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‘पर्यावरण-संरक्षण और तीर्थंकर पार्श्वनाथ'

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‘पर्यावरण-संरक्षण और तीर्थंकर पार्श्वनाथ’

—प्राचार्य निहालचंद जैन, बीना (म.प्र.)

आज सम्पूर्ण विश्व में चिंतन, चेतावनी और चिंता का दौर चल रहा है। पृथ्वी की सुरक्षा के लिए चेतावनी का विषय है पर्यावरण, चिन्तन का विषय है। पर्यावरण-प्रदूषण और चिंता है कि प्रदूषण से पर्यावरण किस प्रकार संरक्षित किया जाए। जीवन के संदर्भ में पर्यावरण-प्रदूषण दो घटकों से जुड़ा है-प्रथम बाह्य-घटक है जिनके अंतर्गत-पृथ्वी, जल, वायु, ध्वनि, ताप और आण्विक-रेडियोधर्मी तत्त्वों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण की बात आती है। दूसरा घटक आंतरिक है-जो व्यक्ति की शुभाशुभ भावनाओं, उसके मानसिक द्वन्द एवं तनाव से सम्बद्ध है। जीवन का आन्तरिक स्वरूप इससे प्रभावित/आन्दोलित रहता है।

कमठ के जीव और मरुभूति के जीव की संघर्ष-

कथा-कमठ के जीव और मरुभूति के जीव पार्श्वनाथ के विगत दस भवों की संघर्ष-कथा का यदि पर्यावरण के संदर्भ में अध्ययन करें तो हमें एक नई दृष्टि प्राप्त होती है। संवरासुर अहंकार, क्रोध एवं वैर की ज्वाला में दग्ध है। उसकी आन्तरिक पर्यावरणीय चेतना, बैर के कालुष्य से विकृत है। उसके अनेक जन्मों की कषायें कभी कुक्कुट सर्प और कभी भयंकर अजगर के रूप में उद्भूत होती हैं। प्रतिशोध से भरे उसके रौद्र-परिणाम प्रत्येक भव में मरुभूति के जीव का प्राणान्त करते हैंं। इसके विपरीत मरुभूति का जीव, साधना और संयम की मंजिलें उत्तरोत्तर प्राप्त करता हुआ, भीतर के पर्यावरण को विशुद्ध बनाता है। मरुभूति का जीव कभी हाथी की पर्याय में सल्लेखना पद से कर्म-निर्जरा कर अच्युत स्वर्ग में जाता है। कभी ग्रैवेयक में अहमिन्द्र/इन्द्र बनकर भावी तीर्थंकर के रूप में वाराणसी नगरी में महाराजा अश्वसेन के राजगृह में पाश्र्व्नााथ के रूप में जन्म लेता है। एक ओर दुष्ट कमठ का जीव अपने खोटे परिणामों के कारण, आंतरिक पर्यावरण को विक्षुब्ध कर रहा है और दूसरी ओर मरुभूति की आत्मा सम्यक्त्व की राह पर चलकर अपने आंतरिक पर्यावरण को निर्मल और प्रदूषण-मुक्त बना, परिष्कृत कर रही है। दसवें भव में संवर असुर के घोर उपसर्ग के सामने भगवान पार्श्वनाथ की असीम सहनशक्ति मानो उस आसुरी शक्ति पर धवल चेतना की एक अक्षय विजय है। पार्श्वनाथ के नाना महिपाल तापसी वेश धारण कर अपने सात सौ शिष्यों के साथ पञ्चाग्नि तप कर रहे हैं। जंगल के काष्ठों को जलाकर आग प्रज्वलित रखते हैंं। निरंतर आग से उठता धुँआ, अहर्निश वायु प्रदूषण का मुख्य कारक बनता है। पार्श्वनाथ की दृष्टि ने केवल अन्तस् के चेतन-पर्यावरण को विशुद्ध रखने की थी, वरन् वे बाह्य पर्यावरण-संरक्षण के लिए महीपाल तापस को व्यर्थ जंगल के काष्ठों को काटकर आग न जलाने के लिए कहते हैं। महीपाल तापस वही कमठ का जीव है, जो विगत कई भवों से प्रतिशोध से परितप्त है। राजकुमार पार्श्वनाथ के प्रतिरोध करने पर वह तमतमा कर आग-बबूला हो उठता है तथा काष्ठ के मोटे-मोटे लठ्ठोें को विदीर्ण करने के लिए उठाता है। पार्श्वकुमार ने अपने अवधिज्ञान से जाना कि जिन काष्ठ-खंडों को वह चीरने जा रहा है, उसमें युगल सर्प हैं। दयाद्र्र ‘पार्श्वनाथ’ कुल्हाड़ी से उन काष्ठों को चीरने से मना करते हैं, लेकिन तापस उल्टा उन्हीं पर कुपित होकर लक्कड़ को चीर देता है जिससे युगल सर्पों के दो टुकड़े हो जाते हैं। करूणा भाव से कुमार पार्श्वनाथ उन्हें कल्याणकारी महामंत्र ‘णमोकार’ सुनाकर सम्बोधते हैं। समता भावोें से मरण को प्राप्त हुए वही युगल सर्प, धरणेन्द्र एवं पद्मावती होते हैं, जो आगे चलकर भगवान पार्श्वनाथ की तपस्या करते हुए घोर उपसर्ग से रक्षा करते हैं। यह घटना दो तथ्य उजागर करती है— १. तीर्थंकर बालक पार्श्वनाथ की दृष्टि में लकड़ी को निष्प्रयोजन जलाना, पर्यावरण संरक्षण के प्रतिकूल है। २. अिंहसा और जीव दया की निष्काम भावना से व्यक्ति अन्तस और बाह्य दोनों पर्यावरण को स्वच्छ बनाता है।

दुष्ट संवर के उपसर्ग-घोर प्रदूषण के प्रतीक-

संवर देव ने सात दिन तक भीषण उपसर्ग किये। ये उपसर्ग वस्तुत: पर्यावरण-प्रदूषण के ही रूप थे। अपार जलराशि, अग्नि की प्रचण्डता, तेज झंझावात, मेघ-गर्जन, तड़ित की कर्वश ध्वनियाँ, पर्वत खण्डों का प्रबल आवेग एवं नर-कंकालों सहित व्रूर हिंसक नृत्यादि का प्रदर्शन। इन भयंकर उपसर्ग जनित प्रदूषणों से रक्षा करने के लिए धरणेन्द्र सात फणों वाले नाग के रूप में प्रकट हुआ। उसने विशाल फण-मण्डल तैयार कर, ध्यानस्थ भगवान पार्श्वनाथ को चारों ओर से ढंक लिया। भगवान पार्श्वनाथ की विश्वकल्याण कामना से सम्पूरित भावना की फलश्रुति के रूप में धरणेन्द्र का आना और प्रकृति के विक्षोभ को दूर करना-पर्यावरण संरक्षण की गहन दृष्टि थी। धरणेन्द्र के सात फन सात प्रकार के प्रदूषणों से रक्षा करने के प्रतीक हैं। सात दिन तक प्रदूषण का विप्लव जारी रहा। जब इंद्र ने रौद्र रूप जल की उत्तुंग लहरें उठते देखीं और सम्पूर्ण वनखंड को समुद्र में बदलते देखा तब उसने कमठासुर पर ‘महायुद्ध वङ्का’ घुमाकर फैका। जिससे वह भयाक्रान्त हो भागा और फिर कहीं शरण न पाकर जिनेन्द्र प्रभु पार्श्वनाथ की शरण में जाकर नतशीश हुआ। संवरसुर की पराजय पर्यावरण-प्रदूषण की निरर्थकता की द्योतक है। पाश्र्व-प्रभु की उपसर्गों पर विजय पर्यावरण-संरक्षण की निर्मल दृष्टि का प्रतीक है। सम्पूर्ण घटना में हिंसा, अहिंसा के मुकाबले हार जाती है। क्षुद्र संवर का हृदय-परिवर्तन, पर्यावरण की विजय है।

पर्यावरण संरक्षण का मूल अहिंसा—

भगवान पार्श्वनाथ अहिंसा के प्रबल संवाहक बने। अहिंसा पर्यावरण संरक्षण का मूल आधार है। आज मानव हथियारों से ज्यादा रेडियोधर्मी विनाशक धूल एवं आण्विक-शक्ति से घबड़ाया हुआ है। अहिंसा, प्रकृति और पर्यावरण को संरक्षित करने का पहला पाठ पढ़ाती है। भगवान पार्श्वनाथ ने अहिंसा का समर्थ उपदेश देकर आर्य-आर्येतर जातियों को अहिंसा धर्म में संस्कारित किया।

वन सहजीवी संस्कृति और अहिंसा-

भगवान पार्श्वनाथ की तपस्या का मूलस्थान ‘अश्व वन’ था। वस्तुत: वनों पर आधारित सहजीवी जीवन-पद्धति में अहिंसा की पूर्ण प्रतिष्ठा है जिससे भोजन, पेय, औषधि, रसायन आदि की व्यवस्था सम्भव है। प्राकृतिक वनों से पर्यावरण पूर्ण सन्तुलित रहता है। ‘कल्पवृक्ष’ की अवधारणा, वन संस्कृति के श्रेष्ठ अवदान का प्रतीक है। वृक्षों को उस समय ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता रहा, जब वे जीवन की सारी आवश्यकताएँ पूरी कर दिया करते थे। भगवान पार्श्वनाथ वन्य संस्कृति से जुड़े ‘महायोगी’ अनुत्तर पुरूष थे। उनका दिगम्बरत्व-प्रकृति एवं पर्यावरण से तादात्म्य स्थापित करने के लिए था, वे रमणीय थे। यही कारण है कि वन-बहुल प्रान्त बिहार एवं उड़ीसा तथा बंगाल में पैâले लाखों सराक, बंगाल के मेदिनीपुर जिले के सद्गोप तथा उड़ीसा के रङ्गिया आदिवासी इनके परम भक्त हैं। निश्चित ही पार्श्वनाथ के उपदेशों का इनके लोक जीवन पर अमिट प्रभाव पड़ा; जिससे ये जातियाँ आज भी इन्हें अपना ‘कुल देवता’ मानती हैं। तय है कि वन-पर्यावरण के सन्निकट रहने वाले भगवान पार्श्वनाथ के शरीर का वर्ण हरित था। हरित वर्ण वृक्षों की हरियाली तथा वनों की हरीतिमा का प्रतीक है। अत: हम कह सकते हैं कि पार्श्वनाथ का परमौदिक शरीर पर्यावरण-संरक्षण का जीवन्त उदाहरण है। महामुनि भगवान पार्श्वनाथ प्रथम पारणा के दिन आहार हेतु गुल्मखेट नगर आये थे, यहाँ धन्य नामक राजा ने नवधा भक्तिपूर्वक परमान्न—खीर का आहार दिया। तत्पश्चात् देवों ने पंचाश्चर्य किये। उन सभी पंचाश्चर्यों का संबंध पर्यावरण-संरक्षण और पर्यावरण-विशुद्धि से था। ये हैं-शीतल सुगन्धित पवन बहना, सुरभित जल-वृष्टि, देवकृत पुष्पवर्षा, देव-दुन्दुभि एवं जयघोष।

भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण स्थल एवं पर्यावरण चेतना-

भगवान पार्श्वनाथ की निर्वाण भूमि श्री सम्मेदशिखर है, जो बिहार प्रांत (अब झारखंड प्रांत) में ‘पारसनाथ हिल’ के नाम से जानी जाती है, यह सम्पूर्ण जैन समाज की पवित्र भूमि है। यहाँ २० तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया था। यह पर्वत सघन वन से आच्छादित है और पर्यावरण संरक्षण का जीवन्त स्थान है। पर्वत पर पारसनाथ टोंक सबसे ऊँची है, जिससे चारों ओर का मनोहारी प्राकृतिक दृश्य आँखों की शीतलता/स्निग्धता प्रदान करता है। यहाँ का सम्पूर्ण पर्यावरण शुद्ध प्राणवायु आक्सीजन का फैला हुआ अपार भण्डार है, जो वातावरण में अधिकतम प्रतिशत के रूप में विद्यमान है। पैदल वन्दनार्थी भक्तगणों के यही आक्सीजन अपार शक्ति का संचार करती है और २७ कि.मी. की यह पर्वत की चढ़ाई यात्रा में थकान महसूस नहीं होने देती। एक ओर जहाँ भक्त की श्रद्धा कार्य करती है तो बाह्य घटक के रूप में यह प्राणवायु श्वासोें में घुलकर ऊर्जा का स्रोेत बनती है। सम्मेदाचल पाश्र्वप्रभु की पर्यावरण चेतना का संवाहक है।

पर्यावरण संरक्षण में पाश्र्वप्रभु की महती भूमिका-

पर्यावरण संरक्षण में भगवान पार्श्वनाथ पर विहङ्गम दृष्टि भगवज्जिनसेनाचार्य ने अपने अमर महाकाव्य ‘पाश्र्वाभ्युदय’ के माध्यम से डाली है। उन्होेंने संवर के माध्यम से मेघ के रूपों और उसके प्रतिफलों को अधिक विस्तार से वर्णित किया तथा अध्यात्मनिष्ठ निर्मल भावों के साक्ष्य से यह सिद्ध किया कि पाश्र्व प्रभु याचक नहीं, अपितु परिपूर्ण समर्थ शक्तिवान हैंं। कमठ का अधम जीव संवर, मेघों के द्वारा उनके चित्त में क्षोभ उत्पन्न करना चाहता है और सोचता है कि उनका धैर्य डगमगाने पर किसी तरह उन्हें मार डालूँगा, लेकिन वह पार्श्वनाथ की आत्मशक्ति से अपरिचित था। आचार्य जिनसेन की दृष्टि में, संवर देव काम, क्रोध एवं मद से युक्त रागद्वेष के द्वन्दों में झूल रहा है।वहीं वीतरागी प्रभु निश्छल समाधि की ओर बढ़ते हुए आत्म वैभव को पाने वाले हैं। भगवान पाश्र्वप्रभु का बाहरी पर्यावरण, जिसमें वे तपस्या लीन हैं जितना स्वच्छ और निर्दोष है, उनका आभ्यन्तर पर्यावरण भी रागद्वेष, मोह, आसक्ति, कामना, वासना आदि प्रदूषणों से मुक्त पूर्ण स्वच्छ बन चुका है। वहाँ न काम शेष है न कामना। उस निरंजन पर्यावरण में अक्षय शांति के अजस्र स्रोत खुल गये हैं। सही है जिनका आभ्यन्तर शुद्ध पारदर्शी परिष्कृत हो चुका उसका बाहरी पर्यावरण फिर कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। आत्म तत्त्व की अजेय शक्ति के सामने बाहर की सारी विद्रूप शक्तियाँ लड़खड़ा जाती हैं।

तीर्थंकर पार्श्वनाथ की वाणी में करूणा, मधुरता और शांति की त्रिवेणी समाहित है। करूणा में अहिंसा, मधुरता में प्रेम और शांति में समता झांकती है। उन्होंने अहिंसा को अजेय शक्ति के सहारे तपाग्नि तपते तापसी-परम्परा का शुद्धीकरण किया और विवेक व ज्ञान युक्त तप की प्रशस्त दिशा दी। संक्षेप में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में तीर्थंकर पार्श्वनाथ की पारगामी दृष्टि उल्लेखनीय है। उन्होंने जीवन व जगत को प्रकृति के साथ चलने के लिए कहा क्योंकि प्रकृति पर्यावरण के संरक्षण के प्रति प्रतिपल समर्पित है।