्योपम अपहृत होता है।

विशेषार्थ-

धवला टीका में श्रीवीरसेनाचार्य ने कहा है कि ‘‘अन्तर्मुहूर्त’’ शब्द कालवाचक है इसलिए सूत्र में ‘काल’ शब्द का अलग से ग्रहण नहीं किया है। प्रकृत में द्रव्यप्रमाण के प्ररूपण करने से ही अर्थ का निश्चय हो जाता है, इसलिए यहाँ पर क्षेत्रप्रमाण और कालप्रमाण के द्वारा प्ररूपणा नहीं की है। ‘‘पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं’’ इस प्रकार सामान्य से कहने पर द्रव्यप्रमाण के विषय में अच्छी तरह निश्चय नहीं हो पाता है, इसलिए इस विषय में निश्चय को उत्पन्न करने के लिए ‘‘इन जीवराशियों के द्वारा पल्योपम से अपहृत होता है’’ इस प्रकार भागहार प्ररूपणा और विभज्यमान राशि की प्ररूपणा की है। इस विषय मेें आचार्यों के उपदेश का आश्रय लेकर विशेष व्याख्यान आगे कहेंगे ।

अब अनुदिश विमान से प्रारंभ करके अपराजित विमानपर्यन्त देवों में सम्यग्दृष्टि देवों की प्रमाण प्ररूपणा बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अनुदिश विमान से लेकर अपराजित विमान तक उनमें रहने वाले असंयतसम्यग्दृष्टि देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं। इन उपर्युक्त जीवराशियों के द्वारा अन्तर्मुहूर्त से पल्योपम अपहृत होता है ।। ७२ ।।

हिन्दी टीका-नव अनुदिश विमानों से प्रारंभ करके पंच अनुत्तर में से चतुर्थ अपराजित विमान तक विमानवासी देवों में असंयत सम्यग्दृष्टि देवों की संख्या द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितनी है ? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर प्राप्त होता है कि पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण उनकी संख्या है। इन उपर्युक्त जीवराशियों के द्वारा अन्तर्मुहूर्त से पल्योपम अपहृत होता है। नव अनुदिश विमानोें में तथा विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित विमानों मेें रहने वाले सभी देव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं।

अब सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों की संख्या निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? संख्यात हैं।।७३।।

हिन्दी टीका-सर्वार्थसिद्धि विमान में निवास करने वाले देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर वे संख्यात हैं ऐसा उत्तर मिलता है। ये मनुष्यिनियोें की राशि से तीन गुनी अधिक है।

अब भागाभाग के बारे मेें बताते हैं-

सर्व देवराशि के संख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण ज्योतिषी मिथ्यादृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभाग वाणव्यंतर मिथ्यादृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण सौधर्म और ऐशान कल्प के मिथ्यादृष्टि देव हैं। इसी प्रकार शतार और सहस्रर कल्प के मिथ्यादृष्टि देवों तक ले जाना चाहिए। शतार और सहस्रार के मिथ्यादृष्टि प्रमाण के अनन्तर जो एक भाग शेष रहे, उसके असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण सौधर्म और ऐशान कल्प के असंयतसम्यग्दृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के संख्यात करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण वहीं के सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव हैं।

शेष एक भाग के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण वहीं के सासादनसम्यग्दृष्टि देव है। इसी प्रकार सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प से लेकर सहस्रार कल्प तक ले जाना चाहिए। सहस्रार कल्प से आगे ज्योतिषी, वाणव्यंतर और भवनवासी देवों तक यही क्रम ले जाना चाहिए पुनः भवनवासी सासादनसम्यग्दृष्टियों के प्रमाण के अनन्तर जो एक भाग शेष रहे, उसके संख्यात खंड करने पर बहुभागप्रमाण आनत और प्राणत के असंयतसम्यग्दृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण आरण और अच्युत के असंयतसम्यग्दृष्टि देव हैं। इसी प्रकार उपरिम-उपरिम (अंतिम)गै्रवेयक तक ले जाना चाहिए।

उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक असंयतसम्यग्दृष्टियों के प्रमाण आने के अनन्तर जो एक भाग शेष रहे, उसके संख्यात खंड करने पर बहुभागप्रमाण आनत और प्राणत के मिथ्यादृष्टि देव हैं । शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभाग आरण और अच्युत के मिथ्यादृष्टि देव हैं। इसी प्रकार उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक तक ले जाना चाहिए। इन उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक के मिथ्यादृष्टि प्रमाण के अनन्तर जो एक भाग शेष रहे, उसके संख्यात खंड करने पर बहुभाग अनुदिश के असंख्यात सम्यग्दृष्टि होते हैं। शेष के असंख्यात खंड करने पर बहुभाग विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित इन चार अनुत्तर विमानों के असंयतसम्यग्दृष्टि देव हैं। शेष के संख्यात खंड करने पर बहुभागप्रमाण आनत और प्राणत के सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के संख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण आरण और अच्युत के सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव हैं। इसी प्रकार उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक तक ले जाना चाहिए। उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक के सम्यग्मिथ्यादृष्टियों के प्रमाण के अनन्तर जो एक भाग शेष रहे, उसके संख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण आनत और प्राणत के सासादनसम्यग्दृष्टि देव हैं। शेष एक भाग के संख्यात करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण आरण और अच्युत सासादन सम्यग्दृष्टि देव हैं। इसी प्रकार उपरिम-मध्यम ग्रैवेयक के सासादनसम्यग्दृष्टियों के प्रमाण आने तक ले जाना चाहिए। उपरिम-मध्यम ग्रैवेयक के सासादनसम्यग्दृष्टि प्रमाण के अनन्तर जो एक भाग शेष रहे, उसके असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक के सासादनसम्यग्दृष्टि देव हैं। शेष एक खंडप्रमाण सर्वार्थसिद्धि के असंयतसम्यग्दृष्टि देव हैं। इस प्रकार भागाभाग समाप्त हुआ। इस प्रकार सौधर्म स्वर्ग से लेकर सर्वार्थसिद्धिपर्यन्त विमानों में रहने वाले देवों के प्रमाण के निरूपण की मुख्यता वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार पाँच स्थलों में इक्कीस सूत्रों के द्वारा देवगति का प्रमाण प्ररूपण करने वाला देवगतिप्रमाणप्ररूपक नाम का चतुर्थ अन्तराधिकार समाप्त हुआ।

टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. २६८।
  2. सर्वार्थसिद्धि अ. १, सूत्र ८।
  3. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. २७४।
  4. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. २७६।
  5. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. २८६-२८७।