ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

-कुण्डलपुर का ऐतिहासिक स्वरूप-

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

[सम्पादन]
कुण्डलपुर का ऐतिहासिक स्वरूप-(फरवरी २००३ में प्रस्तुत)

-डा. ब्रजेशकुमार ‘वर्मा’, नालंदा (बिहार)

जैनियों का संबंध ‘कुण्डलपुर’ से अतिप्राचीन काल से ही रहा था और रहेगा यह ‘कुण्डलपुर’ नगरी ही जैनधर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से भगवान महावीर की पावन जन्मभूमि है। वर्तमान में कई आधुनिक इतिहासकारों तथा पुरातत्वविदों ने इस स्थल को दिग्भ्रमित बनाये रखा कि भगवान महावीर की जन्मस्थली कुण्डलपुर नहीं है वैशाली है किन्तु जैन साहित्य ग्रंथों, पुराणों तथा विदेशी यात्रियों के द्वारा तैयार किये गये विवरणों के आधार पर तथा पुरातात्विक अवशेषों के प्रमाण के आधार पर जैन समाज के वरिष्ठ विद्वानों को पूर्ण विश्वास है कि हमारे जैन तीर्थंकरों में भगवान् महावीर की पावन जन्मभूमि ‘कुण्डलपुर’ ही है।

इस कुण्डलपुर में अति भव्य नंद्यावर्त महल बना हुआ था जहाँ भगवान महावीर का जन्म हुआ था। काल के थपेड़ों ने इस पवित्र भूमि के अस्तित्व को मिटाने का नाना प्रयास करना चाहा किन्तु जैन संतों एवं प्रत्येक जिन धर्मानुयायियों के द्वारा आस्था एवं विश्वास ‘कुण्डलपुर’ में हमेशा बनाये रहने के कारण आज भी वह जन्मभूमि श्रद्धा का केन्द्र बनी हुई है। वर्तमान समय में ‘कुण्डलपुर’ में जैनसमाज की सर्वोच्च साध्वी परम पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा द्वारा भव्य नंद्यावर्त महल एवं विशाल जिनमंदिरों का पुन: निर्माण कार्य जारी है। पुरातत्वविदों के अनुसार भी यह ज्ञात होता है कि ‘कुण्डलपुर’ के दिगम्बर जैन मंदिर के पश्चिम में टीलों में जैन तीर्थंकर भगवान महावीर का प्राचीन एवं पावन भव्य महल जमीन के गर्भ में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ा हुआ है। अनेक प्रमाणों के अनुसार यह ज्ञात होता है कि वास्तव में भगवान महावीर की जन्मभूमि ‘कुण्डलपुर’ ही थी। इसके और बहुत सारे प्रमाण नालंदा पुरातात्विक संग्रहालय से प्राप्त जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों से जाने जा सकते हैं कि नालंदा पूर्व में जैनियों का ही केन्द्रबिन्दु था किन्तु अन्य धर्म के सम्प्रदायों ने आगे चलकर ‘राजनीतिक संरक्षण’ के कारण इस धर्म के भाव-भंगिम रूप को परिवर्तित कर दिया।

वर्तमान समय में जो नालंदा विश्वविद्यालय बना हुआ है वह कुछ खोजकर्ताओं के अनुसार जैन तीर्थंकर भगवान् महावीर के प्राचीन राजमहल के पुरातात्विक अवशेष के रूप में जाना जा रहा है। जैन धर्म अनादि निधन है और भगवान महावीर से पूर्व २३ तीर्थंकर इसमें हो चुके हैं, महात्मा बुद्ध भगवान महावीर के समकालीन थे उस समय तक जैनधर्म का एक व्यापक रूप था उस जिनधर्म के अनुयायी मगध प्रांत के राजा उदयन, अजातशत्रु , बिम्बसार और चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्बसार आदि अनेक राजागण थे। जिनके द्वारा मगध प्रांत व अनेक प्रांतों में जैन गुफाओं, मठों, तथा जैन संस्कृति को प्रत्यारोपित करने का विवरण साहित्य ग्रंथों में मिलता है। दिगम्बर जैनियों की परम्पराओं के अनुसार ‘कुण्डलपुर’ ही जैनियों के २४ वें तीर्थंकर भगवान महावीर की पावन जन्मभूमि के रूप में आस्था का स्थल है। अतएव यहां कई दशकों पूर्व से ही जैन लोग ‘भगवान महावीर की जन्मभूमि’ के रूप में दर्शन के लिए आया करते हैं। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है कि भगवान महावीर की पावन जन्मभूमि कुण्डलपुर ही है।

जैनधर्म का ऐतिहासिक स्वरूप-जैनधर्म अनादि निधन है इसका कोई निर्माता नहीं है, यह युगों-युगों से प्राणिमात्र के लिए हितकारी है। जैनधर्म के तीर्थंकरों में ऋषभदेव प्रथम, पाश्र्वनाथ २३वें तथा भगवान महावीर २४वें तीर्थंकर हैं। इन्होंने जैनधर्म को विशेष रूप से पुष्पित एवं पल्लवित किया। भगवान महावीर के समय हिंसा का अत्यधिक बोलबाला होने से जैनमत की बिखरी पड़ी प्राचीन परम्परा, उसके अहिंसक स्वरूप एवं सांस्कृतिक इतिहास को एक माला के रूप में गूँथकर उन्होंने सजाया और संवारा। इनका जन्म विदेह देश (बिहार प्रदेश) की राजधानी कुण्डलपुर में ई.पू. ५९९ में आज से २६००वर्ष पूर्व माता त्रिशला देवी (प्रियकारिणी) के पवित्र गर्भ से भव्य नंद्यावर्त महल में हुआ था। नाथवंशीय राजा सिद्धार्थ इनके पिता थे। वर्तमान में कुण्डलपुर (नालंदा) जिला (बिहार प्रदेश) में स्थित है। जैनधर्म के अनुयायी कुण्डलपुर नालंदा को २६०० वर्षों से जन्मकल्याणक से पवित्र भूमि के रूप में पूजते आ रहे हैं। लेकिन इधर कुछ दशकों से कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने अपने शोधों एवं खुदाई में प्राप्त मात्र कुछ अवशेषों के माध्यम से वैशाली में एक कुण्डग्राम बनाकर उसे भगवान महावीर की जन्मभूमि बतलाया है। इस क्रम में जैन सम्प्रदाय के कुछ अनुयायी भी दिग्भ्रमित होकर वैशाली स्थित कुण्डग्राम को भगवान महावीर की जन्मभूमि बतलाने लगे हैं और कतिपय शोधकर्ताओं एवं आधुनिक इतिहासकारों के शोधों के आधार पर ही बिहार सरकार शासन ने भी १९५६ में वैशाली को भगवान् महावीर की जन्मभूमि स्वीकार कर पाठ्य-पुस्तकों में भी प्रकाशित कर दिया जिससे जनसाधारण भी इस दिशा में दिग्भ्रमित हो गए किन्तु यह जैनधर्म ग्रंथों के आधार पर नितान्त गलत व निराधार है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर की वास्तविकता को स्पष्ट किया जाये जिससे मानव जाति व जैन अनुयायी महावीर की जन्मभूमि के बारे में विस्तृत रूप से सत्य का दर्शन कर सकें तथा जैनधर्म से संबंधित भविष्य में होने वाले शोधों में वास्तविक सत्यों को उद्घाटित कर सकें यदि ऐसा नहीं किया गया तो भगवान महावीर जन्मभूमि के संबंध में मानव-जाति व जैन अनुयायियों के सामने एक विकट समस्या उत्पन्न हो जायेगी। इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि जब तक महावीर जन्मभूमि को स्पष्ट नहीं किया जायेगा तब तक संसार का कल्याण होना बहुत ही मुश्किल है। जब हम जैनधर्म के प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते हैं तो महावीर की जन्मभूमि का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होता है। जैनधर्म के सार-तत्त्व को ग्रहण कर हम महावीर की जन्मभूमि को विवादग्रस्त होने से बचा सकते हैं। उपर्युक्त परिपे्रक्ष्य में जैनियों की ऐतिहासिक धरोहर भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर की प्रासंगिकता एवं महत्व परिलक्षित होता है।

जैनधर्म में भगवान महावीर जन्मभूमि कुण्डलपुर से संबंधित सामग्री का बाहुल्य है। इस सिलसिले में यह कहा जा सकता है कि जैनियों का सर्वप्राचीन ग्रंथ ‘तिलोयपण्णत्ति’ है जिसमें विभिन्न प्रसंगों में महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर का प्रसंग यत्र-तत्र बिखरा पड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम कुण्डलपुर से संबंधित उन बिखरे पड़े प्रसंग रूपी पुष्पों को चुनकर एक माला के रूप में गुम्फित करें जिससे इसके सौन्दर्यवर्धन का कार्य हो सके। मात्र तिलोयपण्णत्ति में ही नहीं बल्कि ‘धवला’, ‘जयधवला’, ‘उत्तरपुराण’, हरिवंशपुराण, महावीर पुराण, वर्धमान चरित्र आदि अनेक ग्रंथों के अवलोकन से भी उपर्युक्त तथ्यों की पुष्टि होती है। इन ग्रंथों के अतिरिक्त ‘षट्खण्डागम’, ‘वीरजिणिन्दचरिउ’ आदि महाग्रंथों के अध्ययन से भी तथ्य से संबंधित तत्त्वों की उपलब्धि होती है। माणिक्यचन्द्र जैन, खण्डवा द्वारा लिखित ‘थ्ग्fा दf श्aप्aन्ग्ra' तथा पंडित बलभद्र जैन द्वारा लिखित ‘भारत के दिगम्बर जैन तीर्थ’ पुस्तक में इस विषय से संबंधित प्रचुर सामग्री प्राप्त हो सकती है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई में प्राप्त अवशेषों से भी भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर का स्पष्ट संकेत मिलता है। इसका आशय यह है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई में भगवान ऋषभदेव, भगवान पार्श्वनाथ और भगवान महावीर की मूर्तियों के साथ-साथ प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण अभिलेख का भी प्रमाण ज्ञात है और जैनधर्म से संबंधित कई अनेक प्रकार की सामग्री भी मिली है। जिससे पुरातत्वविदों ने यह प्रमाणित किया है कि नालंदा बौद्धों से पूर्व जैनों का पवित्र नगर था जहाँ भगवान महावीर का जन्म हुआ था। कुछ पुरातत्व-विदों के अनुसार यह अनुप्रमाणित है कि नालंदा विश्वविद्यालय की उत्तर दिशा में, जो आज कुण्डलपुर के नाम से जैन सम्प्रदाय में ख्यातिबद्ध है, इसके आसपास ऐतिहासिक स्थलों, टीलों आदि का पुरातत्वविदों द्वारा अन्वेषण कराया जाये तो ऐसा अनुमान है कि भगवान महावीर के भव्य राजमहल नंद्यावर्त के अवशेष को उत्खनन कराकर प्रदर्शित किया जा सकता है। लेकिन वर्तमान में कुछ जैन अनुयायी नालंदा विश्वविद्यालय की खुदाई में प्राप्त अवशेषों एवं जैनधर्म के ग्रंथों के अध्ययन के आधार पर यह बतलाते हैं कि नालंदा विश्वविद्यालय ही कभी नंद्यावर्त महल का अवशेष रहा होगा।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खुदाई में प्राप्त अवशेषों, पुरातत्वविदों के प्रमाणित दस्तावेजों, जैन अनुयायियों एवं जैनधर्म से संबंध रखने वाले विद्वानों की सहायता से भी इस विषय से संबंधित सामग्री उपलब्ध हो सकती है। इतना ही नहीं, जैनधर्म के दिगम्बर सम्प्रदाय के ग्रंथों में भी महावीर जन्मस्थली कुण्डलपुर के तथ्यों का अवलोकन किया जा सकता है।

इस प्रकार भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर के परिप्रेक्ष्य में हमें विस्तृत क्षेत्र दृष्टिगोचर होता है। यहाँ पर प्रयास किया गया है कि जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर से संबंधित विस्तृत क्षेत्र का आकलन किया जाये जिससे हम वर्तमान युग को संत्रस्त मानवता एवं जैन अनुयायियों का परित्राण कर यथार्थ को स्पष्ट कर सवेंâ, इसके आधार पर हम केवल वर्तमान जैन सम्प्रदाय का ही कल्याण करने में सक्षम नहीं होंगे बल्कि भविष्य में भी मानवता के संरक्षक के रूप में कार्य करने में सक्षम हो सवेंâगे। आज अनुसंधान एवं अन्वेषण की अनेक पद्धतियों का प्रचलन है। उन पद्धतियों में लेखा-जोखा प्रस्तुत करने वाली पद्धति, तुलनात्मक पद्धति, आलोचनात्मक पद्धति, विश्लेषणात्मक पद्धति, पुरातात्विक सर्वेक्षण पद्धति है। प्रस्तुत प्रस्तावित शोध के अनुक्रम में इन विभिन्न गवेषणात्मक पद्धतियों का अवलम्बन व सहयोग लिया जावे क्योंकि किसी एक ही पद्धति से यह काम संभव नहीं है।

चूँकि जैनधर्म के ग्रंथों में अनेक प्रकार की सामग्री प्रचुरता के साथ उपलब्ध है अतः उपर्युक्त विभिन्न गवेषणात्मक पद्धतियों के अवलम्बन के आधार पर वर्तमान शोधकर्ता लेखक भगवान महावीर की जन्मभूमि कुण्डलपुर से संबंधित एक विशिष्ट कृति का उदाहरण प्रस्तुत करने का इच्छुक है। इस कार्य के लिए विभिन्न पाठ्य-ग्रंथों के अध्ययन की अपेक्षा के साथ ही साथ इस विषय के ज्ञान रखने वाले विभिन्न शिक्षाविदों से विचार-विमर्श की भी कम अपेक्षा नहीं है। इस प्रकार प्रस्तुत शोध-प्रबंध एक विशिष्ट रूप में उपस्थित होकर, मानव-कल्याण में एवं जैनमत के पोषकों के बीच योगदान करने का कार्य कर सकेगा। इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं की जा सकती है। भगवान महावीर का व्यक्तित्व विश्लेषण- १. कंचनकाया २. कर्मयोगी ३. अद्भुत साहसी ४. लोक-प्रदीप५. करुणामूर्ति ६. दिव्य-तपस्वी ७. लोक कल्याण और लोकप्रियता ८. स्वावलम्बी ९. अहिंसा के अवतार१०. क्रान्तिदृष्टा ११. पुरुषोत्तम १२. निःस्वार्थ । वस्तुतः तीर्थंकर महावीर के व्यक्तित्व मेें एक महामानव के सभी गुण विद्यमान थे। वे स्वयंबुद्ध और निर्भीक साधक थे और अिंहसा ही उनका साधन सूत्र था। उनके मन में न कुन्ठाओं को स्थान प्राप्त था और न तनावों को। प्रथम दर्शन में ही व्यक्ति उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाता था। यही कारण है कि इन्द्रभूति गौतमजैसे तलस्पर्शी ज्ञानी पंडित भी भगवान महावीर के दर्शनमात्र से प्रभावित हुए और उनके शिष्य बन गए। यह सार्वजनिक सत्य है कि यदि व्यक्ति के मुख पर तेज, छवि में सौन्दर्य, आँखों में आभा, ओठों पर मंद मुस्कान, शरीर में चारुता, अंतरंग में निश्छल प्रेम हो तो वह सहज में ही अन्य व्यक्तियों को आकृष्ट कर लेता है। महावीर के बाह्य और अंतरंग दोनों ही व्यक्तित्व अनुपम थे। उनका शारीरिक गठन, संस्थान और आकार जितना उत्तम था उतना ही वीतरागता का तेज भी दीप्ति युक्त था।

वृष के समान मांसल स्कन्ध, चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त पदकमल, लम्बी भुजाएं, आकर्षक सौम्य चेहरा उनके बाह्य व्यक्तित्व को भव्यता प्रदान करते थे। साथ ही तपःसाधना, स्वावलम्बन वृत्ति, श्रमणत्व का आचार, तपोपलब्धि, संयम, सहिष्णुता, अद्भुत साहस, आत्मविश्वास आदि अंतरंग गुण उनके आभ्यन्तर व्यक्तित्व को आलोकित करते थे। महावीर धर्मनेता, तीर्थंकर, उपदेशक एवं संसार के मार्गदर्शक थे। जो भी उनकी शरण या छत्र छाया मेें पहुँचा उसे ही आत्मिक शांति उपलब्ध हुई। निस्संदेह वे विश्व के अद्वितीय क्रांतिकारी, तत्त्वोपदेशक और जननेता थे। उनकी क्रांति एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। उन्होंने सर्वतोमुखी क्रांति का शंखनाद किया, आध्यात्मिक दर्शन, समाज-व्यवस्था, धर्मानुष्ठान-तपश्चरण यहाँ तक कि भाषा के क्षेत्र में भी अपूर्व क्रांति की। तत्कालीन तापसों की तपस्या के बाह्यरूप के स्थान में आभ्यन्तर रूप प्रदान किया। पारस्परिक खण्डन-मण्डन में निरत दार्शनिकों को अनेकांतवाद का महामंत्र प्रदान किया। इस प्रकार महावीर का व्यक्तित्व आद्यन्त क्रांति, त्याग, तपस्या, संयम, अहिंसा आदि से अनुप्राणित है। ऐसे महामना तीर्थंकर को पाकर निश्चितरूप से कुण्डलपुर नगरी एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर है। सैकड़ों वर्षों से उपेक्षित इस तीर्थ का सन् २००३ में जैन समाज द्वारा हो रहा विकास नालंदा जिले ही नहीं, पूरे बिहार प्रांत के लिए महान गौरव की बात है। पूज्य ज्ञानमती माताजी जैसी सर्वोच्च साध्वी के हम आभारी हैं और पुरातत्त्व विभाग द्वारा हम लोग कुछ भी सहयोेग देने में अपना अहोभाग्य समझेंगे।