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०६-कषायमार्गणाधिकार

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कषायमार्गणाधिकार

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन पंचभि: सूत्रै: कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले अकषायिनामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘कसाया-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु द्वितीयस्थले क्रोधादिचतुर्विध-कषायसहितानामल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘माण-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयमिति पातनिका भवति।
इदानीमकषायिजीवानामल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
कसायाणुवादेण सव्वत्थोवा अकसाई।।१४५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका- सर्वस्तोका: अकषायिनो जीवा:, उपशान्तकषायादारभ्य आ सिद्धपरमेष्ठिन:। चतुर्गतिजीवा: एकेन्द्रियजीवाश्च चतुर्विधकषायसहिता एव अत एभ्यस्तेऽल्पा इति ज्ञातव्यं भवति।
एवं प्रथमस्थले कषायविरहितानामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतं।
संप्रति कषायसहितानामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
माणकसाई अणंतगुणा।।१४६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकारेऽत्र, सर्वजीवानां प्रथमवर्गमूलादनन्तगुणोऽस्ति।
कोधकसाई विसेसाहिया।।१४७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मानकषायिनां जीवानां असंख्यातभागोऽपि अनन्तप्रमाणमेव।
मायकसाई विसेसाहिया।।१४८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्रापि विशेषप्रमाणं क्रोधकषायिभ्योऽसंख्यातभागोऽपि अनन्तमेव।
लोभकसाई विसेसाहिया।।१४९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पूर्ववत् विशेषप्रमाणं ज्ञातव्यं। मानादिकषायापेक्षया लोभकषायसहिता: विशेषाधिका:, दशमगुणस्थानपर्यन्तमस्यास्तित्वात्।
एवं द्वितीयस्थले मानादिकषायसहितानामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडेऽल्पबहुत्वानुगमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम- षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।


अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में पाँच सूत्रों के द्वारा कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में अकषायी जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाला ‘‘कसाया’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: द्वितीय स्थल में क्रोधादि चारों प्रकार की कषाय से सहित जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘माण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब यहाँ अकषायी जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु एक सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुसार कषायरहित जीव सबसे कम हैं।।१४५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सबसे कम अकषायी जीव उपशान्तकषाय नामक ग्यारहवें गुणस्थान से लेकर गुणस्थानातीत सिद्ध परमेष्ठी भगवान हैं। चारों गतियों में रहने वाले और एकेन्द्रिय जीव चारों प्रकार की कषाय से सहित ही रहते हैं अत: इन सभी से वे अकषायी अल्प होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कषायरहित जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब कषायसहित जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायरहित जीवों से मानकषायी जीव अनन्तगुणे हैं।।१४६।।

टीका-यहाँ गुणकार सभी जीवों के प्रथम वर्गमूल से अनन्तगुणा है।

मानकषाइयों से क्रोधकषायी जीव विशेष अधिक हैं।।१४७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मानकषाय वाले जीवों का असंख्यात भाग भी अनन्तप्रमाण ही है।

क्रोधकषायियों से मायाकषायी जीव विशेष अधिक हैं।।१४८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ भी विशेष प्रमाण क्रोधकषायी जीवों से असंख्यातभाग भी अनन्त-प्रमाण है।

मायाकषायियों से लोभकषायी विशेष अधिक हैं।।१४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विशेष प्रमाण पूर्ववत् जानना चाहिए। मान आदि कषाय की अपेक्षा लोभकषाय सहित जीव विशेष अधिक हैं, क्योंकि दशवें गुणस्थान तक उनका अस्तित्व पाया जाता है।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में मान आदि कषाय से सहित जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में अल्पबहुत्वानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।