ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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001. वैराग्य के अंकुर

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वैराग्य के अंकुर

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जब सात-आठ वर्ष की मेरी अवस्था होगी, घर के बाहर प्रांगण में सभी लड़कियाँ सायंकाल में खेलने आ जातीं। उस समय मैं भी बाहर खेलने के लिए जाना चाहती। माँ से आज्ञा माँगती, तब वे कहतीं-‘‘खेल-कूद कर क्या करना? देखो! यह काम कर लो, यह कर लो, जल्दी निपटकर अभी मन्दिर चलूँगी, वहाँ आरती करूँगी और शास्त्र सुनूँगी।’’ मैं कभी-कभी मन मारकर रह जाती और कभी खुश भी हो जाती। सायंकाल खेल में न जाकर थोड़ी देर बाद माँ के साथ मन्दिर जाती , आरती करती पुनः शास्त्र सुनने बैठ जाती। उस समय मंदिर में कोई पण्डित शास्त्र बाँचते थे या कभी गाँव के ही कोई बड़े पुरुष बाँचते थे। मैं प्रौढ़ महिलाओं के बीच में बैठ जाती। कभी-कभी बराबर की लड़कियाँ भी आती थीं किन्तु वे सब प्रायः बातों में लगी रहती थीं अतः मैं उन लड़कियों के साथ नहीं बैठती थी। शास्त्र बाँचने में कभी कुछ, कभी कुछ विशेष बातें अवश्य मिल जाया करती थीं जो कि मेरे हृदय में प्रवेश कर जाया करती थीं। एक बार प्रकरण आया-

‘‘आत्मा में अनन्त शक्ति है।’’

मैंने सोचा ‘‘जब आत्मा अनन्त शक्तिवाली है तो मैं उसको प्रगट क्यों नहीं कर सकती? उस पुरुषार्थ के लिए भला क्या नहीं कर सकती?’’ माँ प्रातः स्वाध्याय करके ही जलपान लेती थीं। वह शास्त्र था ‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’ जिसे खोलकर विधिवत् मंगलाचरण करके एक श्लोक संस्कृत का पढ़कर उसकी हिन्दी पढ़ लेती थीं। कभी-कभी दो श्लोक पढ़ लेती थीं। यही उनका नियम था। वे क्वचित् कदाचित् मेरे से भी पढ़ा लिया करती थीं। बाद में माँ की आज्ञा से मैंने भी उस ग्रन्थ का स्वाध्याय प्रारम्भ कर दिया जिससे ज्ञान और वैराग्य प्रस्फुटित होता चला गया। पुनः-पुनः बाहर लड़कियों को खेलते देख खेलने जाना चाहती और वे नहीं जाने देतीं और कभी-कभी कहतीं-

‘‘लो यह दर्शनकथा और शीलकथा पढ़ो।’’

मैं उन्हें लेकर पढ़ने बैठ जाती। उन दोनों कथाओं में मुझे बहुत ही रस आता । यहाँ तक कि मैंने उन दोनों कथाओं को सैकड़ों बार पढ़ डाला। बहुत से प्रकरण मुझे याद हो गये थे, जिनको मैं स्वतः मन ही मन गुना करती थी। शीलकथा की मुझ पर इतनी गहरी छाप पड़ी कि मैं स्वयं एक दिन भगवान के मंदिर में जाकर बैठ गई और बोली-‘‘भगवन्! आज तो कोई दिगम्बर गुरु दिखते नहीं हैं जैसा कि मनोरमा को मिल गये थे अतः अब मैं आपके सान्निध्य में ही शीलव्रत ले रही हूँ। हे देव ! इस जन्म में मैं पूर्णतया शीलव्रत पालन करूँगी।’’ दर्शनकथा पढ़कर भी मैंने ऐसे ही देवदर्शन करने का हमेशा के लिए नियम कर लिया था पुनः एक दिन चुपके से अपनी छोटी बहन शांतिदेवी को भी यह शीलव्रत दे दिया था, कई एक साथ की सहेलियों को भी दे दिया।

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धार्मिक नाटक का प्रभाव-

उस लघुवय में ही एक बार पाठशाला में लड़कों ने ‘अकलंक निकलंक’ नाटक खेला था। जिसमें अकलंक और उनके पिता के संवाद में अकलंक ने एक पंक्ति कही-

‘‘प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरं।’’

कीचड़ में पैर रखकर धोने की अपेक्षा कीचड़ में पैर नहीं रखना ही अच्छा है, वैसे ही विवाह करके पुनः छोड़कर दीक्षा लेने की अपेक्षा विवाह नहीं करना ही उत्तम है। यह पंक्ति मेरे हृदय में पूर्णतया उतर गई और उसी क्षण से लेकर मैं हमेशा सोचती रहती तथा यह पंक्ति मन में रटा करती।

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मिथ्यात्व त्याग-

कुछ पूर्वजन्म के संस्कार भी ऐसे ही थे मैंने इतनी छोटी वय में घर में त्योहारों पर मिथ्यात्व पूजना और बायना निकालना बंद करा दिया था। पद्मनंदिपंचविंशतिका शास्त्र का स्वाध्याय कर तथा छहढाला पढ़कर मैं मिथ्यात्व और सम्यक्त्व का लक्षण समझ चुकी थी। कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरु को पूजना मिथ्यात्व है जो कि अनंत संसार में घुमाने वाला है और सच्चे देव, शास्त्र, गुरु पर दृढ़ श्रद्धा रखना सम्यग्दर्शन है जो कि संसार के जन्ममरण के दुखों से छुटाने वाला है इतना मैं समझ लेती थी। एक समय की घटना है-पड़ोस में एक सोलह वर्ष के जवान पुत्र को चेचक निकली। उनकी माँ हर किसी के कहने से नीम के वृक्ष पूजना, ‘‘माता निकली है’’ ऐसा कहकर शीतला माता की पूजा के लिए मालिन को पूजा सामग्री देना आदि करने लगीं। उन्हीं दिनों मेरे घर में छोटे भाई प्रकाशचंद और सुभाषचंद को भी बहुत जोरों से चेचक निकल आई। अड़ोस-पड़ोस के व घर की दादी, बुआ आदि सभी ने माँ से कहा कि-

‘‘शीतला माता की पूजा के लिए मालिन को सामग्री दे दो, तुम मिथ्यात्व मत करो, मालिन को सामग्री देने में क्या होता है? बहुत भयंकर माता निकली है। पता नहीं क्या अनिष्ट हो सकता है?’’

किन्तु माँ ने मेरी बात मान ली और दृढ़ता रखी। मिथ्यात्व का सेवन कतई नहीं किया। मैं प्रतिदिन मंदिर मेंं जाकर शीतलनाथ भगवान की पूजा करती और भगवान का गंधोदक लाकर बालकों के सर्वाङ्ग में लगा देती थी। माँ को विचलित करने के लिए बहुतों ने अनेक पुरुषार्थ किये किन्तु किसी की कुछ नहीं चली। इधर दोनों भाइयों के चेचक की हालत बहुत खराब थी। उन दोनों भाइयों के बचने की आशा ही हटती जा रही थी तब कई एक महिलाओं ने कहा-

‘‘यह तुम्हारी मैना, इन भाइयों को खत्म कर देगी। वाह रे धरम!! बच्चे मर रहे हैं और यह धरम-धरम चिल्ला रही है।’’

मैंने ये शब्द सुन लिये, घबड़ा गई और प्रातः काल मंदिर में पहुँचकर मन ही मन भगवान से बोली-

‘‘भगवन् ! अब मेरी लाज और धर्म की लाज आपके ही हाथ में है। यदि ये दोनों बालक मर गये तो सारे गाँव में ही क्या, सारे प्रांत में चेचक निकलने पर शीतला माता जैसी आज पुज रही हैं वैसे ही पुजती रहेंगी! किन्तु सम्यक्त्व को, आपकी भक्ति को कोई भी नहीं समझेगा!’’

इतना सोचते-सोचते मैं भगवान के पास रो पड़ी। अनेक भक्ति स्तोत्र पढ़ कर मैं घर आ गई और भाइयों को गन्धोदक लगाकर उनकी परिचर्या में लग गई। कुछ दिनों बाद धीरे-धीरे इन दोनों बालकों की हालत सुधरने लगी और धीरे-धीरे ये स्वस्थ हो गये। उधर पड़ोस में जो माँ अपने युवापुत्र के लिए मिथ्यात्व की उपासना करती रही थी उसका पुत्र स्वर्गस्थ हो गया। इस प्रत्यक्ष घटना से सभी के मन पर धर्म का बहुत ही प्रभाव पड़ा। सर्वत्र धर्म की व मेरी भी प्रशंसा होने लगी। धर्म की इस विजय से मैं बहुत ही प्रसन्न हुई। उस प्रांत में उस समय अग्रवाल वैष्णव के संस्कारों से जैन अग्रवालों के यहाँ भी घर-घर में महिलाएं करवा चौथ आदि त्योहार मनाया करती थीं। जिसमें घर में गौरी बनाकर उसको फूल चढ़ाना, सिन्दूर लगाना, माथा झुकाना आदि करतीं पुनः नैवेद्य-पकवान चढ़ाकर सास, ननद आदि को बायना देती थीं। मैंने इस क्रिया को मिथ्यात्व कहकर माँ से इसका पूर्णतया त्याग करा दिया था। तब दादी अक्सर कहा करतीं-

‘‘पति पुत्रों के यह त्योहार हैं इन्हें नहीं छोड़ना चाहिए।’’

किन्तु मैं उनको भी उस समय अपनी बुद्धि के अनुसार सम्यक्त्व का उपदेश दिया करती थी और मिथ्यात्व के दोष बताया करती थी। एक बार पंडित मनोहरलालजी शास्त्री टिकैतनगर आये थे वो अत्यधिक विद्वान् माने जाते थे। माँ ने उन्हें बुलाया और शंका करने लगीं-

‘‘पण्डितजी ! इन त्योहारों में पूजा करना आदि मिथ्यात्व है तो सासु को बायना देना आदि भी मिथ्यात्व है या नहीं।’’

पण्डित जी ने कहा-‘‘गौरी बनाकर पूजना मिथ्यात्व है उसे तुम छोड़ दो किन्तु त्योहार मानना व उस दिन पकवान बनाकर सासु को देना मिथ्यात्व नहीं है। उसे तुम कर सकती हो।’’ मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ, मैंने कहा-‘‘पण्डित जी! यह करवा चौथ आदि त्योहार जैनधर्म से कुछ भी संबंध नहीं रखते हैं अतः इन त्योहारों को मानना, उस दिन पकवान बनाना भी मिथ्यात्व है तथा उस त्यौहार के उपलक्ष्य में सासु को बायना देना भी मिथ्यात्व है। यदि सासु को बायना देना ही है तो अन्य दिनों किसी और निमित्त से दे देना चाहिए। उस दिन कतई नहीं देना चाहिए।’’ पण्डित जी सारी बातें सुनते रहे, फिर कुछ भी नहीं बोले, चुप रहे। पुनः बोले-‘‘यह कन्या कोई ‘देवी’ है। बहुत ही होनहार दिखती है।’’ उन विद्वान् के वे शब्द मेरे कान में बहुत दिनों तक गूँजते रहे हैं। मैं सोचा करती थी- ‘‘भगवन! मैं सारे प्रांत से ही नहीं, सारे देश की जैन समाज से मिथ्यात्व को दूर भगा दूँ ऐसी शक्ति मुझे कब आयेगी?’’ अहो! यह मिथ्यात्व महाशत्रु है। इसे दूर करने का बलपूर्वक अतीव पुरुषार्थ सभी को करते रहना चाहिए। लोग छहढ़ाला पढ़कर, धार्मिक पुस्तकों का स्वाध्याय करके भी मिथ्यात्व का त्याग क्यों नहीं करते हैं? ‘‘सम्यग्दृष्टि क्यों नहीं बन जाते हैं?’’

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क्षयोपशम-

छहढ़ाला का अध्ययन धार्मिक पाठशाला में चल रहा था। इस समय मेरी अवस्था ९-१० वर्ष के लगभग होगी। घर में सभी भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ी थी अतः घर के सभी कार्यों में माँ का हाथ बँटाना पड़ता था। परीक्षा का समय निकट था। पण्डित जमुनाप्रसाद जी ने अनुशासन कर दिया था कि सभी छात्राओं को प्रातः समय से आना होगा और रात्रि में भी एक घंटा कक्षा चलेगी। मैंने माँ से कहा तब उन्होंने पाठशाला में कहला दिया कि- ‘‘मैना को घर में काम अधिक होने से प्रातः भी दो घण्टे देर से पाठशाला पहुँचेगी और रात्रि में तो अवकाश ही नहीं मिलेगा।’’ मैं घर के बहुत कुछ काम निपटा कर दो घण्टे बाद पाठशाला पहुँचती थी। छहढ़ाला के साथ निबंधरत्नमाला आदि और भी कई पुस्तके पढ़ाई जाती थीं। एक दिन की बात है-सभी लड़कियाँ पाठ सुनाने के लिए खड़ी थीं। कोई-कोई लड़कियाँ पाठ सुनाते-सुनाते कुछ भूल जाती थीं। तब पण्डित जी ने कहा-‘‘ मैं प्रतिदिन कहता हूँ कि घर में अच्छी तरह से पाठ याद किया करो परन्तु तुम लोग सुनती नहीं हो। अच्छा जिस-जिस लड़की ने घर में पाठ याद नहीं किया है वह हाथ उठावें।’’ कई एक छात्राओं के साथ मैंने भी हाथ उठा दिया तब पण्डित जी आश्चर्य चकित हो बोले-‘‘ऐं! तुमने क्यों हाथ उठाया? तुम्हें तो पाठ हमेशा ही याद रहता है।’’ तब मैंने कहा- ‘‘किन्तु मैं घर में कभी नहीं याद करती हूँ।’’ पण्डित जी ने और अधिक आश्चर्य व्यक्त करते हुये पूछा- ‘‘अरे! फिर तुम पाठ कहाँ याद करती हो? तुम अभी तो घर से ही आ रही हो।’’ मैंने कहा-‘‘यहीं खड़ी-खड़ी जब तक एक दो लड़कियाँ पाठ सुनाती हैं तब तक ही मैं याद कर लेती हूँ।’’ तब पण्डित जी ने कहा-यदि ऐसी बात है तो पिछले सभी पाठ तुम्हें कैसे याद रहते हैं?’’ ऐसा कहकर उन्होंने पिछले एक दो प्रश्न पूछ लिये और मैंने भी सभी के उत्तर श्लोक बोलकर सुना दिये और अच्छी तरह से उनका अर्थ भी बता दिया। पण्डित जी बहुत ही प्रभावित हुए और बोले-‘‘इसका क्षयोपशम बहुत ही अच्छा है।’’ छहढाला आदि सभी पुस्तकों की परीक्षा में मेरे बहुत अच्छे नम्बर आये और पुरस्कार भी मिला था। इसके बाद हम सभी लड़कियों ने बहुत ही प्रयत्न किया कि आगे कुछ और पढ़ाई हो जावे किन्तु प्रायः सभी के माता-पिता ने अपनी पुत्रियों को आगे पाठशाला में पढ़ने से रोक दिया और मेरी भी पढ़ाई बंद हो गई। अब मैं घर में अनेक पाठ याद किया करती थी। सीताजी का बारहमासा, राजुल का बारहमासा, बारह भावनायें, वैराग्य भावना, अनेक स्तुतियाँ, ज्ञानपचीसी आदि पाठ जिनवाणी संग्रह से याद किया करती थी। घर में प्रायःनन्हें-नन्हें भाई बहनों को संभालने, खिलाने-पिलाने व रोते हों तो चुप कराने में सारा समय निकल जाता था। नौकर के अधीन बच्चों को डालना प्रायः मुझे स्वयं ही इष्ट नहीं था अतः मैं स्वयं इन कार्यों को रुचि से किया करती थी। रसोई में काम करना होता था तथा गेहूँ, दाल, चावल आदि भी साफ करने रहते थे। सभी कामों को माँ के साथ मुझे करना होता ही था। मैं प्रायः चौका साफ करते समय, महरी के मंजे बर्तनों को पुनः धोते हुए और दाल चावल आदि साफ करते हुये कई एक पाठ याद कर लिया करती थी। पुस्तक या जिनवाणी को विनय से एक उच्चस्थान पर खोल कर रख लेती थी और एक-एक पंक्ति देख कर रट लिया करती थी। उन रटे हुए पाठों को प्रतिदिन सोते समय और उठकर प्रातः पढ़ा करती थी जिससे हृदय में वैराग्य भावना की लहर उठा करती थी। सीताजी की बारह भावना में एक पंक्ति मुझे बहुत ही प्रिय लगती थी जिसे मन ही मन गुनगुनाया करती थी-

‘‘परवश भोगी भारी वेदना, स्ववश सही नहिं रंच।

शाश्वत सुख जासों पावती, लेई करम ने वंच।।’’

मैंने परवश में अर्थात् कर्म के अधीन होकर बहुत भारी कष्ट सहन किये हैं किन्तु स्ववश-स्वाधीन होकर अर्थात् अपनी इच्छा से रंचमात्र भी दुःख नहीं सहन किये हैं, यदि स्वाधीन होकर अर्थात् अपनी रुचि से धर्म अनुष्ठान में-तपश्चर्या में किंचित् भी दुःख सहन कर लेती तो शाश्वत अविनाशी सुख प्राप्त कर लेती किन्तु हा ! कर्म ने मुझे ठग लिया है। वैराग्य भावना की ये पंक्तियां भी बहुत ही अच्छी लगती थीं-

‘‘सुख होता संसार विषे तो, तीर्थंकर क्यों त्यागे।

काहे को शिवसाधन करते, संजम सों अनुरागे।।’’

यदि इस संसार में सच्चा सुख होता तो तीर्थंकर जैसे महापुरुष उसे क्यों छोड़ते? क्यों वन में जाकर तपश्चर्या करते और क्यों संयम से प्रेम करके मोक्ष के साधन में लगते? जब कभी बैलगाड़ी पर अधिक सामान लदे रहने से बैलों को भार ढोते देखती व इक्का (घोड़ा तांगा) पर बैठने का प्रसंग आता तो घोड़ों पर चाबुक का प्रहार देखते ही रोम-रोम सिहर उठता और सोचने लगती-‘‘इन अनाथ पशुओं का नाथ-रक्षक कौन है? देखो, बेचारे कैसे कष्ट भोग रहे हैं? कोड़ों से पीटे जाना, अधिक भार लादना, समय पर दाना पानी नहीं मिलना आदि।.......’’ कभी कुत्ते घर में घुसते तो नौकर मार कर भगाते। उस समय भी मेरा जी भर आता, बहुत-दुःख होता। मैं प्रायः रोटी का टुकड़ा ले जाकर बाहर डालकर कुत्तों को घर से भगाती थी और इन पशुओं के नाना दुःख देखकर संसार से वैराग्य भावना भाने लगती थी। घर में छोटे-छोटे भाई बहनों को कभी नजला, खाँसी आदि देखकर कभी-कभी अन्य कुछ छोटे-मोटे कष्ट देखकर मैं सोचने लगती-‘‘इस शरीर के साथ अनेक रोग, शोक, आधि, व्याधि लगी ही रहती हैं। भगवन् ! ऐसा क्या उपाय है कि जो इस शरीर से ही छुटकारा पाया जा सके?’’

पद्मनन्दिपंचविंशतिका-

मेरी माँ को दहेज में उनके पिता ने ‘पद्मनंदिपञ्चविंशतिका’ नाम के एक ग्रन्थ को दिया था। माँ सदा ही उसका स्वाध्याय किया करती थीं। कितनी बार वे उसे पढ़ चुकी हैं, शायद उन्हें भी यह याद नहीं होगा। एक बार वह ग्रन्थ पूरा हो जाता पुनः उसी को चालू कर लिया करती थीं। वे कहा करती थीं कि- ‘‘मैंने इसी ग्रन्थ का स्वाध्याय करके सर्वप्रथम आजन्म शीलव्रत और अष्टमी, चौदस का ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था।’’ उन्हीं की प्रेरणा से मैं भी उस ग्रन्थ का स्वाध्याय करने लगी थी किन्तु मुझे अतिशय प्रिय लगने से मैं १-२ श्लोकों से अधिक पढ़ लिया करती थी अतः वर्ष दो वर्ष के अंतर्गत ही मैंने स्वयं उसका अनेक बार स्वाध्याय कर लिया था और उसमें से अनेक प्रिय श्लोक याद कर लिये थे। उस ग्रन्थ के शरीराष्टक अधिकार से मुझे शरीर के स्वरूप का ज्ञान हो जाने से वैराग्य बढ़ रहा था और ब्रह्मचर्याष्टक अधिकार पढ़कर तो ऐसी भावना हो रही थी कि-‘‘हे भगवन्! मैं इस जन्म में तो ब्रह्मचर्यव्रत धारण कर ही लूँ साथ ही ऐसी तपश्चर्या करूँ कि जिससे मैं लौकांतिक देव हो जाऊँ। जहाँ पर पूर्ण ब्रह्मचर्य ही है, जहाँ पर जाने के बाद वापस एक भव ही लेना पड़ता है पुनः संसार में अधिक भ्रमण नहीं करना पड़ता है।’’ कभी-कभी रात्रि में मेरी नींद खुल जाती तब यही सोचने लगती-‘‘ क्या उपाय किया जाये कि जिससे मैं विवाह के बंधन में न पड़ूँ और लौकांतिक देव के पद को प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर लूँ.....इत्यादि।’’ किन्तु इतनी छोटी उम्र में घर वालों से कुछ कहने का और कुछ कर सकने का कुछ उपाय ही नहीं दिखता था। एक बार मैंने रात्रि के शास्त्र स्वाध्याय में सुना कि ‘‘दक्षिण में मुनि रहते हैं वे तपश्चर्या करते हैं।’’ मैंने सोचा-‘‘कैसे उनके दर्शन किये जायें?’’ इसी बीच मेरी सहेली, उससे एक दिन मैंने अपने मन की बात कह दी। तब उसने भी कुछ ऐसे ही घर से कहीं चलने के भाव व्यक्त किये। धीरे-धीरे हम दोनों की एकांत में चर्चायें चलती रहीं। आखिर एक दिन-‘‘ हम दोनों घर से निकलकर दक्षिण में चलें’’ ऐसा निर्णय कर लिया। तभी वह सहेली दूसरे दिन आकर बोली- ‘‘मेरा साहस नहीं है, क्योंकि यदि अपन दोनों कहीं गयीं तो तत्काल ही यहाँ गाँव में ढूँढना शुरू हो जायेगा और यदि ढूंढने से हम दोनों मिल गयीं तो क्या होगा? खूब फटकार मिलेगी........।’’ मैं चुप हो गई और मन ही मन सोचने लगी-‘‘घर से निकलकर मुनियों का दर्शन करने, उनसे त्याग मार्ग में चलने को सीखने के लिए कहाँ जाया जाये? क्या उपाय किया जाये?’’ समय व्यतीत होता गया, मेरी आंतरिक विचारधारा बढ़ती ही गई।

शुभ शकुन-

एक दिन ऊपर एकांत में बैठी कुछ ऐसे ही सोच रही थी कि तभी मन में एक विचार आया-‘‘क्या कभी मैं सबके बीच में उपदेश करने का अवसर प्राप्त करूँगी?’’ इतना विचार आते ही मेरी अकस्मात् बायीं आँख फड़कने लगी और काफी देर तक फड़कती रही, तब मुझे विश्वास हो गया कि-‘‘मेरे जीवन में ऐसा दिन अवश्य आयेगा।’’ समय व्यतीत हो रहा था। मैं गृहबन्धन के पिंजड़े से उड़ने का अवसर खोज रही थी और परिवार के लोग गृहबन्धन में बाँधने की सोच रहे थे। दादी जब आकर माँ के पास बैठतीं तब यही कहतीं-

‘‘मैना सयानी हो गई है उसके लिए वर ढूँढना चाहिए।’’

पिता के घर में आते ही माँ यही चर्चा छेड़ देतीं। कभी-कभी बात आई गई हो जाती और कभी-कभी मां-पिता की आपस में खटपट भी हो जाती। वह समय ऐसा था कि लड़की के सामने माँ-बाप विवाह की चर्चा करते थे तो या तो वे लोग स्वयं लड़की को किसी काम से वहाँ से हटा देते थे या लड़की स्वयं शरम से वहाँ से हट जाती थी। इस स्थिति के अनुसार यद्यपि मैं वहाँ से हट जाया करती थी फिर भी मेरे विवाह के बारे में ये लोग कितनी चिन्ता किया करते हैं, इसके बारे में मैं अच्छी तरह समझती थी।