Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०६. कषायमार्गणा में अल्पबहुत्व

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कषायमार्गणा में अल्पबहुत्व

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभि: स्थलै: एकोनविंशतिसूत्रै: कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले चतु:कषायसहितानां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि एकादशसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले चतुर्थादिगुणस्थानेषु अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत: परं तृतीयस्थले अकषायिणां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘अकसाईसु’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं इति समुदायपातनिका।
संप्रति उपशमादि-अधस्तनमिथ्यादृष्टिपर्यंतानामल्पबहुत्वकथनाय एकादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-कसायाणुवादेण कोधकसाइ-माणकसाइ-मायकसाइ-लोभकसाईसु दोसु अद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।१९७।।
खवा संखेज्जगुणा।।१९८।।
णवरि विसेसो, लोभकसाईसु सुहुमसांपराइय-उवसमा विसेसाहिया।।१९९।।
खवा संखेज्जगुणा।।२००।।
अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।२०१।
पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।२०२।।
संजदासंजदा असंखेज्जगुणा।।२०३।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।२०४।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।२०५।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।२०६।।
मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा।।२०७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कषायमार्गणायां चतुर्विधकषायेषु द्वयो: श्रेणिगुणस्थानयो: उपशमा: प्रवेशेन तुल्या: स्तोकाश्च। क्षपका: संख्यातगुणा:। लोभकषायसहितेषु सूक्ष्मसांपरायिका: उपशामका: विशेषाधिका: सन्ति। एभ्य: क्षपका: द्विगुणा:। अप्रमत्तसंयता: संख्यातगुणा:, एभ्य: प्रमत्तसंयता: संख्यातगुणा:। शेषाणां सूत्राणां अर्थ: सुगम:।
एवं प्रथमस्थले चतुर्विधकषायसहितानां अल्पबहुत्वकथनत्वेन एकादशसूत्राणि गतानि।

अथ कषायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन स्थलों में उन्नीस सूत्रों के द्वारा कषायमार्गणा नामका छठा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में चारों कषाय से सहित जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि ग्यारह सूत्र हैं। पुनः द्वितीय स्थल में चतुर्थ आदि गुणस्थानों में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में कषायरहित भगवन्तों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले ‘‘अकसाईसु’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब उपशम श्रेणी से प्रारंभ करके नीचे मिथ्यादृष्टि गुणस्थान तक के जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ग्यारह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुवाद से क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और अल्प हैं।।१९७।।

चारों कषाय वाले जीवों में उपशामकों से क्षपक संख्यातगुणित हैं।।१९८।।

केवल विशेषता यह है कि लोभकषायी जीवों में क्षपकों से सूक्ष्मसाम्परायिक उपशामक विशेष अधिक हैं।।१९९।।

लोभकषायी जीवों में सूक्ष्मसाम्परायिक उपशामकों से सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपक संख्यातगुणित हैं।।२००।।

चारों कषाय वाले जीवों में क्षपकों से अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणित हैं।।२०१।।

चारों कषाय वाले जीवों में अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत संख्यातगुणित हैं।।२०२।।

चारों कषाय वाले जीवों में प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत असंख्यातगुणित हैं।।२०३।।

चारों कषाय वाले जीवों में संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।२०४।।

चारों कषाय वाले जीवों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणित हैं।।२०५।।

चारों कषाय वाले जीवों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।२०६।।

चारों कषाय वाले जीवों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणित हैं।।२०७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कषायमार्गणा में चारों कषाय वाले दोनों श्रेणी के गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा एक समान और सबसे कम हैं। क्षपक श्रेणी वाले उनसे संख्यातगुणे हैं। लोभकषाय सहित जीवों में सूक्ष्मसांपरायिक उपशामक विशेष अधिक हैं। इनसे दुगने क्षपक हैं। अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं, इनसे प्रमत्तसंयत मुनियों की संख्या संख्यातगुणी है। शेष सूत्रों का अर्थ सुगम है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में चारों कषाय सहित जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले ग्यारह सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति कषायसहितानां असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिगुणस्थानेषु अल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-

असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजद-पमत्त-अप्पमत्तसंजदट्ठाणे सम्मत्तप्पा-बहुअमोघं।।२०८।।

एवं दोसु अद्धासु।।२०९।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।२१०।।
खवा संखेज्जगुणा।।२११।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-यथा प्रमत्ताप्रमत्तयो: त्रिषु कषायसहितेषु सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वं प्ररूपितं, तथा अपूर्वकरणानिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्तिनो: श्रेण्यारोहकमहामुन्यो: सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वं ज्ञातव्यं। विशेषेण तु लोभकषायस्य एवं त्रिषु अपूर्वानिवृत्तिसूक्ष्मसांपरायेषु गुणस्थानेषु अल्पबहुत्वे वक्तव्यं, यावत् सूक्ष्मसांपरायिक: इति लोभकषायोपलंभात्। शेषसूत्राणामर्थ: सुगम: वर्तते।
एवं द्वितीयस्थले असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिसूक्ष्मसांपरायिकेषु अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
अकषायिनामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-अकसाईसु सव्वत्थोवा उवसंतकसायवीदरागछदुमत्था।।२१२।।
खीणकसायवीदरागछदुमत्था संखेज्जगुणा।।२१३।।
सजोगिकेवली अजोगिकेवली पवेसणेण दो वि तुल्ला तत्तिया चेव।।२१४।।
सजोगिकेवली अद्धं पडुच्च संखेज्जगुणा।।२१५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अकषायिषु सर्वस्तोका: एकादशगुणस्थानवर्तिन:, चतु:पंचाशत् प्रमाणत्वात्। क्षीणकषायिण: अष्टोत्तरशतपरिमाणा: सन्ति। सयोगिकेवलिन: अयोगिकेवलिनश्च प्रवेशापेक्षया द्वौ अपि तुल्यौ, अष्टोत्तरशत प्रमाणा एव। सयोगिकेवलिन: संचयकालापेक्षया संख्यातगुणा:, ओघराशिना अन्यूनाधिका: सन्ति।
एवं तृतीयस्थले कषायविरहितानां उपशान्तकषायादिचतु:गुणस्थानवर्तिनां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वनाम्नि अष्टमप्रकरणे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानामषष्ठोऽधिकार: समाप्त:।


अब कषाय सहित जीवों का असंयतसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानों में अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

चारों कषाय वाले जीवों में असंयतसम्यग्दृष्टि , संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में सम्यक्त्वसम्बन्धी अल्पबहुत्व गुणस्थान के समान है।।२०८।।

इसी प्रकार अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण, इन दोनों गुणस्थानों में चारों कषाय वाले जीवों का सम्यक्त्वसम्बन्धी अल्पबहुत्व है।।२०९।।

चारों कषाय वाले उपशामक जीव सबसे कम हैं।।२१०।।

उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।२११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिस प्रकार प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान में तीनों कषाय सहित जीवों में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व कहा गया है, उसी प्रकार अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में श्रेणी आरोहण करने वाले महामुनि के सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व जानना चाहिए। विशेषरूप से लोभकषाय का, इसी प्रकार तीन गुणस्थानों में अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसांपराय में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व कहना चाहिए, क्योंकि सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान तक लोभकषाय का सद्भाव पाया जाता है। शेष सूत्रों का अर्थ सुगम है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर सूक्ष्मसांपरायिक गुणस्थान तक के जीवों में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब कषायरहित भगवन्तों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अकषायी जीवों में उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थ सबसे कम हैं।।२१२।।

अकषायी जीवों में उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थों से क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ संख्यातगुणित हैं।।२१३।।

अकषायी जीवों में सयोगिकेवली और अयोगिकेवली ये दोनों ही प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।२१४।।

अकषायी जीवों में सयोगिकेवली संचयकाल की अपेक्षा बहुत अधिक संख्यातगुणित हैं।।२१५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अकषायी-कषायरहित जीवों में सबसे कम ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती जीव होते हैं, क्योंकि उनकी संख्या चौवन (५४) प्रमाण है। क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती मुनियों की संख्या १०८ है। सयोगिकेवली और अयोगिकेवली दोनों भी प्रवेश की अपेक्षा समान होते हैं अर्थात् दोनों की संख्या एक सौ आठ प्रमाण ही है। सयोगिकेवली भगवान संचयकाल की अपेक्षा संख्यातगुणे हैं, उनका प्रमाण ओघराशि से न कम है, न अधिक है।

इस तरह से तृतीय स्थल में कषाय से रहित जीवों का उपशांतकषाय आदि चारों गुणस्थानवर्ती संयतों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अल्पबहुत्व नामक अष्टम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि टीका में कषायमार्गणा नामक छठा अधिकार समाप्त हुआ।