ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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005.दो शब्द

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दो शब्द

—पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर (समाधिस्थ)
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संसार में प्राय: देखा जाता है कि जिन-जिन महापुरुषों ने जिनधर्म प्रभावना का यदि कोई व्यापक बीड़ा उठाया है तो उन्हें प्राचीन आर्ष परम्परा एवं निर्दोष गुरुपरम्परा की लीक से कुछ न कुछ हटकर अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ा है। संसारी प्राणी चूँकि सरलचर्या और शिथिलाचार की ओर स्वभाव से बढ़ रहा है इसलिए आर्षपरम्परा से हटकर आचरण करने वालों के प्रति उसका आकर्षण बढ़ता है पुन: लोकप्रभावना के प्रवाह में मानव बहता चला जाता है। किन्तु इसी सरागी संसार में तीर्थंकर भगवन्तों की पावन परम्परा में कुछ विशिष्ट महापुरुष ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने समय-समय पर धर्म का सरलीकरण तो किया लेकिन प्राचीन बुनियादों को कभी समाप्त नहीं किया।

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इसीलिए एक अनुष्टुप् छंद के मंगलाचरण में भी पढ़ा जाता है

मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी।

मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलं।।

अर्थात् तीर्थंकर महावीर, गौतम गणधर एवं आचार्यश्री कुन्दकुन्दस्वामी तक अविच्छिन्न जैनशासन चला है पुन: उन्हीं की परम्परा में बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर महाराज हुए जिन्होेंने आगमपरम्परा के निर्वहन में अपूर्व योगदान दिया। वर्तमान में उनकी कृपाप्रसाद से ही निर्दोष मुनिमार्ग के दर्शन हो रहे हैं।

मुझे आज इस बात को लिखते हुए महान गौरव हो रहा है कि चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री की चतुर्विध संघ शृंखला में बीसवीं सदी की प्रथम बालब्रह्मचारिणी आर्यिका पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सन् १९५२ के गृहत्याग से लेकर अद्यावधि चतुर्मुखी कार्यकलापों में प्रेरणा देने तक कभी कोई कार्य आगमविरुद्ध या गुरुपरम्परा के प्रतिकूल नहीं किया। उनके समक्ष चाहे कितने ही संघर्ष आए किन्तु सदैव दृढ़ता की दीवार का अवलम्बन लेकर सबको यही उत्तर दिया कि ‘‘धर्म पैसों से नहीं बिका करता है, जीवन में जैनेश्वरी दीक्षा आत्मकल्याण के लिए ली जाती है न कि ख्याति-पूजा-लाभ अथवा लोकानुरंजन के लिए।’’ वे आचार्य श्री कुन्दकुन्दस्वामी की पंक्तियाँ कई बार हम लोगों को भी सुनाया करती हैं कि—

आदहिदं कादव्वं, आदहिदं परहिदं च कादव्वं।

आदहिद परहिदादो, आदहिदं सुट्ठु कादव्वं।।

अर्थात् संतों को सर्वप्रथम आत्महित की ओर प्रवृत्त होना चाहिए पुन: आत्महित के साथ-साथ परहित भी जितना संभव हो उतना करें तथा आत्महित और परहित दोनों की तुलना में आत्महित को ही प्रमुखता देना चाहिए।

सन् १९६७ से मैं निरंतर पूज्य माताजी के जीवन को सूक्ष्मता से देख रहा हूँ कि उन्होंने कितने ही प्रभावना आदि प्रलोभन के प्रसंग आने पर भी संघर्ष एवं धर्म के बीच कभी समझौता नहीं किया। अपनी पूर्ण आवश्यक क्रियाओं को सम्पन्न करने के पश्चात् जो अवकाश मिला उन क्षणों का सदुपयोग शास्त्रसम्मत लेखन में किया तथा कभी भी किसी निजी विचारधारा को प्रश्रय न देकर सदैव आर्षमार्ग का ही अनुसरण करते हुए आगम ग्रंथों का सृजन किया।

उनके जीवन की इसी विशेषता को मैं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानता हूँ कि उन्होंने निर्माण-प्रेरणा, शिष्य-संग्रह, ग्रंथ-रचना, धर्मोपदेश, पंचकल्याणक, महामहोत्सव आदि जितने भी कार्य किए उनमें कभी कोई आगमविरुद्ध, परम्पराविरुद्ध अथवा पदविरुद्ध कार्य नहीं किया।

इस प्रकार निर्दोषरीत्या जिनधर्म की प्रभावना करने वाली पूज्य माताजी ने जिस आदर्श को उपस्थित किया है वह प्रत्येक मुनि-आर्यिका के लिए अनुकरणीय है। मुझे भी ऐसी शक्ति प्राप्त हो कि आपके समान दृढ़ता का अवलम्बन लेकर आत्महित और परहित का मार्ग प्रशस्त कर सकूँ यही पूज्य माताजी से मेरी विनम्र प्रार्थना है।

अक्टूबर- २००९