Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०६.कषायमार्गणा अधिकार

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


कषायमार्गणा अधिकार

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन सूत्रषट्केन कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले चतुर्विधकषाय-सहितानां संख्यानिरूपणत्वेन ‘‘कसाया-’’ सूत्रचतुष्टयं गतं। तदनु द्वितीयस्थले कषायरहितानां द्रव्यप्रमाण-प्रतिपादनत्वेन ‘‘अकसाई-’’ इत्यादिसूत्रद्वयमिति पातनिका सूचिता भवति।
अधुना चतुर्विधकषायसहितानां द्रव्यप्रमाणनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई दव्वपमाणेण केवडिया ?।।११२।।
अणंता।।११३।।
अणंताणंताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण।।११४।।
खेत्तेण अणंताणंता लोगा।।११५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र कषायसहितानां जीवानां संख्या मध्यमानंतानंताः ज्ञातव्याः। एकेन्द्रियप्रभृति-सर्वजीवानां विवक्षितत्वात्।
एवं प्रथमस्थले चतुर्विधकषाययुक्तानां संख्यानिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
संप्रति कषायरहितानां द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
अकसाई दव्वपमाणेण केवडिया ?।।११६।।
अणंता।।११७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अनंतस्य नवभेदाः सन्ति।
कश्चिदाह-नवविधेषु अनंतेषु कस्मिन् भेदे अकषायराशिर्भवति ?
तत्रोत्तरं दीयते-अजघन्यानुत्कृष्टानंतानंते भवति।
कुतः ?
कथ्यते-‘‘जम्हि जम्हि अण्तयं मग्गिज्जदि तम्हि तम्हि अजहण्णाणुक्कस्समणंताणंतयं घेत्तव्वं इदि परियम्मवयणादो ।’’
एवं द्वितीयस्थले कषायरहितानां छद्मस्थादिजीवानां सिद्धानां च द्रव्यप्रमाणनिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे गते।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे द्रव्यप्रमाणानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकारः समाप्तः।


अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में छह सूत्रों के द्वारा कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में चार प्रकार की कषाय से सहित जीवों की संख्या का निरूपण करने हेतु ‘‘कसाया’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में कषायरहित जीवों का द्रव्यप्रमाण प्रतिपादित करने वाले ‘‘अकसाई’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब चारों प्रकार की कषाय से सहित जीवों का द्रव्यप्रमाण निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।११२।।

उक्त चारों कषाय वाले जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा अनन्त हैं।।११३।।

उक्त चारों कषाय वाले जीव काल की अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों से अपहृत नहीं होते हैं।। ११४।।

उक्त चारों कषाय वाले जीव क्षेत्र की अपेक्षा अनन्तानन्त लोकप्रमाण हैं।।११५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ कषायसहित जीवों की संख्या मध्यम अनन्तानन्त जानना चाहिए, क्योंकि इसमें एकेन्द्रिय से लेकर सभी जीवों की विवक्षा है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में चारों प्रकार की कषाय से युक्त जीवों की संख्या निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब कषायरहित जीवों का द्रव्यप्रमाण बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायरहित जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।११६।।

उक्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा अनन्त हैं।।११७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अनन्त के नौ भेद होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है-नौ प्रकार के अनन्तों में किस अनन्त में कषायरहित जीवराशि ली गई है?

इसका समाधान देते हैं-अजघन्यानुत्कृष्ट अनन्तानन्त में कषायरहित जीवराशि पाई जाती है।

प्रश्न-क्यों ?

उत्तर-क्योंकि जहाँ-जहाँ अनन्त की खोज करनी हो, वहाँ-वहाँ अजघन्यानुत्कृष्ट अनन्तानन्त को ग्रहण करना चाहिए, यह परिकर्म सूत्र का वचन है।

इस तरह से द्वितीय स्थल में कषायरहित, छद्मस्थादि जीवों का एवं सिद्धों का द्रव्यप्रमाण बताने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में द्रव्यप्रमाणानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।