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०६. पंचम भव पूर्व-"राजा सुविधिकुमार"

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राजा सुविधिकुमार

श्रीधर देव का जीव ईशान स्वर्ग से च्युत होकर जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में महावत्सा देश की सुसीमा नगरी के राजा सुदृष्टि की रानी सुंदरनंदा के गर्भ में आ गया। नव माह बाद सुंदरनंदा ने पुत्र रत्न को जन्म दिया। उसके अनेक उत्तम-उत्तम लक्षणों को देखकर परिवार के जनों ने उसका सुविधि यह नाम रखा। यह बालक माता-पिता एवं प्रजाजनों के हर्ष को बढ़ाते हुए धीरे-धीरे तरुण अवस्था को प्राप्त हो गया। वहीं विदेह क्षेत्र में अभयघोष नाम के चक्रवर्ती थे, उनकी एक पुत्री का नाम मनोरमा था। चक्रवर्ती ने अपनी पुत्री मनोरमा का विवाह राजकुमार सुविधि के साथ कर दिया।

इधर राजा सुदृष्टि ने भी सुविधि को सर्वगुणों से युक्त देखकर उसे अपना राज्य सौंप दिया। राजा सुविधि अपनी रानी मनोरमा के साथ धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ का सेवन कर रहे थे। इसी मध्य ईशान स्वर्ग के श्रीप्रभ देव का जीव रानी के गर्भ में आ गया, नव माह बाद पुत्र रत्न उत्पन्न हुआ। उसका नाम ‘केशव’ रखा। राजा वङ्काजंघ की पर्याय में जो रानी श्रीमती का जीव था और जिसने भोगभूमि में ‘आर्या’ की पर्याय में श्रीगुरु से सम्यग्दर्शन धारण किया था। अतएव सम्यक्त्व के माहात्म्य से जिसने स्त्रीपर्याय से छूटकर ईशानस्वर्ग में श्रीप्रभ देव के वैभव को प्राप्त किया था, वही श्रीमती पत्नी का जीव इस भव में राजा का पुत्र हो गया है। वास्तव में पुत्र ही पिता के लिए अतीव स्नेह बन्धन का कारण होता है पुनः वह यदि पूर्वभवों में प्रिय पत्नी के रूप में रहा हो तो भला उसके प्रति प्रेम का क्या कहना? यही कारण था कि राजा सुविधि का अपने पुत्र केशव के प्रति अप्रतिम स्नेह था।

इधर वङ्काजंघ राजा के द्वारा वन में आहारदान के समय जो सिंह, नकुल, वानर और सूकर पशुओं ने दान की अनुमोदना से पुण्यसंचित कर भोगभूमि के सौख्य को पाया था पुनः वे चारों ही द्वितीय स्वर्ग में देव हुए थे। वे चारों ही देव अपनी-अपनी आयु पूर्ण कर स्वर्ग से च्युत होकर उसी विदेहक्षेत्र में क्रम से वरदत्त, वरसेन, चित्रांगद और प्रशान्तमदन नाम के राजपुत्र हो गये। ये सभी समान आकार, समान रूप और समान वैभव को धारण करने वाले अपने-अपने योग्य राज्यलक्ष्मी को पाकर सुख का अनुभव करते थे।

एक समय भगवान् विमलवाहन का समवसरण वहाँ आया हुआ था। अभयघोष चक्रवर्ती और वे वरदत्त आदि चारों राजा अपने अनेक परिकर को लेकर भगवान् की वंदना करने के लिए गये। भगवान् की वंदना, भक्ति करके प्रभु का दिव्य उपदेश सुना। साथ में हजारों-हजारों राजा थे। चक्रवर्ती को प्रवचन सुनने के बाद वैराग्य हो गया। संसार की क्षणभंगुरता को जानकर सम्राट् चक्रवर्ती ने चारों राजा समेत अठारह हजार राजाओं के साथ एवं अपने पाँच हजार राजपुत्रों के साथ वहीं समवसरण में दैगंबरी दीक्षा ले ली और महामुनि बन गये।

राजा सुविधि को जब यह समाचार विदित हुआ तब उसे धर्मप्रेम के साथ आश्चर्य भी हुआ तथा रानी मनोरमा को पिता व पाँच हजार भ्राताओं की एक साथ मुनिदीक्षा सुनकर बहुत ही शोक हुआ, वह मोह के वशीभूत हो विलाप करने लगी-

हे पिताजी! आपने सम्पूर्ण राज्य को, सम्पूर्ण अन्तःपुर को एवं सम्पूर्ण प्रजा को कैसे अनाथ कर दिया? अब यह चक्ररत्न किसकी आज्ञा में रहेगा? रानी के शोक को दूर करने के लिए राजा सुविधि ने उन सभी मुनियों की वंदना के लिए प्रस्थान किया। वहाँ समवसरण में पहुँचकर भगवान् विमलवाहन की वंदना-स्तुति की पुनः पूजा करने के बाद चक्रवर्ती महामुनि के चरणों में नमस्कार किया। मनोरमा ने अपने पूज्य पिता के चरणों की वंदना करके शोक और मोह को छोड़कर हर्षितमना हो हाथ जोड़कर स्तुति करना प्रारंभ किया-

हे भगवन् ! आप धन्य हैं, आपने छह खण्ड के वैभव को, चक्ररत्न को एवं सर्व आरंभ-परिग्रह को छोड़कर अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए यह अर्हंत मुद्रा धारण की है। आपकी भक्ति करके मैं भी अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने के पुरुषार्थ में लगा सवूँâ ऐसी मुझे शक्ति प्राप्त हो, मैं यही याचना करती हूँ।

अनन्तर क्रम-क्रम से सभी भाइयों के चरणों में नमोऽस्तु करते हुए और आनंदाश्रु से उनके चरणों का प्रक्षालन करते हुए सभी के गुणों की स्तुति करके अपने कोठे में आकर बैठ गई। राजा सुविधि मनोरमा के साथ प्रभु का दिव्य उपदेश सुनकर अपने राज्य में वापस आ गये। एक दिन राजा सुविधि चिन्तन करते हैं- अहो! मेरे श्वसुर ने और मेरे चारों साथी राजाओं ने तथा पाँच हजार मेरी पत्नी के भाइयों ने-मेरे सालों ने मुनि दीक्षा ले ली, उन्होंने एक क्षण में इतने विशाल चक्रवर्ती साम्राज्य को छोड़ दिया। मेरा राज्य तो उसके आगे बहुत ही अल्प है फिर भी मैं नहीं छोड़ पा रहा हूँ। वास्तव में राज्य को, रानी को एवं सब कुछ परिग्रह को छोड़ना सरल है, मुझे कुछ भी कठिन नहीं लगता किन्तु मैं भला इस ‘केशव’ पुत्र को कैसे छोड़ँ? इसके स्नेहबंधन को छोड़ना ही आज मेरे लिए दुष्कर हो रहा है। इत्यादि प्रकार से चिन्तन कर राजा ने क्रम-क्रम से ग्यारह प्रतिमा के स्थान को प्राप्त कर क्षुल्लक दीक्षा धारण कर ली।

१. दर्शन प्रतिमा

२. व्रत प्रतिमा

३. सामायिक प्रतिमा

४. प्रोषधप्रतिमा

५. सचित्तत्याग प्रतिमा

६. दिवामैथुनत्याग प्रतिमा अथवा रात्रि भोजन त्याग प्रतिमा

७. ब्रह्मचर्य प्रतिमा

८. आरम्भत्याग प्रतिमा

९. परिग्रहत्याग प्रतिमा

१०. अनुमतित्याग प्रतिमा

११. उद्दिष्टत्याग प्रतिमा।

इन ग्यारह प्रतिमाओें के धारी क्षुल्लक उत्कृष्ट श्रावक कहलाते हैं। इस प्रकार सम्यग्दर्शन से पवित्र व्रतों की शुद्धता को प्राप्त हुए राजर्षि सुविधि ने बहुत काल तक मोक्ष मार्ग की उपासना की थी।

अनन्तर जीवन के अन्त में सर्व परिग्रह का त्याग कर दैगंबरी दीक्षा ग्रहण कर ली और समाधिपूर्वक शरीर का त्याग कर अच्युत स्वर्ग में इंद्र पद प्राप्त कर लिया। पुत्र केशव ने भी निग्र्रंथ दीक्षा ग्रहण कर आयु के अंत में शरीर को छोड़ कर सोलहवें स्वर्ग में प्रतीन्द्र पद प्राप्त कर लिया। वरदत्त आदि चारों राजाओं ने जो दीक्षा ली थी, वे भी वहीं यथायोग्य सामानिक जाति के देव हो गये।