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०६.कषाय मार्गणा अधिकार

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कषाय मार्गणा अधिकार

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ द्वाभ्यां स्थलाभ्यां सूत्रद्वयेन क्षेत्रानुगमे कषायमार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले कषायसहितानां जीवानां क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘कसाया’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु द्वितीयस्थले कषायरहितानां महामुनीनां क्षेत्रकथ-नत्वेन ‘‘अकसाई’’ इत्यादिसूत्रमेकमिति पातनिका भवति।
अधुना कषायसहितानां जीवानां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रमवतार्यते-
कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई णवुंसयवेदभंगो।।७८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादपदैः सर्वलोकावस्थानं चतुर्विध-कषायसहितानां जीवानां, वैक्रियिकाहारपदाभ्यां त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः। विशेषेण-अत्र तैजसाहारपदे स्तः, नपुंसकवेदे न स्तः अप्रशस्तत्वात्।
एवं प्रथमस्थले क्रोधादिकषायसहितानां क्षेत्रनरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतम् ।
संप्रति कषायरहितानां जीवानां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रमवतार्यते-
अकसाई अवगदवेदभंगो।।७९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूक्ष्मकषायगुणस्थानादुपरि उपशान्तकषाय-क्षीणकषाय-सयोगिकेवलि-अयोगिकेवलिनां क्षेत्रं वेदरहितानां महामुनीनां क्षेत्रवत् ज्ञातव्यं।
तात्पर्यमेतत्-क्रोधं क्षमया जेतव्यं, मानं मार्दवगुणेन, मायां सरलमनोवाक्काययोगेन आर्जवेन, लोभंं च निर्लोभपरिणामेन शौचधर्मेण परिहृत्य अनादिनिधनदशलक्षणपर्वणि यद्भावितं निकटातीत-काले तदेव पुनः पुनः भावयितव्यंं। उत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तपस्त्या-गाकिंचन्यब्रह्मचर्यनामान इमे दशधर्माः युगादिब्रह्मणा श्रीऋषभदेवभगवता प्रथमतीर्थकरेण युगादौ प्रतिपादिताः ततः प्रभृति द्वितीयतीर्थकराजितनाथादिवर्धमानपर्यन्तजिनेन्द्रदेवैः निरूपिताश्च अद्य प्रभृति वर्तन्ते इमे धर्माः, तान् सर्वान् सदा वंदामहे । तथा च-
धर्मः सर्वसुखाकरो हितकरो, धर्मं बुधाश्चिन्वते।
धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं, धर्माय तस्मै नमः।।
धर्मान्नास्त्यपर: सुहृद् भवभृतां, धर्मस्य मूलं दया।
धर्मे चित्तमहं दधे प्रतिदिनं, हे धर्म! मां पालय।।७।।
एवं द्वितीयस्थले कषायविरहितानां क्षेत्रकथनत्वेन सूत्रमेकं गतम् ।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे क्षेत्रानुगमनाम षष्ठे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम- षष्ठोऽधिकारः समाप्तः ।

अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में दो सूत्रों के द्वारा क्षेत्रानुगम में कषायमार्गणा अधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों का क्षेत्रनिरूपण करने हेतु ‘‘कसाया’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: द्वितीय स्थल में कषायरहित महामुनियों का क्षेत्र कथन करने वाला ‘‘अकसाई’ इत्यादि एक सूत्र है। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब कषायसहित जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित किया जाता है-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणानुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीवों का क्षेत्र नपुंसकवेदियों के समान है।।७८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त चारों कषाय वाले जीव स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद पदों की अपेक्षा सर्वलोक में अवस्थान से तथा वैक्रियिक और आहारकसमुद्घात की अपेक्षा तीन लोकों के असंख्यातवें व तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग से एवं ढाईद्वीप की अपेक्षा संख्यातगुणे हैं। विशेषता यह है कि यहाँ तैजस और आहारक समुद्घातपद हैं, किन्तु अप्रशस्त होने से नपुंसकवेदियों में ये नहीं होते हैं।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में क्रोधादिककषायसहित जीवों का क्षेत्र निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब कषायरहित जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेुत सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अकषायी जीवों का क्षेत्र अपगतवेदियों के समान है।।७९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूक्ष्मकषाय नामक दशवें गुणस्थान से ऊपर उपशांत कषाय-क्षीणकषाय-सयोगकेवली और अयोगकेवली भगवन्तों का क्षेत्र वेद हित महामुनियों के क्षेत्र के समान जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि-क्रोध कषाय को क्षमा से जीतना चाहिए, मानकषाय को मार्दवगुण से, माया कषाय को सरल मन-वचन-काय योगरूप आर्जव गुण से तथा लोभ कषाय को निर्लोभ परिणामरूप शौच धर्म से जीत करके अनादिनिधिन दशलक्षण पर्व में जिन दशधर्मों की भावना भाई जाती है, उनकी ही पुन: पुन: भावना करना चाहिए।

उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्यरूप ये दश धर्म हैं, इन्हें युग की आदि में युगादिब्रह्मा, श्री ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर भगवान ने प्रतिपादित किया था। तब से लेकर द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ से वर्धमानपर्यन्त सभी जिनेन्द्र भगवन्तों के द्वारा ये निरूपित किये गये हैं और आज तक ये धर्म उसी प्रकार चल रहे हैं, उन सभी धर्मों को हम नमस्कार करते हैं। कहा भी है- श्लोकार्थ-जो धर्म सर्वसुखों की खान है, सर्वजन हितकारी है, उस धर्म को ज्ञानीजन धारण करते हैं। धर्म से ही मोक्षसुख की प्राप्ति होती है, उस धर्म के लिए मेरा नमस्कार है। इस संसार में प्राणियों के लिए धर्म के सिवाय दूसरा कोई मित्र नहीं है, जिस धर्म का मूल दया है, उस धर्म को मैं प्रतिदिन चित्त में धारण करता हूँ, हे धर्म! तुम मेरी रक्षा करो।।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में कषायरहित जीवों का क्षेत्रकथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्रीषट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में क्षेत्रानुगम नामके छठे महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।