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२०. बाल ब्रह्मचारी रवीन्द्रकुमार ‘भाई जी’ से बने रवीन्द्रकीर्ति ‘स्वामी जी’

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बाल ब्रह्मचारी रवीन्द्रकुमार ‘भाई जी’ से बने रवीन्द्रकीर्ति ‘स्वामी जी’

-प्रो. डी. ए. पाटिल, जयसिंहपुर, (चेयरमैन-दक्षिण भारत जैन सभा)

२० नवम्बर २०११, यह तारीख भारत वर्ष के सभी जैन धर्मियों के लिए एक परिवर्तन का दिन है। क्योंकि इसी दिन जम्बूद्वीप तीर्थ के द्वितीय पीठाधीश के रूप में भारत को रवीन्द्रकीर्ति जी मिले हैं। यह दिन महत्वपूर्ण इसलिए है कि पूरे भारतवर्ष को पीठाधीश के रूप में धर्मसंरक्षण करने वाला एक महापुरुष मिला है। जिसने पूरे भारत में अपनी मधुरता, सरलता, सहजता, कर्मठता व निश्छलता से अपनी अलग पहचान बनाई है तथा सबको अपना बनाया है। उस महान व्यक्तित्व का नाम है - कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन जो वर्तमान के नूतन पीठाधीश बने हैं। १९५० में टिकैतनगर (बाराबंकी) उ.प्र. में जन्मे हुए बा.ब्र. रवीन्द्रकुमार जी ने पहले सन् १९६८ में पूज्य माताजी से दो वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत लिया पुन: सन् १९७२ में उन्होंने पूज्य आचार्य श्री धर्मसगार जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया। आगे १९८७ में उन्होंने पूज्य माताजी से सप्तम प्रतिमा व्रत धारण करके सम्पूर्ण घर-बार का त्याग कर दिया।

किसी भी तीर्थ अथवा धर्मसंस्था को सुसस्थापित रखने के लिए, उसके सही संचालन के लिए भट्टारक, पीठाधीश्वर अथवा धर्माधिकारी पद की आवश्यकता होती है। गुरु परम्परा में चलने वाली इन पीठों के माध्यम से धर्म की प्रभावना, संस्कृति का संरक्षण - संवर्धन तथा विकास होता है। इसी कारण सन् १९८७ को जम्बूद्वीप तीर्थ में धर्म पीठ की स्थापना की गई और पीठाधीश्वर के रूप में क्षुल्लकरत्न श्री मोतीसागर जी को बनाया गया। विगत १० नवम्बर को उन्होंने मुनि अवस्था में समाधिमरण प्राप्त किया। पश्चात् पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार जी को द्वितीय पीठाधीश घोषित करके विधिवत् १० प्रतिमा व्रत प्रदान किया और श्वेत वस्त्र में दिखने वाले ‘‘भाई जी’’ अब भगवे वस्त्र धारण करके पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति ‘स्वामी जी’ बन गये।

रवीन्द्रकीर्ति जी ने अपना सर्वस्व जीवन धर्म और समाज के लिए अर्पित किया है। देश की सभी जैन संस्थाओं से उनका निकट का संबंध रहा है। दक्षिण भारत जैन सभा से भी उनका संबंध अत्यन्त आत्मीयता का रहा है। सभा और त्रिलोक शोध संस्थान मानो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की परम्परा और बीसपंथी आम्नाय आगे भी दृढ़तापूर्वक चलाने या समाज के किसी कार्य के निमित्त से जब भी हम उनसे मिलते हैं, तब धर्म, समाज के प्रति उनकी चिंता, चिंतन और संस्था की प्रगति के संबंध में हमें गंभीरता दिखाई देती है। दक्षिण भारत जैन सभा को कोई भी काम हो या जम्बूद्वीप का यह दोनों संस्थाएँ मानों घुल-मिलकर परस्पर संबंध दृढ़ करके आगे बढ़ रहे हैं। इसका हमें बड़ा गर्व महसूस होता है।

बा. ब्र. रवीन्द्रकुमार जी संस्थाओं का प्रबंधन एवं कार्यक्रमों का अत्यन्त कुशलतापूर्वक नियोजन, संचालन करते हैं। उनके इसी वैशिष्टों से ही पूज्य माताजी ने अनेक क्षेत्रों का उद्धार तथा विकास किया है। भाई जी के चिंतन, नियोजन, सूक्ष्म निरीक्षण तथा संचालन से महाराष्ट्र में मांगीतुंगी जी पर्वत पर विशाल १०८ फुट निर्माणाधीन भगवान आदिनाथ की मूर्ति जल्दी ही पूर्णत: साकार होगी इसका हमें पूरा विश्वास है।

पीठाधीश परमपूज्य रवीन्द्रकीर्ति महास्वामी जी को दक्षिण भारत की दिगम्बर जैन समाज की प्रतिनिधि संस्था ‘दक्षिण भारत जैन सभा’ की ओर से बहुत सारी शुभकामनाएँ व वन्दन।