ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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008.संस्कृत साहित्य के विकास मेंगणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का योगदान

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संस्कृत साहित्य के विकास मेंगणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का योगदान

-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती
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संस्कृत भाषा का उद्गम दिव्यध्वनि से हुआ है-जैनधर्म के अनुसार तीर्थंकर महापुरुषों की दिव्यध्वनि सात सौ अठारह भाषाओं में परिणत हुई मानी गई है अर्थात् केवलज्ञान के प्रगट होने पर तीर्थंकर की दिव्यध्वनि तो ॐकारमय खिरती है किन्तु सुनने वाले भव्यात्माओं के कानों में जाकर वह उन सबकी भाषा में परिवर्तित होकर सात सौ अठारह भेदरूप हो जाती है। इनमें से अठारह महाभाषाएँ मानी गई हैं और सात सौ लघु भाषाएँ हैं। उन महाभाषाओं के अन्तर्गत ही संस्कृत और प्राकृत को सर्व प्राचीन एवं प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकृत किया जाता है।

संस्कृत जहाँ एक परिष्कृत, लालित्यपूर्ण भाषा है वहीं उसे साहित्यकारों ने ‘देवनागरी’ भाषा कहकर सम्मान प्रदान किया है। समय-समय पर अनेक साहित्यकारों ने संस्कृत भाषा में गद्य साहित्य, पद्य साहित्य एवं गद्य-पद्य मिश्रित चम्पू साहित्य लिखकर प्राचीन महापुरुषों और सतियों के चारित्र से लोगों को परिचित कराया है।

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साहित्य रचना की पृष्ठभूमि-

इसी शृँखला में बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध काल एक नई क्रांति के साथ प्रारंभ होकर अनेक साहित्यिक उपलब्धियों के साथ समापन की ओर अग्रसर है। जैन समाज सदैव उत्कृष्ट त्याग, ज्ञान और वैराग्य में प्रसिद्ध रहा है। यहाँ उच्च कोटि के मनीषी लेखक के रूप में आचार्यश्री गुणधर, कुन्दकुन्द, धरसेन, पुष्पदन्त, भूतबलि, उमास्वामी, समंतभद्र, यतिवृषभ, पूज्यपाद, अकलंकदेव, वीरसेन, जिनसेन, गुणभद्र स्वामी आदि दिगम्बराचार्यों ने सिद्धान्त, न्याय, अध्यात्म, व्याकरण, पुराण आदि ग्रंथ प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखकर जिज्ञासुओं को प्रदान किया है किन्तु न जाने क्या कारण रहा कि अनेक विदुषी गणिनी आर्यिका पद को प्राप्त करने के बाद भी दिगम्बर जैन साध्वियों के द्वारा लिखित कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता है। लगभग ढाई सहस्राब्दियों का इतिहास तो इस बात का साक्षी है ही कि साध्वियों ने ग्रंथों का लेखन नहीं किया है। अन्यथा देश के किसी न किसी संग्रहालय या पुस्तकालय में उनके कुछ अवशेष तो अवश्य प्राप्त होते।

मूलाचार आदि चरणानुयोग ग्रंथों में जैन आर्यिकाओं की समस्त चर्या जैन मुनियों के समान ही वर्णित है अत: उन्हें सैद्धान्तिक सूत्र ग्रंथों को भी पढ़ने का अधिकार प्रदान किया है। महापुराण ग्रंथ में आचार्य श्री जिनसेन स्वामी ने भगवान ऋषभदेव के समवसरण की एक आर्यिका सुलोचना माता के लिए बताया है कि वे ग्यारह अंगरूप श्रुत में पारंगत थीं। यथा-‘एकादशांगभृज्जाता सार्यिकापि सुलोचना’ जैन शासन में तीर्थंकर भगवन्तों की दिव्यध्वनि ग्यारह अंग-चौदह पूर्व रूप मानी गई है।

यह सारा ज्ञान भगवान महावीर तक तो अविच्छिन्न रूप से रहा है, पुन: क्रम परम्परा से ईसा पूर्व लगभग द्वितीय शताब्दी में इसका कुछ अंश श्री गुणधर आचार्य को प्राप्त हुआ और उसके पश्चात् अंग-पूर्वों का अंशात्मक ज्ञान ही अन्य संतों को मिला जो उनके निबद्ध वर्तमान श्रुत में उपलब्ध होता है।

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शताब्दी का उत्तरार्ध नारी प्रगति का रहा-

मैंने ऊपर वर्तमान शताब्दी के उत्तरार्ध का जो उल्लेख किया है उस ओर ही अपने विषय को ले चलती हूँ कि जैन साध्वी की लेखन प्रतिभा में निखार आना सन् १९५४ से प्रारंभ हुआ और इसका प्रथम श्रेय प्राप्त किया शताब्दी की प्रथम बाल ब्रह्मचारिणी गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने। ईसवी सन् १९३४ में २२ अक्टूबर को वि.सं. १९९१ की आश्विन शुक्ला पूर्णिमा (शरदपूर्णिमा) के शुभ दिन रात्रि में ९ बजकर १५ मिनट पर उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिले में ‘टिकैतनगर’ कस्बे में श्रेष्ठी श्री धनकुमार जैन के सुपुत्र श्री छोटेलाल जी की धर्मपत्नी श्रीमती मोहिनी देवी ने प्रथम कन्यारत्न को जन्म दिया था। वही कन्या आगे चलकर शास्त्रीय इतिहास को साकार करने में महात्मा गांधी के समान प्रथम आत्मस्वतंत्रता सेनानी के रूप में प्रसिद्ध हो गई और तब सन् १९५२ में वि.सं. २००९ को शरदपूर्णिमा के दिन से ही नया स्वर्णिम इतिहास शुरू हुआ अर्थात् ३ अक्टूबर १९५२ में इस कन्या ‘मैना’ ने आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज से सप्तम प्रतिमा व आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर घर का त्याग कर दिया।

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क्षुल्लिका दीक्षा-

परिवार के तीव्र मोह तथा सामाजिक संघर्षों पर विजय प्राप्त करके ब्रह्मचारिणी मैना यद्यपि उसी दिन से एक उत्कृष्ट साध्वी के समान चर्या पालने लगी थी तथापि उनके दीक्षित जीवन का प्रारंभ हुआ मार्च सन् १९५३ में, जब वि.सं. २००९ की चैत्र कृष्णा एकम तिथि, रविवार को श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र पर आचार्य श्री देशभूषण महाराज ने इन्हें क्षुल्लिका दीक्षा देकर ‘वीरमती’ नाम प्रदान किया था। पूर्वजन्म के संस्कारवश इन्हें प्रारंभ से जहाँ ज्ञानार्जन की तीव्र पिपासा थी, वहीं संस्कृत ज्ञान प्राप्ति की अपूर्व अभिलाषा थी।

सन् १९५४ में ये एक क्षुल्लिका श्री विशालमती माताजी के साथ दक्षिण भारत गर्इं। वहाँ चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज से उद्बोधन प्राप्तकर पुन: गुरु के पास आकर सन् १९५४ का चातुर्मास जयपुर में किया। गुरु की कृपा प्रसाद से इन्होंने वहाँ पर मात्र दो माह में ‘कातंत्ररूपमाला’ नाम की जैन संस्कृत व्याकरण पढ़ी और वही इनके जीवन में साहित्य सृजन का मूल आधार बन गई। उसके बाद आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की सल्लेखना देखने के उद्देश्य से ये पुन: उन्हीं क्षुल्लिका जी के साथ दक्षिण प्रान्त में गर्इं और सन् १९५५ का चातुर्मास ‘म्हसवड़’ नामक शहर में किया। बस, यही चातुर्मास उनके संस्कृत ज्ञान के प्रयोगात्मक काल का प्रारंभीकरण था, जब उन्होंने आचार्यश्री जिनसेन स्वामी द्वारा रचित ‘सहस्रनाम स्तोत्र’ के आधार से भगवान के एक हजार आठ नाम निकालकर नम: के साथ उनमें चतुर्थी विभक्ति लगा लगाकर भगवान को नमस्कार करते हुए पूरे एक हजार आठ ‘सहस्रनाम मंत्र’’ बना दिये। उन मंत्रों को देखकर क्षुल्लिका विशालमती जी बड़ी प्रसन्न हुर्इं और उसी चातुर्मास में उन्होंने इन मंत्रों की एक छोटी सी पुस्तक छपवा दी। प्रभु के श्रीचरणों में अपने ज्ञान का समर्पण इनके जीवन का वरदान बन गया, फिर तो दिन-दूनी रात-चौगुनी वृद्धि के साथ इनके संस्कृत ज्ञान का विकास होने लगा।

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आर्यिका दीक्षा-

इसके पश्चात् इन्होंने २७ अप्रैल १९५६ विक्रम संवत् २०१२ में वैशाख कृष्णा द्वितीया के दिन राजस्थान के माधोराजपुरा (अतिशय क्षेत्र पद्मपुरा के निकट) ग्राम में आचार्यश्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टशिष्य आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के करकमलों से आर्यिका दीक्षा धारण कर ‘ज्ञानमती’ नाम प्राप्त किया। नाम के साथ-साथ गुरुदेव के द्वारा एक लघु सम्बोधन मिला कि ‘ज्ञानमती! तुम अपने नाम का सदैव ध्यान रखना।’

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गुरुभक्ति से लेखनी का प्रारंभीकरण-

ऐसा लगता है कि गुरु का वह आशीर्वाद एवं सम्बोधन ही इनके जीवन में ज्ञान का भंडार भरने में अतिशयकारी संबल बन गया और अपनी लघुवय में ही इन्होंने पहले अपनी शिष्याओं को व्याकरण, सिद्धान्त, न्याय आदि ग्रंथ पढ़ा-पढ़ाकर अपने ज्ञान को परिमार्जित किया पुन: उस ज्ञान को जब प्रयोगात्मकरूप में प्रस्तुत किया तो इनकी कृतियाँ पढ़-पढ़कर उच्चकोटि के विद्वान भी आश्चर्यचकित हो गये।

इनकी प्रथम शिष्या आर्यिका जिनमती माताजी थीं, जिन्हें कु. प्रभावती के रूप में इन्होंने सन् १९५५ में म्हसवड़ (महा.) से निकालकर ज्ञान के अमृत से समूलचूल अभिसिंचित किया था। उन्हें जब ये संस्कृत भाषा में धारावाहिक बोलना सिखाती थीं तो साक्षात् सरस्वती माता के समान इनकी प्रतिभा प्रतीत होती थी।

इनकी साहित्यिक कृतियों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि इन्होंने अपना प्रथम लक्ष्य बनाया बैंक के फिक्स डिपॉजिट की तरह ज्ञान का कोठार भरना और उसके बाद समयानुसार उसका उपयोग करना। इसी लक्ष्य के कारण सन् १९५५ से १९६४ तक मात्र अध्ययन और अध्यापन में अपना समय व्यतीत किया पुन: सन् १९६५ से उसका प्रयोगात्मक कार्य साहित्य सृजन के रूप में प्रारंभ हुआ।

इस मध्य आचार्य श्री शिवसागर महाराज के संघ में रहते हुए सन् १९५९ के अजमेर (राज.) के चातुर्मास में आपने अपने दीक्षागुरु पूज्य आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज की एक स्तुति ‘‘उपजाति’’ छंद में (१० श्लोकों में) बनाई। जिसमें व्याकरण, छंद, अलंकार और कोष के पूर्ण उपयोग के साथ आचार्यश्री की कुछ विशेषताओं का भी दिग्दर्शन है। जैसे पाँचवे श्लोक में वे कहती हैं-

स्वाध्यायध्यानादिक्रियासु सक्त:, संसारभोगेषु विरक्तचित्त:।

बाह्यान्तरंगं तप आचरन्यो, दु:खाभिभूतो न हि बाह्यक्लेशात्।।५।।

इस छंद के माध्यम से शिष्या को अपने गुरुदेव की शारीरिक दु:ख की सहनशीलता की कहानी याद आती प्रतीत होती है। कहते हैं कि आचार्य वीरसागर महाराज की पीठ में एक बार बहुत बड़ा ‘अदीठ का फोड़ा’ हुआ था। उसका डॉक्टर ने बिना बेहोश किये आपरेशन किया किन्तु आचार्यश्री ज्ञान-ध्यान में इतना तन्मय हो गये कि असहनीय दर्द को भी अपने तत्त्वचिंतन के द्वारा सहन कर लिया था। इसीलिए उनकी स्तृति के उपर्युक्त शब्द बिल्कुल सार्थक प्रतीत होते हैं कि वे आचार्यदेव स्वाध्याय, ध्यान आदि क्रियाओं में पूर्ण अनुरक्त थे और सांसारिक विषयभोगों से पूर्ण विरक्त-वैरागी थे तथा बाह्य-आभ्यंतर तपस्या में लीन रहते हुए वे बाह्यक्लेशों और दु:खों से कभी दु:खी नहीं होते थे।

ऐसे वीतरागी गुरु की शिष्या वास्तव में खुद को गौरवशाली अनुभव करती हैं और उसी पथ की अनुगामिनी बनती हुई ज्ञानमती माताजी की चारित्रिक दृढ़ता भी सचमुच में अनुकरणीय है। सन् १९६४ तथा १९८५-८६ में उनकी रूग्णावस्था की कट्टरता उनकी ही ऐतिहासिक कृति ‘‘मेरी स्मृतियाँ’’३ में दृष्टव्य है।

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आलंकारिक सौन्दर्य भरा है स्तुतियों में-

सन् १९६३ में आपने आर्यिका ज्ञानमती माताजी के रूप में अपने आर्यिका संघ के साथ सम्मेदशिखर यात्रा के लिए आचार्यश्री शिवसागरजी के संघ से पृथक् विहार किया पुन: कलकत्ता और हैदराबाद चातुर्मास करके सन् १९६५ में कर्नाटक प्रान्त के श्रवणबेलगोला तीर्थ पर पहुँची। संघ में उस समय आपके अतिरिक्त आर्यिका जिनमती जी, आर्यिका आदिमती जी, आर्यिका पद्मावती जी, क्षुल्लिका श्रेयांसमती जी और क्षुल्लिका अभयमती जी थीं। इनमें से कुछ माताओं की अस्वस्थता के कारण आपका श्रवणबेलगोला में एक वर्ष तक (चातुर्मास सहित) प्रवास रहा अत: भगवान बाहुबली के चरण सानिध्य में ध्यान करने का अपूर्व अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ ध्यान में तेरहद्वीप रचना एवं जम्बूद्वीप की उपलब्धि के साथ-साथ आपकी काव्यप्रतिभा भी विशेष रूप से ऐसी प्रस्फुटित हुई कि वह अविरल प्रवाहरूप से चलती आ रही है। वहाँ सर्वप्रथम ‘श्री बाहुबलिस्तोत्रम्’ नाम से भगवान बाहुबली की स्तुति बसन्ततिलका के इक्यावन (५१) छंदों में रची जिसमें अलंकारों की बहुलता ने रत्नजटित आभूषणों से सुसज्जित सुन्दर कन्या की भाँति लालित्य प्रकट किया है। इस स्तोत्र का शुभारंभ आपने इस प्रकार किया है-

सिद्धिप्रदं मुनिगणेन्द्रशतेन्द्रवंद्यं। कल्पद्रुमं शुभकरं धृतिकीर्तिसद्म।।

पापापहं भवभृतां भववार्धिपोत-मानम्य पादयुगलं पुरुदेवसूनो:।।१।।

स्तोत्र रचयित्री का यह अपना मत है कि कार्य के प्रारंभ में सिद्ध या सिद्धि शब्द के प्रयोग से वह सिद्धिप्रदायक तथा निर्विघ्न कार्यपूर्णता का परिचायक होता है। इसीलिए उनकी संस्कृत और हिन्दी की लगभग समस्त साहित्यिक कृतियों में सिद्ध शब्द से ही रचना की शुरुआत हुई है।६ इस बाहुबलि स्तोत्र में बाहुबलि भगवान के गुणवर्णन के साथ-साथ उनके शरीर का वर्ण, ऊँचाई, सुन्दरता तथा उनकी ध्यानस्थ अवस्था का बड़ा सुन्दर वर्णन है। श्रवणबेलगोला में विराजमान अतिशयकारी ५७ फुट उत्तुंग बाहुबली प्रतिमा के समक्ष बैठकर ही यह स्तोत्र लिखा गया है। इसीलिए उनकी छवि भी इसमें वर्णित है-

मूर्ति: प्रभो! निरूपमा सुयशोलताभिर्युक्ता,सुबाहुबलिनो जिनपस्य तेऽत्र।

तिष्ठेच्चिरं जयतु जैनमतश्च नित्यं, चामुंडराजसितकीर्तिलतापि तन्यात्।।५०।।

इसी के हिन्दी पद्यानुवाद में लेखिका संस्कृत का भाव प्रगट करती हैं कि-

प्रभो! आपकी मूर्ति अनुपम सुयशलताओं से वेष्टित।

हे बाहुबलि! हे जिनपति! तव मूर्ती तुंग सतावन फुट।।
तिष्ठे भूपर चिर कालावधि जैनधर्म जयशील रहे।
चामुंडराय की उज्ज्वल कीर्तिबेली भी विस्तार लहे।।

सन् १९६५ के इसी प्रवास काल में माताजी ने वहाँ मालिनी छंद के ८ श्लोकों में श्रीजम्बूस्वामी की संस्कृतस्तुति लिखी है जो इस युग के अंतिम केवली बनकर मथुरा चौरासी से मोक्ष गये हैं। उन जम्बूस्वामी की रोमांचक कथा शास्त्रों में बहुप्रचलित है कि वे चार सुंदरी कन्याओं के साथ विवाह करके प्रथम सुहागरात में भी कामभोग में लिप्त न होकर अखंड ब्रह्मचर्य में दृढ़ रहे और प्रात: जाकर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। उनकी महिमा स्तुति के प्रथम छंद में ही निहित है-

विहित-विमल-सम्यक्खड्गधाराव्रत: प्राक्। भव इह न हि कांतासक्तचेता निकाम:।।

इह भरतधरायामंतिम: केवली तम्। त्रिभुननुतजम्बूस्वामिनं स्तौमि भक् त्या।।१।।

अर्थात् जम्बूस्वामी के पूर्वभव के कथानक का भी इसमें संकेत है कि पहले भव में भी आपने असिधाराव्रत का पालन किया था इसीलिए इस भव में भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर आप इस भरत क्षेत्र के अंतिम अनुबद्ध केवली प्रसिद्ध हुए हैं।

इसी प्रकार श्रीमहावीर स्तुति, चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की, आचार्य श्री शिवसागर महाराज की और युग की प्रथम गणिनी आर्यिका ब्राह्मी माता की स्तुतियाँ भी क्रमश: सांगत्यराग भुजंगप्रयातं छंद, बसंततिलका एवं अनुष्टुप् छंद में ४१ श्लोकों में रची है जो उन-उन के गुणों का परिचायक हैं तथा ज्ञानमती माताजी की संस्कृत साहित्य के प्रति अविस्मरणीय देन है।

स्तोत्र साहित्य की श्रृंखला में सन् १९६५ में आर्यिकाजी ने उपर्युक्त ६ स्तोत्रों में एक सौ ग्यारह (१११) श्लोकों की रचना करके मानों १०८ कर्मास्रव रोकने एवं रत्नत्रय की पूर्ण प्राप्ति का ही निवेदन भगवान् बाहुबली से किया है। इनके अतिरिक्त वहाँ बाहुबली का हिन्दी पद्यात्मक चारित्र भी १११ पद्यों में लिखा जो स्टूडियो से रिकार्डिंग होकर आकाशवाणी से प्रसारित भी हो चुका है।

कर्र्नाटक में जाते ही आपने कुछ पुस्तकों के माध्यम से वहाँ की प्रादेशिक कन्नड़ भाषा सीख ली और तुरंत बाहुबली भगवान की तथा अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु की स्तुति कन्नड़ में बनाई और एक कन्नड़ की सुंदर बारहभावना लिखी जो उधर अत्यधिक प्रचलित हुई है। उससे पूर्व उधर कन्नड़ की बारहभावना शायद कोई थी ही नहीं, इसीलिए यह बारहभावना सबके आकर्षण का केन्द्र बन गई। ऐसी कुछ फुटकर रचनाऐं और भी हुई किन्तु वे पुरानी कापियों में ही छिपकर रह गर्इं, प्रकाशित न हो पाने से अब उनकी उपलब्धि ही नहीं है, केवल पूज्य माताजी से मैंने सुना ही है।

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जन्म दिन की सार्थकता संस्कृत साहित्य रचना से-

संसार के सामान्य प्राणियों की भांति जन्म लेना और आयु के क्षणों को व्यतीत कर प्रयाण कर जाना कोई विशेष बात नहीं है। पूज्य ज्ञानमती माताजी उन सामान्य आत्माओं में से न होकर प्रारंभ से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी हैं, तभी तो ७-८ वर्ष की उम्र में ही सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध आंदोलन कर अपने माता-पिता को ही उनसे दूर नहीं किया प्रत्युत गाँव में जिनेन्द्र भक्ति का शंखनाद कर दिया। उसका प्रभाव आज भी टिकैतनगर तथा आस-पास के गाँवों में दृष्टिगत होता है।

दूसरी बात प्राचीन बालसतियों के कथानक पढ़कर उसे अपने ही जीवन में साकार करना इनके ही बस की बात थी अन्यथा इस भौतिकवादी युग में ऐसे कठोर त्याग की बातें सुनना भी सुकुमारिकाएँ पसंद नहीं करती हैं। सन् १९५२ से निरंतर गर्मी, सर्दी, बरसात आदि सहन करते हुए मात्र एक श्वेत साड़ी में रहना, जीवन भर नंगे पैर चलना, चौबीस घंटे में एक बार रुखा-सूखा भोजन करपात्र में लेना, प्रत्येक ३ से ४ माह के भीतर सिर के केशों को उखाड़ कर केशलोंच करना, चटाई पाटे अथवा घास में सो कर शीत परीषह सहना आदि दिगम्बर जैन साध्वी की चर्या का उत्कृष्टता के साथ पालन करना एक कुमारी कन्या की दृढ़ इच्छाशक्ति का ही प्रतीक है।

इन्होंने शरदपूर्णिमा के दिन शारीरिक जन्म को ही धारण नहीं किया बल्कि सन् १९५२ में जब गृहत्याग कर ब्रह्मचर्य दीक्षा ग्रहण की तब उस दिन भी शरदपूर्णिमा ही थी और माँ मोहिनी ने उस समय कहा था बेटी! आज तूने जीवन के १८ वर्ष पूर्ण कर १९ वें वर्ष में प्रवेश करते समय जो यह ‘‘भीष्मप्रतिज्ञा’’ स्वीकार की है उसके लिए मेरी शुभकामनाऐं सदैव तेरे साथ हैं। इस प्रकार शरदपूर्णिमा तिथि इनकी संयम जयंती बन गई और ज्ञान की चाँदनी से आलोकित होकर ये जन-जन को ज्ञान वितरित करने वाली महासती ब्राह्मी माता के समान प्रसिद्धि को प्राप्त हो गर्इं। अपने जन्मदिवस पर कभी कोई ख्याति, पूजा की इच्छा न रखते हुए भगवान् जिनेन्द्र के श्रीचरणों में कोई न कोई अपना भक्ति साहित्य का पुष्प समर्पित करने लगीं। यह मौन झलक इनके द्वारा रचित स्तोत्रों की श्लोकगणना में मिलती है, जैसे सन् १९६६ के सोलापुर चातुर्मास में इन्होंने शरदपूर्णिमा के दिन जन्म के ३२ वर्ष पूर्ण कर ३३ वें वर्ष में प्रवेश किया था अत: वहाँ उस दिन एक ‘‘चन्द्रप्रभस्तुति’’ के ३२ छन्द भुजंगप्रयात, शिखरिणी, पृथ्वी, दु्रतविलम्बित छंद में बनाकर ३३ वें ‘‘शार्दूलविक्रीडित छंद’’ में भाव व्यक्त किये हैं—

मुक्ति श्रीललनापति: शुभशरत्पूर्णैकचंद्रो जिन:।

मोहैकाहिविष प्रभूच्र्छितजनान् पुष्यन्सुधावर्षणै:।।
श्रीचन्द्रप्रभ एष चेत्खलु, मया स्तूयेत भक्त्या मयि।
पूर्णज्ञानमतीव तर्हि परमानंदात्मकं प्रस्फुरेत्।।३३।।

अर्थात् शरदऋतु के पूर्ण चंद्रमा के समान गुणों से परिपूर्ण हे चंद्रप्रभु भगवान्! मुझमें भी पूर्णज्ञान का विकास कीजिए। इस स्तुति में रचयित्री की ३२ वर्ष पूर्व की रोमांचक गाथा छिपी है उसे प्रसंगोपात्त यहाँ स्पष्ट करना उचित ही होगा— सन् १९५२ में आचार्य श्री देशभूषण महाराज का चतुर्मास बाराबंकी शहर में हो रहा था। वहाँ सरावगी मोहल्ले में एक दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर है जहाँ एक वेदी में भगवान् चंद्रप्रभु की लगभग ढाई फुट की श्वेतपाषाण की पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। पूज्य ज्ञानमती माताजी के ऊपर कु. मैना की अवस्था में जब ब्रह्मचर्य व्रत लेते समय समाज और परिवार के घोर विरोध आए तो ये भगवान के मंदिर में जाकर चंद्रप्रभ भगवान की शरण में चतुराहार त्याग करके बैठ गर्इं और कहने लगीं कि हे प्रभो! मेरे गृहत्याग करने के मनोरथ सिद्धि तक अन्नजल का त्याग है तथा अब घर जाकर विवाह बंधन में फंसना मुझे कदापि स्वीकार नहीं है।

सदी की यह प्रथम घटना होने के कारण ही शायद इन्हें विरोध का सामना करना पड़ा था जब जनता का वातावरण देखकर आचार्यश्री ने भी कह दिया था कि इस लड़की को उठाकर घर ले जाओ, मैं इसे व्रत नहीं दूँगा।

ज्ञानमती माताजी बताती हैं कि उस समय मेरे दिल पर बहुत चोट पहुँची कि अब तो गुरु का सहारा भी छूट गया है फिर भी भगवान् चंद्रप्रभु के भरोसे अपनी नैया डाल दी और मुझे लगा कि ये भगवान मुझे मेरी रक्षा करने का आश्वासन दे रहे हैं पुन: वास्तव में ऐसा चमत्कार हुआ कि राग पर वैराग्य की विजय हुई। मेरी आराधना की शक्ति से माँ के भावों में परिवर्तन आया और मेरे द्वारा रात भर उन्हें समझाए जाने पर उन्होंने रोते हुए एक कागज पर अपनी स्वीकृति लिखकर दे दी, जिससे मुझे अगले दिन शरदपूर्णिमा को आचार्यश्री ने ब्रह्मचर्य व्रत एवं गृहत्याग व्रत प्रदान कर दिया।

भारत को आजादी दिलाने में सहयोगी वीरपुरुषों की भाँति इनका त्याग सचमुच में वर्तमान की कुमारी बालसती कन्याओं के लिए अनुकरणीय है कि इनके बनाये मार्ग पर आज हम चलने के लिए स्वतंत्र हो सके हैं।

अपने ३३ वें जन्मदिन पर पूज्य श्री द्वारा रचित यह चंद्रप्रभस्तुति वास्तव में बनारस की घटना वाली समन्तभद्रस्वामी की चमत्कारिक स्तुति का ही स्मरण कराती है।

इसी चतुर्मास में इन्होंने आर्याछंद के ६३ श्लोकों में एक ‘‘त्रैलोक्य चैत्यवंदना’’१२ बनाई जिसमें तीनों लोकों के आठ करोड़ छप्पन लाख सत्तानवे हजार चार सौ इक्यासी आकृत्रिम जिन चैत्यालयों में विराजमान नव सौ पचीस करोड़, त्रेपन लाख, सत्ताइस हजार, नव सौ अड़तालीस जिन प्रतिमाओं की वंदना करते हुए मोक्ष के शाश्वतसुख की अभिलाषा व्यक्त की है।

पुन: इसी सन् १९६६ में इन्होंने ८४ श्लोकों के द्वारा ‘‘श्रीसम्मेदशिखरवंदना’’१३ लिखी है। उसमें प्रत्येक कूट से मोक्ष जाने वाले तीर्थंकर एवं मुनियों की गणना देकर सबको सोलापुर में ही बैठकर भावों से नमन किया है। स्तुति के अंतिम छंदों में कैलाशपर्वत, चम्पापुर, गिरनार, पावापुर आदि अन्य निर्वाणभूमियों की भी वंदना की है।

उपर्युक्त तीनों स्तुतियों का हिन्दी पद्यानुवाद भी माताजी ने स्वयं करके जनसामान्य को उनके रसास्वादन का अवसर प्रदान कर दिया है। इस प्रकार संस्कृत साहित्य के विकास में इन्होंने सन् १९६६ में १८० श्लोक तीन संस्कृत स्तुतियों के माध्यम से प्रदान किये और कुछ फुटकर हिन्दी रचनाओं के साथ सदैव संघ का अध्यापन कार्य चलता रहा जो इनके अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग का प्रतीक है।

सोलापुर के ‘‘श्राविकाश्रम’’ में किये गये इस चातुर्मास की स्मृति वहाँ आज भी नजर आती है कि वहाँ की संचालिका ब्र.सुमतिबाई जी एवं ब्र.कु. विद्युल्लता जैन शहा के आदेशानुसार वहाँ की सैकड़ों बालिकाएँ पूज्य ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित ‘‘उषा वंदना’’१४ सामूहिक रूप से पढ़ती हैं। माताजी बताती हैं कि मेरे प्रवास काल में ही वहाँ यह उषा वंदना खूब अच्छी तरह से पढ़ी जाती थी और पण्डिता सुमतिबाई जी मेरे ज्ञान का क्षयोपशम देखकर अतीव प्रसन्न होती थीं तथा मेरे द्वारा चलाई गयी लब्धिसार एवं समयसार आदि की शिक्षण कक्षा में भी वे भाग लेती थीं। उपर्युक्त स्तुतियों पर यदि विद्वानों द्वारा संस्कृत-हिन्दी टीकाओं का लेखन किया जाय तो कालिदास के रघुवंश आदि काव्यों की भाँति इनकी लोकप्रियता में निश्चित रूप से वृद्धि हो सकती है।

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३४ श्लोकों की शांतिजिनस्तुति-

दक्षिण भारत से विहार करके ज्ञानमती माताजी राजस्थान में आचार्यश्री शिवसागर महाराज के संघ में आ रही थीं उसके मध्य इंदौर शहर के निकट ‘‘सनावद’’ नामक नगर में सन् १९६७ के चातुर्मास का योग आ गया। वहाँ अपने जीवन के ३४ वें वर्ष में प्रवेश पर इन्होंने पृथ्वीछंद के ३४ श्लोकों में शांतिनाथ भगवान की एक स्तुति१५ रचकर शरदपूर्णिमा के दिन प्रभु चरणों में समर्पित की। अनेक रस और अलंकारों से समन्वित इस स्तुति का बीसवां छंद दृष्टव्य है—

सुभक्तिवरयंत्रत: स्फुटरवा ध्वनिक्षेपकात्।

सुदूर-जिन-पाश्र्वगा भगवत: स्पृशंति क्षणात्।।
पुन: पतनशीलतोऽवपतिता नु ते स्पर्शनात्।
भवन्त्यभिमतार्थदा: स्तुतिफलं ततश्चाप्यते।।२०।।

अर्थात् हे भगवन्! आपकी श्रेष्ठ भक्ति ही ध्वनिविक्षेपण (रेडियो आदि) यंत्र है उससे प्रगट हुई शब्द वर्गणाएँ बहुत ही दूर तक सिद्धालय में आपके पास आती हैं और वहाँ आपका स्पर्श करती हैं। पुन: पुद्गलमयी शब्द वर्गणाएँ पतनशील होने से यहाँ आकर भव्यजीवों के मनोरथ को सिद्ध कर देती हैं अतएव इस लोक में स्तुति का फल पाया जाता है अन्यथा नहीं पाया जा सकता था।

इसमें उपमा अलंकार का प्रयोग करते हुए लेखिका ने जिनेन्द्रभक्ति को वायरलेस की तरह बतलाया है कि भक्तों की स्तुति के शब्द सिद्धशिला का स्पर्श करने के कारण कार्यसिद्धिकारक बन जाते हैं इसीलिए सच्चे मन से स्तुति करने वाले भक्त श्रीमानतुंगाचार्य, श्रीवादिराजमुनिराज, धनंजयकवि आदि के मनोरथ तुरंत सिद्ध होने के उदाहरण स्पष्ट हैं।

संस्कृत की इस मूलरचना के साथ ही इस चातुर्मास में माताजी ने ‘‘पात्रकेसरी स्तोत्र’’१६ का हिन्दी पद्यानुवाद एवं ‘‘आलापपद्धति’’१७ नामक पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी किया जो पुस्तक रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं।

इसी प्रकार सन् १९६८ के प्रतापगढ़ (राज.) के चातुर्मास में ३५ श्लोकों में ‘‘पंचमेरुस्तुति’’१८ की रचना हुई जो वर्तमान में ‘‘पंचमेरुभक्ति:’’ नाम से जिनस्तोत्रसंग्रह१९ में प्रकाशित है। पूज्य माताजी ने इस स्तुति के अंत में प्राकृत की अंचलिका जोड़कर आचार्य श्रीकुन्दकुन्द एवं पूज्यपादस्वामी द्वारा रचित दशभक्तियों के समान यह नई भक्ति बना दी है जिसे अनेक साधु-साध्वी पंचमेरु व्रतादि में पढ़ करके अतिशय प्रसन्न होते हैं। सन् १९६९ के जयपुर चातुर्मास में इन्होेंने ३६ श्लोकों में ‘‘वीरजिनस्तुति’’२० बनाई और उस समय आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज के पट्ट पर आसीन तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की दो स्तुतियाँ संस्कृत में लिखीं । इनमें से एक में ‘‘वसन्ततिलका’’ छंद के ८ श्लोक हैं और दूसरी, उपजाति के १२ छंदों में निबद्ध है।

पूज्य गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने सन् १९५७ से लेकर सन् १९७१ तक और उसके बाद समय-समय पर अनेक मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिकाओं को अपने विशिष्ट ज्ञान के आधार पर संस्कृत व्याकरण, न्याय, छंद, अलंकार, सिद्धांत आदि का अध्ययन कराया। जिसे देख-देखकर आचार्यश्री वीरसागर महाराज, आचार्य श्री शिवसागर महाराज एवं आचार्य श्री धर्मसागर महाराज अतीव प्रसन्न होते थे।

जयपुर चातुर्मास में मैं प्रथम बार पूज्य माताजी के दर्शन करने आई तो देखा कि मेंहदी चौक के मंदिर में एक आर्यिका माताजी सुबह ७ से १० बजे तक और मध्यान्ह ११ बजे से १२ बजे तक अपरान्ह १ बजे से ५ बजे तक अनके साधु-साध्वियों को पढ़ाती रहती थीं। मुझे तब पहली बार ज्ञात हुआ कि ये मेरी सबसे बड़ी बहन और वर्तमान में आर्यिका ज्ञानमती माताजी हैं। उस समय अध्ययन कक्षा में आचार्य श्री के अतिरिक्त मुनि श्री बोधिसागर जी, मुनि श्री निर्मलसागर जी, मुनि श्री बुद्धिसागर जी, मुनि श्री संयम सागर जी, मुनि श्री अभिनंदनसागर जी, मुनि श्री संभवसागर जी, मुनि श्री वर्धमानसागर जी आदि सभी मुनिगण एवं आर्यिका श्री जिनमती जी, आ.अदिमती जी, आ. पद्मावती जी, आ.अभयमती जी, आ. श्रेष्ठमती जी, आ. जयमती जी आदि समस्त आर्यिका माताऐें, एवं ब्रह्मचारी मोतीचंद जी सहित संघ में सभी ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी पूर्ण निष्ठा एवं रूचिपूर्वक भाग लेते थे। इससे पूर्व मुनि श्री श्रुतसागर जी, मुनि अजितसागर जी, मुनि श्री श्रेयांससागर जी, आर्यिका श्रेयांसमती जी, आर्यिका विशुद्धमति जी आदि लगभग समस्त मुनि-आर्यिकाओं ने इनसे कुछ ग्रंथों का अध्ययन किया जिसे उसी कक्षा में बैठने वाले पं. पन्नालालजी सोनी-ब्यावर, पं. श्रीलालजी शास्त्री-श्रीमहावीर जी, पं. खूबचंदजी शास्त्री-इंदौर, पं. इन्द्रलालजी शास्त्री-जयपुर, पं.गुलाबचंदजी दर्शनाचार्य-जयपुर आदि उच्चकोटि के विद्वान देखकर आश्चर्यचकित हो कहते थे कि हमारे महाविद्यालय आदि में तो एक-एक विषय को मात्र ४५-४५ मिनिट पढ़ाने वाले विद्वान अलग-अलग रहते हैं लेकिन ये माताजी अनेक ग्रंथ जैसे-जैनेन्द्रप्रक्रिया (संस्कृत व्याकरण), राजवार्तिक, गद्यचिंतामणि, अष्टसहस्री, गोम्मटसारजीवकांड, कर्मकांड, प्रमेयरत्नमाला, आप्तपरीक्षा आदि क्लिष्टतम ग्रंथों को अकेली पढ़ाती हैं। जबकि उन दिनों ये संग्रहणी रोग से ग्रस्त थीं और आहार में मीठा, नमक, तेल, दही आदि रसों का त्याग करके रूखा-सूखा नि:स्वाद भोजन प्राय: केवल मट्ठा और रोटी ग्रहण करती थीं। इनकी आत्मशक्ति, ब्रह्मचर्य का प्रभाव और पूर्वजन्म के संस्कार ही इस ज्ञान प्रतिभा में निमित्त मानने होंगे इस जन्म में किसी से उपर्युक्त ग्रंथों का अध्ययन किये बिना दूसरों को पढ़ाकर निष्णात कर देना भला किसके लिए शक्य हो सकता है? किन्तु इन्होंने तो केवल पढ़ा-पढ़ाकर ही अपने ज्ञान का परिमार्जन किया है। जैन साहित्य जगत् का इतिहास ऐसी अलौकिक साध्वी के उपकारों को युगों-युगों तक भूल नहीं सकता है। मैंने उपर्युक्त सन् १९६९ की कृतियों में जिस ‘‘वीरजिनस्तुति’’ का उल्लेख किया है, कुछ वर्ष पूर्व मैंने उसकी संस्कृत और हिन्दी टीका लिखकर सम्यग्ज्ञान मासिक पत्रिका के ‘‘चरणानुयोग’’ स्तंभ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित कराई थी जो भविष्य में लघुकाय ग्रंथ के रूप में प्रकाशनाधीन है।

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चातुर्मास की अविस्मरणीय देन—

संस्कृत साहित्य की क्लिष्टता में जैनागम का न्यायग्रंथ ‘‘अष्टसहस्री’’ सबसे कठिन ग्रंथ माना जाता है। जिसे उसके रचयिता श्रीविद्यानंदि आचार्य ने स्वयं ‘‘कष्टसहस्री’’ संज्ञा से संबोधित किया है। ‘‘न्यायतीर्थ’’ उपाधि की परीक्षा देने वाले विद्यार्थी उसे न्यायदर्शन के विद्वानों की सहायता से बड़ी कठिनतापूर्वक पढ़ते थे। पूज्य ज्ञानमती माताजी के शिष्य ब्र.मोतीचंद जी ने भी न्यायतीर्थ परीक्षा का फार्म कलकत्ता से भरा था अत: माताजी उन्हें अष्टसहस्री का अध्ययन कराती थीं तो उनके निमित्त से सभी साधु-साध्वियों को भी उसका ज्ञान प्राप्त होता था।

अध्ययन के उस माध्यम से पूज्य माताजी ने अष्टसहस्री का हिन्दी अनुवाद सन् १९६९ के श्रावणमास से करना शुरू कर दिया और सन् १९७० में टोंक (राज.) के चातुर्मास के पश्चात् पौषशुक्ला द्वादशी को लगभग डेढ़ वर्ष में सारा अनुवाद पूर्ण भी कर दिया। जिसे देखकर न्यायदर्शन के उच्चकोटि के विद्वान दांतों तले अंगुली दबाने लगे और तब से ज्ञानमती माताजी की दिव्यज्ञानप्रतिभा से लोग विशेष परिचित होने लगे।

दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर की ‘‘वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला’’ से यह अष्टसहस्री ग्रंथ तीन भागों में प्रकाशित हो चुका है।२२ इसकी हिन्दी टीका का नाम है—स्याद्वादचिन्तामणि टीका। ग्रंथ की गहनता और उसके अनुवाद की सरलता देखकर मुझे तो यह प्रतीत हुआ कि अपनी स्वतंत्र कृति की रचना में अपने ज्ञान का उपयोग करना तो सरल है किन्तु दूसरों की कृति के कठिनतम रहस्य को समझकर उसका अनुवाद करना अत्यन्त दुरूह कार्य है। यदि यह कार्य कुछ बुद्धिजीवियों के द्वारा संभव न होता तो संभवत: संस्कृत साहित्य के विकास में भीषण रूकावट उत्पन्न हो सकती थी। इस दुरूह कार्य को अपने अथक परिश्रम से ज्ञानमती माताजी ने सरल रूप में उपलब्ध कराकर वास्तव में संस्कृत साहित्य के विस्तारीकरण में अपूर्व योगदान प्रदान किया है। न्यायदर्शन के जिज्ञासुओं को अष्टसहस्री के तीनों भागों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। आचार्य श्री विद्यानंदि देव ने उसमें कहा भी है—

श्रोताव्याष्टसहस्री, श्रुतै: किमन्यै: सहस्रसंख्यानै:।

विज्ञायते ययैव, स्वसमयपरसमयसद्भाव:।।

अर्थात् एक अष्टसहस्री ग्रंथ को ही सुनना चाहिए, अन्य हजारों ग्रंथों को सुनने से क्या लाभ है? क्योंकि उस अष्टसहस्री के स्वाध्याय से स्वसमय और परसमय के सद्भाव की जानकारी प्राप्त होती है।

इस अनुवाद की पूर्णता पर माताजी की असीम प्रसन्नता तो स्वाभाविक ही है। उसी प्रसन्नता के फलस्वरूप इन्होंने अनुष्टुप, मन्दाक्रान्ता, आर्या और उपजाति इन चार छंदों का प्रयोग करते हुए चौबीस श्लोकों में एक ‘‘अष्टसहस्रीवंदना’’ संस्कृत में लिखी, जिसमें ग्रंथ का प्राचीन इतिहास दर्शाया है कि आज से लगभग अट्ठारह सौ वर्ष पूर्व आचार्य श्री समंतभद्रस्वामी ने ११४ कारिकाओं में ‘‘देवगम स्तोत्र’’ अपरनाम ‘‘आप्तमीमांसा’’ की रचना की, उन्हीं कारिकाओं पर आठ हजार श्लोक प्रमाण संस्कृत टीका श्रीविद्यानंदिदेव ने रचकर ग्रंथ का नाम ‘‘अष्टसहस्री’’ रखा है।

इसी शृंखला में अपने वें वर्ष के प्रवेश में सन् १९७० में इन्होंने २४ श्लोकों में एक ‘‘उपसर्गविजयी पार्श्वनाथ स्तुति:’’ तथा एक १३ श्लोकप्रमाण ‘‘श्रीपाश्र्वजिनस्तुति:’’२५ रची है जो निज पर आक्रामक कर्मों के उपसर्ग दूर करने की भावना को दर्शाने वाली हैं।

सन् १९७१ के अजमेर (राज.) चातुर्मास में ‘‘सुप्रभातस्तोत्र’’ (९ श्लोकों में ) ‘मंगल स्तुति’(५ श्लोकों में), ‘जम्बूद्वीपभक्ति’ (२० श्लोकों में ) रची है और सन् १९७२ में राजस्थान से विहार करती हुई पूज्य माताजी अपने आर्यिकासंघ के साथ भारत की राजधानी दिल्ली में आ गई तब इनके संघ में इनकी गृहस्थावस्था की माँ मोहिनी जी ‘‘आर्यिका श्री रत्नमती माताजी’’ के रूप में सम्मिलित थीं क्योंकि सन् १९७१ अजमेर के चातुर्मास में इन्होंने पूज्य ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से मगसिर कृ. को आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज के करकमलों से जब दीक्षा धारण की तो आचार्य श्री ने इनका ‘रत्नमती’ यह सार्थक नाम रखा था। सन् १९७२ से सन् १९९२ तक २० वर्ष के काल में पूज्य ज्ञानमती माताजी का प्रवास मुख्य रूप से दिल्ली, हस्तिनापुर एवं पश्चिमी उत्तरप्रदेश में रहा। जिसमें जम्बूद्वीप रचना निर्माण की प्रेरणा तथा विशाल साहित्य का सृजन इनका प्रमुख लक्ष्य रहा। यहाँ विषयवृद्धि के कारण उनका वर्णन शक्य नहीं है। हस्तिनापुर में निर्मित जम्बूद्वीप रचना स्थल पर पहुँचकर वहाँ की चहुँमुखी गतिविधियों को देखने से ही इनका असली परिचय प्राप्त हो सकता है, जो पूरे देश में ‘‘धरती का स्वर्ग’’ माना जाता है।

संस्कृत साहित्य की रचना के अंतर्गत इन्होंने सन् १९७२ के चातुर्मास में एक ‘चतुर्विंशतिजिनस्तोत्रम्’ नाम से उपजाति छंद के २५ श्लोकों में चौबीस तीर्थंकर भगवन्तों की स्तुति लिखी, अनुष्टुप् के २५ छंदों में एक ‘श्रीतीर्थंकरस्तुति’२९ रची। इसमें संक्षेप में चौबीस जिनवरों की वंदना निहित है। दिल्ली में उस समय उनके क्षुल्लिका दीक्षा अवस्था के गुरु भारतगौरव आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज भी विराजमान थे। लगभग १७ वर्षों के पश्चात् गुरु के दर्शन की खुशी में ही मानो इन्होेंने १० श्लोकों की एक स्तुति गुरुचरणों में समर्पित की थी।

आचार्यश्री ने इनकी अलौकिक प्रतिभा तथा अनेक कृतियों का सृजन देखकर भावविभोर होकर आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा—ज्ञानमती! तुम इस युग की वह महान वीरांगना कन्या हो जिसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर लिखा जाएगा।इसी सन् १९७२ के चातुर्मास में इन्होंने करणानुयोग से संबंधित ग्रंथ ‘‘त्रिलोेकभास्कर’’ लिखा पुन: १९७३ में अनुष्टुप छंद के ४१ श्लोकों में एक ‘‘गणधरवलयस्तुति:’’ बनाई और कातन्त्ररूपमाला’ नाम की संस्कृत जैन व्याकरण, भावसंग्रह, भावत्रिभंगी, आस्रत्रिभंगी नामक संस्कृत ग्रंथों की हिन्दी अनुवाद कर जनसाधारण को उनके अध्ययन का लाभ प्राप्त कराया तथा एक मौलिक ग्रंथ ‘‘न्यायसार’’ लिखा जो न्यायग्रंथों के ज्ञान प्राप्त कराने हेतु कुंजी के समान है। इनके साथ ही आचार्य श्री पूज्यपाद रचित संस्कृत व्याकरण ‘‘जैनेन्द्रप्रक्रिया’’ का हिन्दी अनुवाद भी प्रारंभ किया था जो लगभग आधा होने के बाद अन्य कार्य व्यस्तता से छूट गया था वह अब तक भी अधूरा ही है। इनमें से कातंत्रव्याकरण ग्रंथ प्रकाशन होने के बाद समस्त साधु संघों में उसका खूब अध्ययन/अध्यापन चल रहा है।

पूज्य माताजी ने चूँकि अब तक बालक, युवा, प्रौढ़, वृद्ध, विद्वान, भक्त आदि सभी की रुचि और आवश्यकता को देखते हुए उपन्यास, साहित्य, सिद्धांत, नाटक, पूजा, विधान, अध्यात्म आदि के लगभग दो सौ ग्रंथ लिखे हैं। उन सबकी चर्चा यहाँ न करके मैं उनके द्वारा रचित मात्र संस्कृत साहित्य के विषय में ही प्रकाश डालूँगी जो प्रसंगोपात्त है।

स्तुति साहित्य रचना की शृंखला में सन् १९७४ से १९७७ के मध्य इन्होंने स्रग्धरा छंद में ‘‘श्रीमहावीरस्तवनम्’’ (६ श्लोक), बसंततिलका छंद में ‘‘सुदर्शनमेरुभक्ति’’ (५ श्लोक), अनुष्टुप छंद में ‘‘निरंजनस्तुति’’ (५१ श्लोक), ‘‘कल्याणकल्पतरु स्तोत्रम्’’ (२१२ श्लोक), ‘‘वंदना’’ (९ श्लोक), ‘‘श्री त्रिंशच्चतुर्विंशतिनामस्तवनं’’ (१३० श्लाक) आदि रचनाऐं की हैं।३६ इनमें त्रिंशतचतुर्विंशतिनाम स्तवन में सहस्रनामस्तोत्र की तरह ही १० श्लोकों में प्रथम पीठिका है पुन: अनुष्टुप छंद में निबद्ध दश अधिकार हैं जिनके १-१ अधिकार में एक-एक क्षेत्र संबंधी त्रैकालिक चौबीसी के बहत्तर-बहत्तर तीर्थंकरों के नाम हैं और अंत में आठ (८) श्लोक की अष्टप्रार्थना में पंचकल्याणकों से युक्त तीर्थंकर पद प्राप्ति का उत्कृष्ट भाव प्रकट किया है तथा तीन श्लोकों की प्रशस्ति मेें स्तोत्ररचना का काल वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ तीन (सन् १९७७) का माघ शुक्ला चतुर्दशी तिथि लिखी है जो हस्तिनापुर तीर्थ के प्राचीन मंदिर में लिखी गई कृति है।

इसी चातुर्मास में इन्होंने तीसचौबीसी के सात सौ बीस (७२०) तीर्थंकरों के नाममंत्र भी बनाए जो अलग-अलग तीस पैराग्राफ में हैं। तीसचौबीसी का व्रत करने वालों के लिए उपर्युक्त स्तोत्र और मंत्र बहुत ही उपयोगी रहते हैं। इसी प्रकार पाँच महाविदेहक्षेत्रों में सदैव विद्यमान रहने वाले ‘‘विहरमाण बीस तीर्थंकर’’ के नाम मंत्र भी रचे हैं और हिन्दी में उनकी स्तुति है। ये उपर्युक्त स्तोत्र और मंत्र पुण्य वृद्धि हेतु वास्तव में पठनीय हैं।

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‘‘कल्याणकल्पतरूस्तोत्रम्’’ एक पठनीय छंदशास्त्र है—

मैंने ऊपर जिस कल्याणकल्पतरूस्तोत्र का नामोल्लेख किया है उसकी अपनी कुछ विशेष महिमा है जिससे पाठकों को परिचित कराना आवश्यक है। संस्कृत छंद शास्त्रों में एक अक्षरी छंद से लेकर तीस अक्षरों तक छंदों का वर्णन आता है। पूज्य माताजी हम सभी शिष्य-शिष्याओं को व्याकरण के साथ-साथ छंद का ज्ञान कराने के लिए ‘‘वृत्तरत्नाकर’’ छंदशास्त्र पढ़ाती थीं। पुन: उसी के आधार से सन् १९७५ में उन्होंने इन सभी छंदों का प्रयोग भगवान की स्तुति में करने हेतु एक ‘‘कल्याणकल्पतरूस्तोत्र’’ की मौलिक रचना कर दी। इस स्तोत्र में भगवान ऋषभदेव से लेकर महावीर स्वामी तक चौबीसों तीर्थंकरों की पृथक-पृथक स्तुतियाँ हैं तथा इनमें क्रम से एकाक्षरी से लेकर तीस अक्षरी छंद तक कुल एक सौ चवालीस (१४४) छंदों का प्रयोग करते हुए भगवन्तों की पंचकल्याणक तिथियाँ, उनके शरीर के वर्ण, आयु, कल्याणक स्थल आदि का पूरा इतिहास निहित कर दिया है। प्रत्येक स्तुति में पाँच से दस-बीस तक भी श्लोकों की संख्या है और अन्त में एक ‘चतुर्विंशतितीर्थंकर स्तोत्र’ नाम से समुच्चय स्तोत्र है। इस प्रकार कुल मिलाकर पूरे कल्याणकल्पतरू स्तोत्र में दो सौ बारह (२१२) श्लोक हैं तथा इसमें वर्णिक, मात्रिक, सम, विषम और दण्डक इन पाँच प्रकार के छंदों का प्रयोग है। ‘‘जिनस्तोत्र संग्रह’’३७ पुस्तक में तो यह पूरा स्तोत्र मात्र छंद के नामों सहित प्रकाशित है और ‘‘कल्याणकल्पतरू स्तोत्र’’३८ के नाम से एक अलग पुस्तक भी जम्बूद्वीप से सन् १९९२ में छपी है जिसमें सभी स्तुतियाँ पृष्ठ के बाई ओर हैं और दाहिनी ओर स्तुतियों के अन्वयार्थ तथा अर्थ हिन्दी में प्रकाशित हैं एवं स्तुतियों के नीचे आधे-आधे पृष्ठों में उन-उन, स्तुतियों में प्रयुक्त सभी छंदों के लक्षण दिये गये हैं। स्तुतियों के पश्चात् भी इस पुस्तक में ‘‘छन्दविज्ञान’’ नामक प्रकरण के अंदर छंदों के विशेष लक्षण, उनकी उपयोगिता तथा अर्धसमवर्णछंद, विषमवर्ण छंद, मात्रा छंद आदि के भेद और लक्षणों का वर्णन होने से यह पुस्तक एक साकार उदाहरण सहित एक ‘‘छंदशास्त्र’’ ग्रंथ बन गया है जो छंद ज्ञानपिपासुओं के लिए अत्यंत पठनीय एवं दर्शनीय है। इस पुस्तक के अंत में संस्कृत का एक ‘‘एकाक्षरी कोश’’ भी प्रकाशित है। स्तोत्र के किंचित प्रकरण यहाँ उद्धृत करती हूँ जिससे पाठकों को उसके विषय का आंशिक ज्ञान प्राप्त हो सकेगा। यथा-एकाक्षरी, द्विअक्षरी, त्रिअक्षरी और चतुरक्षरी छंदों में निबद्ध ऋषभजिनस्तुति के कुछ पद्य देखें-

श्री छंद (एकाक्षरी)-ॐ, मां।सोऽव्यात्।।१।। स्त्रीछंद (दो अक्षरी)—जैनी, वाणी। सिद्धिं, दद्यात्।।२।। केसाछंद (तीन अक्षरी)—गणीन्द्र। त्वदंघ्रिं। नमामि, त्रिकालं।।३।। नारी छंद (तीन अक्षरी)—श्री देवो, नाभेय:। वन्देऽहं, तं मूध्र्ना।।४।। कन्या छंद (चार अक्षरी)—पू: साकेता, पूता जाता। त्वत्सूते: सा, सेन्द्रैर्मान्या।।५।। व्रीड़ा छंद (चार अक्षरी)—महासत्यां, मरूदेव्यां। सुतोभूस्त्वं, जगत्पूज्य:।।६।।

उपर्युक्त छंदों के माध्यम से भगवान की दिव्यध्वनि का प्रतीक ‘ॐ’ बीजाक्षर जो परम ब्रह्म परमेष्ठी का वाचक सर्वसम्प्रदाय मान्य मंत्र है। उसे प्राणियों का रक्षक बतलाकर जैन वाणी—जिनेन्द्र भगवान की वाणी को सर्वसिद्धिप्रदायक कहा है तथा ऋषभदेव की जन्म नगरी अयोध्या और उनके माता-पिता का भी नामोल्लेख किया है। इसी प्रकार सत्रह अक्षरी छंद ‘हरिणी’ के द्वारा मुनिसुव्रत भगवान की स्तुति में कहती हैं—

स्वगुणरूचिरै: रत्नै:, रत्नाकरोे व्रतशीलभृत।

समरसभरै: नीरै:, पूर्ण: महानिधिमान् पुमान्।।
त्रिभुवनगुरुर्विष्णु-ब्र्रह्मा शिवो जिनपुंगव:।
विगलितमहामोहो दोषो जिनो मुनिसुव्रत:।।

अर्थात् हे मुनिसुव्रत जिनेन्द्र! आप तीन लोक के गुरु हैं, विष्णु हैं, ब्रह्मा हैं, महादेव हैं और जिनों में श्रेष्ठ जिनेन्द्र देव हैं। आप महामोह से रहित एवं अठारह दोषों से रहित तीर्थंकर भगवान हैं। पुन: स्तोत्र के समापन में समुच्चय स्तुति के अंदर ‘अर्णोदण्डक’’ नामक तीस अक्षरी छंद में माताजी ने पंचबालयतियों की पृथक वंदना की है—

प्रणतसुरपतिस्फुरन्मौलिमालामहारत्न-माणिक्यरश्मिच्छटारंजितांघ्रे! प्रभो।

सुरभितभुवनोदरं त्वत्पदांभोरूहं प्राप्य-भव्या जना: सौख्यपीयूषपानं व्यधु:।।
मुनिपतिनतवासुपूज्य: मल्लिर्जिनो-नेमिपाश्र्वो महावीरदेवश्च पंचेति ये।
परिणयरहिता: कुमाराश्च निष्क्रम्य-दीक्षावधूटीवरा भक्तितस्तान् सदा नौम्यहं।।६।।

इस छंद का सारांश यह है कि वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीरस्वामी ये पाँच तीर्थंकर विवाह न करके कुमार अवस्था में ही दीक्षा लेकर तपश्चर्यारूपी स्त्री के पति हो गये हैं। उन पाँच बालयति तीर्थंकरों को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करती हूँ। इस प्रकार यह कल्याणकल्पतरू स्तोत्र पढ़ने वाले भक्तों के लिए कल्याणकारी होगा और कल्पवृक्ष के समान इच्छित फल को प्रदान करेगा, यही मेरा विश्वास है।

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आराधना नामक आचार शास्त्र का सृजन—

सन् १९७७ (वी.नि.संवत् २५०३) में पूज्य माताजी ने हस्तिनापुर तीर्थ क्षेत्र पर मूलाचार, आचारसार, अनगारधर्मामृत, भगवती आराधना आदि ग्रंथों के आधार से चार सौ चवालीस श्लोक प्रमाण एक ‘आराधना’ नाम से दिगम्बर जैन मुनि-आर्यिका आदि की चर्या बतलाने वाला आचारसंहिता ग्रंथ रचा और उसका हिन्दी अनुवाद भी स्वयं किया जो लगभग १५०, पृष्ठों की पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुका है।

यह ग्रंथ दर्शनाराधना, ज्ञानाराधना, चारित्राराधना, समाचारविधि, नित्यक्रिया, नैमित्तिक क्रियाएँ, तप आराधना और आराधक नाम के आठ अधिकारों में निबद्ध है। इसका शुभारंभ सिद्धानाराध्य.....इत्यादि मंगलाचरण से करके सर्वप्रथम एक श्लोक में आराध्य, आराधक, आराधना और उसका फल बतलाया है—

रत्नत्रयं सदाराध्यं, भव्यस्त्वाराधक: सुधी:।

आराधना ह्युपाय: स्यात्, स्वर्गमोक्षौ च तत्फलम्।।२।।

अर्थ—सत् रत्नत्रय ही आराधना करने योग्य होने से ‘आराध्य’ है। बुद्धिमान भव्य ही आराधना करने वाला होने से ‘आराधक’ है। इसकी प्राप्ति का उपाय ही ‘आराधना’ है और स्वर्ग तथा मोक्ष ही ‘आराधना का फल’ है। वर्तमान में दुनिया भर में अपने को भगवान कहलाने वाले लगभग तीन सौ महानुभाव विद्यमान हैं और साधु शब्द से संबोधित किये जाने वाले तो लाखों होंगे, किन्तु उन सभी में जैन संतों एवं साध्वियों की संख्या अत्यल्प है और उसमें भी दिगम्बर जैन मुनि, आर्यिका और क्षुल्लक-क्षुल्लिका के चतुर्विध संघ के साथ पैदल विहार करने वाले साधु-साध्वी मात्र भारतवर्ष की वसुंधरा पर ही उपलब्ध होते हैं और उनकी संख्या १००० के लगभग है। लगभग सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में सैकड़ों की संख्या यद्यपि नगण्य के बराबर है फिर भी उनकी चर्या अपने आप में विलक्षण और आत्मोन्मुखी मानी गई है।

जैन साधु-साध्वियों की प्रत्येक चर्या एवं क्रिया में मूलरूप से अहिंसा धर्म के पालन की प्रमुखता है जिससे द्रव्यहिंसा और भावहिंसा दोनों से विरक्ति होती है। इस ‘आराधना’ ग्रंथ में उपर्युक्त आठ अधिकारों में से ‘चारित्राराधना’ नामक तृतीय अध्याय में मुनियों के अट्ठाईस मूलगुण बतलाते हुए माताजी ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच महाव्रतों का वर्णन करते हुए ‘महाव्रत’ शब्द की सार्थकता बतलाई है—

तीर्थकृच्चक्रवत्र्यादि महापुरुषसेवितम्।

तस्मान्महाव्रतं ख्यातमित्युक्तं मुनिपुंगवै:।।५५।।

अर्थात् तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदिमहापुरुषों के द्वारा जो सेवित हैं इसलिए ये महाव्रत इस प्रकार से प्रसिद्ध हैं, ऐसा मुनिपुंगवों ने कहा है। इस विषय में श्वेताम्बर जैन परम्परा का मत है कि भगवान ऋषभदेव से लेकर पार्श्वनाथ तक चातुर्याम धर्म का प्रचलन था अर्थात् वे अहिंसा, सत्य, अचौर्य एवं अपरिग्रह ये चार महाव्रत पालते थे और अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी ने इसमें ब्रह्मचर्य को मिलाकर पाँच महाव्रतों का उपदेश दिया है किन्तु दिगम्बर जैनियों की मान्यतानुसार ऐसा नहीं है। बल्कि पाँच महाव्रत तो प्राकृतिक रूप से अनादिकाल से जैन साधु-साध्वी पालन करते आ रहे हैं ऐसा वर्णन चरणानुयोग ग्रंथों में पाया जाता है। श्री गौतमगणधरस्वामी ने भी पाक्षिक प्रतिक्रमण सूत्रों में महाव्रत के विषय में कहा है कि—

‘पढ़मे महव्वदे पाणादिवादादो वेरमणं उवट्ठावण.......

मंडले महत्थे महागुणे महाणुभावे महाजसे महापुरिसाणु-चिण्णे.......।

इसके हिन्दी पद्यानुवाद में पूज्य ज्ञानमती माताजी ने लिखा है

प्रथममहाव्रत में प्राणों के घात से विरती होना है।

यह महाव्रत उपस्थापनामंडल प्रशस्त सुव्रतारोपण है।
महाअर्थ है महानुगुणमय महानुभाव महात्म्य है।
महासुयश महापुरुष तीर्थंकर आदि जनों से अनुष्ठित है।।

अर्थात् तीर्थंकर आदि महापुरुष भी इन महाव्रतों को एक सामायिक चारित्र रूप से धारण करते हैं इसीलिए इन व्रतों को महाव्रत की संज्ञा दी है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँच पापों का पूर्ण रूप से त्याग ही महाव्रत रूप से परिणत हो जाता है तथा इन महाव्रतों का पालन करने वाले दिगम्बर साधु महाव्रती मुनि कहलाते हैं। इस आराधना ग्रंथ के छठे अधिकार में साधुओं के संयम का उपकरण जो मयूरपंख की पिच्छिका होती है, उसके गुणों के बारे में बतलाया है—

स्वेदधूल्योरग्रहणं, मार्दवं सुकुमारता। लघुत्वं चैति पंचैते, पिच्छिकायां गुणा मता:।।

अर्थात् पसीना और धूलि को ग्रहण न करना, मृदुता, सुकुमारता और लघुता ये पाँच गुण पिच्छिका में माने गये हैं। सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की रक्षा हेतु ही यह पिच्छिका समस्त दिगम्बर जैन आम्नाय के साधु-साध्वियों को ग्रहण करना आवश्यक होता है। अर्थात् उनका चिन्ह ही पिच्छिका होती है, उसके बिना ‘साधु’ संज्ञा प्राप्त नहीं होती है क्योंकि श्रीकुन्दकुन्दाचार्य ने भी ‘‘णिप्पिच्छे णत्थि णिव्वाणं’४८ पद से यही भाव प्रगट किया है। इस प्रकार अनेक प्रकरणों से समन्वित यह ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण पठनीय है। इसकी संस्कृत-हिन्दी टीका हो जाने पर निश्चित ही यह एक ‘‘मूलाचार’ ग्रंथ की भाँति साधुओं की संहिता के रूप में प्रचलित हो जाएगा। ग्रंथ पर संस्कृत टीका लिखने की मेरी तीव्र अभिलाषा है, पूज्य माताजी के आशीर्वाद से मुझ में यह शक्ति जागृत हो यही मंगल भावना है।

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नियमसार की स्याद्वादचन्द्रिका टीका अध्यात्मजगत को अमर देन—

आचार्य श्रीकुन्दकुन्दस्वामी का नियमसार ग्रंथ आपकी विशेष अभिरूचि का पात्र प्रतीत होता है क्योंकि सन् १९७७ में नियमसार की मूल गाथाओं का पद्यानुवाद किया एवं श्रीपद्मप्रभमलधारी देवकृत उसकी संस्कृत टीका का भी हिन्दी में अनुवाद किया जो फरवरी सन् १९८५ में प्रकाशित हो चुका है।४९ इतना कार्य होने के बाद भी शायद आपको पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई अत:कुन्दकुन्द के भावों को सरलतापूर्वक जनसाधारण को समझाने के हेतु सन् १९७८ में उन गाथाओं पर संस्कृत टीका लिखने का भाव बनाया और लगभग ६२ ग्रंथों के उद्धरण आदि के साथ नयव्यवस्था द्वारा गुणस्थान आदि के प्रकरण स्पष्ट करते हुए नवम्बर सन् १९८४ में वह ‘‘स्याद्वादचन्द्रिका’’ टीका लिखकर पूर्ण की है। टीका का हिन्दी अनुवाद भी आपने स्वयं ही किया है तथा प्रसंगोपात्त विशेषार्थों से ग्रंथ में चार चाँद लग गए हैं। सन् १९८५ में यह ग्रंथ प्रकाशित होकर विद्वान पाठकों तक पहुँच गया।५० इस टीका में ६ वर्ष लगने का कारण माताजी ने स्वयं ‘‘आद्यउपोद्घात’’ में बताया है कि ७४ गाथाओं की टीका एक वर्ष में हो गई थी पुन: सन् १९७९ में सुमेरुपर्वत की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के बाद मैंने दिल्ली की ओर विहार कर दिया अत: लेखन बंद हो गया पुन: अन्य अनेक लेखन कार्य आदि में व्यासंग से उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया। सन् १९८४ के चातुर्मास में जब उसका वाचन करने के लिए हस्तलिखित टीका पृष्ठ निकाले गये तो संघस्थ कु. माधुरी (वर्तमान में आर्यिका चंदनामती माताजी) के निवेदन पर मैंने पुन: टीकालेखन प्रारंभ किया और २४ नवम्बर सन् १९८४ को पूर्ण कर दिया। इस प्रकार पहले ११ माह तक पुन: ८ माह तक इसका लेखन करके कुल १९ माह में इसकी संस्कृत और हिन्दी दोनों टीकाएँ लिखकर पूर्ण की हैं।

इस नियमसार ग्रंथ में कुल १८७ गाथाएँ हैं। तीन महाधिकार और सैंतीस अंतराधिकारों में माताजी ने ग्रंथ का विभाजन किया है। इसकी प्रस्तावना में डॉ. लालबहादुर जैन शास्त्री-दिल्ली ने लिखा है कि ‘‘यदि इस टीका को नारी जगत के मस्तक का टीका कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी क्योंकि किसी महिला साध्वी के द्वारा की गई वह पहली ही टीका है जो शब्द, अर्थ और अभिप्रायों से सम्पन्न है।’’

आचार्य श्रीकुंदकुंद जिस प्रकार समयसार आदि ग्रंथों में अध्यात्मतत्व का विशेष वर्णन किया है उसी प्रकार नियमसार में मुनियों के व्यवहार और निश्चय रत्नत्रय का वर्णन सूक्ष्मता से किया है। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने संभवत: इसीलिए नियमसार ग्रंथ को अपने कार्यक्षेत्र का विशेष अंग बनाया है किकुन्दकुन्द स्वामी के प्रति लोगों की जो भ्रान्त धारणा है कि वे मात्र आध्यात्मिक थे और उन्होंने अध्यात्मग्रंथ ही लिखे हैं वह इस नियमसार ग्रंथ के स्वाध्याय से निकल जानी चाहिए।

नियमसार की इस टीका में आचार्य श्री जयसेन स्वामी की समयसार, प्रवचनसार आदि की तात्पर्यवृत्ति टीका पद्धति की पूरी छाप दिखती है। यह अत्यंत सरल और प्रभावक तो है ही, साथ ही अनेक ग्रंथों के प्रमाण इसकी प्रमाणिकता को द्विगुणित करते हैं।

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पंडित मक्खनलाल जी ने कहा— आप श्रुतकेवली हैं—

सन् १९७८ के एक प्रशिक्षण शिविर में जैन समाज के उच्चकोटि के लगभग १०० विद्वान हस्तिनापुर पधारे थे तब पूज्य माताजी के द्वारा लिखी जा रही इस टीका को देखकर उन लोगों ने महान आश्चर्य व्यक्त किया और मुरैना के पंडित मक्खनलाल जी शास्त्री तो हर्ष से उछल पड़े और बोले कि ‘‘माताजी’’! आप तो इस पंचमकाल की श्रुतकेवली हैं, क्योंकि आज तक जो कार्य हम विद्वान भी नहीं कर पाये, वह आपने कर दिखाया है।’’ इसी प्रकार पं. फूलचंद जैन सिद्धांतशास्त्री-बनारस ने सन् १९८६ में माताजी की अस्वस्थता के समय इस ग्रंथ का पूरा स्वाध्याय पूज्य माताजी के सानिध्य में किया तो वे भी कहने लगे कि ‘‘माताजी ने पूर्णरूप से आर्ष परम्परा का अनुसरण करते हुए इस टीका का लेखन किया है अत: इसमें शंका की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है।’’ अनेक विद्वान एवं स्वाध्यायियों ने ग्रंथ का स्वाध्याय करके अपने अच्छे-अच्छे विचार प्रगट किये हैं जिन्हें यहाँ देना संभव नहीं हो पा रहा है। वर्तमान में इस ग्रंथ की टीका पर पंडित श्री शिवचरणलाल जैन-मैनपुरी ने एक २०० पृष्ठीय शोधप्रबन्ध लिखा है जो शीघ्र ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होगा। कुल मिलाकर नियमसार ग्रंथ की ‘‘स्याद्वादचन्द्रिका’’ टीका इस बीसवीं सदी की एक अनोखी उपलब्धि है, जिसके विषय में टीकाकत्र्री स्वयं लिखती हैं कि—

‘‘अयं ग्रंथो नियमकुमुदं विकासयितुं चन्द्रोदय: तस्य चन्द्रोदयस्य (ग्रन्थस्य) टीका चंद्रिका।’’ अथवा द्वितीय व्युत्पत्ति इस प्रकार भी है—

‘‘यतिवैरवाणि प्रफुल्लीकत्र्तुं राकानिशीथिनीनाथत्वात् यतिवैरवचंद्रोदयोऽस्ति। अस्मिन् पदे पदे व्यवहारनिश्चय-नययोंव्र्यवहारनिश्चयक्रिययोव्र्यवहारनिश्चयमार्गयोश्च परस्परमित्र-त्वात् अस्य विषय: स्याद्वादगर्भीकृतो वर्ततेस्य टीका चन्द्रोदयस्य चंद्रिका इव विभासतेऽतो स्याद्वादचन्द्रिका नाम्ना सार्थक्यं लभते’’

अर्थात् सारांश यह है कि माताजी ने स्वरचित टीका का नाम ‘‘स्याद्वादचन्द्रिका’’ बड़ी सूझ-बूझ के साथ रखा है। टीका के एक-एक प्रकरण हृदयग्राही हैं जो ग्रंथ के स्वाध्याय से ही ज्ञात हो सकते हैं। लगभग छह सौ पृष्ठों में प्रकाशित यह ‘‘नियमसार प्राभृत’’ ग्रंथ इस युग को एक अपूर्व देन है। इस वृहत्कार्य के पश्चात् भी पूज्य माताजी ने साहित्यिक कार्यों से विराम नहीं लिया प्रत्युत् समयोचित ग्रंथों का सृजन भी करती रहीं और यदा-कदा संस्कृत स्तुति, भक्ति आदि का लेखन भी चलता रहा अत: संस्कृत काव्य श्रृंखला में पुन: संख्या वृद्धि हुई। दशलक्षण भक्ति (१२ श्लोक), मंगल-चतुर्विंशतिका (शार्दूलविक्रीडित के २५ श्लोक), मंगलाष्टक स्तोत्र (अनुष्टुप के ९ श्लोक), मंगलाष्टक (अनुष्टुप के ९ श्लोक), स्वस्तिस्तवन (इन्द्रवङ्काा के श्लोक), समयसार वंदना (अनुष्टुप के १० एवं मन्दाक्रान्ता का १ ऐसे ११ श्लोक), सोलहकारणभक्ति५२ (उपजाति के १७ एवं अनुष्टुप का १ ऐसे १८ श्लोक) तथा उत्तमक्षमा आदि दशलक्षण धर्म के सार को बतलाने वाली ‘‘दशधर्मस्तुति’’ अनुष्टुप के ५४ छंदों में निबद्ध है, जो दशधर्म पुस्तक में एक-एक धर्म में यथास्थान प्रकाशित है। इन सबमें भक्तिरस, अध्यात्म, करूणा एवं शांतरस की प्रधानता के साथ-साथ उपमा, यमक, श्लेष, अनुप्रास आदि अलंकारों का समावेश स्तुति रचयित्रि की काव्य प्रतिभा का दिग्दर्शन कराता है।

इनकी रचनाओं में कहीं भी ग्रामीण एवं अश्लील शब्दों का प्रयोग तो देखने में नहीं आता है प्रत्युत उच्चकोटि के साहित्यिक शब्दों का प्रयोग संस्कृत कोश के अध्ययन का प्रतीक है। संस्कृत रचनाओं में जैन व्याकरण के एक विशेष नियम का प्रयोग है—

इनके द्वारा रचित अनेक स्तोत्रों में पाद के अंत में कई जगह मकार के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग है जिसे देखकर अच्छे-अच्छे संस्कृतज्ञ विद्वान इसे संस्कृत की त्रुटि मानकर वहां मकार लिखने की सलाह देने लगते हैं कि किंन्तु इस विषय मेें पूज्य माताजी ने बताया कि मैंने अपनी स्तुतियों में जानबूझकर जैन व्याकरण के इस नियम को अपनाते हुए ही पदांत मकार को अनुस्वार किया है क्योंकि कातन्त्ररूपमाला में श्रीशर्ववर्म आचार्य ने व्यंजनसंधि के ९२ वें सूत्र ‘‘विरामे वा’’ में कहा है कि ‘‘विराम में पदांत मकार का अनुस्वार विकल्प से होता है ‘‘जैसे-देवानां अथवा देवानाम्, पुरूषाणां अथवा पुरूषाणाम् देवं अथवा देवम्।

यह वैकल्पिक नियम कातंत्रव्याकरण के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी व्याकरण में नहीं है, सर्वत्र विराम में अनुस्वार न करने अर्थात् मकार ही रखने का विधान है। इस नियम को प्रमाण मानकर विद्वज्जन माताजी द्वारा रचित गद्य-पद्य सभी रचनाओं में पदांत में प्रयुक्त अनुस्वार को व्याकरण की गलती न समझकर विशेष नियम का प्रयोग ही समझें। जैसे-श्रीपाश्र्वजिनस्तुति के इस पृथ्वी छंद को देखें जिसके चारों चरणों के अंत में अनुस्वार है

सुरासुर-खगेन्द्रवंद्य-चरणाब्जयुग्मं प्रभुंं। महामहिम-मोहमल्ल-गजराज-कंठीरवं।।

महामहिम-रागभूमिरुह-मूलमुत्पाटनं। स्तवीमि-कमठोपसर्गजयि- पार्श्वनाथं जिनं।।१।।

तथा पदांत में मकार प्रयोगवाली स्तुतियाँ भी हैं, श्रीशांतिसागर स्तुति का भुंजग प्रयात छंद में निबद्ध निम्न पद्य देखें—

सुरत्नत्रयै: सद्व्रतैर्भाजमान:, चतु:संघनाथो गणीन्द्रो मुनीन्द्र:।

महामोहमल्लैकजेता यतीन्द्र:, स्तुवे तं सुचारित्रचक्रीशसूरिम्।।१।।

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षट्खंडागम ग्रंथ की सिद्धांतिंचतामणि संस्कृत टीका—

अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के पश्चात् उनकी दिव्यध्वनि से प्राप्त अंग-पूर्वों का ज्ञान जब लुप्तप्राय: होने लगा तब ईसवी सन् ७३ के लगभग श्रीधरसेनाचार्य ने पुष्पदंत-भूतबली नाम के दो सुयोग्य मुनिराजों को उनका अंशात्मक ज्ञान प्रदान किया जिसके फलस्वरूप उन्होेंने ‘षट्खंडागम’ नामक सिद्धांतशास्त्र का निर्माण किया। उल्लेखानुसार कतिपय अन्य आचार्यों ने भी उस पर टीकाएँ लिखीं। पुन: उनके सूत्रों पर आज से लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व (सन् ८१६ में हुए) श्रीवीरसेनाचार्य के द्वारा ‘‘धवला’’ नामक टीका (प्राकृत एवं संस्कृत मिश्रित) लिखी गई।

उनके पश्चात् षट्खंडागम सूत्रों पर किसी भी आरातीय आचार्य अथवा विद्वान ने लेखनी चलाने का उपक्रम नहीं किया था, वह उद्यम इस सदी की ऐतिहासिक नारी पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने कर दिखाया है। ८ अक्टूबर सन् १९९५ को शरदपूर्णिमा के पावन दिवस पर उन्होंने मेरे विनम्र निवेदन पर इस षट्खण्डागम सूत्रग्रंथ का मंगलाचरण लिखकर एक सरल संस्कृत टीका लिखने का प्रारंभीकरण किया और मात्र १३५ दिन मेंं प्रथम खण्ड की एक पुस्तक में निहित १७७ सूत्रों की संस्कृत टीका (फुलस्केप कागज के) १६३ पृष्ठों में लिखकर पूर्ण कर दी। जो मेरे द्वारा की गई हिन्दी टीका समेत ५ अक्टूबर १९९८ को ग्रंथरूप में प्रकाशित हो चुकी है।

इस टीका का नाम पूज्य माताजी ने ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ यह सार्थक ही रखा है। इसके पश्चात् क्रम-क्रम से लेखन करते हुए उन्होंने ४ अप्रैल २००७ में वैशाख कृष्णा दूज को अपने आर्यिका दीक्षा के ५१ वर्ष की पूर्णता पर जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में निर्मित कमलमंदिर में कल्पवृक्ष भगवान महावीर के पादमूल में बैठकर सोलहों पुस्तकों की संस्कृत टीका लिखकर परिपूर्ण किया। कुल ३१०७ पृष्ठों में लिखित यह टीका विद्वत्समाज के मस्तक का तिलक बनकर युग-युग तक ज्ञान का प्रकाश फैलाएगी। इसकी चार पुस्तकों का प्रकाशन अब तक हिन्दी टीका सहित हो चुका है। आगे के प्रकाशन भी क्रमश: शीघ्रता से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होंगे।

इन्होंने अपने इस टीकाग्रंथ के प्रारंभिक मंगलाचरण में भी सर्वप्रथम ‘‘सिद्धान्’’ शब्द का प्रयोग किया है जो इनकी कार्यसिद्धि का प्रबल हेतु प्रतीत होता है। वह अनुष्टुप छंद यहाँ देखें—

सिद्धान् सिद्धयर्थमानम्य, सर्वांस्त्रैलोक्यमूद्र्धगान्।

इष्ट: सर्वक्रियान्तेऽसौ, शांतीशो हृदि धार्यते।।१।।

प्रथम पुस्तक की टीका के समापन में माताजी ने प्रथम और अंतिम तीर्थंकर का स्मरण करते हुए लिखा है कि—

जीयात् ऋषभदेवस्य, शासनं जिनशासनम्।

अन्तिमवीरनाथस्या-प्यहिंसाशासनं चिरम्।।१।।

इसी प्रकार ग्रंथ की अंतिम प्रशस्ति में माताजी ने अपनी गुरूपरंपरा का किंचित परिचय प्रदान किया है जो गुरुभक्ति के साथ ही इनके टीकाकाल की प्रमाणता का भी परिचायक है। बीसवीं सदी में जब इन्होंने प्रथम कुमारी कन्या के रूप में आर्यिका दीक्षा धारण कर ‘‘ज्ञानमती’’ नाम प्राप्त किया तब तक ‘‘ज्ञानमती’’ नाम से कोई भी आर्यिका-क्षुल्लिका नहीं थीं। किन्तु उसके बाद कुछ अन्य संघों में भी ‘‘ज्ञानमती’’ नाम की एक-दो आर्यिकाओं का प्रादुर्भाव हुआ है अत: सामान्य लोग कभी-कभी नाम साम्य से दिग्भ्रमित हो जाते हैं किन्तु इनकी कृतियाँ विलक्षण प्रतिभाओें से युक्त होने के कारण इनके व्यक्तित्व का भी बिल्कुल पृथक ही अस्तित्व झलकाती हैैं।

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‘‘ऋषभदेवचरितम्’’ एक साहित्यिक देन—'

मैं ज्यों-ज्यों इस लेख को समापन की ओर पहुँचाने का प्रयास कर रही हूँ, त्यों-त्योें लेख का विषय बढ़ता जा रहा प्रतीत होता है। किन्तु एक और साहित्यिक देन से पाठकों को अपरिचित रखना भी उचित नहीं होगा। उपर्युक्त कृतियों का उल्लेख करते समय स्मरण आया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव का जो जीवन चरित्र पूज्य माताजी ने संस्कृत में लिखा है उसका भी कुछ अंश प्रस्तुत करूँ अत: ‘‘ऋषभदेवचरितम्’’ का नाम एक साहित्यिक कृति के रूप में उल्लिखित किया है। इस कृति में भगवान ऋषभदेव के जीवन का उत्थान किस पर्याय से शुरू हुआ है और वे भगवान् की श्रेणी तक कैसे एवं कब पहुँचे, इन समस्त विषयों का वर्णन महापुराण ग्रंथ के आधार से दिया है। राजा महाबल से लेकर तीर्थंकर ऋषभदेव तक उनके दशभवों का वर्णन देकर भोगभूमि और देवगति के सुखों का भी वर्णन किया है।

युग की आवश्यकता को देखते हुए पूज्य माताजी ने भगवान् ऋषभदेव एवं जैन धर्म के सिद्धांतों को देश-विदेश में प्रसारित करने का जो बीड़ा उठाया उसी के अंतर्गत मेरी लघु प्रेरणा से विद्वत्समाज की आवश्यकता की पूर्ति हेतु इस ‘‘ऋषभदेवचरित’’ का लेखन ११ दिसम्बर १९९७ को प्रारंभ किया था। षट्खंडागम टीका एवं अन्य लेखनकार्यों के साथ-साथ इसका भी कार्य मध्यम गति से चला और कभी-कभी तो बिल्कुल बंद भी रहा तथापि २४ अक्टूबर सन् १९९९, शरदपूर्णिमा को कनॉट प्लेस-दिल्ली के अग्रवाल दिगम्बर जैन मंदिर में यह ग्रंथ पूज्य माताजी ने लिखकर पूर्ण भी कर दिया है। लगभग १६० पृष्ठों में माताजी द्वारा लिखित इस कृति का हिन्दी अनुवाद मेरे द्वारा चल रहा है। इसका प्रारंभीकरण शार्दूलविक्रिडित छंद में इन भावों से हुआ है—

सिद्धा ये कृतकृत्यतामुपगतास्त्रैलोक्यमूध्र्नि स्थिता:।

तीर्थेशा: ऋषभादिवीरचरमास्त्रैकालिका ये जिना:।।
तान् सर्वान् हृदि संनिधाय चरितं चाप्यादिनाथस्य हि।
भक्त्या श्रीऋषभस्य केचिद्गुणा: कीत्र्यन्त एवाधुना।।१।।

अर्थात् सिद्धशिला पर विराजमान अनंत सिद्धपरमात्मा तथा ऋषभदेव से महावीर पर्यन्त चौबीसों तीर्थंकरों को हृदय से धारण करके लेखिका ने तीर्थंकर ऋषभदेव का शुभचरित्र लिखने का संकल्प उपर्युक्त श्लोक में दर्शाया है जो उनकी ईश्वरभक्ति एवं आस्तिक्यगुण का परिचायक है। भगवान महावीर के २६००वें जन्मकल्याणक महोत्सव के अवसर पर पूज्य माताजी ने महावीर स्वामी के गुणों का स्मरण करते हुए २६०० मंत्र रचकर नौ पूजाओं से समन्वित एक पूजन-विधान ग्रंथ मात्र दो माह में पूर्ण करके भगवान के चरणों में समर्पित किया जो एक अमिट कृति है। इसके अतिरिक्त भगवान पार्श्वनाथ के १०८ मंत्रों की रचना पूर्वक ‘‘ पार्श्वनाथ विधान’’, ‘‘नेमिनाथ विधान’’, का सृजन एवं बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज के संयम वर्ष में एक नया ‘‘शांतिसागर विधान’’ एवं अपने दीक्षागुरु आचार्य श्री वीरसागर महाराज के नाम पर ‘‘वीरसागर विधान’’ भी लिखकर श्रद्धालुभक्तों को प्रदान किया है।

उपसंहार—अपने अभीक्ष्णज्ञानोपयोग में संलग्न पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को जहाँ जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी होने का श्रेय प्राप्त है वहीं इनकी अनमोल साहित्य सेवा का मूल्यांकन करते हुए फैजाबाद (उ.प्र.) के डॉ.राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय ने इन्हें ५ फरवरी १९९५ को एक विशेष दीक्षान्त समारोह में ‘‘डी लिट्’’ की मानद उपाधि से अलंकृत कर अपने विश्वविद्यालय को गौरवान्वित अनुभव किया। इनके जीवन की विशेषता में निम्न पंक्तियाँ बिल्कुल सार्थक ठहरती हैं—

नैराश्य मद में डूबते नर के लिए नव आस हो।

कोई अलौकिक शक्ति हो अभिव्यक्ति हो विश्वास हो।।
कलिकाल की नवज्योति हो उत्कर्ष का आभास हो ।
मानो न मानो सत्य है तुम स्वयं में इतिहास हो।।

उपर्युक्त काव्यकृतियों के आधार पर यदि ज्ञानमती माताजी को ‘‘महाकवियित्री’’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि वैदिक परंपरा में महाकवि कालिदास, भास, भवभूति, माघ और बाणभट्ट का जो स्थान है, जैन परम्परा में अकलंकदेव, समन्तभद्र, अमृतचंद्रसूरि, श्रीजयसेनाचार्य, ब्रह्मदेवसूरि आदि पूर्वाचार्यों की परम्परा का निर्वाह करने वाली साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का वही स्थान मानना चाहिए। उनके उत्कृष्ट त्याग और संयम ने उनके गद्य, पद्य, हिन्दी और संस्कृत के समस्त साहित्य में पूर्ण जीवन्तता उत्पन्न कर दी है। जैसा कि कवि श्री सुमित्रानंदन पन्त जी ने महाकवि कालिदास को भारतीय काव्य का प्रथम कत्र्ता मानते हुए कहा है—

वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान।

निकलकर आँखों से चुपचाप, वही होगी कविता अनजान।।

लगता है कि इसी प्रकार से एक नारी हृदय की वीरता को ज्ञानमती माताजी की कृतियों ने उद्घाटित करके कलियुग की नारियों में चेतना का स्वर फूका है। यही कारण है कि इनकी साहित्यसर्जना के प्रारंभीकरण के पश्चात् अन्य अनेक जैन साध्वियों ने भी साहित्यरचना के क्षेत्र में कदम बढ़ाए और उनकी कृतियों से भी समाज लाभान्वित हो रहा है। उपर्युक्त पंतजी की पंक्तियाँ इनके प्रति इस प्रकार घटित हो जाती हैं—

बालसति हैं जो पहली नार, आत्मबल ही जिनका आधार।

उन्होेंने किया प्रभू गुणगान, बना यह साहित्यिक अवदान।।

संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में उनके द्वारा दिये गये अवदान को जैन समाज ही नहीं, संपूर्ण साहित्यजगत् कभी विस्मृत नहीं कर सकता है। ज्ञानमती माताजी की समस्त कृतियों में संस्कृत साहित्य की भाषा भी अत्यंत सरल और सौष्ठवपूर्ण है और उसमें माधुर्य का भी समावेश है। उसमें प्राय: लम्बे समासों तथा क्लिष्ट पदावली का अभाव है। उनकी वाक्ययोजना सरल तथा प्रभावोत्पादक है। भाषा में कहीं अस्वाभाविकता के दर्शन नहीं होते। यही कारण है कि उनके श्लोकों एवं टीकाग्रंथों को पढ़ते ही उनका अभिप्राय अथवा तात्पर्य शीघ्र ज्ञात हो जाता है।

इन समस्त विशेषताओं से परिपूर्ण आपकी कृतियाँ संसार में सभी को समीचीन बोध प्रदान करें तथा देवभाषा संस्कृत की अभिवृद्धि में कारण बने यही अभिलाषा है।