ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

(३) द्रौपदी स्वयंवर एवं पाण्डव वनवास

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
(३) द्रौपदी स्वयंवर एवं पाण्डव वनवास

DT9bEk9T7.jpg
DT9bEk9T7.jpg

किसी समय शौर्यपुर में राज्य करते हुए राजा समुद्रविजय के राजमहल में रानी शिवादेवी के आँगन में सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने रत्नों की वर्षा करना शुरू कर दिया। प्रतिदिन साढ़े बारह करोड़ रत्न बरसते थे। महाराज समुद्र- विजय इन रत्नों को याचकों को बाँट देते थे।

श्री, ह्री, धृति,कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नाम की षट् कुमारिकाओं ने माता की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। छह महीने बाद माता शिवादेवी ने ऐरावत हाथी आदि सोलह स्वप्न देखे। प्रात: पति से उनका फल विदित किया कि ‘‘तीन लोक के स्वामी तीर्थंकर शिशु तुम्हारे गर्भ में आ गया है।’’ ऐसा सुनकर रानी शिवादेवी बहुत ही प्रसन्न हुर्इं। यह तिथि र्काितक शुक्ला षष्ठी थी।

नव महीने व्यतीत हो जाने के बाद श्रावण सुदी छठ के दिन माता ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। उस समय तीर्थंकर शिशु के पुण्यप्रभाव से चारों प्रकार के देवों के यहाँ बिना बजाये शंख, घंटा, भेरी, सिंहनाद आदि बाजे बजने लगे। इंद्रों के आसन काँपने लगे, उनके मुकुट झुक गये और कल्पवृक्षों से पुष्प बरसने लगे।

अवधिज्ञान के द्वारा जिनेन्द्र भगवान के जन्म को जानकर सौधर्म इन्द्र महावैभव से असंख्यातों देव-देवियों सहित शौर्यपुर आया, तब इंद्राणी ने प्रसूतिगृह में जाकर जिनबालक को उठा लिया और बाहर लाकर इंद्र को दे दिया। इंद्रराज जिनबालक को लेकर महामहोत्सव सहित ऐरावत हाथी पर बैठकर सुदर्शन मेरु के ऊपर जा पहुँचे। वहाँ पर पांडुकशिला पर जिनबालक को विराजमान करके क्षीरसागर से भरकर लाए हुए ऐसे १००८ स्वर्णकलशों से जिनप्रभु का जन्माभिषेक किया। इन्द्राणी ने बालक को वस्त्राभरणों से अलंकृत किया। इंद्र ने बालक का ‘नेमिनाथ’ नामकरण किया। अनंतर महावैभव से लाकर माता-पिता को देकर आनन्द से तांडव नृत्य आदि करके अनेक देवों को जिन बालक के साथ क्रीड़ा करने के लिये नियुक्त कर इन्द्रराज अपने स्थान पर चले गये।

इधर बालक नेमिनाथ क्रम-क्रम से वृद्धि को प्राप्त होते हुये युवावस्था में आ गये।