ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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003.श्री गिरनार सिद्धक्षेत्र यात्रा

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श्री गिरनार सिद्धक्षेत्र यात्रा

समाहित विषयवस्तु

१. गुरु-वियोग के मेघ छाए रहे।

२. आचार्य श्री शिवसागर जी का गिरनार यात्रा का विचार।

३. हीरालाल जी निवाई संघपति बने।

४. संघ का विहार-अजमेर में प्रथम पड़ाव।

५. विहार काल में भी ज्ञानमती माताजी अपनी शिष्या जिनमती को मुखाग्र ग्रंथ अध्यापन करातीं।

६. ज्ञानमती ने सभी से राजमार्ग से ही चलने को कहा।

७. एक माताजी पगडंडी से चलीं-आधा संघ भटक गया।

८. ब्यावर होते हुए संघ गिरनार पहुँच गया।

९. तीर्थक्षेत्र की माताजी ने लगातार ७ वंदनाएँ की।

१०. तीर्थक्षेत्र का वर्णन।

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काव्य पद

श्रावक हो अथवा हो साधु, योग-वियोग का पड़े प्रभाव।

आचार्य श्री वीरसागर का, अनुभव करता संघ अभाव।।
यदपि समय की चादर दुख को, क्रमश: क्रमश: करती कम।
पर, सब बोले गुरु वियोग को, नहीं भुला पाते हैं हम।।३२५।।

अंतरंग में गुरु का सुमरन, बार-बार हो आता है।
सुधियों में घिर कर अतीत भी, वर्तमान बन जाता है।।
अज्ञानी की हृदय वेदना, आँसू बन बह जाती है।
ज्ञानीजन की अंतस् पीड़ा, धर्म रूप ढल जाती है।।३२६।।

गुरु वियोग उत्पन्न भार से, हृदतंत्री के झंकृत तार।
नवाचार्य शिवसागर जी ने, तीर्थयात्रा का रखा विचार।।
सकल संघ अनुमोदन पाया, आचार्यश्री आशीष दिया।
हीरालाल निवाई पाटनी, पद संघपति स्वीकार किया।।३२७।।

चला संघ गिरनार क्षेत्र को, प्रथम चरण अजमेर रहा।
धवला में श्री वीरसेन ने, गिरि को मंगलक्षेत्र कहा।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, संघ साथ में किया गमन।
पद विहार कर माताजी का, हुआ नगर में शुभागमन।।३२८।।

श्री सरसेठ भागचंद सोनी, करी संघ की अगवानी।
अनुनय-विनय-भक्ति-गद्गद स्वर, बोले स्वर्णमयी वाणी।।
सफल हुआ जन्म अजमेरा, शिवसागर से संत मिले।
रोम-रोम पुलकित हैं सबके, हर्षे मानस कंज खिले।।३२९।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती की, प्रतिभा बड़ी विलक्षण है।
ज्ञानपुंज, विदुषी माता की, शैली में आकर्षण है।।
अत: पूज्य आचार्यश्री ने, करा दिया नशिया प्रवचन।
किया श्रवण विस्मय विमुग्ध हो, रोम-रोम पुलकित जन-जन।।३३०।।

मिल समाज ने किया निवेदन, आचार्यश्री के चरणों जा।
माताजी के प्रवचन होवें, नगर बीच सार्वजनिक सभा।।
यह गौरव की बात संघ की, मुस्काये आचार्य प्रवर।
पहुँच गई ईष्र्यालू जन तक, किसी तरह यह बुरी खबर।।३३१।।

आचार्यश्री के श्रवण द्वार तक, जा पहुँची यह दाह-जलन।
रहे शांत सद्भाव संघ में, मना कर दिया माँ-प्रवचन।।
निन्दा-स्तुति, सुक्ख-दुक्ख में, बुध लेते समता का स्वाद।
अत: नहीं माताजी मन में, किंचित् आया हर्ष-विषाद।।३३२।।

जयपुर से अजमेर गमन में, उभयकाल था चला विहार।
सोलह मील रोज संघ चलता, मध्यकाल करता आहार।।
कहीं वृक्ष की छाया मिलती, माताजी करतीं विश्राम।
इतने स्वल्पकाल में माता, कर लेतीं अध्यापन काम।।३३३।।

गुरुवर होते बड़े पारखी, अनुभव से लेते सब जान।
किसको कितनी प्यास लगी है, उसको उतना देते ज्ञान।।
माताजी, जिनमति शिष्या को, तीन बार में छह-छह-छह।
गाथाएँ-श्लोक पढ़ातीं, सैद्धान्तिक ग्रंथों की-कह।।३३४।।

बैठ के पढ़तीं, राह में गुनतीं, सोने के पूर्व सुना देतीं।
अगर नहीं तो याद करातीं, माता तदा सुला देतीं।।
लौकिक माँ होती अपूर्ण हैं, गुरु पूर्णिमाँ होती है।
वही पूर्ण छवि ज्ञानमती में, हमें दृष्टिगत होती है।।३३५।।

कर विहार अजमेर नगर से, पहुँचा संघ नगर ब्यावर।
रुका तीन दिन, कर प्रभावना, गया वहाँ से अन्य शहर।।
एक-एक पग चलते-चलते, आ जाता है पथ का पार।
धर्म प्रभावना करता-करता, बृहद् संघ पहुँचा गिरनार।।३३६।।

पाँच-एक मुनि, नौ आर्यिका, क्षुल्लक एक, क्षुल्लिका चार।
एकादश-नौ ब्रह्म-ब्रह्मचारी, चौके वाले कई उदार।।
जहाँ कहीं भी संघ ठहरता, वहीं तीर्थ बन जाता था।
जिनशासन का डंका बजता, सब मंगल हो जाता था।।३३७।।

संघ जा रहा राजमार्ग से, तब पगडंडी आन मिली।
कहा आर्यिका वीरमती ने, चलें इसी से राह भली।।
ज्ञानमती ने टोका उनको, राजमार्ग ही चलें सभी।
पगडंडी भटकन का कारण, हो सकती है कभी-कभी।।३३८।।

राय हमेशा भाई से लें, चाहे हो कितना ही बैर।
राजमार्ग से चलने में ही, रहती सदा पथिक की खैर।।
माता से ही करना भोजन, चाहे हो कितना नीरस।
वत्सलता के कारण उसमें, आ जाता है अनुपम रस।।३३९।।

किन्तु नहीं मानी माताजी, उनके पीछे चलीं सभी।
संघ छूटकर भटक गयीं सब, विपत्ति महत्तम आन पड़ी।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, यद्यपि वय में रहीं कनिष्ठ।
लेकिन अनुभव, ज्ञान-ध्यान में, अनुपम-उत्तम-सकल वरिष्ठ।।३४०।।

जो पहले ही त्याग चुके सब, शेष न कुछ करने को त्याग।
बोलो, अब क्या त्याग करें वे, मुनि-आर्यिका जी बड़भाग।।
फिर भी क्षेत्र वंदना तक को, नमक आदि का त्याग किया।
सच है जिसने रसना जीती, वह ही जग में सही जिया।।३४१।।

यात्रा काल साधुगण सब ही, अरिष्ट नेमिप्रभु जाप करें।
हो निर्विघ्न सभी की यात्रा, पथ में चिन्तन सतत करें।।
गुरु आज्ञा पा ज्ञानमती ने, सवालाख मंत्रों का जाप।
मग मन ही मन किये निरंतर, भागे विघ्न स्वत: चुपचाप।।३४२।।

श्री गिरनार क्षेत्र का कण-कण, पावन है अतिशायी महान्।
कोटि बहत्तर, सात शतक मुनि, गिरिवर से पाया निर्वाण।।
पाँच टोंक शोभित गिरनारी, कहीं जिनालय, कहीं चरण।
इनका जो वंदन करता है, उनके मिटते जन्म-मरण।।३४३।।

प्रथम टोंक पर गोमुख गंगा, जिनमंदिर चौबीस चरण।
माताजी श्रीज्ञानमती ने, सादर सबको किया नमन।।
द्वितीय टोंक निर्वाण पधारे, श्रीमुनिवर अनिरुद्धकुमार।
दर्शन करके माताजी ने, कीना पाप-पुंज को क्षार।।३४४।।

तृतिय टोंक से शिवपुर पहुँचे, परम तपस्वी शंबुकुमार।
चतुर्थ टोंक अक्षयपद पाया, श्री मुनिवर प्रद्युम्न कुमार।।
चतुर्थ टोंक से सब भय खाते, कम ही भक्त चढ़ें उस पर।
लेकिन जिसने ठान लिया हो, उसे न लगता किंचित् डर।।३४५।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती जी, चढ़ीं वंदना हित गिरनार।
भक्ति-भाव से, गद्गद स्वर से, करी वंदना श्रुत अनुसार।।
पग-पग प्रभु की स्तुति करतीं, टोंक-टोंक पर टेका माथ।
नेमिनाथ प्रभु चरण शरण में, पहुँच गयीं गुरुवर के साथ ||३४६||

माताजी सुकुमारी नारी, अत: थकावट हुई अधिक।
तद्यपि धर्म प्रेरणा प्रेरित, सप्त वंदना कीं अनथक।।
टोंक पाँचवीं मोक्ष को गये, तीर्थंकर श्री नेमिनाथ।
माताजी श्री ज्ञानमती ने, सविनय नमन किया मुनिनाथ।।३४७।।

सकल भक्तियाँ की माताजी, चरण वंदना की सात।
शीघ्र सिद्धपद प्राप्त मुझे हो, करी भावना प्रभु के द्वार।।
समाधिभक्ति पढ़ करी वंदना, लिया पुन: दर्शन की आश।
वापस आयीं संघ साथ में, मनसि तोष-आनंद का वास।।३४८।।

नहीं सीढ़ियाँ, नहीं सहारा, आरोहण है कठिन अती।
बिना सहारे ऊपर पहुँचीं, पूज्य आर्यिका ज्ञानमती।।
यही नहीं औरों को कराया, आरोहण दे कर अवलम्ब।
तृण का भी यदि योग प्राप्त हो, मिले सफलता बिना विलम्ब।।३४९।।