ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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005.गृह-बंधन से छूटने का पुरुषार्थ

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गृह-बंधन से छूटने का पुरुषार्थ

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समय ऐसी चीज है कि गहरे से गहरे घाव पर भी मलहम-पट्टी करके उसे अच्छा कर देता है, भर देता है किन्तु मेरे लिए समय ने उल्टा ही काम किया। जैसे-जैसे वह बीतता जाता, वैसे-वैसे मेरी आकुलता और चिन्ता बढ़ती जाती। इधर गांव के इस विषम वातावरण से आचार्यश्री ने यहाँ टिकैतनगर के चातुर्मास का मन ही हटा लिया और कई एक दिन बाद उनके बाराबंकी चातुर्मास होने का समाचार आ गया।

इसके पूर्व इधर मैं घर के सारे कामों को करते हुये भी पढ़ने में अपना उपयोग लगाती रहती थी। माँ गर्भवती थीं, प्रायः नवाँ महीना चल रहा था, उनसे उठना-बैठना, घर के काम करना कठिन हो रहा था अतः मैं विरक्तमना होकर भी और चिंतित होकर भी, माँ की सेवा, घर के सभी काम व नन्हें-नन्हें भाई-बहनों को सम्भालना अपना कर्तव्य समझकर बड़े प्रेम से कर रही थी।

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आचार्य संघ के दर्शन का प्रलोभन-

पिताजी रोज शाम को छत पर बैठकर मनोरंजन किया करते थे। वे एक दिन बोले-‘‘देखो बिटिया! सुना है सम्मेदशिखर जी में बहुत बड़ा संघ ठहरा हुआ है। लोग कहते हैं कि उसमें बहुत सी आर्यिकाएं भी हैं, अतः तुम्हें मैं वहीं भेज आऊँगा, तुम चिन्ता मत करो।’’ फिर क्या था, मैंने जिद करना शुरू कर दिया और बोली-‘‘आज ही मुझे शिखर जी ले चलो, संघ का दर्शन करा दो।’’ तब पिताजी ने आज-कल, आज-कल कहकर टालना शुरू किया और मुझे रोते देखकर सान्त्वना देना शुरू कर दिया किन्तु मुझे एक-एक दिन क्या, एक-एक क्षण भी निकालना कठिन हो रहा था। उस समय मैं अपनी पराधीनता की, अपने पूर्वकृत कर्मों की निन्दा करके ही मन को कुछ शान्त कर पाती थी। एक दिन पिता ने पाठशाला के पण्डित जी को बुलाकर कहा-‘‘बिटिया! तुम इनसे कुछ पढ़ो, जिससे तुम्हारा मन बहल जायेगा।’’ यद्यपि मैंने एक-दो दिन कुछ पढ़ा। पण्डित जी से छहढ़ाला के बाद की पुस्तकों को पढ़ने के नाम लिखे। पण्डित जी ने बताया कि छहढ़ाला के बाद रत्नकरण्डश्रावकाचार, सिद्धान्त प्रवेशिका, द्र्रव्यसंग्रह, धनंजय नाममाला आदि पढ़नी चाहिए किन्तु मुझे पंडित जी के पास बैठकर पढ़ने का समय नहीं मिल सका। दूसरी बात महाराज जी ने एक दिन कहा था कि- ‘‘आजकल का समय बहुत खराब है, तुम्हें अन्य किसी से न पढ़कर स्वयं ही अध्ययन करना चाहिए। तुम्हारी उम्र बहुत छोटी है, व्यर्थ ही कोई उँगली न उठा दे।’’ इस गुरु-शिक्षा से भी मैं सावधान थी, अतः पण्डित जी से न पढ़कर मैंने स्वयं ही रत्नकरण्डश्रावकाचार रटना शुरू कर दिया। घर के काम-काज करते हुए तथा नन्हें-नन्हें भाई-बहनों को संभालते हुए, गोद में खिलाते हुए भी मैं प्रतिदिन ४-५ श्लोक याद कर लिया करती थी और पुनः अपनी छोटी बहन शांति को या भाई कैलाश को सुना दिया करती थी। मैं उस समय प्रातः जल्दी उठकर नियमित सामायिक करती, मन्दिर में शुद्ध द्रव्य से पूजा करती और घर में शुद्ध भोजन ही बनाकर खाती थी तथा सम्मेदशिखर दर्शन के लिए और आचार्य संघ में रहने के लिए प्रायः समय पाकर माता-पिता से कहा करती थी।

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श्रद्धा से मन्त्रित जल का प्रभाव-

जब एक दिन माँ के पेट में बहुत जोरों का दर्द उठा, वे तड़फड़ाने लगीं। मैं जल्दी से उठकर जिनवाणी लाकर उन्हें कुछ वैराग्यवर्धक पाठ सुनाने लगी। जब दादी आई और उन्होंने उनको ऐसी स्थिति में देखा तब वे झट से उन्हें पहले से ही साफ किये गये ऐसे एक कमरे में ले गयीं, लिटा दिया और पड़ोस से धाय को बुलाकर अन्दर भेज दिया। दरवाजों पर परदे लगा दिये गये और चारों तरफ से सभी का जाना वहाँ रोक दिया गया। तब मैं शुद्ध वस्त्र पहन कर एक कटोरी में शुद्ध छना हुआ जल लेकर एकांत में जाकर बैठ गई और जिनवाणी हाथ में लेकर सामने चौकी पर कटोरी रखकर ‘सहस्रनामस्तोत्र’ का पाठ करने लगी। कुछ देर में सहस्रनाम पूरा पढ़कर वह जल मंत्रित कर दिया। उस समय सहस्रनाम में से एक श्लोक का अर्थ मुझे कुछ समझ में आता था जो यह था- ‘‘पठेदष्टोत्तरं नाम्नां सहस्रं पापशांतये।’’ जो भगवान के इन १००८ नामों को पढ़ता है उसके हजारों पाप शांत हो जाते हैं। इस श्रद्धा से सहस्रनाम का पाठ करके मैं वह कटोरी हाथ में लेकर कमरे से बाहर आई। दादी को जैसे-तैसे राजी करके मैं अन्दर माँ के पास गई और उन्हें कष्ट में दुःखी देख मैंने वह जल उन्हें पिला दिया। दादी के हल्ले-गुल्ले से मैं जल्दी ही बाहर आ गई। तभी कुछ देर बाद दादी ने कहा-

‘‘मैना! जल्दी से थाली बजाओ, तुम्हारी एक बहन आ गई है।’’ मैंने थाली बजाई। दुकान पर ‘कन्यारत्न’ के जन्म का समाचार भेज दिया। किसी ने कहा-‘‘लाला जी! छठी लड़की हुई है खूब कमाई करते रहो, ये सब एक-एक लाख के हुण्डा हैं।’’ तभी पिता ने कहा-‘‘चुप रहो, वह कन्या भी मुट्ठी बाँध कर आई है और अपने बड़े भारी भाग्य को साथ में लाई है।’’ पिताजी कन्या जन्म के बाद भी घर के वातावरण को अप्रशस्त, गमगीन कतई नहीं होने देते थे प्रत्युत् स्वयं खुश होते थे और दूसरों को भी खुश करते थे। कुछ देर बाद धाय ने बाहर आकर कहा-‘‘पता नहीं, इस लड़की ने कटोरी में क्या लाकर पिला दिया जिससे बच्चा सुख से हो गया, नहीं तो आज इन्हें बहुत ही कष्ट दिख रहा था और मुझे तो आज बच्चा होने के लक्षण भी नहीं दिखते थे, ऐसा लगता था कि इन्हें आज रात्रि भर भी ऐसे ही निकालना पड़ेगा, या डॉक्टरनी को बुलाना पड़ेगा। तभी दादी ने पूछा- ‘‘तुमने क्या पिलाया था?’’ मैंने कहा-‘‘मैंने सहस्रनाम पढ़कर जल पिलाया था।’’

तब सभी ने इसे स्वीकार किया कि स्तोत्र से मंत्रित जल में बहुत बड़ी शक्ति होती है कि जिसने इनकी प्रसव वेदना को कम कर दिया और तत्काल ही सुखपूर्वक बच्चा हो गया। अब मैं बहुत खुश थी और समझती थी कि माँ मुझे महाराज जी के दर्शन करने अवश्य ही भेज देंगी। इसके पूर्व जब-जब मैं माँ से बाराबंकी जाकर महाराज जी के दर्शन करने का भाव व्यक्त करती तब वे कह दिया करती थीं कि- ‘‘बिटिया मैना! तुम मेरी यह सौर (प्रसूति) और पार कर दो फिर चली जाना.....दर्शन कर आना......।’’ अतः उनके उन शब्दों को बार-बार याद कर मैं धैर्य धारण कर लिया करती थी। जब माँ को छह दिन हो गये और उधर की भाषा में पहला पानी पड़ गया-छट्ठी हो गई, तभी से मैंने जाने की आकुलता चालू कर दी, किन्तु दादी से वृद्धावस्था के कारण कुछ काम होता नहीं था। इसके अतिरिक्त रवीन्द्र लगभग......दो साल का था, वह मुझसे बहुत ही हिला हुआ था। मेरे पास ही सोता था, मेरे हाथ से ही खाना खाता था और मेरे पास ही रहता था। उस समय माँ को न पाकर उसने और भी रोना शुरू कर दिया था। मैं ही उसे बहलाती थी और रात्रि में अपने पास सुलाती थी तथा मेरी जाने-जाने की चर्चा चल रही थी अतः वह छोटा सा बालक रात्रि में मेरी धोेती पकड़ कर ही सोता था तथा रात्रि भर धोती पकड़े ही रहता था कि कहीं जीजी मुझे छोड़कर चली न जाये।

जब-जब मैं कहती थी कि-‘‘ अब मुझे एक बार बाराबंकी भेज दो तब-तब माँ घबड़ातीं और कहतींं- ‘‘बिटिया मैना! एक पानी और डलवा दो फिर कुछ कहो, देखो, भला रवीन्द्र को कौन संभालेगा........?’’ ‘‘मैं चुप हो जाती, किन्तु उन दिनों मेरे हृदय से ममता बिल्कुल निकल गई थी और मेरा हृदय इतना निर्मम बन चुका था कि मुझे उस समय उन माँ-पिता आदि की बातें, ममत्व भरे परिणाम और करुणामयी मुद्रा सब कुछ भी केवल वैराग्य बढ़ाने में कारण बनते थे। मैं सोचने लगती थी- ‘‘अहो! संसार समुद्र को पार करना कितना कठिन है। देखो, यह सब मोही जीव कैसे दुःखी हो रहे हैं? मैं कैसे जल्दी से जल्दी इन सब मोह बन्धनों से छूटकर गुरुदेव की शरण में, धर्म की शरण में पहुँचूँ? क्या करूँ?’’ बस सोचते-सोचते जिनेन्द्र देव का स्मरण कर उन्हीं से प्रार्थना करने लगती-‘‘हे नाथ! हे परमकरुणासागर! मुझे भी अब जल्दी ही अपने हाथ का अवलम्बन देकर गृह कूप से निकालो, मेरा बेड़ा पार करो.....।’’ धीरे-धीरे दूसरा और तीसरा पानी पड़ गया। यह वह समय था कि जब बच्चे हुई जच्चा को एक माह तक उसी प्रसूतिगृह में ही रहना पड़ता था। वह कुछ भी छू नहीं सकती थी और न उनको ही कोई छू सकता था। भगवान जाने उधर भी आज क्या हो रहा है.....? रक्षाबन्धन पर्व आ गया था। माँ को २२ दिन हो चुके थे। चौथा पानी१ पड़ चुका था। मैंने उस कन्या का अपना मनपसंद ‘मालती’ यह नाम रखा और उसे ऊपर से नहलाकर उठा लिया। नये कपड़े अपने हाथ से सिले हुए थे सो उसे प्यार से पहनाये। पुनः उस कन्या के हाथ से भी पिता व सभी भाइयों के हाथ में राखी बंधवाई। बस मैं मानो कृतकृत्य हो चुकी थी। कन्या को वापस माँ को दे दिया और मैं पुनः महाराज जी के दर्शनों के लिए प्रार्थना करने लगी किन्तु पिता से आज्ञा कदापि नहीं मिल पा रही थी। वे जानते थे और खूब जानते थे कि- ‘‘यह बाराबंकी जाकर फिर वापस नहीं आ सकती है।’’ दूसरे ही दिन किसी कार्यवश पिता त्रिलोकपुर चले गये थे। उन्हें एक दिन बाद ही आना था। बस, मैंने अच्छा मौका देखकर बहुत कुछ अनुनय-विनय करके माँ को राजी किया और छोटे भाई कैलाशचन्द्र के साथ बाराबंकी जाने का निर्णय बना लिया। यह वह समय था कि जब सयानी कुवारी कन्या को घर से बाहर भी नहीं निकलने दिया जाता था, तब बाहर दूसरे गाँव, बिना माता-पिता के, अन्य के साथ, अकेली जाना बहुत ही कठिन था फिर भी इतने उत्कण्ठ भावों को आखिर कोई कब तक रोक पाता? शेष में माँ ने कहा-

‘‘देखो बिटिया! तुम पिता के आने से पहले ही आ जाना अन्यथा प्रसूतिगृह (सौर) में ही वो मेरे ऊपर उपद्रव कर डालेंगे कि तुमने मैना को कैसे जाने दिया?....।’’ उसके पूर्व भी जब से मेरा गृहत्याग का विचार बना था तभी से पिता सदैव माँ को यही फटकारा करते थे कि- ‘‘तुमने ही इसे रात-दिन पढ़ा-पढ़ा कर ऐसी बना दिया है। न कभी खेलने जाने दिया और न कभी इच्छानुसार पाठशाला ही भेजा, सदा बन्धन में रख-रखकर ओैर शीलकथा, दर्शन कथा आदि कथाएं पढ़ा-पढ़ा कर इसका मूड खराब कर दिया है.....।’’ अतः इस समय भी वे बहुत ही घबड़ा रही थीं। उस दिन तक घर की तिजोरी व दुकान के रुपयों की सभी चाबियाँ मेरे पास ही रहती थीं। पिताजी मुझे अपना बड़ा पुत्र ही समझते थे और दुकान से बिना गिने ही रुपये लाकर मुझे संभला दिया करते थे। मैं भी उन रुपयों को गिनकर सौ-सौ की गड्डी बनाकर एक अलग पेटी में रखकर ताला लगा दिया करती थी और चाबी अपने पास रखती थी। जब भी वो रुपये मांगते मैं व्यवस्थित गड्डियाँ लाकर दे देती तो पिताजी बहुत ही खुश होते थे और मेरे ऊपर बहुत ही विश्वास तथा बहुत ही स्नेह रखते थे। अक्सर ही उनके मुख से ये शब्द निकल जाया करते थे-

‘‘यदि यह लड़का होता तो जीवन भर मुझे कितना सुख देता। उस छोटी सी उम्र में भी माता-पिता प्रायः हर किसी विषय में मेरे से सलाह लिया करते थे और मैं उन्हें उचित-योग्य सलाह दिया करती थी। जिससे वे सदा ही मुझ पर खुश रहते थे और पंडित मनोहरलाल जी के शब्दों में वे मुझे कोई देवी का ही अवतार समझ लेते। यदि पिताजी एक दिन भी स्वाध्याय न करते तो मैं उनके पीछे पड़ जाती और स्वाध्याय कराकर ही मानती थी। जब वे शास्त्र पढ़ने बैठते, तब मैं भी बैठकर उन्हें खूब अच्छा अर्थ समझाने लगती थी।