ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

004.प्रस्तावना

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प्रस्तावना

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अपनी मौलिक विचारधारा को आधार बनाकर स्वतंत्र ग्रंथ का लेखन कर लेना तो सरल माना जा सकता है किन्तु पूर्वाचार्यों की सूत्ररूप वाणी का आधार लेकर उनके मनोभावों को दृष्टि में रखकर पूर्वापर आगम से अविरुद्ध वचनरूपी मोतियों की माला पिरोते हुए किसी सैद्धान्तिक सूत्रग्रंथ की टीका लिखना अत्यंत दुरूह कार्य है।

इसकी कठिनता तो मात्र वे विशिष्ट प्रबुद्धजन ही जान सकते हैं जिन्होंने या तो उन टीकाग्रंथों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया हो अथवा कोई ऐसा दुरूह लेखनकार्य किया हो। नीतिकारों ने इस विषय में कहा भी है—

विद्वान् एव विजानाति, विद्वज्जनपरिश्रमम्।

न हि वन्ध्या विजानाति, पुत्रप्रसववेदनाम्।।

अर्थात् बन्ध्या स्त्री जिस प्रकार पुत्रप्रसव की वेदना को नहीं जान सकती है, उसी प्रकार विद्वान् के अतिरिक्त साधारण मनुष्य ग्रंथलेखन के परिश्रम का अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं।

हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ध्यान आदि में से समय निकालकर महान् परिश्रमपूर्वक लेखन करके जैनवाङ्मय का सारतत्त्व भव्यात्माओं के लिए प्रदान किया है। उनमें से ही भगवान महावीर की दिव्यध्वनि से प्राप्त अंगपूर्वों का ज्ञान जब लुप्तप्राय: होने लगा तब श्रीधरसेनाचार्य की कृपाप्रसाद से आचार्ययुगल श्री पुष्पदंत एवं भूतबलि जी ने सूत्र ग्रंथों की रचना करके ‘‘षट्खंडागम’’ नामक सिद्धांतशास्त्र का निर्माण किया।

समय के अनुसार जहाँ संक्षेप रुचि वाले शिष्यों का अभाव होने लगा वहीं स्थूलबुद्धि के धारक मनुष्यों में उन सूत्रों का सरल अर्थ जानने की जिज्ञासा भी उत्पन्न हुई। पुन: आज से लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व ‘‘श्रीवीरसेन’’ नाम के महान् ज्ञानी आचार्य हुए जिन्होंने सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ-साथ प्राकृत और संस्कृत भाषा पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करके ‘‘षट्खंडागम’’ सूत्रों पर ‘‘धवला’’ नाम की टीका का लेखन किया। वर्तमान में इसी टीका के नाम पर ही ग्रंथ की पहचान हो रही है और अपने नाम के अनुरूप ही धवलाग्रंथ ज्ञानियों के मन को धवल-पवित्र करने में अमृत के समान है। इन ‘‘षट्खंडागम’’ सूत्र ग्रंथों पर अन्य किन-किन आचार्यों के द्वारा टीका आदि लिखी गर्ई हैंं, यह प्रस्तुत ग्रंथ के मूल विषयवस्तु में दर्शाया गया है।

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एक अतिशयकारी टीका का पुन: प्रादुर्भाव—

बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक निश्चितरूप से परमसौभाग्यशाली मानना होगा जब भारतदेश ने पौद्गलिकशक्ति के फलस्वरूप अनेक वैज्ञानिक प्रगतियों के साथ ही आजादी की स्वर्णजयंती वर्ष में पोखरन (राज.) के परमाणु विस्फोट के द्वारा अपनी स्वतंत्रता का अर्थ भी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करके दिखा दिया ऐसे युग में आध्यात्मिक शक्तियों ने भी अपना विकसित रूप प्रगट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

आचार्य पुष्पदंत-भूतबलि द्वारा रचित इन षट्खंडागम सूत्रों पर श्रीवीरसेनाचार्य के पश्चात् किसी भी आरातीय आचार्य अथवा विद्वान् ने लेखनी चलाने का उपक्रम नहीं किया था, वह उद्यम इस सदी की ऐतिहासिक साध्वी पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने कर दिखाया है। जैसा कि उन्होेंने स्वयं ग्रंथ की प्रारंभिक भूमिका में अपने प्रतिज्ञावाक्य में कहा है—

‘‘अस्य षट्खंडागमग्रंथराजस्य षट्टीका: श्रूयन्ते, परन्तु वर्तमानकाले एका धवलाख्या एव टीका उपलभ्यते। अस्या: टीकाया आधारेणैव विशेषतया स्वस्य ज्ञातुमर्हाणि प्रकरणान्युद्धृत्योद्धृत्य क्वचित्प्राकृतपंक्ती: क्वचित्प्राकृतपंक्तीनां संस्कृतछायां कृत्वा.........अन्येषामपि ग्रंथानां विशेषोद्धरणानि अपि संगृह्य मयेयं सिद्धांतचिंतामणिर्नामधेया टीका लिख्यते।’’

अर्थात् इस षट्खंडागम ग्रंथ की छह टीकाएँ सुनी जाती हैं किन्तु वर्तमान में एकमात्र धवला नाम की टीका ही उपलब्ध है। इस धवला टीका के आधार से ही स्वयं विशेष जानने की इच्छा से अनेक प्रकरणों को वहाँ से ज्यों के त्यों उद्धृत करके, किन्हीं प्राकृत पंक्तियों की संस्कृत छाया करके, कुछ विषयों को संक्षिप्त करके, किन्हीं प्रसंगोपात्त विषयों को सरल करने के लिए अन्य ग्रंथों के विशेष उद्धरणों को भी संग्रहीत करके मेरे द्वारा यह ‘‘सिद्धांत-चिंतामणि’’ नामकी टीका लिखी जा रही है।

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सरलता एवं पापभीरुता का अद्वितीय उदाहरण—

उपर्युक्त पंक्तियों में टीककत्र्री की स्पष्टवादिता वास्तव में उनकी पूर्ण ईमानदारी एवं पापभीरुता का परिचायक है किन्तु आज प्राय: अनेक लेखकों की कृतियों में यह बेईमानी धड़ल्ले से देखी जा रही है। कितने ही लेखक-लेखिकाएँ, सम्पादक आदि अत्यंत प्राचीन आचार्यों की कृति में भी संशोधन, परिवर्तन, परिवद्र्धन करने में बिल्कुल भी डरते नहीं हैं प्रत्युत् इस कार्य में अपने को उनसे अधिक व्याकरणज्ञानी महसूस करते हैं। कई हिन्दी अनुवादक साधु-साध्वी भी मूलकृति का नाम ही बदल कर नया नाम दे रहे हैं जो अत्यंत विचारणीय विषय है और परमार्थ से नैतिक अपराध का द्योतक है।

अभी अनेक सम्पादक, लेखक, लेखिका एवं संग्रहकर्ताओं द्वारा प्रकाशित छोटी-बड़ी पुस्तकों, ग्रंथों, स्तुतियों, पूजा आदिको में ताजा नमूना देखने में आया है कि पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित पद्य-गद्य रचनाओं को लेकर उसमें से माताजी का नाम हटा दिया है पुन: उसे या तो किसी ने अपने नाम से छाप दिया है अथवा वे रचनाएँ किसी का नाम दिये बिना ही छापी हैं, इसमें जहाँ लेखक के मन का ‘‘निन्हव’’ दोष झलकता है वहीं योग्यता के अभाव में भी नाम लोलुपता का उच्चाकांक्षी भाव प्रदर्शित होता है।

पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की इस टीका में तो साक्षात् गुणज्ञता दिख ही रही है, उनके दो सौ से अधिक रचित ग्रंथों में भी कहीं ऐसा निन्हव या मात्सर्य देखने को नहीं मिलता है। जहाँ से जिस प्रकरण को उन्होंने जिस ग्रंथ से लिया उसका नाम तत्काल वहीं टिप्पण में दे दिया है। इसी प्रकार यहाँ भी उन्होंने प्रारंभ में ही पाठकों के लिए खुलासा कर दिया है कि इस टीका में मैंने कहीं भी अपने कोई मनगढ़न्त विचारों का समावेश नहीं किया है और मूल टीका का ही इसमें प्रमुख आधार लिया है ताकि ग्रंथ की प्रामाणिकता में कहीं प्रश्नचिन्ह न लगने पावे। टीकाकत्र्री के ज्ञानगाम्भीर्य को मैंने स्वयं पग-पग पर अनुभव किया है, क्योंकि इस टीका का हिन्दी अनुवाद करते समय अनेक स्थानों पर मैंने अवलोकन किया कि मूलग्रंथ के विषय को जनसामान्य तक सरलतापूर्वक पहुँचाने के लिए उन्होंने अनेक उच्चकोटि के ग्रंथों में से प्रसंगोपात्त उद्धरण दिये हैं, फिर भी वे ग्रंथ के प्रारंभ में अपनी लघुता ही प्रदर्शित करती हुई कहती हैं—

‘‘नायं मम प्रयास: स्वविद्वत्ताप्रदर्शनार्थं, प्रत्युत् स्वज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमवृद्ध्यर्थं सिद्धांतसूत्रग्रंथे प्रवेशकरणार्थं स्वात्मनि परमाह्लादमुत्पादयितुं चायं उपक्रम: क्रियते।............क्वायं द्वादशांगांशमहार्णव: सिद्धान्तागम:? क्व च लवमात्रज्ञानधारिणी अल्पबुद्धि:?..........

अर्थात् स्वयं को अल्पबुद्धि कहकर उन्होंने इस टीका को और भी महिमामण्डित कर दिया है। इसके पठन से पाठकों में भी स्वयमेव नम्रता की कलिका प्रस्फुटित होकर सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो सकेगा जो कि आगमग्रंथों के स्वाध्याय का फल माना गया है।

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सूत्रों का समुचित हिसाब समुदायपातनिका में है—

पूरे ग्रंथ का आलोढन करने के बाद इस टीका का लेखन सचमुच में उत्कृष्टता का द्योतक है। जो कार्य मूल ग्रंथ में देखने को नहीं मिलता है वह इसमें माताजी ने मूल मंगलाचरण सूत्र से पहले ही दे दिया है कि बीस प्ररूपणाओं में से इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ में तीन महाधिकार हैं और उनमें कुल एक सौ सतत्तर (१७७) सूत्र हैं जो अनेक अंतरस्थलों में विभक्त हैं।

सभी महाधिकारों के प्रारंभ में अंतरस्थलों की संख्या तथा सूत्रों की संख्या को बतलाकार ही विषय वस्तु का शुभारंभ किया गया है ताकि स्वाध्यायी सरलता से समझ सके कि इस अधिकार में क्या विषय है। जैसे प्रथम महाधिकार की समुदायपातनिका का संक्षिप्त नमूना देखें—

‘‘अत्रापि प्रथममहाधिकारे ‘‘णमो’’ इत्यादि मंगलाचरणरूपेण प्रथमस्थले गाथासूत्रमेकं।....एवं षट्खंडागमग्रंथराजस्य सत्प्ररूपणाया: पीठिकाधिकारे चतुर्भिरन्तरस्थलै: सप्तसूत्रै: समुदायपातनिका सूचितास्ति।’’

अर्थात् इन पंक्तियों में यह स्पष्ट हो गया कि प्रथम ‘‘पीठिका’’ नामक महाधिकार में चार अंतराधिकार हैं। जिनके माध्यम से इस अधिकार में मंगलाचरण रूप णमोकार महामंत्र का विस्तृत, विवेचन, गुणस्थान एवं मार्गणाओं का वर्णन एवं आठ अनुयोगद्वारों का कथन किया गया है। टीकाकत्र्री का यह श्रमसाध्य कार्य सराहनीय तो है ही, आगे ग्रंथ पर शोध करने वाले जिज्ञासुओं के लिए ये समुदायपातनिकाएँ कुंजी के समान सहायक भी सिद्ध होंगी।

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मंगलाचरण ही प्रथम सूत्र है—

अनादिनिधन णमोकार महामंत्र को मूल मंगलाचरण बनाकर ग्रंथकर्ता ने उसे ही प्रथम गाथासूत्र माना है और आगे के सूत्रों का प्रारंभ दो नम्बर से किया है। यूूँ तो वीरसेनस्वामी ने भी धवला टीका में मंगलाचरण का अच्छा विस्तारीकरण किया है फिर भी इस नूतन टीका में णमोकार मंत्र के ३५ अक्षर, ५८ मात्रा एवं स्वर-व्यञ्जन आदि का सुंदर विवेचन है। इस मंत्र के माध्यम से जिन पंचपरमेष्ठियों का स्मरण किया जाता है, मैंने हिन्दी टीका में उनके मूलगुणों का भी यथास्थान वर्णन दिया है। इन कतिपय विशेषताओं से सहित यह मंगलाचरण प्रकरण विशेषरूप से पठनीय बन गया है।

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णमोकारमंत्र अनादि मंत्र कैसे है?—

इस महामंत्र प्रकरण में निबद्ध और अनिबद्ध मंगल का स्वरूप पढ़ते समय कभी-कभी मन दिग्भ्रमित होने लगता है कि णमोकार मंत्र संभवत: इसी षट्खंडागम ग्रंथ के कत्र्ता द्वारा निर्मित किया गया होगा। किन्तु इस टीका के पढ़ने के बाद उस संदेह का पूर्णतया निवारण हो जाता है क्योंकि टीकाकत्र्री ने णमोकार—एक अनुचिंतन पुस्तक में वर्णित धवला टीका की निम्न पंक्तियों में स्पष्ट कर दिया है कि—

‘‘य: सूत्रस्यादौ सूत्रकत्र्रा णिबद्ध:—संग्रहीत: न च ग्रथित: देवतानमस्कार: स निबद्धमंगलं। य: सूत्रस्यादौ सूत्रकत्र्रा कृत:—ग्रथित: देवतानमस्कार: स अनिबद्धमंगलं। अनेन एतज्ज्ञायते—अयं महामंत्र: मंगलाचरण-रूपेणात्र संग्रहीतोऽपि अनादिनिधन:, न तु केनापि रचितो ग्रथितो वा।’’

अर्थात् इस मंगलाचरण में णमोकार मंत्र को आचार्य श्रीपुष्पदंत स्वामी ने स्वयं बनाया नहीं है बल्कि उसका संग्रह किया है इसलिए वह अनादिनिधन मंत्र उपर्युक्त पंक्तियों से शाश्वत सिद्ध हो जाता है।

उपर्युक्त संस्कृत पंक्तियाँ धवला की मुद्रित प्रति में तो नहीं हैं किन्तु ‘‘णमोकार मंत्र—एक अनुचिंतन’’ पुस्तक के लेखक ने किसी प्रति में प्राप्त किया है सो उनके अनुसार ही यहाँ भी दी गई हैं।

इस णमोकार मंत्र को सादि एवं अनादि दोनों रूप मानने की परम्परा भी है विद्वज्जन उसके प्रमाण स्वयं देखें। श्रीसकलकीर्ति भट्टारक के द्वारा रचित उसी ‘‘णमोकारमंत्र कल्प’’ पुस्तक का उद्धरण भी अपनी टीका में देते हुए महामंत्र की अनादिनिधनता सिद्ध की है—

महापंचगुरोर्नाम, नमस्कारसुसम्भवम्।

महामंत्रं जगज्जेष्ठमनादिसिद्धमादिदम्।।

अर्थात् पंचपरमेष्ठियों को नमस्कारस्वरूप महामंत्र संसार में सबसे महान् और अनादिसिद्ध मंत्र है। इस मंत्र से ८४ लाख मंत्रों का उद्भव माना जाता है, षट्खंडागम ग्रंथ में मंगलाचरण के स्थान पर इसका प्रयोग करना वास्तव में महामंत्र की महानता को और भी असंख्यगुणित कर देता है।

इस ग्रंथ की सिद्धांतचिंतामणि टीका का ज्यों-ज्यों अवलोकन करेंगे, त्यों-त्यों इसमें नये-नये विषयों का संकलन प्राप्त होगा, जैसेकि मूलग्रंथ रचना के हेतुओं का प्रतिपादन करते हुए परिमाण का भी वर्णन करते हुए लिखा है कि—

साम्प्रतं हेतुरुच्यते। तत्र हेतुद्र्विविध:, प्रत्यक्षहेतु: परोक्षहेतुरिति।................प्रतिसमयसंख्यात-गुणश्रेण्या कर्म निर्जरा च........। तत्र परम्परा प्रत्यक्षं शिष्यप्रशिष्यादिभि: सततमभ्यर्चनम्।........अथवा जिनपालितो निमित्तं, हेतुर्मोक्ष:, शिक्षकाणां हर्षोत्पादनं निमित्तहेतुकथने प्रयोजनं।

अर्थात् ग्रंथ अध्ययन के हेतुओं में मोक्षप्राप्ति का हेतु तो सबसे प्रबल है एवं जिनपालित नामक अपने भानजे के निमित्त से इस ग्रंथ को रचने का अभिप्राय भी आचार्यदेव ने इसमें स्पष्ट कर दिया है। इससे जहाँ श्रीपुष्पदंताचार्य का श्रुत सरिता को अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित करने का भाव झलकता है, वहीं अपने गृहस्थावस्था के परिवारजनों को भी त्यागमार्ग में प्रवृत्त करने की अभिलाषा भी स्पष्ट प्रतिभासित होती है। उनकी इस परम्परा का निर्वहन संयोगवश इस टीका रचयित्री ने भी अतिशयरूप से किया है क्योंकि उन्होंने जैसे अनेक संसारी प्राणियों को शिक्षा-दीक्षा देकर मोक्षमार्ग में लगाया, उसी प्रकार अपने गृहस्थ परिवारजनों को भी भरपूर प्रेरणा देकर उन्हें त्यागपथ पर अग्रसर किया है। जैसे-उनकी माँ मोहिनी जी ने आर्यिका दीक्षा लेकर अपना ‘‘रत्नमती’’ नाम सार्थक किया तथा एक बहन मनोवती जी आर्यिका श्री अभयमती जी के रूप में हैं और उनकी दूसरी बहन कु. माधुरी (मैं स्वयं) आर्यिका चंदनामती बनकर उनकी छत्रछाया में रत्नत्रयाराधना कर रही हूँ। इसी प्रकार से एक गृहस्थ भ्राता ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन भी इसी पथ पर चल रहे हैं जिनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा भविष्य की उज्ज्वलता को दर्शाती है।

इसके साथ ही शताब्दी के इतिहास का यह प्रथम उदाहरण ही है कि उनके गृहस्थ अवस्था के दो भाई एवं तीन बहनों की १-१ सुयोग्य कन्याएँ भी इसी मार्ग का अनुसरण करती हुई इसी संघ में ज्ञानाराधना तथा प्रभावनात्मक कार्य कर रही हैं। ये सभी बालिकाएँ भी जिनपालित के समान भविष्य में कोई न कोई अनूठा इतिहास प्रस्तुत करें इसी अभिलाषा से उन्हें पूज्य माताजी के उद्बोधन से सिञ्चित किया जा रहा है तथा मेरे द्वारा विभिन्न धर्मग्रंथों का अध्ययन कराया जा रहा है।

संभवत: इस प्रकार का कोई द्वितीय उदाहरण इस युग में किसी परिवार का मिलना असंभव ही है। भगवान ऋषभदेव के तो समस्त १०१ पुत्रों का दीक्षा लेकर उसी भव से मोक्षप्राप्त करना आगम प्रसिद्ध है किन्तु आज का कलियुग इसका अपवाद है।

यहाँ प्रसंगोपात्त मैंने इस विषय का संक्षेप में उल्लेख किया है चूँकि मुझे भी टीकाकत्र्री श्री ज्ञानमती माताजी की लघु भगिनी होने के सौभाग्य के साथ-साथ उनकी इस संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद करने का पुण्य भी प्राप्त हुआ है। जैनवाङ्मय की अविच्छिन्नता में पूज्य मातुश्री का अपूर्व योगदान है जिसे युग कभी विस्मरण नहीं कर सकता है।

उपर्युक्त हेतु प्रकरण के अनंतर उन्होंने सत्प्ररूपणा की इस टीका में ग्रंथ का परिमाण देते हुए कहा है कि श्रुत, अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्तिक और अनुयोगद्वारों की अपेक्षा संख्यात तथा अर्थ की अपेक्षा अनंत है।

वह अनंत श्रुतरूप वाङ्मय अरिहंत और सिद्ध अवस्था के अतिरिक्त छद्मस्थों में तो होना कदापि सम्भव ही नहीं है अत: उसका श्रद्धान मात्र करना ही हम सबके लिए श्रेयस्कर है।

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विभिन्न अपेक्षाओं से ग्रंथकर्ताओं का निर्णय—

यद्यपि पूर्व कथनों से यह ज्ञात हो चुका है कि इस षट्खंडागम ग्रंथ के कर्ता श्रीपुष्पदंत-भूतबलि आचार्य हैं फिर भी धवला टीकाकार के बुद्धि कौशल की विशेषतावश इस टीका में भी पूज्य माताजी ने द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव इन चार निक्षेपों की अपेक्षा कत्र्ता का निरूपण करते हुए भगवान महावीर स्वामी को द्रव्य दृष्टि से अर्थकत्र्ता माना है, क्षेत्र की अपेक्षा राजगृह के विपुलाचल पर्वत को, काल की अपेक्षा श्रावण कृष्णा प्रतिपदा (एकम्) तिथि को तथा भाव की अपेक्षा अनंतचतुष्टय एवं नवलब्धि से परिणत तीर्थंकर देव को ही अर्थकत्र्ता स्वीकार किया है।

इसी संदर्भ में श्रावणकृष्णा प्रतिपदा को युग का आदि दिवस भी बतलाया है तथा तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ के आधार से वीरजिनेन्द्र को ही अर्थकत्र्ता सिद्ध किया है क्योंकि उनकी दिव्यध्वनि ग्रंथरचना की मूल नींव है। इस विषय में टीकाकत्र्री की निम्न पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—

‘‘अस्यामवसर्पिण्यां चतुर्थकाले किंचिन्न्यूनचतुस्त्रिंशद्वर्षशेषे सति वर्षाणां प्रथममासे श्रावणमासे कृष्णपक्षे प्रतिपत्तिथौ धर्मतीर्थस्योत्पत्तिर्जाता, भगवतो महावीरस्य दिव्यध्वनिराविर्बभूव। इयमेव तिथि: युगादि: कथ्यते। ...........अष्टादशमहाभाषा सप्तशतकलघुभाषामयदिव्यध्वने: स्वामी भगवान् महावीरो समवसरणे असंख्यभव्यजीवानां धर्मोपदेशको बभूव।’’

भगवान महावीर के पश्चात् इस धरती पर कोई तीर्थंकर महापुरुष नहीं हुए हैं और उनके उपदेश के बाद ही दिगम्बर जैनाचार्यों ने ग्रंथ लेखन की परम्परा शुरू की है इसीलिए उन्हें अर्थकत्र्ता मानने में कोई विवादापन्न स्थितियाँ उत्पन्न नहीं होती हैं।

इसी श्रृंखला में तीर्थंकर महावीर के प्रथम गणधर श्रीइंद्रभूति गौतम को ग्रंथकत्र्ता सिद्ध करते हुए श्रीवीरसेनस्वामी की प्राकृत पंक्तियाँ उद्धृत की हैं कि—

‘‘.......पुणो तेणिन्दभूदिणा भावसुदपज्जय-परिणदेण बारहंगाणं चोद्दसपुव्वाणं च गंथाणमेक्केण चेव मुहुत्तेण रयणा कदा।’’

अर्थात् ‘‘उन इंद्रभूति गौतम ने भावश्रुतपर्यायज्ञान से परिणत होकर एकमुहूर्त मात्र में बारहअंग और चौदहपूर्वरूप ग्रंथों की रचना कर दी।’’ इसीलिए उन गणधरस्वामी को ग्रंथकत्र्ता माना गया है।

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बारहअंगों में क्या विषय है?—

जिनेन्द्र भगवान की दिव्यध्वनि द्वादशांगरूप मानी गई है उसका विवेचन करते हुए पूज्य माताजी ने पृथक्-पृथक् सब अंगों के स्वरूप बताये हैं और उनके उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं, जैसे—प्रथम आचारांग के वर्णन में मुनियों के आचार से संबंधित प्रश्नोत्तर में अन्य ग्रंथ का प्रमाण देते हुए कहा है—

प्रश्न-‘‘कधं चरे कधं चिट्ठे कधमासे कधं सये, कधं भुंजेज्ज भासेज्ज कधं पावं ण बज्झई।।’’ अर्थात् शिष्य ने गुरु से पूछा कि हे भगवन्! मैं कैसे चलूँ, कैसे बैठूँ, कैसे शयन करूँ, कैसे भोजन करूँ, कैसे बोलूँ, जिससे कि मुझे पाप का बंध न होने पावे। पुन: उत्तर रूप में भी इसी प्रकार का पद्य कहा है— उत्तर-‘‘जदं चरे जदं चिट्ठे जदमासे जदं सये। जदं भुंजेज्ज भासेज्ज एवं पावं ण बज्झई।।’’ अर्थात् हे शिष्य! तू यत्नाचार पूर्वक (सावधानीपूर्वक प्रमाद रहित होकर) अपनी समस्त क्रियाएँ करेगा तो तुझे पाप का बंध नहीं होगा। इसी प्रकार से सप्तम उपासकाध्ययन नामक अंग में श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं का वर्णन है और दशवें प्रश्नव्याकरण अंग में आक्षेपिणी, विक्षेपिणी, संवेदिनी और निर्वेदिनी नाम की चार कथाओं के वर्णन में एक सर्वोपयोगी वाक्य आया है कि—

‘‘अत्रमध्ये या विक्षेपिणी कथा, सा सर्वेषां समक्षे न कथयितव्या। य: कश्चिद् जिनवचनं न जानाति स: कदाचित् परसमयप्रतिपादनपरां इमां कथां श्रुत्वा मिथ्यात्वं गच्छेत्तर्हि तस्य विक्षेपिणी-कथामनुपदिश्य तिस्र: कथा: एव वक्तव्या: सन्ति।’’

अर्थात् ‘‘यह बात विद्वानों के समझने की है कि दूसरों पर भिन्न-भिन्न मतों का पूर्वपक्ष आक्षेपजनक विरोधात्मक कथा सभी के सामने नहीं करना चाहिए क्योंकि जो कोई प्राणी जिनागम की कथाओं को ठीक से नहीं जानता है वह कदाचित् मिथ्यात्व की ओर उन्मुख भी हो सकता है। अत: ऐेसे लोगों के सामने शेष तीन कथाओं का वर्णन ही करना चाहिए।’’ वर्तमान में उन बारह अंगों का अंश हमारे जिनागम में उपलब्ध है, साक्षात् अंग—पूर्वरूप कोई ग्रंथ दिगम्बर जैनशासन में नहीं है। इसी अंग—पूर्व के प्रकरण में राजवार्तिक ग्रंथ के आधार से अंगप्रविष्ट का भी सुंदर वर्णन आया है।

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श्रुतदेवी की प्रतिमा आगमसम्मत है—

जिनेन्द्रवाणी को शास्त्रों में श्रुतदेवी की उपमा प्रदान की गई है। प्रसंगोपात्त इस ग्रंथ में मंगलाचरण की टीका को ही आगे बढ़ाते हुए प्रतिष्ठातिलक ग्रंथ का प्रमाण उद्धृत किया है-

बारह अंगंगिज्जा, दंसणतिलया चरित्तवत्थहरा।

चोद्दसपुव्वाहरणा, ठावे दव्वा य सुयदेवी।।

इसके पश्चात् ७ श्लोकों में इस स्तोत्र के अंदर पूरे द्वादशांग का वर्णन है जो अवश्यमेव पठनीय है क्योंकि उत्तर भारत में सरस्वती की प्रतिमाओं को जिनमंदिरों में विराजमान करने का प्रचलन नहीं है। सो धवलाटीका में श्रीवीरसेनाचार्य का निम्न प्रमाण भी दृष्टव्य है जो इस ग्रंथ की सिद्धांतचिंतामणि टीका में दिया गया है-

बारहअंगंगिज्जा वियलिय-मल-मूढ-दंसणुत्तिलया।

विविह-वर-चरण-भूसा पसियउ सुयदेवया सुइरं।।

इस प्रकार अन्य रचनाकारों के भी एक-एक पद्य को उद्धृत करते हुए सरस्वती के १६ नाम बताये हैं, यथा— भारती, सरस्वती, शारदा, हंसगामिनी................इत्यादि।

इन्हीं सब प्रमाणों के आधार पर पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से हस्तिनापुर तीर्थ के जम्बूद्वीप स्थल पर जिनमंदिर में सरस्वती माता की सुंदर प्रतिमा विराजमान है जिनके मस्तक पर विराजित अरिहन्त भगवान् की प्रतिमा साक्षात् दिव्यध्वनि रूप श्रुतदेवी का दिग्दर्शन कराती है। इस विषय में विज्ञजनों को कोई शंका नहीं करनी चाहिए।

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अविच्छिन्न गुरुपरम्परा—

गुरुमुख से ज्ञान प्राप्त कर भविष्य में उसकी अविच्छिन्न परम्परा चलाने का प्रमुख श्रेय तो श्रीगौतमगणधर स्वामी को है। श्री इंद्रनन्दि आचार्य कृत श्रुतावतार के अनुसार सकलश्रुतधारक, चौदहपूर्वज्ञानधारी, ग्यारहअंग दशपूर्वज्ञानधारी, अंग-पूर्वों के एकदेशज्ञाता आदि आचार्यों की क्रम परम्परा का वर्णन करते हुए श्रुतावतार की संक्षिप्त कथा भी दी है जिससे षट्खंडागम का उद्भव कथानक ज्ञात होता है।

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षट्खंडागम को स्थायित्वरूप किसने प्रदान किया—

हमारे पूर्वाचार्यों ने जंगल की गुफाओं में, जिनमंदिरों तथा मठों में रहकर अनेक ग्रंथों का लेखन ताड़पत्रों के ऊपर सुई से किया है और मंदिरों में ही उन ग्रंथों का रख-रखाव होता था। छापाखानों की परम्परा चलने के बाद भी श्रावकों के प्रमाद या अज्ञानता का ही निमित्त रहा होगा जिससे प्राचीन ग्रंथ प्रकाश में न आ सके और वे दीमक आदि कीड़ों का भोजन बनते रहे। कहते हैं कि वैदिक परम्परा के किन्हीं शंकराचार्य ने जैनग्रंथों की ६ महीने तक होली जलवाई जिससे तमाम प्राचीन ग्रंथ भस्म होकर वर्तमान के लिए अनुपलब्ध हो गये। पुन: उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के दिगम्बर जैनाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज ने अपने ग्रंथों की यह दुर्दशा देखकर श्रावकों को षट्खंडागम आदि सिद्धांतग्रंथों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराने की तथा प्रकाशित करने की पावन प्रेरणा प्रदान की। उस प्रेरणा का उल्लेख पूज्य माताजी ने अपनी टीका में करते हुए गुरुदेव के प्रति अपार श्रद्धा व्यक्त की है। यथा—

‘‘अस्मिन् विंशतिशताब्दौ प्रथमाचार्येण..........एकदा बारामतीनगर्यां गुरुभक्तानां.... .... सिद्धांतश्रुतसंरक्षणचिंतया...............ताम्रपत्राणामुपरि टंकोत्कीर्णार्थं अन्येषामपि पूर्वाचार्यप्रणीतग्रंथानां प्रकाशनार्थं च प्रेरणाकृता।

इसी गुरुपे्ररणा के आधार पर वीर निर्वाण संवत् २४७१ में एक संस्था की स्थापना हुई जिसका नाम रखा गया—‘‘श्री १०८ चारित्रचक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर दिगम्बर जैन जिनवाणी जीर्णोद्धारक संस्था’’। पुन: इस संस्था के माध्यम से सिद्धांतग्रंथों का संरक्षण एवं प्रकाशन आदि महान् कार्य हुए हैं। अत: उन आचार्यदेव के उपकार को संसार में कभी भुलाया नहीं जा सकता है।

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श्रुतज्ञान की विशेषता—

सिद्धांतग्रंथों में जहाँ मति-श्रुतज्ञानों को ‘‘परोक्षज्ञान’’ कहा है, वहीं न्यायदर्शन में मतिज्ञान को सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष भी बताया है। केवलज्ञान क्षायिक होने से सकलप्रत्यक्ष माना गया है किन्तु अंग-पूर्वरूप श्रुत को पढ़कर जो श्रुतकेवली होते हैं उनका ज्ञान भी केवलज्ञान के समान ही निर्मल होता है। उसी श्रुतज्ञान के वर्णन में पूज्य माताजी ने अक्षरात्मक-अनक्षरात्मक रूप दो भेद करके श्रुतज्ञान को पर्याय, पर्यायसमास आदि बीस भेदों में विभक्त किया है और विस्तार से उनके लक्षणों का भी निरूपण किया है, इसमें गोम्मटसार जीवकाण्ड की तत्त्वप्रबोधिनी संस्कृत टीका का आधार लिया है जो प्रसंगोपात्त सैद्धान्तिकज्ञान को वृद्धिंगत करने में परमसहायी प्रतीत होता है।

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सिद्धान्तचक्रवर्ती पद की सार्थकता—

अपने चक्ररत्न से षट्खण्ड पृथ्वी पर विजय करके जैसे भरत आदि अनेक सम्राटों ने चक्रवर्ती पद को प्राप्त किया है उसी प्रकार छह खण्डरूप आगम के ज्ञाता आचार्यों को भी ‘‘सिद्धांतचक्रवर्ती’’ की पदवी से अलंकृत करने की परम्परा रही है और जो तीन खण्डरूप आगम के जानकार हुए उन्हें ‘‘त्रैविद्यदेव’’ की पदवी से विभूषित किया जाता है। इसका वर्णन भी इस सिद्धांतचिंतामणि टीका में आया है कि धवला टीका के पश्चात् हुए आचार्य श्री नेमिचंद्र मुनिराज को ‘‘सिद्धांतचक्रवर्ती’’ की उपाधि थी। जब उन ग्रंथों को पढ़ने वाले आचार्य ने सिद्धांतचक्रवर्ती का पद प्राप्त कर लिया तब उनके रचयिता पुष्पदंत-भूतबलि किस पद के योग्य रहे होंगे यह तो केवलीगम्य ही है अर्थात् उन अगाधज्ञानी संतों को मेरा कोटि-कोटि नमन है।

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ग्रंथ की प्रमाणता—

‘‘वत्तृप्रामाण्याद्वचनं प्रमाणम्’’ इस सूत्रवचन के अनुसार वक्ता की प्रमाणता से वचनों की प्रमाणता भी स्वीकार की गई है। षट्खण्डागम ग्रंथ प्रामाणिक क्यों है? इस सम्बंध में टीका में श्रीवीरसेनाचार्य की पंक्तियाँ भी उद्धृत की गई हैं—

‘‘सांप्रतमन्त्यस्य गुणस्य स्वरूपनिरूपणार्थमर्हन्मुखोद्गतार्थं गणधरदेवग्रथित शब्दसंदर्भं प्रवाहरूपतया-निधन-तामापन्नमशेषदोषव्यतिरिक्त्वादकलंकमुत्तरसूत्रं पुष्पदंतभट्टारक: प्राह’’—

अर्थात् इस ग्रंथ का विषय साक्षात् अर्हंतभगवान् की दिव्यध्वनि से जुड़ा हुआ है और उसी की अनिधनपरम्परा को प्राप्त समस्त दोषों से रहित पवित्र सूत्र का व्याख्यान श्रीपुष्पंदतभट्टारक करते हैं।

धवला टीका का अनुसरण करते हुए इस टीका में भी टीकाकत्र्री ने जगह-जगह सूत्रनिर्माता के लिए ‘‘भट्टारक’’ शब्द का प्रयोग किया है सो ‘‘भट्टारक’’ शब्द से वर्तमान के वस्त्रधारी भट्टारकों को न लेकर प्रत्युत् उत्कृष्ट पूज्यता के प्रतीक तीर्थंकर महावीर, गौतम गणधर एवं दिगम्बर आचार्यों को ही ग्रहण किया है।

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इस ग्रंथ का स्वाध्याय अकाल में न करें—

प्राय: देखा जाता है कि स्वाध्यायी जन हर वक्त ग्रंथ को पढ़ना चाहते हैं किन्तु सिद्धांत रहस्य के प्रतिपादक सूत्रग्रंथों को अकाल में नहीं पढ़ना चाहिए, यह प्रतिपादन धवला पुस्तक ८ के आधार से इस टीका में किया है जो प्रत्येक स्वाध्यायी के लिए अवश्य पठनीय है। यदि कोई साधु इन व्यवहारिक क्रियाओं का पालन न करके अकाल में भी सूत्रग्रंथों का स्वाध्याय कर लेते हैं तो उनके लिए अनेक दोष तो हैं हीं, वे दुर्गति के पात्र भी बनते हैं इन बातों का खुलासा हिन्दी टीका में किया गया है। इसी प्रकरण में एक ‘‘दिक्शुद्धि’’ नाम से कथन बड़ा ही रोचक और पठनीय है जिसमें आचार्य श्रीकुन्दकुन्दकृत मूलाचार ग्रंथ के आधार से बताया है कि— पूर्वान्ह, अपरान्ह और प्रदोष काल (पूर्व रात्रि) के स्वाध्याय करने में दिशाओं के विभाग की शुद्धि के लिए नव, सात और पाँच बार गाथा—णमोकार मंत्र को पढ़े। वर्तमान में प्राय: इस दिक्शुद्धि की ओर स्वाध्यायीजनों का ध्यान नहीं जाता है किन्तु पूज्य माताजी को मैंने सदैव देखा है कि जब कभी वे धवला, जयधवला, महाधवला आदि सैद्धांतिक सूत्रग्रंथों का स्वाध्याय भी करती हैं तो अपनी वसतिका के बाहर निकलकर अथवा अंदर ही ब्राह्ममुहूर्त में वैरात्रिक (पिछली रात्रि का) स्वाध्याय के अनंतर चारों दिशाओं की शुद्धि हेतु ‘‘नमोऽस्तु पौर्वाण्हकाले सिद्धान्तवाचना करणार्थं पूर्वदिक्शुद्धिम् करोम्यहं’’ ऐसा पढ़कर २७ श्वासोच्छ्वास पूर्वक ९ बार णमोकार मंत्र एक दिशा में पढ़ती हैं और इसी प्रकार दक्षिण, पश्चिम, उत्तर दिशाओं में भी उपर्युक्त वाक्य बोलकर ९-९ बार मंत्र पढ़ती हैंं। पुन: रात्रिक प्रतिक्रमण और पौर्वाण्हिक सामायिक के बाद पौर्वाण्हिक स्वाध्याय का काल आता है उस समय विधिवत् कृतिकर्मपूर्वक (श्रुत-आचार्यभक्ति सहित) स्वाध्याय करके उसके समापन के बाद तत्काल अपराण्हकालीन सिद्धांत वाचना हेतु उपर्युक्त तरीके से ही दिक्शुद्धि करने के लिए ७-७ बार णमोकार मंत्र चारों दिशाओं में करती हैं पुन: यदि पूर्वरात्रि में भी उन्हीं सूत्रग्रंथों का पठन अथवा लेखन करना हुआ तो दैवसिक प्रतिक्रमण से पूर्व ५-५ बार णमोकार मंत्र पढ़कर दिक्शुद्धि करती हैं और यदि रात में नहीं किया तो यह दिक्शुद्धि नहीं करती हैं।

इसी क्रम को पूज्यश्री ने मुझे भी प्रस्तुत ग्रंथ के अनुवादकाल में बताया जिसका अनुसरण करते हुए मैंने पूर्ण दिक्शुद्धिपूर्वक ही इस अनुवादकार्य को पूर्ण किया है। इस टीका रचना से पूर्व भी जब-जब संघ में षट्खंडागम ग्रंथों का सामूहिक स्वाध्याय चला तो भी माताजी ने स्वयं तथा हम शिष्यों को इस दिक्शुद्धि को करने की प्रेरणा दी है।

इस विषय में कोई भी प्रश्न या तर्क महत्त्व नहीं रखते हैं क्योंकि शास्त्रोक्त विधि का पालन करने से अपने ज्ञान में निर्मलता आती है और ज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होता है इसमें संदेह नहीं है।

इसी प्रकरण में मुनियों के समान आर्यिकाओं को भी इन सिद्धांतग्रंथों के पठन की आज्ञा आचार्यों ने प्रदान की है जो उनके द्वारा ग्रहण किये गये उपचार महाव्रतों की महिमा का ही परिचायक है। इसके अतिरिक्त श्रावक-श्राविकाओं के लिए तो इन ग्रंथों के पढ़ने का निषेध ही आया है तथापि वर्तमान में विद्वान् पंडितों आदि के द्वारा जो इनकी वाचना आदि के कार्यक्रम रखे जाते हैं सो अपवाद ही जानना चाहिए न कि राजमार्ग।

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मार्गणाओं का निरूपण—

इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ में चतुर्थसूत्र में चौदह मार्गणाओं के नाम देते हुए उनका प्रकरण प्रारंभ हुआ है और गोम्मटसारजीवकांड के आधार से मार्गणाओं का लक्षण दिया गया है।

मार्गणा के इस प्रकरण को लिखते हुए पूज्य माताजी ने पाण्डुलिपि में ३०-३१ नवम्बर १९९५ की तारीख भी डाली है जब वे मेरठ शहर की ‘‘कमलानगर’’ कालोनी में पहुँची थीं और वहाँ के श्रावकप्रमुख श्री प्रेमचंद जैन-तेल वालों के निवेदन पर उन्होंने ‘‘विद्यमान बीस-तीर्थंकर’’ विराजमान करने की नवनिर्माण योजना उन्हें बताई थी सो उसका उल्लेख भी टीका के मध्य कर देने से दक्षिणयात्रा के मध्य लेखन क्रिया निरंतर चलने की पुष्टि होती है।

वह योजना वर्तमान में द्विगुणित होकर वहाँ फलीभूत भी हो चुकी है क्योंकि कमलानगर-मेरठ के दिगम्बर जैन मंदिर की मूल वेदी के आजू-बाजू में बिल्कुल नूतन आकार वाले २० और २४ कमल से सहित सुंदर वृक्षसदृश रचना बनी है जिसमें २० कमलों पर सीमंधर, युगमंधर आदि विद्यमान बीस तीर्थंकरों की प्रतिमा तथा २४ कमलों पर वर्तमानकालीन चौबीस तीर्थंकर प्रतिमाएँ सन् १९९८ में विराजमान की गर्इं।

गतिमार्गणा के कथन से पूर्व इस प्रकरण को माताजी ने लिया है पुन: धवलाटीका और गोम्मटसारजीवकाण्ड के आधार से प्रत्येक मार्गणा का विश्लेषण किया है। इसी प्रकार दिल्ली में भी ११ दिसम्बर १९९५ को एक कमलमंदिर की नींव का उल्लेख माताजी ने टीका के मध्य में किया है वह अनिल जैन नाम के श्रावक के द्वारा पूर्ण किया गया तथा जून १९९७ में उसका पंचकल्याणक एवं मई १९९८ में उस पर स्वर्ण कलशारोहण भी हो चुका है।

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आठ अनुयोगद्वारों से गुणस्थान निरूपण—

जैसे—अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना करने के लिए जम्बूद्वीप के मुख्य द्वार विजय आदि द्वारों में प्रवेश करना पड़ता है उसी प्रकार चौदह गुणस्थानों का दिग्दर्शन कराने हेतु ग्रंथकार ने सातवें सूत्र में ८ अनुयोगद्वार बताए हैं तथा इससे पूर्व पाँचवें सूत्र की टीका में अनुयोग के पाँच पर्यायवाची नाम बताये हैं—अनुयोग, नियोग, भाषा, विभाषा और वत्र्तिका।

इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ में मूलरूप में तीन महाधिकार बतलाये गये हैं सो सातवें सूत्र के पश्चात् ही प्रथम महाधिकार का समापन हुआ है और आठवें सूत्र से द्वितीय अधिकार में सत्प्ररूपणा के भेद-प्रभेदों का वर्णन प्रारंभ हुआ है।

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सावद्यक्रियाओं का उपदेश देने पर भी जिनेन्द्रदेव सदोष नहीं माने जाते हैं!—

गुणस्थान वर्णन की श्रृँखला में जहाँ मिथ्यात्व को पूर्णरूपेण हेय बताकर जीवों को सम्यक्त्व ग्रहण की प्रेरणा दी गई है वहीं १३वें सूत्र में ‘‘संयतासंयत’’ नामक पाँचवें गुणस्थान का कथन करते हुए पाक्षिक प्रतिक्रमण की पंक्तियों के आधार से यह विषय स्पष्ट किया है कि ‘‘जो श्रावक पाँच अणुव्रतों का पालन करते हैं वे स्वर्गसुख का अनुभव करते हुए अधिक से अधिक सात-आठ भवों को ग्रहण करके नियम से निर्वाणपद को प्राप्त कर लेते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।’’

इसी प्रकार कसायपाहुड़ महाग्रंथ की जयधवला टीका की पंक्तियों को इस सिद्धांतचिंतामणि टीका में उद्धृत करके ‘‘जिनेन्द्रदेव के द्वारा श्रावक धर्म का उपदेश दिये जाने पर भी वे सावद्य दोष के भागी नहीं होते हैं’’ यह बतलाया है। हिन्दी टीका में इसका विशेष खुलासा है सो पाठकजन पढ़ें एवं अपने श्रावकोचित धर्म का पालन भी यथाशक्ति करने की प्रेरणा प्राप्त करें।

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अधिकार का समापन चंद्रप्रभ से और शुभारंभ महावीरस्वामी से—

सन् १९९५ के समापन एवं १९९६ के शुभारंभ में हम लोग अतिशयक्षेत्र तिजारा (राज.) में थे वहाँ ३१ दिसम्बर को मांगीतुंगी के पंचकल्याणक महोत्सव सम्बंधी आवश्यक मीटिंग थी जिसमें महोत्सवसमिति का गठन हुआ था एवं मई १९९६ की पंचकल्याणक तारीख की घोषणा माताजी ने की थी। पुन: वहाँ उन्होंने कार्यकर्ताओं को ‘‘सम्मेदशिखर’’ रचना बनाने की प्रेरणा दी तथा इस टीका लेखन की शृंखला में द्वितीय महाधिकार का समापन करते हुए उन्होंने अतिशयकारी चंद्रप्रभ भगवान की स्तुति करते हुए एक ‘‘उपजाति’’ छंद लिखा है। १ जनवरी १९९६ को प्रात: वह समापन छंद लिखकर मध्यान्ह में वहाँ से आगे के लिए संघ का विहार हो गया।

इसके बाद बीच के अन्य शहर-ग्रामों में धर्मप्रभावना करते हुए १८ जनवरी १९९६ को हम लोग महावीर जी अतिशयक्षेत्र पर पहुँचे और वहीं पर १९ जनवरी को माघ कृष्णा चौदश के दिन वहाँ मूलमंदिर में क्षेत्र के पदाधिकारियों ने माताजी की प्रेरणा से भगवान ऋषभदेव निर्वाणलाडू का कार्यक्रम रखा। वहाँ पहुँचकर पूज्य माताजी को अपना पूर्व इतिहास स्मृत हो आया कि सन् १९५३ में चैत्र कृष्णा एकम को इसी प्रांगण में मुझे आचार्य श्री देशभूषण महाराज ने क्षुल्लिका दीक्षा देकर ‘‘वीरमती’’ नाम प्रदान किया था, शायद यहाँ के अतिशयस्वरूप ही मेरे अंदर नारी होकर भी पुरुषोचित कार्यों को करने की क्षमता—वीरता आई है।

२ जनवरी से १७ जनवरी के मध्य अत्यधिक ठंड के कारण लेखन संभवत: कम हो पाया तथा तृतीय अधिकार के सूत्रों की समुदायपातनिका बनाने में माताजी को काफी परिश्रम भी करना पड़ता था सो केवल उसी सूत्र संख्या का लेखन करके जब वे महावीर जी पहुँचीं तो इस महान ग्रंथ के तृतीय महाधिकार का प्रारंभ करते हुए मंगलाचरण में ‘‘अनुष्टुप्’’ छंद के द्वारा सातिशय महावीर स्वामी की स्तुति की है और उसी में पूर्णसंयम प्राप्ति हेतु याचना भी की है।

उपर्युक्त प्रकरण टीकाकत्र्री की असीम जिनेन्द्रभक्ति के परिचायक हैं और यही भक्ति इन वृहत् कार्यों के निर्विघ्न समापन में निमित्त बनी है। इस महावीरजी अतिशयक्षेत्र से संघ २० जनवरी १९९६ को ‘‘शांतिवीरनगर’’ नामक संस्थान परिसर में पहुँचा वहाँ २१ जनवरी को संघ के सानिध्य में भगवान शांतिनाथ की उत्तुंग खड्गासन प्रतिमा का पंचामृतसामग्री द्वारा सुंदर मस्तकाभिषेक हुआ। वहाँ प्रमुख द्वार के पास निर्मित एक बड़ा मंदिर कुछ माह पूर्व गिरकर धराशायी हो गया था, सो वहीं के एक-दो कार्यकर्ता महानुभावों ने माताजी से क्षेत्र की उन्नति के विषय में चर्चा की तो माताजी ने चिंतन करके वहाँ के लिए एक ‘‘मन्दार’’ सिद्धार्थवृक्ष निर्माण की प्रेरणा दी, उनके मुँह से निकलते ही अनन्यभक्त दिल्ली निवासी लाला प्रेमचंद प्रदीप कुमार जैन-खारी बावली ने उस चैत्यवृक्ष निर्माण के सौजन्य हेतु घोषणा कर दी। संयोगवश इधर धातु के सिद्धार्थवृक्ष का निर्माण चला और उधर वह मंदिर भी बनकर तैयार हो गया और ६ फरवरी १९९८ को वहाँ मानस्तम्भ के निकट वह नूतन ‘‘मन्दारसिद्धार्थवृक्ष’’ बनकर तैयार हो गया, उसमें सिद्धों की ४ जिनप्रतिमाएँ भी विराजमान हैं। जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर के अध्यक्ष कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्रकुमार जी की कर्मठता से स्थापित उस सिद्धार्थवृक्ष को देखने के लिए हजारों अजैन बन्धु वहाँ जाकर उसे कल्पवृक्ष समझकर अपने मनोरथ की सिद्धि करते हैं।

उस सिद्धार्थवृक्ष के ऊपर कमलाकार छत है और चारों तरफ प्लास्टिक काँच तथा रेलिंग लगाकर उसे एक सुदृढ़ मंदिर का रूप प्रदान किया गया है। पूज्य माताजी की प्रेरणा से दिल्ली के श्रेष्ठी द्वारा निर्मित उस ‘‘मन्दारवृक्ष’’ की चारों दिशाओं में विराजमान सिद्ध प्रतिमाएँ प्रत्येक दर्शक की इष्ट सिद्धी करें यही मंगलभावना है।

उपर्युक्त निर्माण का संक्षेप में वर्णन इसमें ३५वें सूत्र के पश्चात् आया है अर्थात् महावीर जी के ३-४ दिवसीय प्रवास में टीकाकत्र्री ने कुछ सूत्रों की टीका भी लिखी है।

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आचार्यों की पापभीरुता का नमूना देखें—

वर्तमान में प्राय: देखा जाता है कि ग्रंथों में यदि कहीं कोई दो प्रकार की मान्यता होती है तो पढ़ने वाले या समझाने वाले किसी एक पक्ष का दुराग्रह पकड़कर दूसरे को गलत सिद्ध कर देते हैं किन्तु षट्खंडागम ग्रंथ की धवला टीका में आचार्य श्रीवीरसेनस्वामी का उदाहरण इस विषय में सर्वथा अनुकरणीय है, जब उन्होंने चारों गतियों में गुणस्थान व्यवस्था का उल्लेख किया तो एक प्रकरण के अंतर्गत दोनों आचार्यों के मत को मान्य किया है कि ‘‘क्षपक श्रेणी मेें कर्मों की क्षपणविधि करता हुआ कोई जीव नवमें गुणस्थान में पहले सोलह कर्मों को नष्ट करके बाद में आठ कषायों को क्षय करता है’’ यह तो षट्खण्डागम का उपदेश है एवं कषायप्राभृत के अनुसार ‘‘वह पहले आठ कषायों का क्षपण करता है उसके बाद सोलह कर्मों को नष्ट करता है’’ इन दो वचनों में है तो कोई एक ही सत्य वाक्य, किन्तु श्रीवीरसेनस्वामी कहते हैं कि इस विषय में सत्य-असत्य तो ‘‘सुदकेवली केवली वा जाणदि’’ अर्थात् केवली या श्रुतकेवली ही जान सकते हैं अत: उनके अभाव में हमें तो दोनों आचार्यों के वचन मानना चाहिए।

पूज्य माताजी स्वयं भी इसी पक्ष को मान्यता प्रदान करती हैं इसीलिए उन्होेंने अपनी इस टीका में इस प्रकरण का पूरा प्रश्नोत्तर देते हुए अंत में अपना भाव व्यक्त किया है कि—

‘‘एतत्प्रश्नोत्तरै: विज्ञायते, पूर्वाचार्यै: लिखितशास्त्राणि प्रमाणमेव। तेषां मध्ये यत् किमपि परस्परविरोधिवाक्यं भवेत् तदा द्वयोरपि वाक्ययो: श्रद्धानं कर्तव्यं, न च एकस्य प्रामाण्यं अन्यस्य अप्रामाण्यं वक्तव्यमिति।’’

वास्तव में प्रत्येक पाठक को इन विषयों में पापभीरुता अवश्य रखना चाहिए क्योंकि किसी एक पक्ष को मान्यता प्रदान कर देने से नरक-निगोद जैसी गतियों का बंध भी होने की संभावना रहती है।

जैसे रामायण की मुख्य नायिका सती सीता के लिए भी जैन आगम में ही दो मत हैं। श्री गुणभद्राचार्य द्वारा रचित उत्तरपुराण में सीता को रावण की पुत्री माना है और रविषेणाचार्य रचित पद्मपुराण में सीता को राजा जनक की पुत्री कहा है। दोनों ही कथानक अपने-अपने स्थान पर सत्य प्रतीत होते हैं किन्तु दोनों में से किसी एक को हम छद्मस्थजन प्रामाणिकता की कोटि में नहीं रख सकते। क्योंकि केवली-श्रुतकेवली के चरणसानिध्य में ही इन सन्देहास्पद विषयों का निर्णय हो सकता है।

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कालचक्र कई कार्य एक साथ करता रहा—

२७ नवम्बर १९९५ को हस्तिनापुर से विहार करने के बाद यद्यपि हम लोगों का मूल लक्ष्य मांगीतुंगी पहुँचने का था और लम्बा रास्ता होने के कारण प्रारंभ में जब कभी मेरे मुँह से निकल जाता कि हे प्रभो! पता नहीं कितने दिन में हम मांगीतुंगी पहुँचेंगे? तब क्षुल्लक मोतीसागर जी कहते कि आज इतने प्रतिशत रास्ता पार हो गया है और इतना शेष रहा है।

कालचक्र के साथ-साथ रास्ता तो तय होता ही रहा तथा माताजी का लेखन-प्रवाह अविरल गति से चलने के कारण उन्हें पूरा संतोष रहता था और मार्ग के शहरों में प्रभावनापूर्ण कार्य एवं निर्माण आदि के शिलान्यास हो जाने से हम लोगों की भी सारी थकान उतर जाती थी। मैंने माताजी से कहा कि आप लेखन के पृष्ठों पर यदि तारीख और गाँव के नाम डालती जाएँ तो भविष्य के लिए ये पृष्ठ ऐतिहासिक स्मृति के प्रतीक बन जाएँगे, तो माताजी ने ऐसा ही किया अत: उसी के आधार पर मैंने प्रस्तावना लिखते समय अनेक स्थानों के शिलान्यास आदि का उल्लेख इसमें किया है। इस प्रकार पदयात्रा, लेखन, प्रभावना, शिलान्यास, जीर्णोद्धार और मानव उद्धार आदि अनेक कार्य इस यात्रा में सम्पन्न हुए।

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द्रव्य-भाव वेद का सूक्ष्म रहस्य—

यह षट्खंडागम ग्रंथ सैद्धांतिक रहस्यों की कुञ्जी है जो हीरे के काँटे के समान जौहरियों की परख का विषय है। इसके एक-एक सूत्र में गागर में सागर ही नहीं बल्कि राई में सागर के सदृश अर्थ भरा हुआ है। जैसे, सूत्र नं.-९३ का नमूना देखें—

‘‘सम्मामिच्छाइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठि-संजदासंजद-संजद-ट्ठाणे णियमा पज्जत्तियाओ।।९३।।

सूत्रार्थ- मनुष्यिनियाँ सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत गुणस्थानों में नियम से पर्याप्तक होती हैं।।९३।। अर्थात् द्र्रव्य से पुरुषवेदी जीव के यदि भाव से स्त्रीवेद भी है तो वे चौदहों गुणस्थान प्राप्त कर सकते हैं इसमें कोई बाधा नहीं है। दिगम्बर जैनशासन में द्रव्यस्त्रीवेदियों के मोक्ष नहीं माना गया है चाहे वे भाव से पुरुषवेदी क्यों न हों, तथा द्रव्यपुरुषवेदी भाव से स्त्रीवेद सहित होते हुए भी मोक्ष प्राप्त करते हैं। उपर्युक्त सूत्र की टीका में खुलासा किया है कि ‘‘एषा वेदविषमता तिर्यग्गतौ मनुष्यगतौ चैव न देवनारकाणामिति न च भोगभूमिषु’’ अर्थात् वेदों की यह विषमता (द्रव्य-भाव में पृथक्-पृथक्) कर्मभूमि के तिर्यंच और मनुष्यों में ही देखी जाती है, शेष देव-नारकी और भोगभूमि में यह वेदविषमता नहीं होती है, वहाँ द्रव्य और भाव दोनों में एक समान ही वेदव्यवस्था पाई जाती है।

इस प्रकरण का अच्छा स्पष्टीकरण गोम्मटसार एवं धवला के अनुसार इस टीका में किया है जो पठितव्य ही नहीं विशेष स्मरणीय है क्योंकि द्रव्य और भाववेदों के बारे में जानना अति आवश्यक है ताकि पाठकों की सैद्धान्तिक दिग्भ्रम अवस्था का पूर्णतया निराकरण हो सके। वेदमार्गणा के इसी प्रकरण में ९ मार्च १९९६ को पूज्य माताजी ने कोटा के निकट केशोरायपाटन (राज.) में आधी यात्रा पूर्ण करके पहुँचने पर मुनिसुव्रत भगवान को मध्य मंगलाचरण के रूप में नमन किया और वहाँ लघु पंचपहाड़ी के निर्माण हेतु यंत्रस्थापन किया तथा नीचे गर्भगृह के विस्तारीकरण हेतु भी यंत्रस्थापन किया था उसमें विस्तारीकरण का कार्य कुछ समय पश्चात् ही निर्विघ्नतया सम्पन्न हो चुका है।

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स्त्रियाँ एकान्त से निंद्य नहीं हैं!—

वेदमार्गणा के अंतर्गत १०१ नं. के सूत्र की टीका में माताजी ने स्त्रीवेद का लक्षण बताते हुए गोम्मटसार जीवकाण्ड के आधार से स्त्रियों की प्रवृत्ति छादनशील कही है किन्तु तीर्थंकर भगवान की माता आदि नारियों में सामान्यस्त्रीजन्य दोषों का अभाव रहता है। पुन: ज्ञानार्णव ग्रंथ का उद्धरण देते हुए लिखा है कि—

सतीत्वेन महत्त्वेन, वृत्तेन विनयेन च।

विकेकेन स्त्रिय: काश्चिद्, भूषयन्ति धरातलम्।।

अर्थात् अपने सतीत्व से, महानता से, शील से, विनय और विवेक से अनेक स्त्रियाँ इस धरातल को विभूषित करती हैं। द्रव्यस्त्रीवेद की अपेक्षा इस वर्णन से यह जानना चाहिए कि जो नारियाँ आर्यिका दीक्षा लेकर अपनी कर्मनिर्जरा में प्रवृत्त होती हैं उनकी पूजा तो चक्रवर्ती आदि भी करते हैं। तथा भावस्त्रीवेद से तो शुक्लध्यान एवं मोक्ष की प्राप्ति तक में भी कोई बाधा नहीं है यह इस वेद मार्गणा का सार बताया है।

आगे ज्यों-ज्यों टीका का लेखन चलता जा रहा था त्यों-त्यों मार्ग में कोई न कोई निर्माण प्रेरणा भी उसके साथ जुड़ती चली जाती थी। जैसे—१९ फरवरी १९९६ को अतिशयक्षेत्र चाँदखेड़ी में भगवान ऋषभदेव की मूल प्रतिमा के चरणसानिध्य में एक अनुष्टुप् छंद लिखकर ११५ सूत्र की टीका पूरी की है और २१ फरवरी १९९६ को झालरापाटन (राज.) में १३०-३१ नं. सूत्र की टीका लिखी है सो वहाँ का उल्लेख है कि वहाँ पर ‘‘जूनी नशिया’’ नाम से जीर्णशीर्ण एक पुरानी पहाड़ी पर ‘‘सिद्धाचल’’ नामकरण देकर विकास योजना बनी जो तुरंत शिलान्यासपूर्वक साकार हुई थी।

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ग्रंथ समापन का अद्भुत संयोग पिड़ावा (राज.) को मिला!—

झालरापाटन से ही कुछ भक्तों ने कहना शुरू किया कि माताजी! आप लोगों को पिड़ावा जरूर जाना चाहिए किन्तु कुछ किलोमीटर की वृद्धि होते देखकर वहाँ का कार्यक्रम अपने विहार में न जोड़कर हम लोग २४ फरवरी को साल्याखेड़ी से आगे राजस्थान की सीमा पार करके मध्यप्रदेश के देहरिया गाँव में आ गये थे, लेकिन वहाँ पिड़ावा के एक श्रावक ‘‘धनसिंह जैन-पटवारी’’ के घेरावपूर्ण (जबर्दस्त) आग्रह पर हमें वापस पिड़ावा जाना पड़ा और ४-५ घण्टे के संघप्रवास के मध्य २५ फरवरी १९९६ को वहाँ प्रवचन, आहार, सामायिक, समवसरण का शिलान्यास आदि कार्य तो हुए ही, उसके साथ षट्खण्डागम के इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ की ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ संस्कृत टीका लेखन के समापन का अद्भुत संयोग भी पिड़ावा नगर को प्राप्त हो गया।

उस दिन फाल्गुन शुक्ला सप्तमी तिथि थी और भगवान चंद्रप्रभ के निर्वाणकल्याणक के पवित्र दिवस पर टीका की पूर्णता ने मानो पूज्य माताजी के चरमलक्ष्य की सिद्धी ही कर दी थी। अगले दिन से अष्टान्हिका पर्व प्रांरभ होने वाला था अत: ८ दिन तक सिद्धांत ग्रंथ का अस्वाध्याय काल होने से षट्खंडागम सूत्र ग्रंथ का लेखन नहीं हो सकता था, शायद इसीलिए माताजी ने कुछ शीघ्रता करके आज समापन का भाव बना लिया था जिसका लाभ मिल गया पिड़ावा को और अपराह्न में २ से ३.३० बजे तक इधर ‘‘ पार्श्वनाथ समवसरण’’ का शिलान्यास समारोह चल रहा था और उधर माताजी टीका की पूर्णता करते हुए पंचपरमेष्ठी के स्मरणपूर्वक अपने एवं जगत् के मंगल की कामना कर रही थीं। इस प्रकार से इस ग्रंथ की टीका के इतिहास में पिड़ावा का नाम इस तरह से जुड़ गया जैसे षट्खंडागम के साथ ‘‘अंकलेश्वर’’ का नाम जुड़ा है।

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इसे सरस्वती की कृपा ही माननी होगी!

इस प्रस्तावना के लिखे जाने तक पूज्य माताजी ने षट्खण्डागम की सात पुस्तकों (दो खण्डों) की टीका पूर्ण कर दी थी और तृतीय खण्ड (आठवीं पुस्तक) की टीका का लेखन चालू किया था। उन्होंने अपने मंगलाचरण के श्लोक नं. १३ में यद्यपि यह प्रतिज्ञाभाव प्रगट किया है कि ‘‘षट्खंडागम के प्रथम खण्ड की प्रथम पुस्तक सत्प्ररूपणा ग्रंथ की संस्कृतटीका लिखने का मैंने संकल्प किया है’’ संभव है कि उन्होंने प्रथम खण्ड की छहों पुस्तकों पर टीका लिखने का विचार किया हो और उसमें से प्रथम पुस्तक का संकल्प लिया हो। उस समय शायद माताजी ने सोचा ही नहीं होगा कि इतनी जल्दी यह कार्य सम्पन्न हो जाएगा किन्तु मात्र १३५ दिन में १६३ पृष्ट की यह टीका समापन हो गई और उसके बाद आगे का कार्य भी माताजी ने शुरू कर दिया।

मंगलाचरण की इसी श्रँृखला में श्लोक नं.१६ के अंदर माताजी ने सरस्वती माता को भी नमन किया है कि हे सरस्वती मात:! मेरा यह प्रयास निर्विघ्न सम्पन्न हो। पुन: जब २७ नवम्बर १९९५ को संघ का मांगीतुंगी की ओर मंगलविहार का निर्णय हुआ तो माताजी को इस विषय की कुछ चिंता अवश्य हुई कि अब मेरे लेखन में व्यवधान आएगा लेकिन उसी रात स्वप्न में पूज्य माताजी को सरस्वती माता के साक्षात् दर्शन हुए जिसमें उन्होंने सरस्वती माता से वार्तालाप भी किया एवं उन्होेंने माताजी से कहा कि ‘‘ज्ञानमती जी! तुम चिंता मत करो, तुम्हारे लेखनकार्य में कोई बाधा नहीं आएगी।’’ माताजी ने प्रात: मुझसे बताया कि आज जीवन में प्रथम बार मुझे सरस्वती माता के साक्षात् दर्शन हुए हैं। उनके इस कथन से मुझे यह आभास हो गया था कि माताजी का यह दुरूह कार्य अवश्य शीघ्र सम्पन्न होगा और हुआ भी यही अर्थात् उनका लेखन कार्य रास्ते में बराबर चलता रहा। सर्वप्रथम २७ नवम्बर से लेकर १४ फरवरी १९९६ तक उत्तर भारत की भीषण सर्दी के कारण हम लोगों ने दिन में केवल एक समय (मध्यान्ह १ बजे से ४ बजे तक) पद विहार का कार्यक्रम रखा अत: प्रात:काल विहार न होने के कारण नित्यक्रिया के पश्चात् ७ से ९ बजे तक उनका लेखन हो जाता था पुन: १५ फरवरी १९९६ से कोटा के पश्चात् दोनों समय का विहार होने लगा तब लेखन कुछ कम तो हुआ लेकिन रुका नहीं। हमारे पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि ‘‘ज्ञानमती माताजी अपने जीवन के एक-एक क्षण का सदुपयोग कैसे करती हैं’’। सुबह ७ बजे से ८ बजे तक लेखन के बाद वे विहार करके लगभग १० बजे तक गन्तव्य स्थान तक पहुँच जातीं वहाँ आहार, सामायिक के बाद तत्काल विहार करना पड़ता था अत: रात्रिविश्राम के स्थल पर पहुँचने पर ४ से ५ बजे तक भी वहाँ प्राय: वे अपरान्हिक स्वाध्याय के रूप में लेखन कर लेती थीं। इस अंतराल में यदि कभी संघ की ब्रह्मचारिणी बहनों के सामान की गाड़ी नहीं पहुँचती, वे लोग देर से आतीं तो माताजी को अपना बस्ता नहीं मिलता अत: उन्हें कुछ बेचैनी—आकुलता होती, हम लोग कभी हँसी में कह देते कि माताजी! कभी तो कुछ देर आप खाली भी बैठकर मस्तिष्क को शांति दे दिया करें, तो माताजी कहतीं कि ‘‘मुझे तो अपने स्वाध्याय और लेखन से ही अपूर्व शांति मिलती है।’’ उनकी आकुलता को देखकर कई बार हमें साथ चलने वाले महानुभाव के हाथ में या मोटरसाईकिल द्वारा उनका बस्ता जल्दी भेजना पड़ता था। समय की इस सदुपयोगिता के कारण ही आज आप सभी को पूज्य माताजी द्वारा रचित दो सौ से अधिक ग्रंथ उपलब्ध हो रहे हैं। इसी प्रकार आगे मांगीतुंगी तक उनका लेखनकार्य बराबर चला पुन: वहाँ से विहार करने के समय एक दिन फिर स्वप्न में सरस्वती माता ने दर्शन देते हुए कहा कि ‘‘देखो! ज्ञानमती जी! मैंने तुमसे कहा था न कि तुम्हारा कार्य नहीं रुकेगा। अब तो तुम संतुष्ट हो?’’ प्रात: माताजी ने मुझे फिर अपना स्वप्न बताया सो मैं सोचने लगी कि आज साक्षात् रूप में यदि देवी-देवता आते होते तो जरूर पुष्पदंत-भूतबलि के समान माताजी की भी पूजन करके उनकी महानता संसार को बताते किन्तु अभी वे परोक्ष रूप में ही अपना सहयोग प्रदान कर माताजी में शक्ति भर रहे हैं अन्यथा प्रवचन सभाओं में तथा अनेक वार्तालापों के मध्य भी बैठकर ऐसी दुरूह संस्कृत टीका लिखना सबके बस की बात तो नहीं है।

मंगल विहार के मध्य अनेक स्थानों पर तो माताजी के लिखते समय के रंगीन फोटो एवं वीडियो रिकार्डिंग भी करवाए गये जो जम्बूद्वीप स्थल पर सुरक्षित रखे हैं।

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भगवान शांतिनाथ के नाम में भी असीम शक्ति है—

हस्तिनापुर की पावन वसुन्धरा भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणकों से महान् है उसी भूमि पर बैठकर माताजी ने इस षट्खण्डागम ग्रंथ की टीका का शुभारंभ करते हुए श्री शांतिनाथ भगवान को अपने मनमंदिर में विराजमान करते हुए लिखा है

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—‘‘इष्ट: सर्वक्रियान्तेऽसौ शान्तीशो हृदि धार्यते।’’

इस पंक्ति का स्पष्टीकरण यद्यपि हिन्दी टीका में विशेषरूप से किया गया है फिर भी यहाँ मैं बताना चाहती हूूँ कि भगवान शांतिनाथ से पूर्व तीर्थंकर पुष्पदंतनाथ से धर्मनाथ के बीच में सात बार धर्मतीर्थ का व्युच्छेद हुआ है पुन: शांतिनाथ तीर्थंकर से यह धर्मतीर्थ परम्परा आज तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।१ इसीलिए उनके नाम को हृदय में धारण करने वाली पूज्य ज्ञानमती माताजी का लेखनकार्य अविच्छिन्न-निर्विघ्न चला है और आगे भी चलता रहा, तभी शीघ्र ही षट्खण्डागम की सोलहों पुस्तकों की ‘‘सिद्धांतचिन्तामणि’’ टीका सम्पन्न होकर विद्वत्समाज के समक्ष आ गई है।

जिस प्रकार से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के मूल सूत्रों पर श्री अकलंकदेव, पूज्यपाद स्वामी, विद्यानंदिस्वामी, श्रुतसागरसूरि आदि अनेक आचार्यों ने अलग-अलग टीकाएँ रची हैं उसी प्रकार से षट्खण्डागम ग्रंथ के मूल सूत्रों पर अनेक टीकाओं की श्रृँखला में यह ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ नामकी स्वतंत्र मौलिक टीका है जो भव्यों को सिद्धान्त का ज्ञान सुगमता से कराने में पूर्ण सक्षम है।

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विभिन्न कृतियों को देखने से भ्रम स्वयं दूर हो जाता है!-

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा लिखित, अनूदित एवं काव्यमयी रचनाओं को देखकर संभव है कि कुछ पूर्व पाठकों के समान आपमें से भी किसी पाठक को शंका हो जाए कि बालविकास एवं धार्मिक उपन्यासों की रचयित्री ज्ञानमती माताजी कोई और होंगी, भक्तिसंगीत की धुनों पर आधारित इंद्रध्वज-कल्पद्रुम आदि पचासों पूजा-विधानों की लेखिका ज्ञानमती जी दूसरी हैं तथा अष्टसहस्री जैसे सर्वोच्च न्यायग्रंथ के हिन्दी अनुवाद की प्रौढ़ता, संस्कृत श्लोकों में लिखित ‘‘आराधना’’ ग्रंथ के श्लोकों में भरा रहस्य, नियमसारप्राभृत ग्रंथ की संस्कृत स्याद्वादचंद्रिका टीका आदि की रचना करने वाली कोई सतयुग की ज्ञानमती माताजी होंगी किन्तु अब आपको यह समझते देर नहीं लगेगी कि बालसाहित्य से लेकर इस सिद्धान्तग्रंथ तक को लिखने वाली एक ही ज्ञानमती माताजी हैं इनके द्वारा लिखित प्राय: सभी पाण्डुलिपियाँ हस्तिनापुर जम्बूद्वीपस्थल पर रत्नत्रयनिलय और जम्बूद्वीप पुस्तकालय में सुरक्षित हैं, जिनके दर्शन कर पण्डित कैलाशचंद जैन सिद्धांतशास्त्री आदि ने अत्यंत आश्चर्य एवं हर्ष व्यक्त किया था एवं जिनके नाम के साथ ‘जम्बूद्वीप की पावन प्रेरिका’’ का प्रमुख संकेत जुड़ा हुआ है, वे बीसवीं शताब्दी की प्रथम बालब्रह्मचारिणी आर्यिकारत्न हैं, जैनसाहित्यजगत् की प्रथम लेखिका साध्वी हैं, अनेक तीर्थों की उद्धारिका हैं तथा देश भर में प्रवर्तित हुए जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ, भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार रथ एवं भगवान महावीर ज्योति रथ प्रवर्तन की पावन प्रेरिका हैं और विद्वानों की भाषा में इनकी प्रमुख पहचान निम्न शब्दों में की जाती है—

‘‘ज्ञानमती माताजी तेरी यही निशानी।

एक हाथ में पिच्छी दूजी में जिनवाणी।।’’

जैन धर्म के अलंकार ग्रंथ (वाग्भट्टालंकार) में रचनाकार ने ग्रंथ लेखकों एवं कवियों के गुण-अवगुणों का वर्णन करते हुए लिखा है कि—

प्रतिभाकारणं तस्य व्युत्पत्तिस्तु विभूषणम्।

भृशोत्पत्तिकृदभ्यास इत्याद्यकविसंकथा।।

अर्थात् प्राचीन कवियों का मत है कि ‘‘प्रतिभा’’ काव्योत्पत्ति का हेतु है, ‘‘व्युत्पत्ति’’ से उस (काव्य) में शोभा का आधान होता है और अभ्यास से शीघ्र ही काव्यरचना सम्भव होती है। इसी में और भी बातें बताई हैं कि— अनर्थक, श्रुतिकटु, व्याहतार्थ, अलक्षण, स्वसंकेतप्रक्ऌप्तार्थ, अप्रसिद्ध, असम्मत और ग्राम्य ये आठ दोष जिस पद में आ जाएँ उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। किन्तु कहीं पर ये दोष रहने पर भी दोष नहीं माने जाते। उपर्युक्त गुणों से सहित तथा दोषों से रहित गद्य-पद्य रचना का भाव ही पूज्य माताजी की कृतियों में स्पष्ट झलकता है। यही कारण है कि उनके साहित्य में कभी कोई विद्वान् भी किसी प्रकार की छोटी-मोटी त्रुटि भी नहीं निकाल सके। यह उनकी विशेष प्रतिभाशक्ति ही माननी होगी कि बालोपयोगी साहित्य में उनका बच्चों के प्रति आकर्षण झलकता है, युवाओं के लिए उपयोगी उपन्यास साहित्य को पढ़कर उनकी युवा भावना का परिचय मिलता है कि कैसे युवाओं को धर्म के प्रति आकर्षित किया जा सकता है, पुन: जब आगे बढ़कर प्रौढ़ ग्रंथों को देखते हैं तो माताजी का जहाँ विद्वानों के प्रति प्रौढ़ दृष्टिकोण झलकता है वहीं ज्ञान का अथाह सागर उनके अंदर हिलोरें भरते नजर आता है। ग्रंथ रचने वालों के ज्ञान की चरमसीमा संस्कृत-प्राकृत रचनाओं के द्वारा ज्ञात होती है जिसे आप प्रस्तुत टीका ग्रंथ में साक्षात् देख रहे हैं अत: अब शोधकर्ताओं को दिग्भ्रमित होने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। पूज्य आचार्यश्री विद्यानंद महाराज ने उनकी इस प्रतिभाशक्ति को देखकर दिनाँक १७-१२-९५ को कुन्दकुन्दभारती-दिल्ली में अमरकोष का ‘‘स्यादाचार्याऽपि च स्वत:’’ यह सूत्र स्वयं लिखकर मुझे कागज देते हुए कहा कि देखो! ज्ञानमती माताजी इस सूत्र के अनुसार ‘‘आचार्या’’ पदवी से युक्त हैं क्योंकि शब्दों की स्वयं व्युत्पत्ति करने वालों में ही यह पंक्ति सार्थक होती है।

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किन पूर्वाचार्यों की झलक इस टीका में है—

सबसे पहले सन् १९७२ में समयसार ग्रंथ की श्रीजयसेनाचार्यकृत ‘‘तात्पर्यवृत्ति’’ नामक संस्कृतटीका का अध्ययन माताजी ने जब हम लोगों को करवाया तो उसकी सरलता एवं शैली से अत्यंत ऊँचा आध्यात्मिक विषय भी समझ में आने लगा। पुन: सन् १९७६ में ‘‘बृहद्द्रव्यसंग्रह’’ में श्री ब्रह्मदेव सूरि की टीका में तो आशातीत आनंद की अनुभूति हुई, धीरे-धीरे प्रवचनसार, पंचास्तिकाय सर्वार्थसिद्धी, राजवार्तिक आदि ग्रंथों का अध्ययन चला और वर्तमान में ‘‘परमात्मप्रकाश’’ ग्रंथ में श्रीब्रह्मदेवसूरि की टीका पढ़कर जो जिनागम का रहस्य खुलता है वह वास्तव में अकथनीय है।

जब इस ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ टीका का मैंने सूक्ष्मता से अवलोकन किया तो लगा कि श्री जयसेनाचार्य एवं ब्रह्मदेवसूरि की टीका शैली की पूरी-पूरी छाप इसमें देखने को मिलती है। ठीक उसी प्रकार से अधिकारों के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका, टीका में पदखण्डनारूप से व्याख्या, पुन: मूलसूत्र में वर्णित एक-एक शब्द की व्युत्पत्ति आदि देकर अंत में भावार्थ में टीका का सम्पूर्ण सार स्पष्ट किया गया है। टीका का समापन करते हुए तृतीय महाधिकार के अंत में उन्होंने श्रुतज्ञान की प्राप्ति के लिए जिनवाणी को नमन करके लिखा है—

केवलज्ञानबीजं स्यात्, श्रुतज्ञानं जिनोद्गतम्।

तस्मै नमोऽस्तु मे नित्यं, द्रव्यभावश्रुताप्तये।।

अर्थात् जिनेन्द्र भगवान के मुखारविन्द से प्रगट हुआ श्रुतज्ञान केवलज्ञान का बीज है अत: उस द्रव्य और भावरूप श्रुतज्ञान की प्राप्ति के लिए श्रुत को मेरा बारम्बार नमोस्तु होवे।

इसके पश्चात् टीका उपसंहार करके १६ अनुष्टुप छन्दों में टीकाकत्र्री ने प्रशस्ति लिखी है जिसमें अपनी गुरुपरम्परा को नमन करके ग्रंथ में प्रामाणिकता की पुट लगा दी है। इस प्रकार से ग्रंथ की सर्वांगीणता में कोई कसर नहीं रह जाती है और स्वाध्यायी जनों को निश्चित ही इससे अनेक दुर्लभ विषयों का ज्ञान प्राप्त हो सकेगा।

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जैन व्याकरण के एक विशेष सूत्र का भी इस टीका में प्रयोग हुआ है!

श्री शर्ववर्म आचार्य द्वारा रचित ‘‘कातंत्ररूपमाला’’ नाम से संस्कृत व्याकरण ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद भी पूज्य माताजी ने सन् १९७३ में किया है। वर्तमान में समस्त साधु संघों में उसका बड़ी तेजी से अध्ययन-अध्यापन चल रहा है। यह व्याकरण अपने आपमें पूर्ण सर्वांगीण है जिसे पढ़कर कोई भी जनसाधारण संस्कृतज्ञान में परिपक्वता प्राप्त कर सकता है।

इस व्याकरण के प्रारंभिक संधि प्रकरण में ‘‘विरामे वा’’ सूत्र आया है जिसका अर्थ है—‘‘विराम में पदान्त मकार का अनुस्वार विकल्प से होता है’’ अर्थात् पदान्त में मकार और अनुस्वार दोनों हो सकते हैं। जैसे-देवानाम्, देवानां आदि।

यह वैकल्पिक नियम इस कातंत्र व्याकरण के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी व्याकरण में नहीं है, सर्वत्र विराम में अनुस्वार नहीं करने का विधान है अत: इसी व्याकरण में यह विशेष नियम है। इस नियम का प्रयोग पूज्य माताजी ने अपनी समस्त संस्कृत रचनाओं में कहीं न कहीं किया है। प्रस्तुत ‘‘सिद्धांतचिन्तामणि’’ टीका में भी कई स्थान पर पदान्त में मकार की जगह अनुस्वार लिखा है सो विद्वज्जन इसे व्याकरण की अशुद्धि न समझ कर जैनव्याकरण के विशेष नियम का अनुकरण करें यही मेरा अनुरोध है।

इसकी हिन्दी टीका करने में मुझे जो ज्ञानामृत का रसास्वादन प्राप्त हुआ है वह लेखनी में निबद्ध नहीं किया जा सकता है। हाँ, इतना अवश्य है कि हिन्दी अनुवाद में विलम्ब होने के कारण ग्रंथ का प्रथम प्रकाशन सन् १९९८ में हो पाया था। अन्यथा यह ग्रंथ उससे दो वर्ष पूर्व आप लोगों के हाथ में आ जाता। दरअसल पदविहार की थकावट, पुन: समाज में पहुँचकर प्रवचन आदि के कार्य, संघ की कुछ जिम्मेदारियाँ एवं बचे समय में सम्यग्ज्ञान का लेखनकार्य आदि व्यस्तताओं के कारण यात्रा के मध्य में तो मेरा यह टीका अनुवाद का कार्य बहुत कम हो पाया। अन्ततोगत्वा जब नवम्बर १९९७ में हम लोग वापस हस्तिनापुर आए तो शीतकालीन प्रवास के मध्य लगभग दो माह में मैंने दो सौ पृष्ठ लिखे, उससे पूर्व १०५ पृष्ठ यदा-कदा लिखे गये थे अत: मेरे हस्तलिखित फुलस्केप कागज में कुल ३०५ पृष्ठों की हिन्दी टीका हुई है जिसे फरवरी १९९८ में पूर्ण करके मैंने अपने जीवन को धन्य माना। पुन: अब इसके दुबारा प्रकाशन का संयोग बना है।

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संघस्थ शिष्यों की अनुकूलता भी सराहनीय रही!

साहित्य सृजन आदि कार्यों में संघस्थ परिकर की अनुकूलता भी महत्वपूर्ण होती है, उनकी प्रतिकूलता कार्य में व्यवधान उत्पन्न करती है। जिस प्रकार से पूज्य माताजी के टीका लेखन में संघ के प्रत्येक सदस्य का योगदान रहा है। किसी ने समय पर उन्हें चौकी, बस्ता, कागज और पेन दिया तो किसी ने बिजली आदि की समुचित व्यवस्था की, कोई लेखन के बाद बस्ते को व्यवस्थित करता तो कोई साथ-साथ पैदल चलकर माताजी के ज्ञान का लाभ उठाता, पुन: कोई ब्रह्मचारिणी बहनें चौके आदि की व्यवस्था से सबको निद्र्वन्द्व रखतीं, तो कोई वैय्यावृत्ति करके हम लोगों की थकान उतारतीं जिससे लेखन कार्य सुलभतया होने में कोई बाह्य या अंतरंग विघ्न उपस्थित नहीं हुआ। इसी प्रकार से संघस्थ सभी लोगों ने मुझे भी पूर्ण सहयोग प्रदान किया जिसके कारण यह हिन्दी अनुवाद मेरे द्वारा पूर्ण हो सका।

अनुकूलता के प्रसंग में जब मैं सूक्ष्मता से अवलोकन करती हूँ तो लगता है कि जम्बूद्वीप धर्मपीठ के पीठाधीश धर्मदिवाकर क्षुल्लकरत्न श्री मोतीसागर महाराज का काफी योगदान रहा है इस ग्रंथ के सृजन में। रास्ते में उनका पूरा पदविहार हमारे साथ हुआ, उसकी थकान के बाबजूद भी वे सदैव मेरा उत्साह ही बढ़ाया करते और कहा करते कि चंदनामती माताजी की हिम्मत से यह यात्रा हो रही है। प्रात:काल से ही बाहर की व्यवस्थाओं का खुद ध्यान रखकर मुझे निश्चिंत करके बोलते कि अभी विहार में देरी है थोड़ा लेखन और कर लो, जहाँ गृहस्थों से ज्यादा शंका-समाधान, बोल-चाल के प्रसंग आते वहाँ भी वे स्वयं बिना आराम किये मुझे ही आराम करने को कहकर गृहस्थों से वार्तालाप करते। इतना ही नहीं, मोतीसागर महाराज ने सुबह से शाम तक हम लोगों की पूरी अनुकूलता करके भी कभी उलाहना नहीं दिया बल्कि उनकी गुणग्राहकता हम सबके लिए विशेष अनुकरणीय रही है। मैं उनका किन शब्दों में आभार व्यक्त करूँ समझ में नहीं आता, उनसे आगे भी मुझे यही अपेक्षा है कि अगली पीढ़ी के शिष्यों का उत्साहवर्धन भी इसी प्रकार करते रहें और जिनधर्म की प्रभावना में चार चाँद लगाते रहें।

संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहनों में कु.बीना, आस्था, सारिका, चंद्रिका, इन्दु, अलका, प्रीति, स्वाति आदि सभी ने अपने-अपने योग्य कर्तव्य का पूर्णतया निर्वाह किया है, ये सभी बालिकाएँ पूज्य माताजी की ज्ञानवाटिका की सुरभित कलियाँ हैं जो पुष्पित और पल्लवित होकर भविष्य में खूब सुगंध फैलावें तथा आर्यिका दीक्षा लेकर निज-पर का कल्याण करें यही उन सबके लिए मेरा मंगल आशीर्वाद है।

षट्खण्डागम की इस प्रथम पुस्तक के पुनर्प्रकाशन के समय प्रस्तावना में कतिपय संशोधन के साथ उनका उपसंहार करते हुए मैं आज अपने दीक्षित अवस्था के २० वर्ष पूर्ण करके २१वें वर्ष में प्रवेश कर रही हूँ, अब तक षट्खण्डागम के चार ग्रंथों का मेरे द्वारा अनुवाद होकर प्रकाशन हो चुका है। पंचम ग्रंथ का अनुवाद भी पूर्ण हो चुका है, जो शीघ्र ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होने वाली है। आज अपने गुरु की छत्रछाया में पावन तीर्थ हस्तिनापुर की धरती पर बैठकर भगवान शांतिनाथ और गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से इस शुभाशीर्वाद की याचना करती हूँ कि षट्खंडागम ग्रंथ की अगली सभी पुस्तकों की संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद भी मैं शीघ्र कर सकू तथा मेरा यह अल्पज्ञान पूर्णश्रुतज्ञान और परम्परा से केवलज्ञान प्राप्ति में निमित्त बने यही पुन:-पुन: याचना करते हुए गुरुचरणों की शाश्वतछाया प्राप्ति की इच्छुक................

श्रावण शु. ११, वीर नि. सं. २५३५ ,१ अगस्त २००९
प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती


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