ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्त्याग भावनायै नमः"

(३) द्रौपदी स्वयंवर एवं पाण्डव वनवास

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(३) द्रौपदी स्वयंवर एवं पाण्डव वनवास

किसी समय शौर्यपुर में राज्य करते हुए राजा समुद्रविजय के राजमहल में रानी शिवादेवी के आँगन में सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने रत्नों की वर्षा करना शुरू कर दिया। प्रतिदिन साढ़े बारह करोड़ रत्न बरसते थे। महाराज समुद्र- विजय इन रत्नों को याचकों को बाँट देते थे।

श्री, ह्री, धृति,कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नाम की षट् कुमारिकाओं ने माता की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। छह महीने बाद माता शिवादेवी ने ऐरावत हाथी आदि सोलह स्वप्न देखे। प्रात: पति से उनका फल विदित किया कि ‘‘तीन लोक के स्वामी तीर्थंकर शिशु तुम्हारे गर्भ में आ गया है।’’ ऐसा सुनकर रानी शिवादेवी बहुत ही प्रसन्न हुर्इं। यह तिथि र्काितक शुक्ला षष्ठी थी।

नव महीने व्यतीत हो जाने के बाद श्रावण सुदी छठ के दिन माता ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। उस समय तीर्थंकर शिशु के पुण्यप्रभाव से चारों प्रकार के देवों के यहाँ बिना बजाये शंख, घंटा, भेरी, सिंहनाद आदि बाजे बजने लगे। इंद्रों के आसन काँपने लगे, उनके मुकुट झुक गये और कल्पवृक्षों से पुष्प बरसने लगे।

अवधिज्ञान के द्वारा जिनेन्द्र भगवान के जन्म को जानकर सौधर्म इन्द्र महावैभव से असंख्यातों देव-देवियों सहित शौर्यपुर आया, तब इंद्राणी ने प्रसूतिगृह में जाकर जिनबालक को उठा लिया और बाहर लाकर इंद्र को दे दिया। इंद्रराज जिनबालक को लेकर महामहोत्सव सहित ऐरावत हाथी पर बैठकर सुदर्शन मेरु के ऊपर जा पहुँचे। वहाँ पर पांडुकशिला पर जिनबालक को विराजमान करके क्षीरसागर से भरकर लाए हुए ऐसे १००८ स्वर्णकलशों से जिनप्रभु का जन्माभिषेक किया। इन्द्राणी ने बालक को वस्त्राभरणों से अलंकृत किया। इंद्र ने बालक का ‘नेमिनाथ’ नामकरण किया। अनंतर महावैभव से लाकर माता-पिता को देकर आनन्द से तांडव नृत्य आदि करके अनेक देवों को जिन बालक के साथ क्रीड़ा करने के लिये नियुक्त कर इन्द्रराज अपने स्थान पर चले गये।

इधर बालक नेमिनाथ क्रम-क्रम से वृद्धि को प्राप्त होते हुये युवावस्था में आ गये।