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‘‘वर्तमान युग में धर्म की प्रासंगिकता’’

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‘‘वर्तमान युग में धर्म की प्रासंगिकता’’

‘‘बदल गया परिवेश देश का, बदल गये आचार—विचार, खान—पान भी बदल गया है, बदले हैं नैतिक आधार।

मायाचार का जाल है फैला, झुलस रहा है धर्माचार,

हिंसा —हत्या की भट्टी में, जलने लगे हैं सद् आचार,
सत्य तिरोहित अंधकार में , पनप रहा है भ्रष्टाचार,
विश्व समस्या ग्रस्त हो गया, चारों और है हाहाकार।
वर्तमान का समय भयानक, करना होगा गहन विचार।
धर्म राह पर चलने से ही, हो सकता है बेड़ा पार।’’

आज यदि हम विश्व पटल के वर्तमान परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि विश्व वसुंधरा पर छाई आसुरी प्रवृत्तियों ने धरती की संचित शोभा—सुषमा को अपने विकराल जाल में जकड़ने की पूर्ण तैयारी कर ली है। आज विश्व में धन—वैभव के मूल्य बढ़ गये हैं और नैतिकता के मूल्य शून्य हो गये हैं। गरीबी की गरिमा, सादगी का सौंदर्य, संघर्ष का हर्ष समता का स्वाद, आस्था का आनंद सभी जनसाधारण के आचरण से पतझर के पत्तों की भांति झर गये हैं। उद्देश्य रहित चिंतन और आदर्श रहित चरित्र नारकीय वातावरण उत्पन्न कर रहा है।हिंसा का तांडव चल रहा है, सत्य अंधकार में विलीन हो गया है।भ्रष्टाचार, कदाचार, अनियंत्रित यौनाचार, मायाचार आदि पापाचारों के आचार का स्वाद लोगों की जीभ पर चढ़ गया है। हिंसा, झूठ, डाके, चोरी, राहजनी, आगजनी, कालाबाजारी, तस्करी नशावृत्ति, आदि प्रवृत्तियां बिना किसी अंकुश के आगे बढ़ती जा रही है। आधुनिक शासक रक्षक बनने के बजाय भक्षक बनते जा रहे हैं। भाई—भतीजावाद ने न्याय—व्यवस्था की धज्जियां बिखेर दी हैं। अपरिग्रह का आदर्श पुस्तकों में बंद हो गया है, ब्रह्मचर्य की भावना आधुनिक विलासता के आवरण में लुप्त होती जा रही है। आवागमन के साधनों की बहुलता ने विश्व की दूरी अवश्य कम कर दी है, किन्तु मानव—मानव के मध्य दिलों की दूरी बढ़ा दी है। शस्त्र निर्माण की आक्रामण वृत्ति ने सम्पूर्ण मानव जाति की अन्त्येष्ठि की तैयारी कर ली है। प्रदूषण फैल रहा है, पर्यावरण नष्ट हो रहा है। आज की नारियां नारी स्वातंत्रय के नाम पर उच्छृंखल होती जा रही हैं, तथा आज की युवा पीढ़ी संस्कारों के अभाव में गुमराह होती जा रही है। भौतिकी, बौद्धिकी और औद्योगिकी तूफानी प्रगति ने भले ही सुविधा साधनों के पर्वत खड़े कर दिये हों परन्तु आज का मानव अंदर से खोखला एवम् बाहर से ढकोसला मात्र रह गया है। अणु आयुधों की सैन्य सज्जा ने अवश्य ही इंद्रव्रजों को पीछे छोड़ दिया है परन्तु आज का मानव इतना आतंकित आशंकित और असुरक्षित है जितना कि आदिम युग में रहा होगा। वर्तमान समय में मानव अस्तित्व अभिमन्यु की भांति ऐसे चक्रव्यूह में फंस गया है जिसमें से मात्र धर्म का आश्रय लेकर ही निकला जा सकता है। धर्म का पालन करना अंधविश्वास या रूढ़ि नहीं, धर्म पिछड़ापन नहीं, वरन् धर्म मानव मात्र के लिये धारण करने का नाम है। धर्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है—

‘‘सर्व जनों का पालन कर्ता, सब सुखों का उत्पादक,

सर्व कामना पूरनकर्ता, दु:ख असुरों का संहारक।
कर्म वनों का दाहनकर्ता, दुर्गति जीवों का उद्धारक,
काम—क्रोध का निरसनकर्ता, मोक्षगति का संवाहक।’’

जिस प्रकार अग्नि का प्राण उष्णता है, जल का प्राण शीतलता है, उसी प्रकार मानव समाज का प्राण धर्म है। यदि समाज से धर्म को निकाल दिया जाये तो समाज धर्म से विमुख होकर अर्थहीन एवम् अस्तित्व विहीन हो जायेगा मनुष्य की शारीरिक भूख मिटाने के लिये तो भौतिक पदार्थों का सेवन काफी है परन्तु मानव की अंतस् की भूख मिटाने के लिए आदिकाल से ही धर्म आगे आया है।धर्म ने कई ऐसे उलझनों एवम् समस्याओं को हल किया है ; जिनका हल आज भी ज्ञान की अन्य शाखाओं के पास नहीं है। । धर्म हमारे व्यक्तिगत , सामाजिक , शारीरिक एवम् पारलौकिक कत्तव्यों का संचालक है। धर्म से हमारा जीवन संगीतमय बनता है और सत्य के साथ शिवमय भी। धर्म सर्वश्रेष्ठ कला है जो जीवन को शाश्वत सौंदर्य प्रदान करती है। धर्म अनुपम मंगल है संसार की समस्त समस्याओं के समाधान एवम् संसाररूपी समुद्र से पार उतरने के लिये धर्म ही एकमात्र साधन है। सत्य ही तो कहा गया है—

‘‘संसार है एक समुद्र मानों, इसे महादुस्तर जानो,

ना धर्म नौका अवलंबन होगा, तो डूबने में ना विलंब होगा।’’

भौतिक वादी युग में धर्म की अपेक्षा धन का महत्व बढ़ गया है। वर्तमान मानव—समाज ने विषय—कषायों के साथ पाणिग्रहण कर लिया है और धर्म तत्व के विषय में वह विधुरावस्था में है। जंगली प्रदेश में जिस प्रकार जवाहरात का मूल्य नहीं है उसी तरह जड़वाद के जमाने में धर्म—तत्व का मूल्य नहीं है । मनुष्य सुख की इच्छा तो करता है, परन्तु सुख के उपादान कारण धर्म की ओर से मुँह फैर लेता है। वर्तमान विषम परिस्थितियों में मानव का धर्म के साथ साक्षात्कार होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि धर्म के अभाव में मोहरूपी उन्मान का रोग, राग—रूपी ज्वर का रोग, द्वेष रूपी शूल का रोग, विषय—कषाय रूपी खुजली का रोग, ईष्र्या व निंदा रूपी रक्तपात का रोग, अज्ञान रूपी अंधत्व का रोग तथा प्रमाद रूपी जलोदर जैसे अनेकों कष्ट साध्य रोग हो जाते हैं जो कि शरीर के समान ही समाज व राष्ट्र को मरणासन्न स्थिति में पहुँचा देते हैं।

धन —लिप्सा में लिप्त विलासी मानवों को धर्म का महत्व समझना होगा क्योंकि धर्म से परिचय ना होने के कारण ही वह अनैतिक कृत्यों में लिप्त होकर समाज के लिये ‘घुन’ के समान हो जाता है। धर्म की सही पहचान ना होने के कारण ही पंथवाद पनपता है। और हमारी संवेदनशीलता तथा धार्मिकता संप्रदायवाद की संकरी गलियों में फंसकर गुमराह हो गई है।धर्म के नाम पर पनप रहे मतभेद धर्म के नाम पर हो रही हत्यायें, झगड़े, मंदिर—मस्जिद , गुरूद्वारों को तोड़ने की क्रियायें धर्म का अंश मात्र भी नहीं छूती, क्योंकि इस तरह के लोगों का धर्म चूना, मिट्टी , पत्थर और ईटों से परे जिंदा लोगों की सांसों को सुरक्षित नहीं कर सकता। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं, धर्म सुई का कार्य करता है कैंची का नहीं, संसार में धर्म वही है जो प्राणिमात्र के कल्याण के लिये संकेत करता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सब के लिये प्रकाशमान होती हैं, उसी प्रकार शस्त्रोक्त धर्म भी सभी के उद्धार एवम् अभ्युदय के लिये होता है, क्योंकि

‘‘धर्म वह है जो अर्न्तचेतना जगा दे,

धर्म वह है जो बिछुडे को गले मिला दे।
धर्म वह है जो शैतान को इंसान बना दे,
धर्म वह है जो इंसान को भगवान बना दें।’’

संत्रास आंतक एवम् हिंसा से परिपूर्ण वर्तमान विश्व में आवश्यकता है आध्यात्मिक मानव के सृजन की। आधुनिक भौतिकता वादी हिंसात्मक वातावरण वाले वर्तमान विश्व को गंभीरतम समस्या से मुक्ति दिलाने के लिये, सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, ब्रह्म तथा अनेकांत जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत जो कि भगवान महावीर द्वारा आज से २६०० वर्ष पूर्व प्रसारित किये गये थे। पुन: अमल में लाना होगा। जैन धर्म के सिद्धांतों में जाति की गरिमा नहीं आचरण की महिमा है। जन्म नहीं कर्म की महत्ता है। इनके अनुसार कोई भी व्यक्ति समता से श्रमण, ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण, आत्मज्ञान से साधु तथा साधना से परमेश्वर बन सकता है। अहिंसा का आचरण विश्व मैत्री का ग्रंथ है, अनेकांत शांति का मंत्र है, अपरिग्रह मुक्ति के मार्ग है, सत्य आत्म विश्लेषण की कुंजी है अर्थात् धर्म के ये मूल सिद्धांत जिन्हें कमोवेश सभी धर्म स्वीकारते हैं। सामायिक नहीं शाश्वत सत्य है, युग—युग तक पथ—प्रदर्शन करने वाले महान दीप हैं, सुख—समृद्धि का अनुपम द्वार है, अमर शांति का अक्षय स्त्रोत तथा सामाजिक विकास के सबल स्तंभ हैं। जैन धर्म विश्व धर्म है, कहते हैं जिस क्षण विश्व जैन धर्म के सिद्धान्तों को आत्मसात् करेगा, मानवता के गुणों से अंगीकृत होगा वह क्षण स्वर्णिम क्षण होगा। राग—द्वेष, हिंसा और विरोध का केवल अतीत होगा ना वर्तमान ना भविष्य । जैन धर्म की प्रासंगिकता के बारे में तो यही कहूंगी—

‘‘जैन धर्म है अमिट हमारा, है अपने प्राणों से प्यारा।

चमक रहा है आज महक में जैसे नील गगन में तारा।
आओ सब मिल प्यार से, सत्य अहिंसा हथियार से,
धर्म—ध्वजा को और फहराये, भारत सीमा पर पहुँचायें।।’’

श्रीमति उषा पाटनी
ऋषभ देशना
जुलाई २०१४