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(१५) राम का अयोध्या प्रवेश

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राम का अयोध्या प्रवेश

      माता कौशल्या सुमित्रा के साथ अपने सतखण्डे महल की छत पर खड़ी हैं और पताका के शिखर पर बैठे हुए कौवे से कहती है-‘‘रे रे वायस! उड़ जा, उड़ जा, यदि मेरा पुत्र राम घर आ जायेगा तो मैं तुझे खीर का खोजन देऊँगी।’’ पागल सदृश हुई कौशल्या को जब कौवे की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिलता है तब वह नेत्रों से अश्रु वर्षाते हुए विलाप करने लगती है -

      ‘‘हाय पुत्र! तू कहाँ चला गया? ओह!....बेटा! तू कब आयेगा? मुझ मंदभागिनी को छोड़कर कहाँ चला गया?.....’’ इतना कहते-कहते दोनों माताएं मुक्त कंठ से रोने लगती हैं। इसी बीच क्षुल्लक के वेष में अवद्वार नाम के नारद को आते देख उनको आसन देती हैं। बगल में वीणा दबाए नारद माता को रोते देख आश्चर्यचकित हो पूछते हैं -

      ‘‘मातः! दशरथ की पट्टरानी, श्रीराम की सावित्री माँ! तुम्हारे नेत्रों में ये अश्रु कैसे? क्यों?.....कहो, कहो, जल्दी कहो किसने तुम्हें पीड़ा पहुँचाई है?’’ कौशल्या कहती है -

      ‘‘देवर्षि! आप बहुत दिन बाद आये हैं अतः आपको कुछ मालूम नहीं है कि यहाँ क्या-क्या घटनाएं घट चुकी हैं?’’ ‘‘मातः! मैं धातकीखंड में श्री तीर्थंकर भगवान की वंदना करने गया था उधर ही लगभग २३ वर्ष तक समय निकल गया। अकस्मात् आज मुझे अयोध्या की स्मृति होआई कि जिससे मैं आकाश मार्ग से आ रहा हूँ।’’ कुछ शांत चित्त हो अपराजिता ‘सर्वभूतिहित’ मुनि का आगमन, पति का दीक्षा ग्रहण, राम का वनवास, सीताहरण और लक्ष्मण पर शक्ति प्रहार के बाद विशल्या का भेजना यहाँ तक का सब समाचार सुना कर पुनः रोने लगती है और कहती है -

      ‘‘हे नारद! आगे क्या हुआ? सो मुझे कुछ भी विदित नहीं है मेरा पुत्र सुख में है या दुःख में कौन जाने?..... इतना कहकर पुनः विलाप करती है -

      ‘‘हे पुत्र! तू किस दशा मे है? मुझे खबर दे। हे पतिव्रते सीते! बेटी! तेरा संकट से छुटकारा हुआ या नहीं? तू दुष्ट रावण द्वारा वैâसे हरी गई? समुद्र के मध्य भयंकर दुःख को कैसे झेला होगा?’’ यह सब सुनते हुए नारद उद्विग्नमना हो वीणा को एक तरफ पेंâक देते हैं और मस्तक पर हाथ धर कर बैठ जाते हैं। पुनः कुछ क्षण विचार कर कहते हैं -

      ‘‘हे कौशल्ये! हे शुभे! अब तु म शोक छोड़ो। मैं शीघ्र ही तुम्हारे पुत्रों का समाचार लाता हूँ । हे देवि! इतना कार्य तो मैं ही कर सकता हूँ। शेष कार्य में आपका पुत्र ही समर्थ है।’’ इतना कहकर नारद बगल में वीणा दबाकर आकाश मार्ग से उड़ गये।.....वे नारद लंका नगरी में पहुँच कर पद्म सरोवर के तट पर क्रीड़ा करते हुए अंगद के साथियों से पता लगाकर श्रीराम की सभा में पहुँचे। नमस्कार करके आसन पर बिठाकर उनका कुशल समाचार पूछने के बाद रामचन्द्र पूछते हैं -

      ‘‘हे देवर्षि! इस समय आप कहाँ से आ रहे हैं?’’‘‘मैं दुःख के सागर में डूबी हुई आपकी माता के पास से आपको उनका समाचार बताने के लिए आ रहा हूूँ। हे देव! आपके बिना आपकी माता बालक से बिछुड़ी हुई सिंहनी के समान व्याकुल हो रही हैं। तुम जैसे सुपुत्र के रहते हुए वह पुत्रवत्सला माता रो-रो कर महल में छोटा- मोटा सरोवर बना रही हैं। ओह!.....श्रीराम! उठो, जल्दी चलो, माता के दर्शन करो, क्यों बैठे हो?’’ इतना सुनते ही रामचन्द्र विह्वल हो उठते हैं। उनकी आँ खें सजल हो जाती हैं। लक्ष्मण भी रो पड़ते हैं। तब विद्याधर लोग उन्हें सान्त्वना देने लगते हैं। रामचन्द्र कहते हैं -

      ‘‘अहो ऋषे! इस समय आपने हमारा बहुत बड़ा उपकार किया है। कुछ अशुभोदय से हम लोग माताओं को बिल्कुल ही भूल गये थे। अहो! आपने स्मरण दिला दिया, सो इससे प्रिय और क्या हो सकता है? जो माता की विनय में तत्पर रहते हैं वास्तव में वे ही सत्पुत्र कहलाते हैं।’’ इतना कहकर श्रीरामचन्द्र नारद की पूजा करते हैं पुनः विभीषण भामण्डल, सुग्रीव आदि को बुलाकर कहते हैं -

      ‘‘हे विभीषण! इन्द्रध्वज सरीखे इस भवन में मुझे रहते हुए लगभग छह वर्ष का लम्बा समय व्यतीत हो गया। यद्यपि माता के दर्शनों की लालसा हृदय में विद्यमान थी फिर भी आज मैं उनके दर्शन करके ही शांति का अनुभव करूँगा तथा दूसरी माता के समान अयोध्या के दर्शन की भी उत्कंठा हो रही है।’’ विभीषण ने समझ लिया कि अब इन्हें यहाँ रोकना शक्य नहीं है तब वे कहते हैं -

      ‘‘हे नाथ! यद्यपि आपका वियोग हम लोगों को सहना ही होगा, फिर भी आप कम से कम भी सोलह दिन कीअवधि मुझे और दीजिए। हे देव! मैं अभी-अभी अयोध्या के लिए दूत को भेज रहा हूँ।’’

      जब राम असमर्थता व्यक्त करने लगते हैं तब विभीषण अपने मस्तक को उनके चरणों में रख देते हैं और जब राम उनकी बात मानकर ‘तथास्तु’ कह देते हैं तभी वे मस्तक ऊपर उठाते हैं। पुनः विभीषण, सुग्रीव आदि मंत्रणा करके माता के पास समाचार भिजवा देते हैंऔर अयोध्या नगरी को इतनी अच्छी सजाते हैं कि वह एक नवीन ही रूप धारण कर लेती है। रत्नों के बने हुए तोरणद्वार, पताकायें, मंगल कलश आदि से वह नगरी अनुपम शोभा को प्राप्त हो जाती है।

      विभीषण को लंका का राज्य सौंप कर और सुग्रीव आदि को यथायोग्य राज्य देकर श्रीराम सीता सहित पुष्पक विमान में आरूढ़ हो अयोध्या की तरफ प्रस्थान कर देते हैं। लक्ष्मण, भामंडल आदि अपने-अपने परिवार सहित अपने-अपने वाहनों पर आरूढ़ होकर चल पड़ते हैंं। मार्ग में सीता को परिचित स्थानों की स्मृति दिलाते हुए रामचन्द्र अयोध्या के निकट पहुँच जाते हैं।

      इधर से राजा भरत हाथी पर सवार हो भाइयों के स्वागत हेतु नगरी के बाहर आ जाते हैं। भरत को आता देख श्रीराम अपने विमान को पृथ्वी पर उतार लेते हैंं उस समय भरत हाथी से उतरकर स्नेह से पूरित हो सैकड़ों अर्घ्यों से उनकी पूजा करते हैं और कर-कमल जोड़कर नमस्कार करते हैं। राम उन्हें अपनी भुजाओं में भर लेते हैं। उस समय ‘भ्रातृ-मिलन’ अपने आप में एक ही उदाहरण रह जाता है चूँकि उसके लिए अन्य उदाहरण और कोई भी नहीं हो सकता है।

      पुनः राम लक्ष्मण और भरत को पुष्पक विमान में बिठाकर नगरी में प्रवेश करते हैंं। वहाँ के लोग कृतकृत्य हो राम की आरती कर रहे हैं, पुष्पवृष्टि कर रहे हैं और जय-जयकारों की ध्वनि से पृथ्वीतल एवं आकाशमंडल को एक कर रहे हैं। सभी लोग आपस में एक-दूसरे का परिचय करा रहे हैं। ये लोग सर्व प्रथम राजभवन में पहुँचते हैं। माताएं महल की छत से उतर कर नीचे आ जाती हैं।

      कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी और सुप्रभा मंगलाचार में कुशल चारों माताएं राम-लक्ष्मण के समीप आती हैं। दोनों भाई विमान से उतरकर माता के चरणों में नमस्कार करते हैंं। उस समय स्नेह से पूरित उन माताओं के स्तनों से दूध झरने लगता है। वे सैकड़ों आशीर्वाद देते हुए पुत्रों का आलिंगन करती हैं। उनकी आँखों से वात्सल्य के अश्रू बरसने लगते हैं। पुत्रों के मस्तक पर हाथ पेâरते हुए उन माताओं को इतना सुख का अनुभव होता है कि वह अपने आप में नहीं समाता है। सीता को हृदय से लगाकर उसे सैकड़ों आशीर्वाद देते हुए माता कौशल्या एक अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त हो जाती हैं।