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०६. वेद मार्गणाधिकार

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वेद मार्गणाधिकार

अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ स्थलत्रयेण चतुर्भिः सूत्रैः वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले स्त्रीपुरुष-वेदिनोः क्षेत्रप्ररूपणाय ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमेकं। ततः परं द्वितीयस्थले नपुंसकवेदिनां क्षेत्रप्ररूपणत्वेन ‘‘णवुंसय’’ इत्यादिना एकं सूत्रं। तदनु तृतीयस्थले अपगतवेदिनां क्षेत्रप्रतिपादनत्वेन ‘‘अवगद’’ इत्यादिसूत्रद्वयम्। इति समुदायपातनिका।
अधुना स्त्री-पुरुषवेदिनोः गुणस्थानापेक्षया क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
वेदाणुवादेण इत्थिवेद-पुरिसवेदेसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव अणियट्ठि त्ति केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।४३।।
सूत्रार्थः सुगमः। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगताः द्रव्य-भाववेदिमिथ्यादृष्टयो जीवाः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे च, अत्र प्रधानीकृतदेवीस्त्रीवेदराशित्वात्, अतो ज्ञायतेऽत्र द्रव्यभावस्त्रीवेदस्य ग्रहणमस्ति किं च स्वर्गेषु देवपर्यायेषु द्रव्यभावयोर्वैषम्यं नास्तीति।
मारणान्तिक-उपपादगताः इमाः स्त्रीवेदिन्यः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे।
सासादनसम्यग्दृष्ट्यादि अनिवृत्तिकरणगुणस्थानपर्यंतानां ओघवत् क्षेत्रं ज्ञातव्यं। अस्त्यत्र विशेषः-असंयतसम्यग्दृष्टिषु उपपादो नास्ति। प्रमत्तसंयते तैजसाहारकसमुद्घातौ न स्तः।
एतेन एतज्ज्ञायते यत् प्रमत्ताप्रमत्तापूर्वकरणानिवृत्तिकरणगुणस्थानेषु द्रव्यवेदेन पुरुषाः एव भाववेदेन स्त्रीवेदिनो भवन्ति न च द्रव्यवेदस्त्रियः इति।
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगताः पुरुषवेदिनः मिथ्यादृष्टयः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे च निवसन्ति। मारणान्तिक-उपपादगताः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे च। सासादन-सम्यग्दृष्ट्यादि-अनिवृत्तिकरण-उपशामक-क्षपकपर्यन्तानाम् ओघवत् क्षेत्रं ज्ञातव्यम्।
एवं प्रथमस्थले स्त्रीपुरुषवेदिक्षेत्रनिरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
संप्रति नपुंसकवेदिनां गुणस्थानापेक्षया क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
णवुंसयवेदेसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति ओघं।।४४।।
सूत्रं सुगमं। स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादगतनपुंसकवेदिमिथ्यादृष्टयः सर्वलोके। विहारवत्स्वस्थान-वैक्रियिकसमुद्घातगताः त्रिलोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे।
अस्ति विशेषः-वैक्रियिकसमुद्गताः तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागे। सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे? येन तिष्ठन्ति तेन ओघमिति घटते। सासादनसम्यग्दृष्टिप्रभृति यावत् अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमिति एतेषामपि प्ररूपणा ओघतुल्या अस्ति, किंतु प्रमत्तगुणस्थाने तैजसाहारकपदे न स्तः।
अत्रापि पंचमगुणस्थानपर्यन्ताः नपुंसकवेदिनः द्रव्येण भावेन च संभवन्ति किंतु षष्ठगुणस्थानादुपरि नवमगुणस्थानपर्यंतं भावेनैव नपुंसकवेदिनः न च द्रव्येण इति निश्चेतव्यम् भवद्भिः। एतस्मादेव सूत्रात् इति।
एवं द्वितीयस्थले द्रव्यभावनपुंसकवेदवतां क्षेत्रनिरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतम्।

अथ वेदमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन स्थलों में चार सूत्रों के द्वारा वेदमार्गणा नामक पंचम अधिकार प्रारम्भ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवों की क्षेत्र प्ररूपणा बतलाने के लिए ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र कहेंगे। उसके आगे द्वितीय स्थल में नपुंसकवेदी जीवोें का क्षेत्रनिरूपण करने हेतु ‘‘णवुंसय’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुनः तृतीय स्थल में वेदरहित अरिहंत-सिद्ध भगवन्तों का क्षेत्र प्रतिपादन करने वाले ‘‘अवगद’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की यह समुदायपातनिका कही गई है अर्थात् इस अधिकार में कुल चार सूत्रों के द्वारा वेदमार्गणा का व्याख्यान किया जाएगा।

अब स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा क्षेत्र बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेदी और पुरुषवेदियों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरणगुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।४३।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषाय- समुद्घात और विव्रियिकसमुद्घातगत स्त्रीवेदी मिथ्यादृष्टि जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते है, क्योंकि यहाँ पर देवगतिसम्बन्धी स्त्रीवेदराशि की प्रधानता है, इसलिए यहाँ जानना है कि यहाँ द्रव्यवेद-भाववेद एक हैं क्योंकि स्वर्गों में देवों के द्रव्य और भाववेद में विषमता नहीं है अर्थात् उनके जो द्रव्यवेद रहता है, वही भाववेद पाया जाता है। मारणान्तिक समुद्घात और उपपादगत स्त्रीवेदी मिथ्यादृष्टि सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में और नरलोक तथा तिर्यग्लोक इन दोनों लोकों से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक के स्त्रीवेदी जीवोें का क्षेत्र ओघ के समान लोक का असंख्यातवाँ भाग है। यहाँ विशेष बात यह है कि असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में स्त्रीवेदियों के उपपाद नहीं होता है। प्रमत्तसंयत में तैजस और आहारक समुद्घात नहीं होता है।

इस कथन के द्वारा यह ज्ञात होता है कि प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण गुणस्थानों में द्रव्य से पुरुषवेद ही रहता है, उनके भाव से स्त्रीवेद हो सकता है किन्तु इन गुणस्थानों में द्रव्य से स्त्रीवेदी जीव नहीं रह सकते हैं।

भावार्थ-द्रव्यस्त्री वेदियों के केवल प्रारंभिक पाँच गुणस्थान ही पाये जाते हैं, उससे आगे के गुणस्थान उनके नहीं हो सकते हैं इसीलिए आर्यिकाओं के उपचार महाव्रती होने पर भी पंचमगुणस्थान ही माना गया है। दिगम्बर जैन आगम की मान्यतानुसार इसीलिए स्त्रीमुक्ति का निषेध किया गया है। इन सिद्धान्त ग्रंथों में वेदमार्गणा के प्रकरण में द्रव्यवेद और भाववेद का सूक्ष्मता से अवलोकन करना चाहिए।

स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिक समुद्घात को प्राप्त हुए पुरुषवेदी मिथ्यादृष्टि जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद को प्राप्त पुरुषवेदी मिथ्यादृष्टि जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, नरलोक और तिर्र्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण उपशामक और अनिवृत्तिकरण क्षपक गुणस्थान तक पुरुषवेदी जीवों के स्वस्थानादि पदों का क्षेत्र गुणस्थान क्षेत्र के समान जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में स्त्री और पुरुषवेदी जीवोें का क्षेत्र निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब नपुंसकवेदी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा से क्षेत्र बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदी जीवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का क्षेत्र ओघक्षेत्र के समान है।।४४।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद इन पदों को प्राप्त नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टि जीव सम्पूर्ण लोक में रहते हैं। विहारवत्स्वस्थान और वैव्रियिकसमुद्घातगत वे ही जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में और तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में रहते हैं। यहाँ विशेष बात यह है कि वैव्रियिक समुद्घातगत नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टि जीव तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं तथा उक्त दोनों पदों को प्राप्त नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टि जीव, चूंकि अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, इसलिये सूत्र में कहा गया ‘ओघ’ यह पद घटित हो जाता है। सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक भी इन नपुंसकवेदी जीवोें की क्षेत्रप्ररूपणा ओघवर्णित क्षेत्रप्ररूपणा के तुल्य है किन्तु प्रमत्तसंयत गुणस्थान में नपुंसकवेदियों के तैजसससमुद्घात और आहारकसमुद्घात ये दो पद नहीं होते हैं।

यहाँ भी पंचमगुणस्थान तक द्रव्य और भाव नपुंसकवेदी जीव रहते हैं किन्तु छठे गुणस्थान से नवमें गुणस्थानपर्यन्त भाव से ही नपुंसकवेदी जीव पाये जाते हैं, वहाँ द्रव्य से कोई नपुंसकवेदी नहीं हो सकते हैं, ऐसा इस सूत्र के द्वारा निश्चितरूप से समझना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में द्रव्य और भाव नपुंसकवेदी जीवों के क्षेत्र का निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ ।


संप्रति वेदविरहितानां गुणस्थानापेक्षया क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-

अवगदवेदएसु अणियट्टिप्पहुडि जाव अजोगिकेवली केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।४५।।

अर्थो ज्ञायते। इमे नवमगुणस्थानस्य अवेदभागादारभ्य अयोगिकेवलिपर्यन्ताः महामुनयः चतुर्लोकानाम-संख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे स्वस्थानस्थाः तिष्ठन्ति। इमे मारणान्तिकसमुद्घातगताः उपशामकाः चतुर्लाेकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे च तिष्ठन्ति इति कथितं भवति।
संप्रति सयोगिनां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
सजोगिकेवली ओघं।।४६।।
पूर्वं प्ररूपितार्थमिदं सूत्रमिति अत्र एतस्यार्थो नोच्यते।
तात्पर्यमेतत्-इमां वेदमार्गणां ज्ञात्वा पूर्णब्रह्मचर्यं पालयित्वा अपगतवेदस्थानानि प्राप्तव्यानि।
एवं तृतीयस्थले वेदरहितमहामुनीनां क्षेत्रप्ररूपणत्वेन सूत्रद्वयम् गतम्।
इति षट्खंडागमप्रथमखंडे तृतीयग्रन्थे क्षेत्रानुगमनाम्नितृतीयप्रकरणे
गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां
वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः समाप्तः।

अब वेदरहित-अपगतवेदी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा से क्षेत्र निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी जीवों में अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के अवेदभाग से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।४५।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अर्थ यह जानना है कि ये नवमें गुणस्थान के अवेद भाग से आरम्भ करके अयोगिकेवली नामक चौदहवें गुणस्थानपर्यन्त महामुनि चारों लोकों के असंख्यातवें भाग में तथा मनुष्य क्षेत्र के संख्यातवें भाग में स्वस्थान में स्थित रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त उपशामक-उपशमश्रेणी वाले मुनि चारों लोकों के असंख्यातवें भाग में और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, ऐसा कहा गया है।

अब सयोगिकेवली गुणस्थानवर्ती अरिहंत भगवंतों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी सयोगिकेवली भगवन्तों का क्षेत्र ओघ के समान है।।४६।।

सूत्र का अर्थ पूर्व मेें प्ररूपित किया जा चुका है, इसलिए यहाँ पुनः इसका अर्थ नहीं कहा जा रहा है।

तात्पर्य यह है कि इस वेदमार्गणा को जानकर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करके वेदरहित अवस्था को प्राप्त करना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वेदरहित महामुनिराजों के क्षेत्र का निरूपण करने वाले को सूत्र पूर्ण हुए।

विशेषार्थ-वेदमार्गणा के प्रकरण में तीनों वेद वाले जीवों का, अपगतवेदी महामुनियों एवं केवली भगवन्तों का क्षेत्र बताते हुए वेदरहित अवस्था प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान की गई है। सो यहाँ सामान्य और सरलरूप में वेद के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करने हेतु बताते हैं-

पुरिसिच्छिसंढवेदोदयेण, पुरिसिच्छिसंढओ भावे।

णामोदयेण दव्वे, पाएण समा कहिं विसमा।।

अर्थात् पुरुष, स्त्री और नपुंसक वेदकर्म के उदय से भावपुरुष भावस्त्री, भावनपुंसक होता है और नामकर्म के उदय से द्रव्यपुरुष द्रव्यस्त्री, द्रव्यनपुंसक होता है। सो यह भाववेद और द्रव्यवेद प्रायः करके समान होते हैं परन्तु कहीं-कहीं विषम भी होते हैं। वेद नामक नोकषाय के उदय से जीवों के भाववेद होता है और निर्माण नामकर्म सहित आंगोपांग नामकर्म के उदय से द्रव्यवेद होता है। ये दोनों ही वेद प्रायः करके तो समान ही होते हैं अर्थात् जो भाववेद वही द्रव्यवेद और जो द्रव्यवेद वही भाववेद परन्तु कहीं-कहीं विषमता भी हो जाती है अर्थात् भाववेद दूसरा, द्रव्यवेद दूसरा। यह विषमता देवगति और नरकगति में तो सर्वथा नहीं पाई जाती है, मनुष्य और तिर्यग्गति में जो भोगभूमिज हैं उनमें भी नहीं पाई जाती है, बाकी के तिर्यञ्च मनुष्यों में क्वचित वैषम्य भी पाया जाता है। वेद के तीन भेद होते हैं-पुरुष, स्त्री और नपुंसक वेद। नरकगति में द्रव्य और भाव दोनों वेद नपुंसक ही हैं। देवगति में पुरुष, स्त्रीरूप दो वेद हैं, जिनके जो द्रव्यवेद है, वही भाववेद रहता है, यही बात भोगभूमिजों में भी है। कर्मभूमि के तिर्यंच और मनुष्य में विषमता पाई जाती है। किसी का द्रव्यवेद पुरुष है तो भाववेद पुरुष, स्त्री या नपुंसक कोई भी रह सकता है, हां! जन्म से लेकर मरण तक एक ही वेद का उदय रहता है, बदलता नहीं है। द्रव्य से पुरुषवेदी, भाव से स्त्रीवेदी या नपुंसकवेदी है फिर भी मुनि बनकर छठे-सातवें आदि गुणस्थानों को प्राप्त कर मोक्ष जा सकते हैं किन्तु यदि द्रव्य से स्त्रीवेद है और भाव से पुरुषवेद है तो भी उसके पंचम गुणस्थान के ऊपर नहीं हो सकता है। अतएव दिगम्बर आम्नाय में स्त्रीमुक्ति का निषेध है। पुरुषवेद-जो उत्कृष्ट गुण या भोगों के स्वामी हैं, लोक में उत्कृष्ट कर्म को करते हैं, स्वयं उत्तम हैं, वे पुरुष हैं। स्त्रीवेद-जो मिथ्यात्व असंयम आदि से अपने को दोषों से ढके और मृदुभाषण आदि से पर के दोष को ढके, वह स्त्री है। नपुंसकवेद-जो स्त्री और पुरुष इन दोनों लिंगों से रहित हैं, र्इंट के भट्टे की अग्नि के समान कषाय वाले हैं, वे नपुंसक हैं। स्त्री और पुरुष का यह सामान्य लक्षण है, वास्तव में रावण आदि अनेक पुरुष भी दोषी देखे जाते हैं और भगवान की माता, आर्यिका महासती सीता आदि अनेक स्त्रियाँ महान श्रेष्ठ देखी जाती हैं। अतः सर्वथा एकान्त नहीं समझना चाहिए। तृण की अग्निवत् पुरुषवेद की कषाय, कंडे की अग्निवत् स्त्रीवेद की कषाय और अवे की अग्नि समान नपुंसकवेदी की कषाय से रहित जो अपगतवेदी हैं, वे अपनी आत्मा से ही उत्पन्न अनन्त सुख को भोगते रहते हैं। ऐसे उन अपगतवेदी सिद्धपरमेष्ठी भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए वेदरहित अवस्था प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।

इस प्रकार षट्खंडागम ग्रंथ के प्रथम खंड में तृतीय ग्रंथ के क्षेत्रानुगम नामक तृतीय प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिन्तामणि टीका

में वेदमार्गणा नामक पंचम अधिकार समाप्त हुआ।