ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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006.चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी मुनिराज का जीवन परिचय

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चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी मुनिराज का जीवन परिचय

प्रस्तुति-गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी
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दक्षिण भारत में कोल्हापुर जिले के ‘‘भोज’’ नामक ग्राम के पास ‘‘येळगुळ’’ गांव में विक्रम संवत् १९२९ में (ई. सन् १८७२) आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष में षष्ठी तिथि को बुधवार की रात्रि में सातगौंडा नामक एक बालक ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर चारित्रचक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी मुनिराज के रूप में अपना स्थान बनाया। उनके पिताश्री का नाम भीमगौंडा था तथा माता का नाम ‘‘सत्यवती’’ था। सातगौंडा की विद्यालयीन शिक्षा बहुत कम हुई। वे पाठशाला में तीसरी कक्षा तक पढ़ पाये। जब चरित्र नायक सातगौंडा जी ९ साल के हुए, तब ज्येष्ठ भाई देवगौंडा और आदिगौंडा का विवाह सम्पन्न हो रहा था। सातगौंडा का भी विवाह जबरदस्ती ही किया गया। विवाह के पश्चात् छ: माह के भीतर ही विवाहिता की इहलोक यात्रा समाप्त हुई। सातगौंडा बाल्यावस्था में विवाहबद्ध होकर भी निसर्ग से बालब्रह्मचारी रहे। अनंतर उन्होंने पुन: विवाह नहीं किया। आत्मानुशासन, समयसार इन दो ग्रंथों का स्वाध्याय सातगौंडा प्रारंभ से ही करते थे। आयु के १७वें, १८वें वर्ष में भरी युवावस्था में ही मन में दिगम्बरी दीक्षा लेने के सहज भाव होने लगे परन्तु पिता की आज्ञा तथा पुत्र-कर्तव्य का विकल्प होने से सातगौंडा का दीक्षा लेने का विचार कुछ समय के लिए स्थगित हुआ।

शक संवत् १८३३ ई. सन् १९१२ में सातगौंडा की माता की इहलोक यात्रा समाप्त हुई। उसके कुछ साल पहले ही पिताजी का भी स्वर्गवास हुआ था। सातगौंडा ने जीवन के इक्तालीस साल पूर्ण होने के उपरांत दीक्षा लेने का दृढ़ निश्चय किया। उस समय कर्नाटक में दिगम्बर स्वामी श्रीदेवेंद्रकीर्ति विहार कर रहे थे। सातगौंडा मुनिश्री के समीप पहुँचे और दिगम्बर दीक्षा देने की प्रार्थना की, परन्तु श्रीदेवेन्द्रकीर्ति स्वामी ने प्रारंभ में क्षुल्लक पद की ही दीक्षा लेने को कहा। शक सम्वत् १८३७ ई. सन् १९१४ में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तिथि को ‘‘सातगौंडा’’ ने उत्तूर (महाराष्ट्र) में क्षुल्लक पद की दीक्षा धारण की। क्षुल्लकजी का प्रथम वर्षायोग धारण करने का प्रारंभ कोगनोली से हुआ। अनन्तर सन् १९१७ में श्री गिरनार क्षेत्र पर श्री नेमिनाथ भगवान के चरण साक्षी में स्वयं ऐलक पद को स्वीकार किया।

कर्नाटक के जिला बेलगांव (कर्नाटक) में निपाणी संकेश्वर के समीप ‘‘यरनाळ’’ ग्राम में पंचकल्याणक महोत्सव के लिए मुनिराज श्री देवेन्द्रकीर्तिजी पधारे थे। ऐलक सातगौंडा महाराज भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने गुरु श्रीदेवेन्द्रकीर्ति स्वामी को दिगम्बर दीक्षा देने के लिए पुन: प्रार्थना की। मुनि दीक्षा के लिए समाज भर ने एक स्वर से अनुमोदना की। दीक्षा कल्याणक के दिन ऐलकजी ने भी दीक्षागुरु श्री देवेन्द्रकीर्ति महाराज के पास दिगम्बरी जिनदीक्षा धारण की। भगवान की दीक्षा विधि के साथ ऐलक महाराजजी की भी निर्गं्रथ दीक्षा विधि सम्पन्न हुई, केशलोंच समारम्भ भी हुआ। ऐलक सातगौंडा मुनि हो गये तथा यथाजातरूपधारी हुए। मुनि पद में ऐलक सातगौंडा का नाम श्री ‘‘शांतिसागर’’ रखा गया। उनकी मुनि दीक्षा तिथि शक सम्वत् १८४१ (सन् १९२०) की फाल्गुन शुक्ला चतुर्दशी थी।

यरनाल में दीक्षासमारोह समाप्त होने के अनंतर महाराज नसलापुर आये। उसके बाद महाराज कोगनोली पहुँचे। महाराजजी के विहार काल में कोन्नूर का चातुर्मास बड़ा महत्वपूर्ण रहा। यहां महाराज की जीवनी में अतिशय महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। जब महाराज बाहुबली (कुम्भोज) आये, तब वहां दो सज्जनों (श्री सेठ खुशालचंद जी एवं श्री ब्र. हीरालाल जी) ने महाराज जी के पास क्षुल्लक पद की दीक्षा धारण की। दीक्षा के बाद श्री सेठ खुशालचंद जी क्षु. ‘चन्द्रसागर’ तथा ब्र. हीरालाल जी का क्षु. ‘‘वीरसागर’’ नामांकन हुआ। समडोली के चातुर्मास में आचार्यश्री के पास क्षु. वीरसागर जी ने निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण की। यही महाराज के प्रथम निग्र्रंथ शिष्य थे। आचार्यश्री ने आगे चलकर अपने समाधिकाल में श्री वीरसागर महाराज को ही उन्मुक्त भावों से आचार्यपद प्रदान किया।

समडोली ग्राम में ही सर्वप्रथम आचार्यश्री का चतुःसंघ स्थापित हुआ। अब संघ सहित विहार होने लगा। संघ ने उनको ‘आचार्य’ पद घोषित किया। ई. सन् १९२७ के मार्गशीर्ष वदी प्रतिपदा के दिन श्री सम्मेदशिखर जी क्षेत्र की वंदना और धर्मप्रभावना के उद्देश्य से आचार्यश्री १०८ शांतिसागर जी महाराज की विहार यात्रा संघ सहित बाहुबली (कुम्भोज) क्षेत्र से शुरू हुई। बम्बई निवासी पुरुषोत्तम श्रीमानसेठ पूनमचंद जी घासीलाल जी और सुपुत्रगण आचार्यश्री के पास पहुँचे। उन्होंने आचार्यश्री को ससंघ श्री सम्मेदाचल यात्रा को ले चलने का संकल्प प्रकट किया। ता. ९ जनवरी १९२८ को संघ का नागपुर छोड़कर भंडारा मार्ग से विहार शुरू हुआ। फाल्गुनशुक्ला तृतीया के दिन तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर जी सिद्धक्षेत्र को पहुँचा। यहाँ पर श्री संघपति जी के द्वारा व्यापकरूप में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव द्वारा महती धर्मप्रभावना हुई। भारत के कोने-कोने से श्रावक-श्राविकाएं अत्यधिक प्रमाण में पहुँचे। तीर्थक्षेत्र कमेटी तथा महासभा आदि कई सभाओं के अधिवेशन भी हुए। श्री सम्मेदशिखर की वंदना करके वहां से मंदारगिरी, चम्पापुरी, कुण्डलपुर, पावापुरी, राजगृही, गुणावां आदि अनेक सिद्धक्षेत्रों की संघ ने यात्रा की। संघ विहार करता हुआ गजपंथा सिद्धक्षेत्र पर आया। यहाँ पर सम्मिलित सब जैन समाज ने आचार्यश्री को ‘‘चारित्र-चक्रवर्ती’’ पद से विभूषित किया।

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टंकोत्कीर्ण श्रुत की टंकोत्कीर्ण सुरक्षा-

वि. सं. २००० (ई. सन् १९४४) की घटना है। आचार्यश्री का चौमासा कुंथलगिरि में था। श्री पं. सुमेरचंद जी दिवाकर से धर्म चर्चा के समय यह पता चला कि अतिशयक्षेत्र मूडबिद्री में विद्यमान धवला, जयधवला और महाबंध इन सिद्धान्त ग्रंथों में से महाबंध ग्रंथ की ताड़पत्री प्रति के करीब ५००० सूत्रों का भागांश कीटकों का भक्ष्य बनने से नष्टप्राय हो गया है। भगवान् महावीर के उपदेशों से साक्षात् संबंधित इस जिनवाणी का केवल उपेक्षामात्र से हुआ विनाश सुनकर आचार्यश्री को अत्यन्त खेद हुआ। आगम का विनाश यह अपूरणीय क्षति है। इनकी भविष्य के लिए सुरक्षा हो तो कैसी हो? इस विषय में पर्याप्त विचार परामर्श हुआ। अंत में निर्णय यह हुआ कि इन ग्रंथराजों के ताम्रपत्र किये जायें और कुछ प्रतियां मुद्रित भी हों।

प्रातःकाल की शास्त्र सभा में आचार्यश्री का वक्तव्य हुआ। संघपति श्रीमान् सेठ दाडिमचंद जी, श्रीमान सेठ चंदुलाल जी बारामती, श्रीमान सेठ रामचन्द जी धनजी दावडा आदि सज्जन उपस्थित थे। संघपति जी का कहना था कि जो भी खर्चा हो, वे स्वयं करने के लिए तैयार हैं। फिर भी आचार्यश्री के संकेतानुसार दान संकलित हुआ, जो करीब डेढ़ लाख था।

‘‘श्री १०८ चारित्र चक्रवर्ती शांतिसागर दि. जैन जिनवाणी जीर्णोद्धार संस्था’’ नामक संस्था का जन्म हुआ। ग्रंथों के मूल ताड़पत्री प्रतियों के फोटो लेने का और देवनागरी प्रति से ताम्रपट्ट कराने का निर्णय हुआ। नियमावली बन गई। कार्य की पूर्ति के लिए ध्रुवनिधि की वृद्धि करने का भी निर्णय हुआ। कार्य की पूर्ति शीघ्र उचित रूप से किस प्रकार हो, इस विषय में पत्र द्वारा मुनि श्री समंतभद्र जी से परामर्श किया गया। ‘‘आर्थिक व्यवहार चाहे जिस प्रकार हो, यदि कार्य पूरा करना है तो कार्यनिर्वाह की जिम्मेदारी किसी एक जिम्मेदार व्यक्ति के सुपुर्द करनी होगी। हमारी राय में श्रीमान बालचंद जी देवचंद जी शाह (बी.ए.) को यह कार्य सौंपा जाये’’ इस सलाह के अनुसार कार्य की व्यवस्था बन गई। आचार्यश्री के संकेत को आज्ञा के रूप में श्री सेठ बालचंद जी ने शिरोधार्य कर कार्य संभाला। प्रतियों के मुद्रण तथा ताम्रपत्र के रूप में टंकोत्कीर्ण का कार्य श्रीमान् विद्यावारिधि पं. खूबचंद जी शास्त्री, श्रीमान् पं. पन्नालाल जी सोनी, श्रीमान् पं. सुमेरचंद जी दिवाकर, श्रीमान् पं.हीरालाल जी शास्त्री, श्री पं. माणिकचंद जी भीसीकर आदि विद्वानों के यथासंभव सहयोग से यह कार्य पूरा हो पाया; जिसमें ९ वर्षों का समय लगा।

कुंथलगिरी दक्षिण का सीमावर्ती सुन्दर सिद्धक्षेत्र है। ‘‘यहाँ पर एक विशालकाय बाहुबली भगवान की मूर्ति हो तो अच्छा होगा।’’ यह भव्य आशय कमेटी के सभी सदस्यों को एकदम पसंद आया। सन् १९७० में १८ फीट ऊँची बाहुबली भगवान् की मूर्ति पहाड़ी के ऊपर पूर्वाभिमुख विराजमान होकर प्रतिष्ठा भी सम्पन्न हो गई। इस प्रकार एक तरह से महाराज के सम्पूर्ण काम सिद्ध हुए।

जैनियों की दक्षिणकाशी फलटन नगरी धर्मकार्यों को उत्साह तथा उल्लास के साथ करती ही आ रही है। सन् १९५२ की घटना है। पूज्य श्री के जीवन के ८० वर्ष पूरे हुए। इस प्रसंग में हीरक जयंती महोत्सव सम्पन्न करने का निर्णय एक स्वर से किया गया। जून की ता. १२, १३, १४ ये तीन दिन विशेष आनन्दोत्सव के रहे। भारत के कोने-कोने से हजारों भाई फलटण पहुँचे। सभा-सम्मेलन हुए, योजनाबद्ध रूप से श्रद्धांजfिलयों का समर्पण हुआ। ताम्रपत्रों के ऊपर उत्कीर्ण धवलादि ग्रंथों का हाथियों के ऊपर जुलूस निकालकर, वे ग्रंथ भक्तिभावपूर्वक पूज्य आचार्यश्री को समारोह के साथ समर्पण किये गये। स्वयं फलटन स्टेट के अधिपति श्रीमान् मालोजीवराव निंबालकर फलटन नगरी का यह अहोभाग्य समझते रहे। हीरक जयंती महोत्सव के निमित्त से एक सचित्र स्मरणिका प्रकाशित हुई। जिससे उत्सव का सचेतन स्वरूप सुस्पष्ट होता है।

दिनाँक १८-८-५५ को महाराज जी का यम सल्लेखना का ज्यों ही निर्णय प्रगट हुआ, समाज भर को, देशभर को भूचाल जैसा धक्का लगा, जो स्वाभाविक ही था।

अन्न आहार के रूप में अंतिम ग्रास दिनाँक १८-८-५५ को दिया गया। ता. २६-८-५५ को मध्यान्ह में सल्लेखना विधि के अनुसार महाराजश्री के द्वारा क्षमायाचना का, क्षमा के आदान-प्रदान का भाव व्यक्त हुआ। यह सम्पूर्ण दृश्य अभिनव था। सभा में गंभीरता का वातावरण भर आया। बस अब सदा के लिए अन्नाहार बंद हो गया। केवल पानी मात्र की छूट थी। आगे चलकर पानी का भी दिनाँक २८-८-५५ को परित्याग कर दिया। फिर भी मंदिरों के दर्शन, यथाशक्ति वंदना, अभिषेक, पूजा इत्यादि का अवलोकन, मंत्रस्मरण आदि में कोई खण्ड नहीं रहा। लोगों की बढ़ती हुई भीड़ का क्या कहना? कुंथलगिरि की उस वीरान पहाड़ी का क्या कहना? कुंथलगिरि की उस वीरान पहाड़ी में जनसागर उमड़ पड़ा।

दिनाँक २२-८-५५ को महाराजश्री के संकेत से ही श्रीमान् सेठ बालचंद देवचंद शहा का ताम्रपट्ट तथा ग्रंथमालाओं से की गई श्रुतसेवा के लिए सभासंयोजना पूर्व सत्कार किया गया और मानपत्र समर्पण किया गया। स्वयं महाराजश्री आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित हुए। दिनाँक १८-९-५५ को भाद्रपद शुक्ल दूज, रविवार, प्रात:काल ठीक ६ बजकर ५० मिनट पर महाराजश्री की परमपवित्र निरामय तपस्या से पुनीत आत्मा ‘‘ॐ सिद्धाय नम:’’ के उच्चारण के साथ अंतिम श्वास ले पायी। मोक्षमार्ग के साधक ने इस पर्याय की अपनी पवित्र जीवन यात्रा पूर्ण की हैं।

आचार्यश्री ने सन् १९२० में निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा ली। उस समय से लेकर १९५५ तक के ३५ वर्षों में महाराज ने ६३३८ दिन उपवास किया। इसका अर्थ यह है कि ३६ वर्ष के मुनि जीवन के २५ वर्ष ७ मास अनशन में बीते। महाराज इतने दिन निराहार रहे। क्या इस कठोर उग्र तपस्या में आचार्यश्री की कोई बराबरी कर सकता है? नहीं। यह तो उनकी विशिष्ट आत्मशक्ति का प्रतीक है।

ऐसे उन बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य श्री शान्तिसागर महाराज के श्रीचरणों में शत-शत नमन।