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०६. द्वितीय महाधिकार- इन्द्रिय मार्गणाधिकार

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विषय सूची

द्वितीय महाधिकार - इन्द्रिय मार्गणाधिकार

अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

तत्र तावत् इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयाधिकारे स्थलत्रयेण त्रयोदशसूत्रै: व्याख्यानं क्रियते। तस्मिन्नपि प्रथमस्थले एकेन्द्रियाणां भेदप्रभेदेषु प्रमाणप्रतिपादनत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि त्रीणि सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले विकलत्रयजीवानां संख्याप्ररूपणत्वेन ‘‘वेइंदिय’’ इत्यादि त्रीणि सूत्राणि। तत: परं पञ्चेन्द्रियजीवभेदप्रभेदानां प्रमाणनिरूपणपरत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि सप्तसूत्राणि सन्ति।
संप्रति नवभेदसहितानां एकेन्द्रियाणां प्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रावतार: क्रियते श्रीभूतबलिभट्टारकेण-
इंदियाणुवादेण एइंदिया बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया? अणंता।।७४।।
सिद्धान्तचिंतामणि टीका-
इंदियाणुवादेण-इन्द्रियानुवादेन एइंदिया-सामान्यैकेन्द्रिया: जीवा:, बादरा-बादरैकेन्द्रिया: जीवा:, सुहुमा-सूक्ष्मैकेन्द्रिया: जीवा: इमे त्रयोऽपि पज्जत्ता अपज्जत्ता-पर्याप्ता: अपर्याप्ता: भवन्ति। एवं एकेन्द्रियाणां नवभेदा: जायन्ते। तद्यथा-सामान्यैकेन्द्रिया: सामान्यैकेन्द्रियपर्याप्ता: सामान्यैकेन्द्रियापर्याप्ता:। बादरैकेन्द्रिया: बादरैकेन्द्रियपर्याप्ता:बादरैकेन्द्रियापर्याप्ता:। सूक्ष्मैकेन्द्रिया: सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्ता: सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्ता: इति। इमे नवविधा जीवा:, दव्वपमाणेण केवडिया? द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने अणंता-अनन्ता: भवन्तीति।
सर्वत्र पृच्छापूर्वं परिमाणं किमर्थं उच्यते?
नैष दोष:, मंदबुद्धिशिष्यानुग्रहार्थत्वात्।
अधुना कालापेक्षया एषामेव जीवानां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
अणंताणंताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण।।७५।।
कालापेक्षया पूर्वोत्तैकेन्द्रिया: जीवा: अनंतानंताभ्यां अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभ्यां न अपहृता: भवन्ति।
अवसर्पिण्युत्सर्पिणीप्रमाणेन क्रियमाण: अतीतकाल: अनंतावसर्पिण्युत्सर्पिणीप्रमाणं भवति। तेन तादृशेनापि अतीतकालेन एते नव अपि राशयो न अपह्रियन्ते। एतेषां नवानां राशीनां आयापेक्षया व्ययोऽधिकोऽस्ति। तदेव स्पष्टयति-तत: पूर्वोक्तनवराशिभ्य: निर्गत्य त्रसेषूत्पद्य सम्यक्त्वं गृहीत्वा एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय-असंज्ञिपंचेन्द्रिय-नारक-तिर्यग्-भवनवासि-वाणव्यन्तर-ज्योतिष्क-स्त्री-नपुंसक-अश्व-गज-गंधर्व-अनीकादि संसारिजीवानां इमान् पर्यायान् विनाशयति पुन: एतेषु प्रवेशाभावात्। तत: एते नवापि राशय: व्ययरूपेण साधिका निश्चयेन भवन्ति[१]
एवं हि व्यये सत्यपि इमे राशय: व्युच्छेदं न प्राप्नुवन्ति सरागस्वरूपेण स्थितातीतकालत्वात्।
तेनातीतकालेन सर्वजीवानां व्युच्छेद: किन्न भवतीति चेत्?
नैतत्, अभव्यराशे: प्रतिपक्षभूतभव्यराशे: विच्छेदे मन्यमाने सति अभव्यत्वस्य सत्त्वनाशप्रसंंगात्।
संप्रति क्षेत्रापेक्षया तेषामेव प्रमाणप्ररूपणार्थं सूत्रमवतरति-
खेत्तेण अणंताणंता लोगा।।७६।।
क्षेत्रप्रमाणेन पूर्वोक्ता: नव एकेन्द्रियजीवराशय: अनंतानंतलोकप्रमाणा: सन्ति।
तत्रापि किञ्चित् प्रतिबोधनार्थं कथयन्ति-एकेन्द्रियपर्याप्ता: जीवा: संपूर्णजीवराशे: संख्याता: भागा:। एकेन्द्रियापर्याप्तानां प्रमाणं सर्वजीवराशे: संख्यातभागा:। बादरैकेन्द्रियाणां बादरैकेन्द्रियपर्याप्तानां बादरएकेन्द्रियापर्याप्तानां च जीवानां प्रमाणं संपूर्णजीवराशे: असंख्यातभागा:।
सूक्ष्मैकेन्द्रिया: सर्वजीवराशे: असंख्यातभागा:। सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्ता: सर्वजीवराशे: संख्यातभागा:। सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्ता: सर्वजीवराशे: संख्यातभागा: इति ज्ञातव्या भवन्ति।
एवं एकेन्द्रियजीवप्रमाणप्रतिपादनपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।

अब इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है।

अब इन्द्रिय मार्गणा नामक द्वितीय अधिकार में तीन स्थलों में तेरह सूत्रों के द्वारा व्याख्यान किया जा रहा है। उसमें भी प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय जीवों के भेद-प्रभेदों में प्रमाण कथन की मुख्यता वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं पुनः द्वितीय स्थल में विकलत्रय जीवों की संख्या प्ररूपण करने वाले ‘‘बेइंदिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं, उसके आगे पंचेन्द्रिय जीवों के भेद-प्रभेदों का प्रमाण निरूपण करने वाले ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि सात सूत्र हैं।

अब नौ भेद सहित एकेन्द्रिय जीवों का प्रमाण बतलाने हेतु श्रीभूतबली भट्टारक के द्वारा सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

इन्द्रिय मार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय, एकेन्द्रिय पर्याप्त, एकेन्द्रिय अपर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय,सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? अनन्त हैं ।।७४।।

हिन्दी टीका-इन्द्रिय मार्गणा के अनुवाद से सामान्य एकेन्द्रिय जीव,बादर एकेन्द्रिय जीव और सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव ये तीनों भी पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों प्रकार के होते हैं । इस प्रकार एकेन्द्रिय जीवोें के नौ भेद होते हैं। जो इस प्रकार हैं-

१. सामान्य एकेन्द्रिय जीव

२. सामान्य एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव

३. सामान्य एकेन्द्रिय अपर्याप्त

४. बादर एकेन्द्रिय

५. बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त

६. बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त

७. सूक्ष्म एकेन्द्रिय

८. सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त

९. सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त ।

ये सभी नौ प्रकार के एकेन्द्रिय जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर मिलता है कि वे अनन्त संख्यात प्रमाण हैं।

प्रश्न-सभी जगह पृच्छापूर्वक (प्रश्नपूर्वक) परिमाण क्यों कहा है?
उत्तर-इसमें कोई दोष वाली बात नहीं है, क्योेंकि मन्दबुद्धि शिष्यों के अनुग्रह के लिए ऐसा कहा गया है।

अब काल की अपेक्षा उन्हीं एकेन्द्रिय जीवों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

कालप्रमाण की अपेक्षा पूर्वोक्त एकेन्द्रिय जीव आदि नौ राशियाँ अनन्तानंत अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत नहीं होती हैं ।।७५।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि पूर्वाेक्त एकेन्द्रिय जीव कालप्रमाण की अपेक्षा अनंतानंत अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों से अपहृत नहीं होते हैं।

अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के प्रमाण से किया गया अतीतकाल अनंत अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी प्रमाण होता हैै। इस प्रकार के भी उस अतीतकाल के द्वारा ये नौ राशियाँ अपहृत नहीं होती हैं । इन नवों राशियों का आय की अपेक्षा व्यय अधिक है। इसी बात को स्पष्ट करते हैं-

उन पूर्वोक्त नौ राशियों में से निकलकर त्रस जीवों में उत्पन्न होकर सम्यक्त्व को ग्रहण करके जिन संसारी जीवों ने एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय, नारकी, तिर्यंच, भवनवासी, वाणव्यंतर, ज्योतिषी, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, घोड़ा, हाथी, गन्धर्व और अनीक आदि संसारी जीवोें की इन पर्यायों का नाश कर दिया है वे पुनः इन पर्यायोें में प्रवेश नहीं करते हैं । इसलिए ये सभी नौ राशियाँ निश्चित ही व्ययरूप से अधिक हैं।

इस प्रकार इन नौ राशियों के व्ययरूप से अधिक होने पर भी राशियाँ कभी भी व्युच्छेद को प्राप्त नहीं होती हैं, क्योेंकि पूर्वकाल से ही वे सरागस्वरूप से स्थित हैं।

प्रश्न-उस अतीत काल के द्वारा सम्पूर्ण जीवराशि का व्युच्छेद क्योंं नहीं होता है?
उत्तर-नहीं, क्योंकि अभव्यराशि की प्रतिपक्षभूत भव्यराशि का विच्छेद मान लेने पर अभव्यत्व की सत्ता के नाश का प्रसंग आ जाएगा।

अब क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं एकेन्द्रिय जीवों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र प्रगट होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्रप्रमाण की अपेक्षा पूर्वोक्त एकेन्द्रिय आदि नौ जीवराशियाँ अनन्तानन्त लोकप्रमाण हैं।।७६।।

हिन्दी टीका-क्षेत्रप्रमाण के द्वारा पूर्वोक्त नौ एकेन्द्रिय जीवराशियाँ अनन्तानन्त लोकप्रमाण हैं। वहाँ भी किंचित् प्रतिबोधन के लिए कहते हैं-एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव सम्पूर्ण जीवराशि के संख्यातवें भाग हैं। एकेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों का प्रमाण सम्पूर्ण जीवराशि के संख्यातवेंं भागप्रमाण है। बादर एकेन्द्रिय जीव, बादरएकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव और बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों का प्रमाण संपूर्ण जीवराशि के असंख्यातवें भागप्रमाण है ।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव सम्पूर्ण जीवराशि के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीव सम्पूर्ण जीवराशि के संख्यातवें भागप्रमाण हैं। सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों की संख्या सम्पूर्ण जीवराशि के संख्यातवें भागप्रमाण है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार एकेन्द्रिय जीवों की संख्या बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए ।

अधुना विकलत्रयाणां संख्याप्ररूपणार्थं सूत्रमवतरति-

वेइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिया तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।७७।।

द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियजीवा: तेषामेव पर्याप्ता: अपर्याप्ता: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने असंख्याता: इति ज्ञातव्या:।
अस्मिन् सूत्रे अपर्याप्तपदेन अपर्याप्तनामकर्मोदयेन सहिता: लब्ध्यपर्याप्ता जीवा: गृहीतव्या: तथैव पर्याप्तपदेन पर्याप्तनामकर्मोदयसहितेन सहिता: निवृत्त्यपर्याप्ता जीवा अपि गृहीतव्या:। अत्रासंख्यातपदेन असंख्यातासंख्याता: ज्ञातव्या:।
संप्रति एषामेव विकलत्रयाणां संख्यां कालापेक्षया निरूपयत्सूत्रं अवतरति-
असंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।७८।।
एतस्य सूत्रस्यार्थ: सुगमोऽस्ति।
क्षेत्रापेक्षयापि एषां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
खेत्तेण वेइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिय तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्तेहि पदरमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदि-भागवग्गपडिभाएण अंगुलस्स संखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण अंगुलस्स संखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण।।७९।।
क्षेत्रापेक्षया एभिर्विकलत्रयजीवै: सूच्यंगुलस्य असंख्यातभागवर्गरूपप्रतिभागेन जगत्प्रतरं अपह्रियते। तैरेव पर्याप्तजीवै: सूच्यंगुलस्य संख्यातभागस्य वर्गरूपप्रतिभागेन तथैव तैरेवापर्याप्तजीवै: सूच्यंगुलस्य असंख्यातभागस्य वर्गरूपप्रतिभागेन च जगत्प्रतरं अपह्रियते।
एवं विकलत्रयजीवानां प्रमाणनिरूपकत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति पञ्चेन्द्रियाणां संख्यानिरूपणाय सूत्रस्यावतारो भवति-
पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।८०।।
अत्र असंख्यातपदेन असंख्यातासंख्याता: ज्ञातव्या:। शेषं सुगमं।
कालेन एषां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।८१।।
सूत्रस्यार्थ: सुगम:।
क्षेत्रेण एषामेव प्रमाणनिरूपणाय सूत्रस्यावतारो भवति-
खेत्तेण पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु मिच्छाइट्ठीहि पदरमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदि भागवग्गपडिभाएण अंगुलस्स संखेज्जदिभाग-वग्गपडिभाएण।।८२।।
एतस्य सूत्रस्यापि अर्थ: सुगमो वर्तते।

अब विकलत्रय जीवों की संख्या को प्ररूपित करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीव तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।७७।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र में विकलत्रय जीवोें के लिए बताया है कि दो इन्द्रिय वाले, तीन इन्द्रिय वाले एवं चार इन्द्रिय वाले सामान्य जीव तथा उन्हीं में पर्याप्तक,अपर्याप्तक भेद वाले जीवोें की संख्या द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितनी है? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर प्राप्त होता है कि ये असंख्यातप्रमाण हैं। इस सूत्र में ‘अपर्याप्त’ पद से अपर्याप्त नामकर्म के उदय वाले लब्ध्यपर्याप्तक जीवों को ग्रहण करना चाहिए। इसी प्रकार ‘पर्याप्त’ पद से पर्याप्तक नामकर्म के उदय से सहित निर्वृत्त्यपर्याप्तक जीवों का ग्रहण करना चाहिए तथा यहाँ प्रयुक्त ‘‘असंख्यात’’ पद से ‘‘असंख्यातासंख्यात’’ जानना चाहिए।

अब उन्हीं विकलत्रय जीवों की कालापेक्षा से संख्या बताने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय और चार इन्द्रिय वाले जीव तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीव असंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल के द्वारा अपहृत होते हैं ।।७८।।

इस सूत्र का अर्थ सुगम है।

धवला की हिन्दी टीका में इस सूत्र को स्पष्ट किया है कि ‘‘यहाँ इस सूत्र में ’’ असंखेज्जाहि’’ पाठ है किन्तु अर्थसंदर्भ की दृष्टि से वहाँ ‘‘असंखेज्जासंखेज्जाहि ’’ ऐसा पाठ प्रतीत होता है। खुद्दाबंध खंड के इसी प्रकरण में इन्हीं जीवोें की सामान्य संख्या बतलाते हुए यह सूत्र पाया जाता है- ‘‘असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण’’ किन्तु धवला टीका में ‘असंखेज्जाहि ’ पद होने से उसी के अनुसार कथन किया गया हैै।’’

क्षेत्र की अपेक्षा इन्हीं विकलत्रय जीवोें का प्रमाण बताने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय एवं चार इन्द्रिय जीवों के द्वारा सूच्यंगुल के असंख्यातवेें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोें के द्वारा क्रमशः सूच्यंगुल के संख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से और सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।७९।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा से इन विकलत्रय जीवों के द्वारा सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है। उन्हीं विकलेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों के द्वारा सूच्यंगुल के संख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से तथा अपर्याप्तक जीवों के द्वारा सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है। इस प्रकार विकलत्रय जीवोें का प्रमाण कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए ।

अब पंचेन्द्रिय जीवोें की संख्या निरूपण के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों में मिथ्यादृष्टि द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? असंख्यात हैं ।।८०

यहाँ सूत्र में ‘असंख्यात’ शब्द से ‘‘असंख्यातासंख्यात’’ जानना चाहिए। शेष अर्थ सरल है अतः विस्तृत विवेचन नहीं किया जा रहा है।

अब काल की अपेक्षा उन्हीं पंचेन्द्रिय जीवों की संख्या प्रतिपादन हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों एवं उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।८१।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब क्षेत्र की अपेक्षा इन्हीं पंचेन्द्रियों का प्रमाण बताने हेतु सूत्र प्रगट होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों में मिथ्यादृष्टियों के द्वारा सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से और सूच्यंगुल के संख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।८२।।

संप्रति एषामेव जीवानां सासादनादिगुणस्थानेषु संख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवली ओघं।।८३।।

इमे सामान्य पंचेन्द्रिया: पर्याप्तपंचेन्द्रियाश्च जीवा: सासादनगुणस्थानादारभ्य अयोगिकेवलिपर्यंता: गुणस्थानवत् प्रमाणा: ज्ञातव्या:।
अधुना पंचेन्द्रियापर्याप्तानां संख्यानिरूपणाय सूत्रमवतरति-
पंचिंदियअपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।८४।।
एतस्य सूत्रस्यार्थ: सुगम:।
कालापेक्षया क्षेत्रापेक्षया च सूत्रद्वयमवतरति-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।८५।।
एतस्याप्यर्थ: सुगम:।
खेत्तेण पंचिंदियअपज्जत्तएहि पदरमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदि-भागवग्ग-पडिभाएण।।८६।।
इदमपि सूत्रं सुगमं। अत्र पंचेन्द्रियापर्याप्ता: लब्ध्यपर्याप्ता: एव गृहीतव्या:। एषां जीवानां मिथ्यात्वगुणस्थानमेकमेव।
अत्र किञ्चित् भागाभागं कथयिष्यते-
सर्वजीवराशे: संख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्ता: भवन्ति। शेषस्य एकभागस्य असंख्यातलोकप्रमाणखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्ता: भवन्ति। शेषस्य असंख्यातखण्डे कृते बहुखंडा: बादरैकेन्द्रियापर्याप्ता: भवन्ति। शेषस्यैकभागस्य अनंतखण्डे कृते बहुखण्डा बादरैकेन्द्रियपर्याप्ता: भवन्ति। शेषस्यानंतखण्डे कृते बहुखण्डा: अनिन्द्रिया: भवन्ति[२]
एषां जीवानां अंकसंदृष्ट्या उदाहरणं दीयते-
एकेन्द्रियजीवराशि: द्विपंचाशदधिकद्विशतमात्र: २५६। सूक्ष्मैकेन्द्रियराशि: चत्वारिंशदधिकद्विशतमात्र: २४०। बादरैकेन्द्रियराशि: षोडशमात्र: १६। सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तराशि: अशीति अधिक शतमात्र: १८०। सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तराशि: षष्टि: ६०। बादरैकेन्द्रियापर्याप्तराशि: द्वादशमात्र: १२। बादरएकेन्द्रियपर्याप्तराशि: चत्वार: ४।[३]
एवमेव धवलाटीकायां द्रष्टव्यो द्वीन्द्रियादिजीवानां संख्याक्रम:।
अथवा इंद्रियानुवादेन एकेन्द्रिया मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ता:। द्वित्रिचतुरिन्द्रिया असंख्येया: श्रेणय:, प्रतरासंंख्येयभागप्रमिता:। पंचेंद्रियेषु प्रथमगुणस्थाना: असंख्येया: श्रेणय:, प्रतरासंख्येयभागप्रमिता:। पञ्चेन्द्रियेषु सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयस्त्रयोदशगुणस्थानवर्तिन: सामान्योक्तसंख्या:।[४]
अथवा पञ्चेंद्रियेभ्य: चतुरिन्द्रिया: बहव:। चतुरिन्द्रियेभ्यस्त्रीन्द्रिया बहव:। त्रीन्द्रियेभ्यो द्वीन्द्रिया: बहव:। तेभ्य: एकेन्द्रिया: बहव:[५] इति।
एवं पंचेंद्रियसामान्य-पंचेन्द्रियपर्याप्त-पंचेन्द्रियापर्याप्तानां गुणस्थानेषु संख्याप्ररूपणपरत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे तृतीयग्रन्थे द्रव्यप्रमाणानुगमनाम्नि
द्वितीय प्रकरणे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां
इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

इस सूत्र का अर्थ भी सरल है अतः विशेष कथन नहीं किया जा रहा है। अब उन्हीं पंचेन्द्रिय जीवों का सासादन आदि गुणस्थानों में प्रमाण प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव सामान्य प्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।८३।।

सूत्र का अभिप्राय यह है कि ये सामान्य पंचेन्द्रिय जीव तथा पर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों का प्रमाण सासादन गुणस्थान से प्रारंभ करके आयोगकेवली गुणस्थानपर्यन्त सभी गुणस्थानों के प्रमाण के समान ही जानना चाहिए।

विशेषार्थ-

यहाँ पर सूत्र में पहुडि-प्रभृति शब्द क्रियाविशेषण है जिससे सासादनसम्यग्दृष्टि प्रभृति का अर्थ सासादनसम्यग्दृष्टि को आदि लेकर होता है। यहाँ पर पूर्व सूत्र से पंचेन्द्रिय पद की अनुवृत्ति होती है, इसलिए सम्पूर्ण गुणस्थानप्रतिपन्न जीव पंचेन्द्रिय ही होते हैं, यह अभिप्राय निकलता है।

यहाँ यह शंका होती है कि सयोगकेवली और अयोगकेवली भगवन्तों के सभी इन्द्रियाँ नष्ट हो गई हैं,इसलिए उनके पंचेन्द्रिय जाति नामकर्म की अपेक्षा सयोगकेवली और अयोगकेवलियों के पंचेन्द्रिय संज्ञा बन जाती है।

इन गुणस्थानप्रतिपन्न पंचेन्द्रिय जीवों के प्रमाण की प्ररूपणा मूलोघ प्ररूपणा के समान है क्योंकि पंचेन्द्रिय जाति को छोड़कर दूसरी जातियों में गुणस्थानप्रतिपन्न जीव नहीं पाये जाते हैं।

अब पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों की संख्यानिरूपण के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।८४।।

इस सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब काल की अपेक्षा और क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं जीवों की संख्या बताने हेतु दो सूत्रों का अवतार हो रहा है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपह्रत होते हैं।।८५।।

इस सूत्र का अर्थ भी सुगम है।

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों के द्वारा सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।८६।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अर्थ भी सरल है। यहाँ पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोें में लब्ध्यपर्याप्त जीवों को ही ग्रहण करना चाहिए । इन जीवोें के एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही पाया जाता है।

यहाँ अब किंचित् भागाभाग को कहते हैं-

सम्पूर्ण जीवराशि के संख्यात ख्ड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव हैं। शेष एक भाग के असंख्यात लोकप्रमाण खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव हैं। शेष एक भाग के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव हैं। शेष एक भाग के अनन्त खंड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव हैं। शेष एक भाग के अनन्त खंड करने पर उनमेें से बहुभागप्रमाण अनिन्द्रिय जीव होते हैं।

अब अंंक संदृष्टि के द्वारा इन जीवोें का उदाहरण दिया जा रहा है-

एकेन्द्रिय जीवराशि दो सौ छप्पन (२५६) है। सूक्ष्म एकेन्द्रिय राशि दो सौ चालीस (२४०) है। बादर एकेन्द्रिराशि सोलह (१६) है। सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त राशि एक सौ अस्सी(१८०) है। सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त राशि साठ (६०) है। बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त राशि बारह (१२)है और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त राशि चार (४) है।

इसी प्रकार धवला टीका में द्वीन्द्रिय आदि जीवों का संख्याक्रम द्रष्टव्य है।

अथवा इन्द्रिय मार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों की संंख्या असंख्यातश्रेणी प्रमाण है। अर्थात् प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण है। पंचेन्द्रिय जीवोें में प्रथम गुणस्थान की असंख्यात श्रेणियाँ हैं, वे प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। पंचेन्द्रियों में सासादनसम्यग्दृष्टि आदि तेरह गुणस्थानवर्ती जीवों की संख्या सामान्यरूप से कही गई है।

अथवा पंचेन्द्रिय जीवों से चार इन्द्रिय जीव अधिक हैं। चतुरिन्द्रिय जीवों से तीन इन्द्रिय जीव अधिक हैं। त्रीन्द्रिय जीवोें की अपेक्षा दो इन्द्रिय जीव अधिक हैं और दो इन्द्रियोें की अपेक्षा एकेन्द्रिय जीवों की संख्या बहुत अधिक है।

इस प्रकार पंचेन्द्रिय सामान्य-पंचेन्द्रिय पर्याप्त और पंंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों की गुणस्थानोें में संख्या प्ररूपित करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए। इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खंड में तृतीय पुस्तक में द्रव्यप्रमाणानुगम नामक द्वितीय प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिन्तामणि टीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।

टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. ३०७।
  2. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. ३१८।
  3. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. ३२०।
  4. तत्त्वार्थवृत्ति अध्याय १, सूत्र ८ के अंतर्गत।
  5. तत्त्वार्थवृत्ति अध्याय १, सूत्र ८ के अंतर्गत।