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०६. द्वितीय महाधिकार-कषायमार्गणा

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द्वितीय महाधिकार - कषायमार्गणा

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अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन त्रिभिः सूत्रैः कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले कषायसहितानां स्पर्शनकथनत्वेन द्वे सूत्रे। ततः परं द्वितीयस्थले अकषायानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन एकं सूत्रं इति पातनिका।
अधुना चतुर्विधकषायसहितानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
कसायाणुवादेण कोधकसाइ-माणकसाइ-मायकसाइ-लोभकसाईसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति ओघं।।१२०।।
सूत्रं सुगमं वर्तते।
लोभगतविशेषावबोधनाय सूत्रमवतार्यते-
णवरि लोभकसाईसु सुहुमसांपराइयउवसमा खवा ओघं।।१२१।।
एतदपि सूत्रं सुगमं।
एवं प्रथमस्थले कषायसहितानां स्पर्शनकथनेन द्वे सूत्रे गते।
कषायरहितस्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
अकसाईसु चतुट्ठाणमोघं।।१२२।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। नामैकदेशग्रहणेऽपि नामवतां संप्रत्ययो भवति, इति चतुःस्थानशब्देन वीतरागाणां चतुर्णां गुणस्थानानां ग्रहणं भवति। तेषां प्ररूपणा सुगमा, ओघसमानत्वात्।
एवं द्वितीयस्थले कषायरहितानां स्पर्शनकथनेन एकं सूत्रं गतम्।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे चतुर्थग्रन्थे स्पर्शनानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-
सिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां कषायमार्गणानाम
षष्ठोऽधिकारः समाप्तः।

अथ कषायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो स्थलों में तीन सूत्रों के द्वारा कषाय मार्गणा नाम का छठा अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उसमें से प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों के स्पर्शन का कथन करने वाले दो सूत्र कहेंगे। उसके बाद द्वितीय स्थल में कषायरहित जीवों का स्पर्शनक्षेत्र बतलाने वाला एक सूत्र है। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब चार प्रकार की कषाय सहित जीवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुवाद से क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान है।।१२०।।

सूत्र का अर्थ सुगम है। इसलिए विशेष कथन नहीं किया जा रहा है।

लोभकषाय को प्राप्त जीवों का ज्ञान कराने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

विशेष बात यह है कि लोभकषायी जीवों में सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक जीवों का क्षेत्र ओघ के समान है।।१२१।।

यह सूत्र भी सरल है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों का स्पर्शन बताने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब कषायरहित जीवों का स्पर्शन बताने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अकषायी जीवों में उपशान्तकषाय आदि चार गुणस्थानवालों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान है।।१२२।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। ‘‘किसी भी नाम के एक देश के ग्रहण करने पर भी नाम वालों का सम्प्रत्यय हो जाता है’’ इस न्याय के अनुसार ‘‘चतु:स्थान’’ शब्द से उपशान्तकषाय आदि वीतरागी चारों गुणस्थानों का ग्रहण हो जाता है। उनके स्पर्शन की प्ररूपणा ओघ के समान होने से सुगम है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में कषायरहित जीवों का स्पर्शन कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में चतुर्थ ग्रंथ में स्पर्शनानुगम नाम के चतुर्थ प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।