ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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---संत श्री एलाचार्य

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विषय सूची

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एलाचार्य श्री [तिरुवल्लुवर] द्वारा रचित ग्रंथ-“तिरुक्कुरल[कुरल-काव्य]“

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प्रस्तुति-धनेश कुमार जैन

यह तमिल भाषा में रचित नीति-ग्रंथ है / इसका हिंदी अनुवाद स्व.प.गोविंदराम जैन शास्त्री ने पू. आचार्य श्री 108 विद्यानंद जी की प्रेरणा से किया है/ इस ग्रंथ मे मानव जीवन के सर्वांगीण- निर्माण की प्रेरक सूक्तियों एवं मूलमन्त्रों को 108 परिच्छेदों में विभक्त किया गया है / इस ग्रंथ में वर्णित सूक्तियां कुंद-कुंद साहित्य के अनुकूल लगतीं हैं / इन सूक्तियों को विषय-वार क्रमवद्ध रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है ---------


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परिच्छेद-1 ईश्वर- स्तुति‌‌‌‌‌‌‌‌------

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1- “अ” जिस प्रकार शब्द –लोक का आदि वर्ण है ठीक उसी प्रकार आदि भगवान भगवान-आदिनाथ पुराण – पुरुषों में आदिपुरुष हैं /

2- यदि तुम सर्वज्ञ परमेश्वर के श्रीचरणों की पूजा नहीं करते हो तो तुम्हारी सारी विद्वता किस काम की /

3- जो मनुष्य उस कमलगामी परमेश्वर के पवित्र चरणों की शरण लेता है वह जगत में दीर्घजीवी होकर सुख-सम्रिद्धि के साथ रहता है /

4- धन्य है वह मनुष्य जो आदिपुरुषके पादारविंद में रत रहता है / जो न किसी से राग करता है और न घ्रिणा/ उसे कभी कोई दुख नही होता /

5- देखो जो मनुष्य प्रभु के गुणों का उत्साहपूर्वक गान करते हैं उन्हें अपने भले – बुरे कर्मों का दुःखद फल नहीं भोगना पडता /

6- जो लोग उस परम पिता जितेन्द्रिय पुरुष के द्वारा दिखाये गये धर्म-मार्ग का अनुशरण करते हैं वे चिरंजीवी अर्थात अजर-अमर बनेंगे /

7- केवल वे ही लोग दुःखों से बच सकते हैं जो उस अद्वितीय पुरुष की शरण में आते हैं /

8- धन-वैभव और इंद्रिय-सुख के तूफानी समुद्र को वे ही पार कर सकते हैं जो उस धर्म –सिंधु मुनीश्वर के चरणों में लीन रहते हैं /

9- जो मनुष्य अष्ट गुणों से मण्डित परब्रह्म के आगे सिर नहीं झुकाता वह उस इंद्रिय के समान है जिसमें अपने गुणों [विषय] को ग्रहण करने की शक्ति नहीं है /

10- जन्म-मरण के समुद्र को वे ह्ई पार कर सकते हैं जो प्रभू के चरणों की शरण में आ जाते हैं / दूसरे लोग उसे पार नहीं कर सकते /

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परिच्छेद-2 मेघ-महिमा-----

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1- समय पर न चूकने वाली मेघ-वर्षा से ही धरती अपने को धारण किये हुये है और इसी लिये लोग उसे अमृत कहते है/

2- जितने भी स्वादिष्ठ खाद्य पदार्थ है वे सब वर्षा के ही द्वारा मनुष्य को प्राप्त होते हैं,और जल स्वयं ही भोजन का एक मुख्य अंग है/

3- यदि पानी न बरसे तो सारी पृथ्वी पर अकाल का प्रकोप छा जाये यद्यपि वह चारोंओर समुद्र से घिरी हुई है /

4- यदि स्वर्ग के झरने [मेघ-वर्षा]सूख जावे,तो किसान लोग हल जोतना ही छोड देंगे /

5- वर्षा ही नष्ट करती है और वर्षा ही नष्ट हुई वस्तुओं को फिर से हरा-भरा कर देती है /

6- स्वयं शक्ति-शाली समुद्र में ही कुत्सित वीभत्सता का दारुण प्रकोप हो उठे यदि आकाश उसके जल को पान करना और फिर उसे वापिस देना अस्वीकार कर दे /

7- यदि आकाश से पानी की बौछारें आना बंद हो जायें, तो घास तक का उगना बन्द हो जायेगा /

8- यदि स्वर्ग [मेघों] का जल सूख जाये,तो पृथ्वी पर न यज्ञ होंगे और न भोज ही दिये जायेंगे /

9- यदि ऊपर से जल-धारायें आना बंद होजायें,तोफिर इस पृथ्वी पर न कहीं दान रहे,न कहीं तप /

10-पानी के बिना संसार में कोई काम नहीं चल सकता,इसलिये सदाचार भी अन्ततः वर्षा पर ही आश्रित हैं /


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परिच्छेद-3, मुनि-महिमा-----

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1- जिन लोगों ने इंद्रियों के समस्त भोगों को त्याग दिया है और जो तपस्वी जीवन व्यतीत करते है, धर्मशास्त्र उनकी महिमा को अन्य सब बातों से अधिक उत्क्रिष्ट बताते हैं /

2- तुम तपस्वी लोगों की महिमा को नहीं नाप सकते / यह काम उतना ही कठिन है,जितना कि दिवंगत आत्माओं की गडना करना /

3- जिन लोगों ने परलोक के साथ इह लोक की तुलना करने के पश्चात इसे त्याग दिया है,उसकी महिमा से यह पृथ्वी जगमगा रहीहै /

4- जो पुरुष अपनी सुदृढ इच्छा शक्ति के द्वारा अपनी पांचों इंद्रियों को इस तरह वश में रखता है,जिस तरह हाथी अंकुश द्वारा वशीभूत किया जाता है,वही वास्तव में स्वर्ग के खेतों में बीज बोने योग्य है /

5- जिसने इंद्रियों की तृष्णा शमन की है,उस तपश्वी के तप में क्या सामर्थ्य है,यदि यह देखना चाहते हो,तो देवाधिदेव इंद्र की ओर देखो /

6- महान पुरुष वेही हैं,अशक्त कार्यों को भी सम्भव कर लेते है और क्षुद्र वे हैं,जिनसे यह काम नही हो सकता /

7- जो स्पर्ष,रस,गंध,रूप,और शब्द -इन पाँच इंद्रिय-विषयों का यथोचित उपभोग करता है,वह सारे संसार पर शासन करेगा /

8- संसार भर के धर्मग्रंथ,सत्यवक्ता महात्माओं की महिमा की घोषणा करते हैं /

9- त्याग की चट्टान पर खड़े हुए महात्माओं के क्रोध को एक क्षण भी सह-लेना असम्भव है ।

10-दाधु-प्रक्रिति पुरुषों को ही "ब्राह्मण" कहना चाहिये,क्योंकि वे ही लोग सब प्राणियों पर दया रखते हैं ।


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परिच्छेद-4, धर्म-महिमा-----

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1- धर्म से मनुष्य को मोक्ष मिलता है और उससे स्वर्ग की भी प्राप्ती होती है,फिर भला धर्म से बढकर लाभदायक वस्तु और क्या है/

2- धर्म से बढकर दूसरा और कोई भला काम नहीं,और उसे भुला देने से बढकर दूसरी कोई बुराई नहीं है /

3- सत्कर्म करने में तुम लगातार लगे रहो,अपनीपूरी शक्ति और उत्साह के साथ उन्हें करते रहो /

4- अपना अंतःकरण पवित्र रखो,हर्म का समस्त सार बस इसी में समाया हुआ है/अन्य सब बातें और कुछ नहीं,किवल शब्दाडम्बर मात्र है/

5- ईर्श्या,लालच,क्रोध,और अप्रिय वचन-इन सब से दूर रहो,धर्म की प्राप्ति का यही मार्ग है/

6- यह मत सोचो कि मैं धीरे-2 धर्म मार्ग का अवलम्वन करूंगा,वरन अभी बिना विलम्ब किये ही शुभकर्म करना प्रारम्भ करदो,क्योंकि धर्म ही वह वस्तु है,जो मृत्यु के समय तुम्हारा साथ देनेवाला अमर मित्र सिद्ध होगा /

7- मुझसे यह मत पूछो कि "धर्म करने से क्या लाभ है? "बस एक बार पालकी उठाने वाले कहारों की ओर देखलो और फिर उस आदमी को देखो,जो उसमें सवार है/

8- यदि तुम एक भी दिन व्यर्थ नष्ट किये बिना समस्त जीवन सत्कर्म करने में बिताते हो,तो तुम आगामी जन्म मरण का मार्ग बंद किये देते हो/

9- केवल धर्म जनित सुख ही वास्तविक सुख है,शेष सब तो पीडा और लज्जा मात्र है/

10-जो काम धर्म संगत है, बस वही कार्य रूप में परिणत करने योग्य है/दूसरी जितनी बातें धर्म विरुद्ध हैं,उनसे दूर रहना चाहिये /


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परिच्छेद-5, गृहस्थाश्रम-----

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1- गृहस्थाश्रममें रहने वाला मनुष्य अन्य तीनों आश्रमों का प्रमुख आश्रय है /

2- गृहस्थ "अनाथों का नाथ","गरीबों का सहायक" और "निराश्रितों का मित्र" है/

3- पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा,देव पूजन,अतिथि-सत्कार,बंधु-वांधवों की सहायता और आत्मोन्नति --ये गृहस्थ के पांच कर्म हैं /

4- जिस घर में प्रेम और स्नेह का निवास है,जिससे धर्म का सम्राज्य है,वह सम्पूर्णतया संतुष्ट रहता रहता है-उसके सब उद्देष्य सफल रहते है/

5- जो बुराई से डरता है और भोजन करने से पहले दूसरों को दान देता है,उसका वन्श कभी निर्वाज नही होता /

6- यदि मनुष्य गृहस्थ के सब कर्तव्यों को उचित रूप से पालन करे,तब उसे दूसरे आश्रमों के धर्मों की क्या आवश्यकता है?

7- मुमुक्षुओं में वे लोग श्रेष्ठ वे लोग है,जो धर्मानुकूल गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हैं /

8- जो गृहस्थ दूसरे लोगों को कर्तव्य पालन में सहायता देता है,और स्वयं भी धर्मिक जीवन व्यतीत करता है,वह ऋशियों से अधिक पवित्र है /

9- सदाचार और धर्म का विवाहित जीवन से विशेष सम्बंध है सुयश उसका आभूषण है /

10-जो गृहस्थ उसी तरह आचरण करता है,जिस तरह कि उसे करना चाहिये,तो वह "मनुष्यों में देवता" समझा जायेगा /


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परिच्छेद-6, सहधर्मिणी-----

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1- वही उत्तम सहधर्मिणी है,जिसमें सुपत्नीत्व के गुण विद्यमान हों और जो अपने पति की सामर्थ्य से अधिक व्यय नही करती/

2- यदि पत्नी गृहणी के गुणों से रहित हो तो अन्य समस्त गुणों के होते हुये भी गार्हस्थ्य जीवन व्यर्थ है/

3- यदि किसी की स्त्री सुयोग्य है,तो फिर ऐसी कोनसी वस्तु है,जो उसके पास विद्यमान नहीं/ और स्त्री योग्य नहीं,तो फिर उसके पास है ही कौन सा द्रव्य ?

4- नारी अपने सतीत्व की शक्ति से सुरक्षित हो,तो जगत में उससे बढकर गौरवपूर्ण बात क्या है?

5- जो स्त्री दूसरे देवताओं की पूजा नहीं करती,किंतु बिछोना से उठते ही अपने पति देव को पूजती है,तो जल से भरे हुये बादल भी उसका कहना मानते हैं/

6- वही उत्तम सहधर्मिणी है,जो अपने धर्म और यश की रक्षा करती है तथा प्रेम पूर्वक अपने पतिदेव की आराधना करती है /

7- चहरदीवारी के अंदर पर्दे के साथ रहने से क्या लाभ?स्त्रीधर्म का सर्वोत्तम रक्षक उसका इंद्रिय-निग्रह है/

8- जो स्र्ती लोकमान्य और विद्वान पुत्र को जन्म देती है,स्वर्ग लोक के देवता भी उसकी स्तुति करते हैं/

9- जिस मनुष्य के घर से सुयश का विस्तार नहीं होता,वह मनुष्य अपने बैरियों के सामने गर्व से माथा उंचा करके सिंह वृत्ति के साथ नही चल सकता /

10-सुसम्मनित पवित्र गृह सर्वश्रेष्ठ वर है,और सुयोग्य संतति उसके महत्व की पराकाष्ठा है /


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परिच्छेद-7, सन्तान-----

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1- बुद्धिमान सन्तति पैदा होने से बढकर संसार का दूसरा सुख नहीं /

2- वह मनुष्य धन्य है, जिसके बच्चों का आचरण निष्कलंक है/सात जन्मों तक उसे कोई बुराई छू नहीं सकती /

3- संतान ही मनुष्य की सच्ची सम्पत्ति है, क्योंकि वह अपने सन्चित पुण्य को अपने कृत्यों द्वारा उसमें पहुंचाता है/

4- निस्संदेह अमृत से भी अधिक स्वादिष्ट वह साधारण "रसा" है,जिसे अपने बच्चे छोटे-2 हाथ डालकर घंघोलते हैं/

5- बच्चों को स्पर्ष "शरीर का सुख" है,और "कानों का सुख" है उनकी बोली को सुनना /

6- "वंशी की ध्वनि प्यारी और सितार का स्वर मीठा है;-ऐसा वे ही लोग कहते हैं,जिन्होंने बच्चों की तुतलाती हुई बोली नहीं सुनी है /

7- पुत्र के प्रति पिता का कर्तव्य यही है,कि उसे सभा की प्रथम पंक्ति में बैठने योग्य बना दे /

8- अपने बच्चे को बुद्धि में अपने से बढा हुआ पने में सभी को आनंद होता है /

9- माता के हर्ष का कोई ठिकाना नहीं रहता,जब उसके गर्भ से लडका उत्पन्न होता है;लेकिन उससे भी कहीं अधिक आनंद उस समय होता है,जब लोगों के मुंह से उसकी प्रशंसा सुनती है /

10-पिता के प्रति पुत्र का कर्तव्य क्या है? यही कि संसार उसे देखकर उसके पिता से पूछे-"किस तपस्या के बल से तुम्हें ऐसा सुपुत्र मिला है?"


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परिच्छेद-8 प्रेम-----

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1- ऐसी अर्गला अथवा डंडा कहां है, जो प्रेम के दरवाजे को बंद कर सके? प्रेमियों के आंखों के मंद-2 अश्रुबिंदु अवश्य ही उसकी उपस्थिति की घोषणा किये बिना न रहेंगे /

2- जो प्रेम नहीं करते,वे केवल अपने लिये ही जीते हैं और जो दूसरों से प्रेम करते हैं;उनकी हड्डियां भी दूसरों के काम आती हैं /

3-