ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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006. मैना का घर से अंतिम प्रस्थान

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घर से अन्तिम प्रस्थान-

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बहुत दिनों पूर्व जब मैं छोटी थी और कैलाश भी ५-७ वर्ष का छोटा सा ही था तब मैंने एक दिन उसे कुछ समझाकर कहा था कि- ‘‘देखो कैलाश! तुम मेरे सच्चे भाई तब हो, कि जब मेरे समय पर मेरे काम आओ, अतः कभी यदि किसी समय मैं तुमसे कुछ मेरा विशेष काम कहूँ तो अवश्य ही कर देना।’’ कैलाश ने भी मेरी बात मान ली और तब मैंने उस छोटी सी वय में ‘‘वचन’’ ले लिया था। उस समय वह वचन मुझे याद आ गया था अतः मैंने कैलाश को एकांत में बुलाया और वह पुराना वचन याद दिलाते हुए कहा- ‘‘भैया कैलाश! आज तुम मेरा एक काम कर दो बस मैं कृतार्थ हो जाऊँगी।’’ कैलाश ने जिज्ञासा व्यक्त की-‘‘कौन सा काम जीजी.......?’’ मैंने कहा-‘‘तुम मेरे साथ बाराबंकी चले चलो। देखो! मुझे अकेली तो भेज नहीं सकते हैं अतः तुम्हें मेरे साथ चलना पड़ेगा.....।’’ कैलाश पहले तो कुछ हिचकिचाया, फिर उस वचन को याद कर बोला- ‘‘अच्छा जीजी! मैं चलूँगा.....।’’ मैं रात भर महामंत्र का स्मरण करती रही। मुझे नींद तो बिल्कुल ही न के बराबर आई थी। ब्रह्ममुहूर्त में चार बजे उठी, महामंत्र जपा और सोते हुए तथा पकड़ कर मेरे को चिपके हुए रवीन्द्र को धीरे-धीरे अपने से अलग किया। उसके माथे पर प्यार का, दुलार का हाथ फैरकर उसे अपना अन्तिम भगिनीस्नेह दिया और मैं धीरे से खटिया से नीचे उतर आई। धीरे-धीरे ही नीचे जाकर सामायिक, स्नान आदि से निवृत्त होकर मन्दिर के दर्शन करने चली गई। वहाँ जाकर प्रभु पार्श्वनाथ की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होकर प्रार्थना करने लगी- ‘‘हे तीन लोक के नाथ! जैसे आपने कमठ के उपसर्गों को सहन कर संकट मोचन ‘पार्श्वनाथ ’ यह नाम पाया है वैसे ही मुझे भी संकटों को, उपसर्गों को सहन करने की शक्ति दो और मेरे मनोरथ को सफल करो......।’’ पुनः-पुनः भगवान को नमस्कार कर घर आ गई तब तक भी रवीन्द्र सोया हुआ था। माँ से मिली और उनकी आज्ञा लेकर आगे बढ़ी, सीढ़ी से उतरने लगी तभी मां ने बार-बार कहना शुरू किया- ‘‘बिटिया मैना! आज ही वापस आ जाना, रुकना नहीं, हाँ! शाम की गाड़ी से आ जाना, हाँ......आ जाना.....।’’ उनको सान्त्वना देते हुए मैंने भी यही कहा- ‘‘हाँ, देखो! मैं बिस्तर आदि कुछ भी नहीं ले जा रही हूँ।’’ इसके पूर्व कई बार माँ-पिता ने यह कहा था कि- ‘‘यदि तुम बाराबंकी जाओगी तो दुनिया हमें क्या कहेगी?’’ आचार्यश्री ने मुझे रत्नकरण्डश्रावकाचार पढ़ने की आज्ञा दी थी और एक दिन बोले थे कि ‘‘जब पूरा याद हो जाय तब मैं परीक्षा लूँगा....।’’ अतः मैं इन लोगों से यही कहा करती थी कि- ‘‘देखो, मुझे रत्नकरण्डश्रावकाचार पूरा याद हो चुका है अतः अब मुझे एक बार महाराज जी के पास परीक्षा देने जाना है।’’ उस समय भी वही हेतु बताकर मैं जल्दी-जल्दी घर से बाहर निकली, कैलाश मेरे साथ था। हम दोनों बस में बैठ गये और बाराबंकी आ गये। माँ ने मुझे अच्छी तरह से बता दिया था कि- ‘‘वहाँ पर बाराबंकी में तुम्हारे पिता की बुआ का घर है। उनके दोनों पौत्र बड़े ही सज्जन हैं। तुम्हारे पिताजी जब कभी भी व्यापारिक कार्य से बाराबंकी जाते हैं तो उन्हीं के घर में ही ठहरते हैं अतः तुम वहाँ ही चली जाना।’’ गृह-बन्धन से छूट गई- उसके पूर्व मैंने बाराबंकी शायद कभी देखा भी नहीं था। उस समय जब मैं बस से उतरती हूँ तो पहले सीधे ही मन्दिर का रास्ता पूछकर मन्दिर पहुँचती हूँ। वहीं पर आचार्यश्री का दर्शन करती हूँ। उस समय मुझे इतना आनन्द होता है कि मानों कितने जन्म की खोई हुई निधि मुझे आज मिल गई है। महाराज जी मुझे देखकर बड़े प्रेम से आशीर्वाद देते हैं और बोलते हैं- ‘‘मैना! तुम आ गई।’’ ‘‘हाँ, महाराज जी! मैं आ गई।’’ पुनः मैं वहीं बैठ गई और कुछ देर बाद आचार्यश्री से निवेदन किया- ‘‘महाराज जी! मैंने रत्नकरण्डश्रावकाचार के सभी डेढ़ सौ श्लोक याद कर लिए हैं, अब आप उसकी परीक्षा ले लीजिए।’’ महाराज जी ने पूछा-‘‘क्या उन श्लोकों का अर्थ भी याद किया है?’’ मैंने कहा-‘‘हाँ, महाराज जी! अर्थ भी याद कर लिया है, आप चाहे जहाँ से पूछ लीजिए।’’ महाराज खुश हुए और हँसकर बोले-‘‘अच्छा मैं परीक्षा लेऊँगा।’’ पुनः वो अपने लेखन कार्य में लग गये। आहार का समय हुआ, बाद में मैं माँ के कहे अनुसार कपूरचन्द्र जी के घर जाना ही चाहती थी। इसके पूर्व वहाँ पर मेरे पहुँचते ही कानाफूसी चालू हो गई थी कि- ‘‘यह टिकैतनगर से आई है, ‘‘मैना है’’ जो कि दीक्षा लेना चाहती है....।’’ अतः कपूरचंद्र जी की धर्मपत्नी ने आगे बढ़कर मेरा हाथ पकड़ लिया और बोलीं-‘‘चलो घर खाना खाने.....।’’ मैं भी जाना ही चाहती थी। उनके साथ घर पहुँची, चौके का शुद्ध भोजन किया और उनके बताये अनुसार एक कमरे में बैठ गई। कैलाश ने भी खाना खाया, पुनः बोले- ‘‘जीजी चलो! अब जल्दी ही बस से निकल चलें।’’ मैंने कहा-‘‘देखो, मैं रत्नकरंड की परीक्षा देने के लिए आई हूँ और अभी महाराज जी ने तो परीक्षा ली नहीं, अतः मैं आज यहीं रुकूंगी।’’ कैलाश सहम गया और रोने लगा। मैंने जैसे-तैसे उसे समझाया और पुनः सामायिक के उपरान्त महाराज जी के पास आ गई। मैंने बड़ी मुश्किल से शाम को कैलाश को वापस भेज दिया और कह दिया- ‘‘भैया! दो दिन बाद आकर ले जाना, मुझे आचार्य महाराज को आहार देना है, दो-एक उपदेश सुनना है और परीक्षा देना है।’’ कैलाश ने सब कुछ प्रयत्न कर लिये किन्तु जब मैं नहीं ही जाने को तैयार हुई तब वह बेचारा मन मसोसकर रोता हुआ वापस घर आ गया। जब मैं वापस नहीं आई तब माँ भी बहुत रोई और पिता ने आते ही घर सूना देखा तो आवाज लगाई- ‘‘मैना, मैना!’’ पता चला मैना तो बाराबंकी गई, तब वे भी रोने लगे पुनः माँ के कुछ समझाने पर शांत हुए और बोले- ‘‘अच्छा, दो-चार दिन रह लेने दो, वहाँ तो बुआ का घर अपना ही घर है। फिर मैं जाकर ले आऊँगा।’’ पुनः दो दिन बाद कैलाश को भेजा तब मैंने कहा-‘‘भैया! मैंने नियम कर लिया है कि मैं ‘दशलक्षण’ में यहीं रहूँगी अतः तुम चिन्ता मत करो, मैं बाद में आ जाऊँगी....।’’ वहाँ बाराबंकी में कपूरचन्द्र जी की पत्नी ने मुझे ऊपर का एक कमरा दे दिया था और सारी सुविधाएं दे दी थीं। रात्रि में वे प्रायः मेरे पास ही सो जाया करती थीं। मैं प्रातः उठकर सामायिक करके स्नान आदि से निवृत्त हो मन्दिर में जाकर पूजा करती थी, पुनः महाराज जी का उपदेश सुनती थी। उसके बाद महाराज जी का पड़गाहन करती थी। उस घर में भी चौका लगता था, अतः महाराज जी का जहाँ भी आहार हो, भाभी१ के साथ जाकर आहार देकर चौके में ही शुद्ध भोजन करती थी। पुनः मध्याह्न में सामायिक करती थी। बाद में महाराज जी के यहाँ आ जाती थी। यद्यपि महाराज जी मेरे से बहुत कम बोलते थे फिर भी मैं वहाँ जाकर महिलाओं के बीच बैठ जाती थी। मैंने समय पाकर महाराज जी से कई बार कहा- ‘‘महाराज जी! रत्नकरण्डश्रावकाचार की परीक्षा ले लीजिए और मुझे दूसरी पुस्तक पढ़ने को दे दीजिए।’’ तब एक दिन महाराज जी ने एक-दो प्रश्न किये। मैंने भी सही उत्तर दिया। महाराज जी प्रसन्न हुए और बोले- ‘‘मैना! तुम्हारा क्षयोपशम बहुत ही अच्छा है। तुम्हें परीक्षा क्या देना तुम तो पहले से ही पास हो.....।’’ उस समय मैं महाराज जी की आज्ञा से ‘धनंजय नाममाला’ रट रही थी। समय व्यतीत होता जा रहा था। मैं चाहती थी कि मेरी यहीं दीक्षा हो जाये और अब मैं घर नहीं जाऊँ...। इसी मध्य बाराबंकी में एक मारवाड़ी सेठ ने ऋषिमण्डल विधान प्रारंभ किया था। मैंं महाराज जी की आज्ञा लेकर उस विधान में जाप करने बैठ गई थी। इस निमित्त से भी आठ-दस दिन घर जाने की बात टल गई थी। वहाँ पर श्यामाबाई (धर्मपत्नी राजेन्द्र प्रसाद), ताराबाई (धर्मपत्नी महावीर प्रसाद) और दो महिलाएं मेरे पास में ही बैठती थीं। मेरी धर्मचर्चा सुनती थीं और मेरे इस वय के वैराग्य की सदा सराहना किया करती थीं। वे कहा करती थीं- ‘‘यदि मैं कुंवारी होती, गृहस्थी के बंधन में न होती तो सचमुच में घर छोड़कर महाराज जी के साथ हो जाती......, दीक्षा ले लेती।’’ तब मैं सोचती-‘‘मैं तो अभी किसी के बन्धन में नहीं हूँ, अतः पूर्ण स्वतंत्र हूँ। माँ-बाप तो मोह से व लोक लाज से दुखी हैं। फिर भी माँ तो बहुत ही समझदार हैं अतः अपने को पूर्ण दृढ़ रहना है, चाहे जो भी हो जाये वापस घर नहीं जाना है। आचार्य महाराज इन चारों महिलाओं को विनोद में लौकांतिकदेव कहकर पुकारा करते थे....। ऐसे ही भाद्रपद व्यतीत हो गया और आसोज भी पूरा होने को आ रहा था।