ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्तप भावनायै नमः"

003.आचार्य चतुष्टय परिचय

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आचार्य चतुष्टय परिचय

प्रस्तुति-गणिनी आर्यिका ज्ञानमती
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जिनके श्रीमुखारविन्द से सिद्धान्त का ज्ञान शिष्यद्वय को प्राप्त हुआ था, उस ज्ञान के फलस्वरूप उन दोनों महामुनियों ने षट्खण्डागम सूत्र ग्रंथों की रचना की तथा जिन्होंने उन सूत्रों पर धवला टीका रचकर प्रदान की, ऐसे उन चारों महान आचार्यों (श्री धरसेनाचार्य, श्रीपुष्पदन्ताचार्य, श्री भूतबली आचार्य, श्री वीरसेनाचार्य) के संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किये जा रहे हैं-

आचार्य श्री धरसेन

भगवान महावीर स्वामी ने भावश्रुत का उपदेश दिया, अत: वे अर्थकर्ता हैं। उसी काल में चार ज्ञान से युक्त गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ने बारह अंग और चौदह पूर्वरूप ग्रंथों की एक ही मुहूर्त में क्रम से रचना की अत: भावश्रुत और अर्थपदों के कर्ता तीर्थंकर हैं तथा द्रव्यश्रुत के कर्ता गौतम गणधर हैं। उन गौतम स्वामी ने भी दोनों प्रकार का श्रुतज्ञान लोहार्य को दिया। लोहार्य ने भी जम्बूस्वामी को दिया। परिपाटी क्रम से ये तीनों ही सकल श्रुत के धारण करने वाले कहे गये हैं और यदि परिपाटी क्रम की अपेक्षा न की जाये तो उस समय संख्यात हजार सकलश्रुत के धारी हुए। गौतमस्वामी, लोहार्य और जम्बूस्वामी ये तीनों निर्वाण को प्राप्त हुए। इसके बाद विष्णु, नंदिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु, ये पाँचों ही आचार्य परिपाटी क्रम से चौदह पूर्व के धारी हुए।

तदनन्तर विशाखाचार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जयाचार्य, नागाचार्य, सिद्धार्थ धृतिसेन, विजयाचार्य, बुद्धिल, गंगदेव और धर्मसेन ये ग्यारह ही महापुरुष परिपाटी क्रम से ग्यारह अंग, दशपूर्व के धारक और शेष चार पूर्वों के एकदेश के धारक हुए।

इसके बाद नक्षत्राचार्य, जयपाल, पांडुस्वामी, ध्रुवसेन, कंसाचार्य ये पाँचों ही आचार्य परिपाटी क्रम से सम्पूर्ण ग्यारह अंगों के और चौदह पूर्वों के एकदेश के धारक हुए।

तदनन्तर सुभद्र, यशोभद्र, यशोबाहु और लोहार्य ये चारों ही आचार्य सम्पूर्ण आचारांग के धारक और शेष अंग तथा पूर्वों के एकदेश के धारक हुए।

‘‘इसके बाद सभी अंग और पूर्वों का एकदेश ज्ञान आचार्य परम्परा से आता हुआ धरसेन आचार्य को प्राप्त हुआ।’’

सौराष्ट्र (गुजरात-काठियावाड़) देश के गिरिनगर नाम के नगर की चन्द्रगुफा में रहने वाले अष्टांग महानिमित्त के पारगामी, प्रवचन वत्सल और आगे अंगश्रुत का विच्छेद हो जायेगा, इस प्रकार उत्पन्न हो गया है भय जिनको, ऐसे उन धरसेनाचार्य से महामहिमा (पंचवर्षीय साधु सम्मेलन) में सम्मिलित हुए दक्षिणापथ के (दक्षिण देश के निवासी) आचार्यों के पास एक लेख भेजा। लेख में लिखे गये धरसेनाचार्य के वचनों को अच्छी तरह समझकर उन आचार्यों ने शास्त्र के अर्थ को ग्रहण और धारण करने में समर्थ, नाना प्रकार की उज्ज्वल और निर्मल विनय से विभूषित अंग वाले, शीलरूपी माला के धारक, गुरुओं द्वारा प्रेषण (भेजने) रूपी भोजन से तृप्त हुए, देश, कुल और जाति से शुद्ध अर्थात् उत्तम कुल और उत्तम जाति में उत्पन्न हुए, समस्त कलाओं में पारंगत और तीन बार पूछा है आचार्यों को उन्होंने (आचार्यों से तीन बार आज्ञा ली है जिन्होंने) ऐसे दो साधुओं को आंध्र देश में बहने वाली वेणानदी के तट से भेजा।

मार्ग में उन दोनों के आते समय श्री धरसेन भट्टारक ने रात्रि के पिछले भाग में स्वप्न देखा कि समस्त लक्षणों से परिपूर्ण, सफेद वर्ण वाले दो उन्नत बैल उनकी तीन प्रदक्षिणा देकर चरणों में पड़ गये हैं। इस प्रकार के स्वप्न को देखकर संतुष्ट हुए धरसेनाचार्य ने ‘‘जयउ सुयदेवदा, श्रुतदेवता जयवन्त हो’’ ऐसा वाक्य उच्चारण किया।

उसी दिन दक्षिणापथ से भेजे हुए वे दोनों साधु धरसेनाचार्य को प्राप्त हुए। उसके बाद धरसेनाचार्य की पादवन्दना आदि कृतिकर्म करके और दो दिन बिताकर तीसरे दिन उन दोनों ने धरसेनाचार्य से निवेदन किया कि ‘‘इस कार्य से हम दोनों आपके पादमूल को प्राप्त हुए हैं।’’ उन दोनों मुनियों के इस प्रकार निवेदन करने पर ‘‘अच्छा है, कल्याण हो’’ इस प्रकार कहकर धरसेन भट्टारक ने उन दोनों साधुओं को आश्वासन दिया। इसके बाद भगवान धरसेन ने विचार किया कि-

‘‘शैलघन, भग्नघट, सर्प, चालनी, महिष, मेंढा, जोंक, तोता, मिट्टी और मशक के समान श्रोताओं को जो मोह से श्रुत का व्याख्यान करता है, वह मूढ़ दृढ़रूप से ऋद्धि आदि तीनों प्रकार के गौरवों के अधीन होकर विषयों की लोलुपतारूपी विष के वश से मूच्र्छित हो, बोधि-रत्नत्रय की प्राप्ति से रहित होकर भववन में चिरकाल तक परिभ्रमण करता रहता है।’’

इस वचन के अनुसार स्वच्छन्दतापूर्वक आचरण करने वाले श्रोताओं को विद्या देना संसार और भय को ही बढ़ाने वाला है, ऐसा विचार कर, शुभ स्वप्न के देखने मात्र से ही यद्यपि उन दोनों साधुओं की विशेषता को जान लिया था, तो भी फिर से उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया क्योंकि उत्तम प्रकार से ली गई परीक्षा हृदय में संतोष को उत्पन्न करती है। अनन्तर धरसेनाचार्य ने उन दोनों को दो विद्याएँ दीं। उनमें से एक अधिक अक्षर वाली थी और दूसरी हीन अक्षर वाली थी। उनको विद्याएँ देकर यह कहा कि दो दिन का उपवास करके इन विद्याओं को सिद्ध करो। (इन्द्रनंदि आचार्य ने बताया कि उन दोनों ने गुरु की आज्ञा से नेमिनाथ की निर्वाणस्थली पर जाकर विद्याओं को सिद्ध किया)। जब उनकी विद्याएँ सिद्ध हो गर्इं, तो उन्होंने विद्या की अधिष्ठात्री देविकाओं को देखा कि ‘‘एक देवी के दाँत बाहर निकले हुए हैं और दूसरी कानी है।’’ ‘‘विकृतांग होना देवताओं का स्वभाव नहीं है।’’ इस प्रकार उन दोनों ने विचार कर मंत्र संबंधी-व्याकरण शास्त्र में कुशल उन दोनों ने हीन अक्षर वाली विद्या में अधिक अक्षर मिलाकर और अधिक अक्षर वाली विद्या में से अक्षर निकालकर मंत्र को फिर सिद्ध किया। जिससे वे दोनोें विद्या देवियाँ अपने स्वभाव से सुन्दररूप में दिखलाई पड़ीं। उन्होंने ‘आज्ञा देवो’ ऐसा कहा, तब इन मुनियों ने कहा कि मैंने तो गुरु की आज्ञा मात्र से ही मंत्र का अनुष्ठान किया है, मुझे कुछ आवश्यकता नहीं है, तब वे देविकाएँ अपने स्थान को चली गर्इं ऐसा श्रुतावतार में वर्णन है।

तदनन्तर भगवान धरसेन के समक्ष योग्य विनय सहित उन दोनों ने विद्यासिद्धिसंबंधी समस्त वृत्तान्त निवेदित कर दिया। ‘‘बहुत अच्छा’’ ऐसा कहकर संतुष्ट हुए धरसेनाचार्य ने शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और शुभ वार में ग्रंथ को पढ़ाना प्रारंभ किया। इस तरह क्रम से व्याख्यान करते हुए धरसेन भगवान से उन दोनों ने आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन पूर्वान्ह काल में विनयपूर्वक ग्रंथ समाप्त किया। विनयपूर्वक ग्रंथ समाप्त किया इसलिए संतुष्ट हुए भूत जाति के व्यंतर देवों ने उन दोनों में से एक की पुष्प, बलि तथा शंख और सूर्य जाति के वाद्य विशेष के नाद से व्याप्त बड़ी भारी पूजा की। उसे देखकर धरसेन भट्टारक ने उनका ‘‘भूतबलि’’ यह नाम रखा तथा जिनकी भूतों ने पूजा की है और अस्त-व्यस्त दन्त-पंक्ति को दूर करके जिनके दाँत समान कर दिये हैं, ऐसे दूसरे का भी श्री धरसेन भट्टारक ने ‘‘पुष्पदंत’’ नाम रखा।

तदनन्तर उसी दिन वहाँ से भेजे गये उन दोनों ने ‘‘गुरु की आज्ञा अलंघनीय होती है’’ ऐसा विचार कर आते हुए अंकलेश्वर (गुजरात) में वर्षाकाल बिताया। (गुरु ने अपनी अल्प आयु जानकर उन दोनों को वहाँ से विहार कर अन्यत्र चातुुर्मास करने की आज्ञा दी और वे दोनों मुनि आषाढ़ सुदी ११ को निकलकर श्रावण वदी ४ को अंकलेश्वर आये, वहाँ पर वर्षायोग स्थापित किया)।

वर्षायोग को समाप्त कर और जिनपालित को साथ लेकर पुष्पदन्ताचार्य तो वनवासी देश को चले गये और भूतबलि भट्टारक तमिल देश को चले गये। तदनन्तर पुष्पदन्ताचार्य ने जिनपालित को दीक्षा देकर बीस प्ररूपणा गर्भित सत्प्ररूपणा के सूत्र बनाकर और जिनपालित मुनि को पढ़ाकर अनन्तर उन्हें भूतबलि आचार्य के पास भेजा। भूतबलि ने जिनपालित के द्वारा दिखाये गये सूत्रों को देखकर और पुष्पदन्ताचार्य अल्पायु हैं, ऐसा समझकर तथा हम दोनों के बाद महाकर्म प्रकृति प्राभृत का विच्छेद हो जायेगा; इस प्रकार की बुद्धि के उत्पन्न होने से भगवान भूतबलि ने द्रव्यप्रमाणानुगम को आदि लेकर ग्रंथ रचना की। इसलिए इस खण्ड सिद्धान्त (षट्खण्ड सिद्धान्त) की अपेक्षा भूतबलि और पुष्पदन्त आचार्य भी श्रुत के कर्ता कहे जाते हैं। अनुग्रंथकर्ता गौतम स्वामी हैं और उपग्रंथकर्ता राग, द्वेष और मोह से रहित भूतबलि, पुष्पदन्त आदि अनेक आचार्य हैं।

धरसेनाचार्य का समय-

नंदिसंघ की प्राकृत पट्टावली में ६८३ वर्ष के अंदर ही श्री धरसेन को माना है। यथा-केवली का काल ६२ वर्ष, श्रुत केवलियों का १०० वर्ष, दश पूर्वधारियों का १८३, ग्यारह अंगधारियों का १२३ वर्ष, दस नव व आठ अंगधारी का ९७ वर्ष ऐसे ६२±१००±१८३±१२३±९७·५६५ वर्ष हुए, पुन: एक अंगधारियों में अर्हतबलि का २८ वर्ष, माघनंदि का २१ वर्ष, धरसेन का १९ वर्ष, पुष्पदंत का ३० वर्ष और भूतबलि का २० वर्ष, ऐसे ११८ वर्ष हुए। कुल मिलाकर ५६५±११८·६८३ वर्ष के अंतर्गत ही धरसेनाचार्य हुए हैं।

इस प्रकार इस पट्टावली और इन्द्रनन्दि के श्रुतावतार के आधार पर भी श्री धरसेन का समय वीर निर्वाण संवत् ६०० अर्थात् ई. सन् ७३ के लगभग आता है।

धरसेनाचार्य के गुरु-

उपर्युक्त पट्टावली के अनुसार इनके गुरु श्री माघनंदि आचार्य थे अथवा इन्द्रनन्दि आचार्य ने स्पष्ट कह दिया है कि इनकी गुरु परम्परा का हमें ज्ञान नहीं है।

धरसेनाचार्य की रचना-

यह तो पूर्व में आपने पढ़ा है कि धरसेनाचार्य ने अपने पास में पढ़ने के लिए आए हुए दोनों मुनियों को मंत्र सिद्ध करने का आदेश दिया था अत: ये मंत्रों के विशेष ज्ञाता थे।

अत: इनका बनाया हुआ योनिप्राभृत नाम का एक ग्रंथ आज भी उपलब्ध है। यह ग्रंथ ८०० श्लोक प्रमाण प्राकृत गाथाओं में है। उसका विषय मंत्र-तंत्रवाद है, बृहत् टिप्पणिका नामक सूची में उसका उल्लेख आया है। इसी गं्रथ की एक पाण्डुलिपि भण्डारकर ओरियन्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पूना में है। इस प्रति में ग्रंथ का नाम तो योनिप्राभृत ही है किन्तु उसके कर्ता का नाम पण्हसवण मुनि पाया जाता है। इन महामुनि ने उसे कूष्माण्डिनी महादेवी से प्राप्त किया था और अपने शिष्य पुष्पदन्त और भूतबलि के लिए लिखा। इन दो नामों के कथन से इस ग्रंथ का धरसेन कृत होना बहुत संभव जँचता है। प्रज्ञाश्रमणत्व एक ऋद्धि का नाम है उसके धारण करने वाले प्रज्ञाश्रमण कहलाते थे। पूना में उपलब्ध ‘‘जोणिपाहुड़’’ की इस प्रति का लेखन काल सं. १५८२ है अर्थात् वह प्रति चार सौ वर्ष से अधिक प्राचीन है। जोणिपाहुड़ ग्रंथ का उल्लेख धवला में भी आया है, जो इस प्रकार है-

जोणिपाहुडे भणिद-मंत-तंत-सत्तीओ पोग्गलाणुभागो त्ति घेत्तव्वो।

धवला अ प्रति-पत्र।।१८।।

इस प्रकार से धरसेनाचार्य के महान उपकारस्वरूप ही आज हमें षट्खण्डागम ग्रंथ का स्वाध्याय करने को मिल रहा है। इन्होंने बारहवें दृष्टिवाद अंग के अंतर्गत पूर्वों के तथा पाँचवें अंग व्याख्याप्रज्ञप्ति के कुछ अंशों को पुष्पदन्त और भूतबलि आचार्यों को पढ़ाया था। ‘‘दिगम्बर सम्प्रदाय की मान्यतानुसार षट्खण्डागम और कषायपाहुड़ ही ऐसे ग्रंथ हैं, जिनका सीधा संबंध महावीर स्वामी की द्वादशांग वाणी से माना जाता है।’’ कहा भी है-

‘‘जयउ धरसेणणाहो, जेण महाकम्मपयडिपाहुडसेलो।

बुद्धिसिरेणुद्धरिओ, समप्पिओ पुप्फयंतस्स।।’’
(धवला अ ४७५)

वे धरसेन स्वामी जयवन्त होवें जिन्होंने इस महाकर्म प्रकृति प्राभृतरूपी पर्वत को बुद्धिरूपी मस्तक से उठाकर श्री पुष्पदंत आचार्य को समर्पित किया है अर्थात् जिन्होंने पुष्पदन्त मुनि को पढ़ाया है, पुन: इन्होंने ग्रंथ रचना की है।

इस प्रकार से इस धरसेनाचार्य के इतिहास से हमें यह समझना है कि ये आचार्य अंग और पूर्वों के एकदेश के ज्ञाता थे, मंत्र शास्त्र के ज्ञाता थे एवं एक योनिप्राभृत ग्रंथ भी रचा था, इन्होंने बहुत काल तक चन्द्रगुफा में निवास किया था योग्य मुनियोें को अपना श्रुतज्ञान पढ़ाया था। शिष्यों को मंत्र सिद्ध करने को भी दिया था। इस प्रकार से तो हमें अवश्य सोचना चाहिए कि आज के मुनि या आचार्य किसी को मिथ्यात्व के प्रपंच से हटाकर शांति हेतु या किसी कार्य सिद्धि हेतु यदि कुछ मंत्र दे देते हैं, तो देने वाले या मंत्र जपने वाले दोनों ही मिथ्यादृष्टि नहीं हैं तथा उन्होंने श्रुत के विच्छेद के भय से जो दो मुनियों को अपना श्रुतज्ञान देकर उनके निमित्त से आज श्रुतज्ञान की परम्परा अविच्छिन्न रखी है यह महान् उपकार उनका प्रतिदिन स्मरण करना चाहिए। जिस दिन षट्खण्डागम की रचना पूरी हुई है, उस दिन चतुर्विध संघ ने मिलकर श्रुत की महापूजा की थी, उस दिन ज्येष्ठ सुदी पंचमी थी, अत: उस पंचमी को आज श्रुतपंचमी कहकर सर्वत्र श्रुतपूजा करने की प्रथा चली आ रही है। उसे भी विशेष पर्वरूप में मनाकर श्रुत की, गुरु धरसेनाचार्य, पुष्पदंत तथा भूतबलि आचार्य की पूजा करनी चाहिए।

आचार्य श्री पुष्पदन्त और भूतबलि

पुष्पदन्त और भूतबलि का नाम साथ-साथ प्राप्त होता है। फिर भी नंदिसंघ की प्राकृत पट्टावली में पुष्पदंत को भूतबलि से ज्येष्ठ माना गया है। धरसेनाचार्य के बाद पुष्पदंत का आचार्य काल ३० वर्ष का बताया है और इनके बाद भूतबलि का २० वर्ष कहा गया है अत: इनका समय धरसेनाचार्य के समय के लगभग ही स्पष्ट है।

यह तो निश्चित ही है कि श्री धरसेनाचार्य ने दो मुनियों को अन्यत्र मुनिसंघ से बुुलाकर विद्याध्ययन कराया था। अनन्तर शास्त्रसमाप्ति के दिन उनकी विनय से संतुष्ट हुए भूतजाति के व्यंतर देवों ने उन दोनों में से एक मुनि की पुष्प, बलि तथा शंख और सूर्य जाति के वाद्य विशेषों के नाद से बड़ी भारी पूजा की, उसे देखकर धरसेनाचार्य ने उनका ‘‘भूतबलि’’ यह नाम रखा और दूसरे मुनि की अस्त-व्यस्त दंत पंक्तियों को ठीक करके उनके दाँत समान कर दिये-जिससे गुरु ने उनका ‘‘पुष्पदन्त’’ यह नाम रखा। इस धवला टीका के कथन से यह बात स्पष्ट है कि इनका पूर्व नाम कुछ और ही होना चाहिए तथा इनका गृहस्थाश्रम का परिचय क्या है, यह जिज्ञासा सहज ही होती है।

विबुध श्रीधर के श्रुतावतार में भविष्यवाणी के रूप में पुष्पदंत और भूतबलि आचार्य के जीवन पर अच्छा प्रकाश देखने में आता है। यथा- ‘‘भरत क्षेत्र के वामिदेश-ब्रह्मादेश में वसुन्धरा नाम की नगरी होगी। वहाँ के राजा नरवाहन और रानी सुरूपा पुत्र न होने से खेदखिन्न होंगे। उस समय सुबुद्धि नाम का सेठ उन्हें पद्मावती की पूजा का उपदेश देगा। तदनुसार देवी की पूजा करने पर राजा को पुत्रलाभ होगा और उस पुत्र का नाम पद्म रखा जाएगा। तदनन्तर राजा सहस्रकूट चैत्यालय का निर्माण करायेगा और प्रतिवर्ष यात्रा करेगा। सेठ भी राजा की कृपा से स्थान-स्थान पर जिनमंदिरों का निर्माण करायेगा। इसी समय बसन्त ऋतु में समस्त संघ यहाँ एकत्र होगा और राजा सेठ के साथ जिन पूजा करके रथ चलायेगा। इसी समय राजा अपने मित्र मगध सम्राट को मुनीन्द्र हुआ देख सुबुद्धि सेठ के साथ विरक्त हो दिगम्बरी दीक्षा धारण करेगा। इसी समय एक लेखवाहक वहाँ आयेगा वह जिनदेव को नमस्कार कर मुनियों की तथा परोक्ष में धरसेन गुरुदेव की वंदना कर लेख समर्पित करेगा। वे मुनि उसे बाचेंगे कि ‘‘गिरिनगर के समीप गुफावासी धरसेन मुनीश्वर अग्रायणीय पूर्व की पंचमवस्तु के चौथे प्राभृतशास्त्र का व्याख्यान आरंभ करने वाले हैं अत: योग्य दो मुनियों को भेज दो। वे मुनि नरवाहन और सुबुद्धि मुनि को भेज देंगे। धरसेन भट्टारक कुछ दिनों में नरवाहन और सुबुद्धि नाम के दो मुनियों को पठन, श्रवण और चिन्तन कराकर आषाढ़ शुक्ला एकादशी को शास्त्र समाप्त करेंगे। उनमें से एक की भूतजाति के देव बलिविधि करेंगे और दूसरे के चार दाँतों को सुन्दर बना देंगे। अतएव भूतबलि के प्रभाव से नरवाहन मुनि का नाम भूतबलि और चार दाँत समान हो जाने से सुबुद्धि मुनि का नाम पुष्पदंत होगा।’’

इन्द्रनंदिकृत श्रुतावतार में यह लिखा है कि इन्होंने ग्रंथ समाप्त कर गुरु की आज्ञा से वहाँ से विहार कर अंकलेश्वर में वर्षायोग बिताया। वहाँ से निकलकर दक्षिण देश में पहुँचे। वहाँ पर पुष्पदंत मुनि ने करहाटक देश में अपने भानजे जिनपालित को साथ लिया और दिगम्बरी दीक्षा देकर उन्हें साथ लेकर वनवास देश को चले गये तथा भूतबलि मुनि द्रविड़ देश में चले गये। वनवास देश में पुष्पदंताचार्य ने ‘‘बीसदि’’ सूत्रों की रचना की और जिनपालित को पढ़ाकर तथा उन सूत्रों को उसे देकर भूतबलि मुनि का अभिप्राय जानने के लिए उनके पास भेजा। उन्होंने पुष्पदंताचार्य की अल्पायु जानकर और उन सूत्रों को देखकर बहुत ही संतोष प्राप्त किया पुन: आगे श्रुत का विच्छेद न हो जाये, इस भावना से द्रव्य प्रमाणानुगम को आदि लेकर आगे के सूत्रों की रचना की।

इस प्रकार से भूतबलि आचार्य ने पुष्पदंताचार्य विरचित सूत्रों को मिलाकर पाँच खंडों के छह हजार सूत्र रचे और तत्पश्चात् महाबंध नामक छठे खण्ड की तीस हजार सूत्र ग्रंथरूप रचना की। इस तरह षट्खण्डागम की रचना कर उसे ग्रंथ रूप में निबद्ध किया। पुन: ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन उस श्रुत की महान् पूजा की। अनन्तर भूतबलि ने जिनपालित को षट्खण्डागम सूत्र देकर पुष्पदंत के पास भेजा। अपना सोचा हुआ कार्य पूर्ण हुआ, ऐसा देखकर पुष्पदंताचार्य ने भी श्रुतभक्ति के अनुराग से पुलकित होकर श्रुतपंचमी के दिन चतुर्विध संघ के समक्ष उनकी महान् पूजा की। यह षट्खण्डागम ग्रंथ महाकर्म प्रकृति प्राभृत का अंश है तथा इसमें उसके अर्थ के साथ-साथ सूत्र भी समाविष्ट हैं। भूतबलि आचार्य ने चतुर्थ वेदनाखंड में जो ‘‘णमोजिणाणं’’ आदि ४४ मंगलसूत्र दिये हैं, वे गौतम स्वामी के मुखकमल से निकले हुए हैं। इससे श्री पुष्पदंत और भूतबलि आचार्य इस महान् ग्रंथ के कर्ता नहीं हैं, बल्कि प्ररूपक हैं अत: षट्खंडागम का द्वादशांगवाणी के साथ साक्षात् संबंध है।

षट्खण्डागम का रहस्य-

यह ग्रंथ छह खण्डों में विभक्त है, अत: इसे षट्खण्डागम कहते हैं। उनके नाम-जीवट्ठाण, खुद्दाबंध, बंधसामित्तविचय, वेयणा, वग्गणा और महाबंध हैं। श्री धरसेनाचार्य, पुष्पदंत और भूतबलि के विषय में धवला में अनेक विशेषताएँ उपलब्ध हैं। यथा-

जयउ धरसेणणाहो, जेण महाकम्मपयडिपाहुडसेलो।

बुद्धिसिरेणुद्धरिओ, समप्पिओ पुप्फयन्तस्स।।

वे धरसेन स्वामी जयवन्त होवें, जिन्होंने महाकर्म प्रकृति-प्राभृतरूपी पर्वत को अपने बुद्धिरूपी मस्तक से उठाकर पुष्पदंत को समर्पित किया है।

पणमामि पुप्फयंतं, दुकयंतं दुण्णयंधयाररविं।

भग्गसिवमग्गकंटय-मिसिसमिइवइं सया दंतं।।

जो पापों का अन्त करने वाले हैं, कुनयरूपी अंधकार का नाश करने के लिए सूर्यतुल्य हैं, जिन्होंने मोक्षमार्ग के विघ्नों को नष्ट कर दिया है, जो ऋषियों की सभा के अधिपति हैं और निरन्तर पंचेन्द्रियों का दमन करने वाले हैं, ऐसे पुष्पदन्ताचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ। यहाँ पर ‘‘ऋषिसमितिपति’’ विशेषण से ये महान् संघ के नेता आचार्य सिद्ध होते हैं। ऐसे ही-

‘‘ण चासंबद्धं भूतबलिभडारओ परूवेदि महाकम्मपयडिपाहुड-अमियवाणेण ओसारिदा णंसरागदोसमोहत्तादो।’’

भूतबलि भट्टारक असंबद्ध कथन नहीं कर सकते, क्योंकि महाकर्म प्रकृति प्राभृतरूपी अमृतपान से उनका समस्त रागद्वेष मोह दूर हो गया है। इन प्रकरणों से इन पुष्पदंत और भूतबलि आचार्यों की महानता का परिचय मिल जाता है। ये आचार्य हम और आप जैसे साधारण लेखक या वक्ता न होकर भगवान महावीर की द्वादशांग वाणी के अंशों के आस्वादी और उस वाणी के ही प्ररूपक थे तथा राग, द्वेष और मोह से बहुत दूर थे। उनके संज्वलन कषाय का उदय होते हुए भी वे असत्यभाषण से सर्वथा परे होने से वीतरागी थे, महान् पापभीरू थे। बड़े सौभाग्य की बात है कि उनके द्वारा शास्त्ररूप से निबद्ध हुआ परमागम आज हमें उपलब्ध हो रहा है और हम लोग उनकी वाणी का स्वाध्याय करके अपने असंख्यातगुणित कर्मों की निर्जरा कर रहे हैं तथा महान् पुण्य संचय के साथ-साथ ही सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर अपने आप में कृतकृत्यता का अनुभव कर रहे हैं।

आचार्य श्री वीरसेन

जितात्मपरलोकस्य, कवीनां चक्रवर्तिन:।

वीरसेनगुरो: कीर्तिरकलंकावभासते।।

जिन्होंने स्वपक्ष और परपक्ष के लोगों को जीत लिया है तथा जो कवियों के चक्रवर्ती हैं, ऐसे श्री वीरसेन स्वामी की निर्मल कीर्ति प्रकाशित हो रही है। ये आचार्य वीरसेन किनके शिष्य थे? इनका समय क्या था? इन्होंने क्या-क्या रचनाएं कीं? आदि संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। जीवन परिचय-आचार्यदेव ने स्वयं अपनी धवला टीका की प्रशस्ति में अपने गुरु का नाम एलाचार्य लिखा है। पर इसी प्रशस्ति की चौथी गाथा में गुरु का नाम आर्यनंदि और दादा गुरु का नाम चन्द्रसेन कहा है। डॉ. हीरालाल जैन का अनुमान है कि ऐलाचार्य इनके विद्यागुरु और आर्यनंदि इनके दीक्षागुरु थे।

इस प्रशस्ति से श्री वीरसेनाचार्य सिद्धान्त के प्रकाण्ड विद्वान, छन्द, ज्योतिष, व्याकरण और न्याय के वेत्ता तथा भट्टारक पद से विभूषित थे, ऐसा स्पष्ट है।

जो भी हो, ऐलाचार्य गुरु का वात्सल्य इन पर असीम था, ऐसा स्पष्ट है, वे किसी न किसी रूप में इनके गुरु अवश्य थे। यथा-‘‘एलाइरियवच्छओ’’ स्वयं इस वाक्य में अपने को ऐलाचार्य का ‘‘वत्स’’ कहते हैं। ऐसे और भी अनेक स्थलों पर स्वयं आचार्य ने अपने को ऐलाचार्य का वत्स लिखा है।

समय निर्णय-इनका समय विवादास्पद नहीं है। इनके शिष्य जिनसेन ने इनकी अपूर्ण जयधवला टीका को शक संवत् ७५९ (ईसवी सन् ८३७) की फाल्गुन शुक्ला दशमी को पूर्ण किया है। अत: इस तिथि के पूर्व ही वीरसेनाचार्य का समय होना चाहिए। इसलिए इनका समय ईसवी सन् की ९वीं शताब्दी (८१६) का है।

इनकी रचनाएं-इनकी दो रचनाएं प्रसिद्ध हैं। एक धवला टीका और दूसरी जयधवला टीका। इनमें से द्वितीय टीका तो अपूर्ण रही है। इन्द्रनन्दिकृत श्रुतावतार में दिया है कि ‘‘षट्खण्डागम’’ सूत्र पर श्री वप्पदेव की टीका लिखे जाने के उपरान्त कितने ही वर्ष बाद सिद्धान्तों के वेत्ता ऐलाचार्य हुए, ये चित्रकूट में निवास करते थे, श्री वीरसेन ने इनके पास सम्पूर्ण सिद्धान्त ग्रंथों का अध्ययन किया, अनन्तर गुरु की अनुज्ञा लेकर वाटग्राम में पहुँचे, वहाँ पर आनतेन्द्र द्वारा बनवाये गये जिनमंदिर में ठहरे। वहाँ पर श्री वप्पदेवकृत टीका पढ़ी। अनन्तर उन्होंने ७२००० श्लोक प्रमाण में समस्त षट्खण्डागम पर ‘‘धवला’’ नाम से टीका रची। यह टीका प्राकृत और संस्कृत भाषा में मिश्रित होने से ‘‘मणिप्रवालन्याय’’ से प्रसिद्ध है।

दूसरी रचना ‘‘कसायपाहुड’’ सुत्त पर ‘‘जयधवला’’ नाम से टीका है। इसको वे केवल २०००० श्लोक प्रमाण ही लिख पाये थे कि वे असमय में स्वर्गस्थ हो गये। इस तरह एक व्यक्ति ने अपने जीवन में ९२००० श्लोक प्रमाण रचना लिखी, यह एक आश्चर्य की बात है। श्री वीरसेन स्वामी ने वह कार्य किया है, जो कार्य महाभारत के रचयिता ने किया है। महाभारत का प्रमाण १००००० श्लोक है और इनकी टीकाएं भी लगभग इतनी ही बड़ी हैं। अतएव ‘‘यदिहास्ति तदन्यद् यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्।’’ जो इसमें है सो ही अन्यत्र है और जो इसमें नहीं है सो कहीं पर नहीं है।’’ यह उक्ति यहाँ भी चरितार्थ है।

इन टीकाओं से आचार्य के ज्ञान की विशेषता के साथ-साथ सैद्धान्तिक विषयों का कितना सूक्ष्म तलस्पर्शी इनका अध्ययन था, यह दिख जाता है। वीरसेनाचार्य ने अपनी टीका में जिन आचार्यों के नाम का निर्देश ग्रन्थोल्लेखपूर्वक किया है, वे निम्न प्रकार हैं-

१. गृद्धपिच्छाचार्य का तत्त्वार्थसूत्र

२. तत्त्वार्थभाष्य (तत्त्वार्थवार्तिक भाष्य)

३. सन्मति सूत्र

४. सत्कर्म प्राभृत

५. पिंडिया

६. तिलोयपण्णत्ति

७. व्याख्याप्रज्ञप्ति

८. पंचास्तिकाय प्राभृत

९. जीवसमास

१०. पूज्यपाद विरचितसारसंग्रह

११. प्रभाचन्द्र भट्टारक (ग्रंथकार)

१२. समंतभद्र स्वामी (ग्रंथकार)

१३. छंदसूत्र

१४. सत्कर्म प्रकृति प्राभृत

१५. मूलतंत्र

१६. योनिप्राभृत और सिद्धिविनिश्चय।

और भी ग्रंथों के उद्धरणों या नाम का उल्लेख धवला टीका में पाया जाता है।

१. आचारांग निर्युक्ति

२. मूलाचार

३. प्रवचनसार

४. दशवैकालिक

५. भगवती आराधना

६. अनुयोगद्वार

७. चारित्रप्राभृत

८. स्थानांगसूत्र

९. शाकटायनन्यास

१०. आचारांगसूत्र

११. लघीयस्रय

१२. आप्तमीमांसा

१३. युक्त्यनुशासन

१४. विशेषावश्यक भाष्य

१५. सर्वार्थसिद्धि

१६. सौंदरनन्द

१७. धनंजयनाममाला-अनेकार्थनाममाला

१८. भावप्राभृत

१९. बृहत्स्वयंभूस्तोत्र

२०. नंदिसूत्र

२१. समवायांग

२२. आवश्यकसूत्र

२३. प्रमाणवार्तिक

२४. सांख्यकारिका

२५. कर्मप्रकृति।

धवला टीका में जिन गाथाओं को उद्धृत किया है, उनमें से अधिकांश गाथाएँ गोम्मटसार, त्रिलोकसार, जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति और वसुनंदिश्रावकाचार में भी पायी जाती हैं अत: यह अनुमान होता है कि इन प्राचीन गाथाओं का स्रोत एक ही रहा है, क्योंकि गोम्मटसार आदि ग्रंथ धवला टीका से बाद के ही हैं। जयधवला की प्रशस्ति में कहा है- ‘‘टीका श्री वीरसेनीया शेषा: पद्धतिपंजिका।’’ श्री वीरसेन की टीका ही यथार्थ टीका है, शेष टीकाएँ तो पद्धति या पंजिका हैं। वास्तव में श्री वीरसेन स्वामी को महाकर्म प्रकृति प्राभृत और कषायप्राभृतसंबंधी जो भी ज्ञान गुरु परम्परा से उपलब्ध हुआ, उसे इन दोनों टीकाओं में यथावत् निबद्ध किया है। आगम की परिभाषा में ये दोनों टीकाएँ दृष्टिवाद के अंगभूत दोनों प्राभृतों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अतएव इन्हें यदि स्वतंत्र ग्रंथ संज्ञा दी जाये तो भी अनुपयुक्त नहीं है। यही कारण है कि आज ‘‘षट्खण्डागम’’ सिद्धान्त धवलसिद्धान्त के नाम से और ‘‘पेज्जदोसपाहुड़’’ जयधवल सिद्धान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं।


ज्योतिष एवं गणित विषय-

इस महासिद्धान्त ग्रंथ में ज्योतिष, निमित्त और गणितविषयक की भी महत्वपूर्ण चर्चायें हैं। ५वीं शताब्दी से लेकर ८वीं शताब्दी तक ज्योतिषविषयक इतिहास लिखने के लिए इनका यह ग्रंथ बहुत ही उपयोगी है। ज्योतिषसंंबंधी चर्चाओं में नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा संज्ञाओं के नाम हैं। दिन-रात्रि, मुहूर्त की चर्चा है। निमित्तों में व्यंजन और छिन्न निमित्तों की चर्चायें हैं।

इसमें प्रधानरूप से एक वर्ग समीकरण, अनेक वर्ग समीकरण, करणी, कल्पितराशियाँ, समानान्तर, गुणोत्तर, व्युत्क्रम आदि बीजगणितसंबंधी प्रक्रियायें हैं। धवला में अ३ को अ के घन का प्रथम वर्गमूल कहा है। अ९ को अ के घन का घन बताया है। अ६ को अ के वर्ग का घन बतलाया है, इत्यादि।

आचार्य की पापभीरूता-श्री वीरसेन स्वामी आचार्यों के वचनों को साक्षात् भगवान् की वाणी समझते थे और परस्पर विरुद्ध प्रकरण में कितना अच्छा समाधान दिया है, इससे इनकी पापभीरूता सहज ही परिलक्षित होती है। उदाहरण देखिये- ‘‘आगम का यह अर्थ प्रामाणिक गुरु परम्परा के क्रम से आया है, यह कैसे निश्चय किया जाये? नहीं, क्योंकि........ज्ञान-विज्ञान से युक्त इस युग के अनेक आचार्यों के उपदेश से उसकी प्रमाणता जाननी चाहिए।’’१ श्री वीरसेन स्वामी जयधवला टीका करते समय गाथा सूत्रों को और चूर्णि सूत्रों को कितनी श्रद्धा से देखते हैं- ‘‘विपुलाचल के शिखर पर विराजमान वर्धमान दिवाकर से प्रगट होकर गौतम, लोहाचार्य और जम्बूस्वामी आदि की आचार्य परम्परा से आकर और गुणधराचार्य को प्राप्त होकर गाथास्वरूप से परिणत हो पुन: आर्यमंक्षु और नागहस्ति के द्वारा यतिवृषभ को प्राप्त होकर और उनके मुखकमल से चूर्णिसूत्र के आकार से परिणत दिव्यध्वनिरूप किरण से जानते हैं।’’ इस प्रकरण से यह स्पष्ट है कि कषायप्राभृत ग्रंथ साक्षात् भगवान की दिव्यध्वनि तुल्य है। जब किसी स्थल पर दो मत आये हैं, तब कैसा समाधान है? ‘‘दोनों प्रकार के वचनों में से किस वचन को सत्य माना जाये?’’

‘‘इस बात को केवली या श्रुतकेवली जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जानता। क्योंकि इस समय उसका निर्णय नहीं हो सकता है, इसलिए पापभीरू वर्तमान के आचार्यों को दोनों का ही संग्रह करना चाहिए, अन्यथा पापभीरुता का विनाश हो जावेगा।’’ एक जगह वनस्पति के विषय में कुछ प्रश्न होने पर तो वीरसेन स्वामी कहते हैं कि-‘‘गोदमो एत्थ पुच्छेयव्वो’’ यहाँ गौतम स्वामी से पूछना चाहिए। अर्थात् हम इसका उत्तर नहीं दे सकते। अब बताइये इससे अधिक पापभीरूता और क्या होगी? वास्तव में ये आचार्य अपनी गुरुपरम्परा से प्राप्त जानकारी के अतिरिक्त मन से कुछ निर्णय देना पाप ही समझते थे। इन आचार्यों के ऐसे प्रकरणों से आज के विद्वानों को शिक्षा लेनी चाहिए। जो कि किसी भी विषय में निर्णय देते समय आचार्यों को अथवा उनके गंथों को भी अप्रमाणिक कहने में अतिसाहस कर जाते हैं।


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