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०६. पद्मप्रभनाथ भगवान का परिचय

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श्री पद्मप्रभ भगवान

०६. पद्मप्रभनाथ भगवान का परिचय
Image depicting Padmaprabha
पिछले भगवान सुमतिनाथ
अगले भगवान सुपार्श्वनाथ
चिन्ह लाल कमल
पिता महाराजा धरणराज
माता महारानी सुसीमा
वंश इक्ष्वाकु
वर्ण क्षत्रिय
अवगाहना 250 धनुष (एक हजार हाथ)
देहवर्ण पद्मरागमणि सदृश
आयु 3,000,000 पूर्व वर्ष (211.68 Quintillion years)
वृक्ष मनोहर वन (प्रभाषगिरि) एवं प्रियंगुवृक्ष
प्रथम आहार वद्र्धमान नगर के राजा सोमदत्त द्वारा (खीर)
पंचकल्याणक तिथियां
गर्भ माघ कृ.६
जन्म कार्तिक कृ.१३
कौशाम्बी (जिला-कौशाम्बी) उत्तर प्रदेश
दीक्षा कार्तिक कृ.१३
केवलज्ञान चैत्र शु .१५
मोक्ष फाल्गुन कृष्ण ४
सम्मेद शिखर
समवशरण
गणधर श्री वज्रचामर आदि ११०
मुनि तीन लाख तीस हजार
गणिनी आर्यिका रतिषेणा
आर्यिका चार लाख तीस हजार
श्रावक तीन लाख
श्राविका पांच लाख
यक्ष कुसुमदेव
यक्षी मनोवेगा देवी
पदमप्रभुदेव् भगवान का परिचय
Padamprabhu.jpg

परिचय

धातकीखंड द्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में सीतानदी के दक्षिण तट पर वत्सदेश है। उसके सुसीमा नगर के अधिपति अपराजित थे। किसी दिन भोगों से विरक्त होकर पिहितास्रव जिनेन्द्र के पास दीक्षा धारण कर ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। अन्त में ऊर्ध्व ग्रैवेयक के प्रीतिंकर विमान में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।

गर्भ और जन्म

इसी जम्बूद्वीप की कौशाम्बी नगरी में धरण महाराज की सुसीमा रानी ने माघ कृष्ण षष्ठी के दिन उक्त अहमिन्द्र को गर्भ में धारण किया। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन पुत्ररत्न को उत्पन्न किया। इन्द्रों ने जन्मोत्सव के बाद उनका नाम ‘पद्मप्रभ' रखा।

तप

किसी समय दरवाजे पर बंधे हुए हाथी की दशा सुनने से उन्हें अपने पूर्व भवों का ज्ञान हो गया जिससे भगवान को वैराग्य हो गया। वे देवों द्वारा लाई गई ‘निवृत्ति' नाम की पालकी पर बैठ मनोहर नाम के वन में गये और कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन दीक्षा ले ली।

केवलज्ञान और मोक्ष

छह मास छद्मस्थ अवस्था के व्यतीत हो जाने पर चैत्र शुक्ला पूर्णिमा के दिन मध्यान्ह में केवलज्ञान प्रकट हो गया। बहुत काल तक भव्यों को धर्मोपदेश देकर फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन सम्मेदाचल से मोक्ष को प्राप्त कर लिया।