ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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01.गतिमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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गतिमार्गणाधिकार

अथ गतिमार्गणाधिकार:

अत्रापि गत्यनुवादेन चतुर्भिरन्तरस्थलैः चतुस्त्र्शत्सूत्राणि कथयिष्यन्ते। तत्र तावत् प्रथमस्थले नरकगतौ नारकाणां अन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘एगजीवेण’’ इत्यादिना चत्वारि सूत्राणि। ततः परं द्वितीयस्थले तिरश्चां मनुष्याणां चान्तरप्रतिपादनत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले भवनत्रिकदेवानां सौधर्मैशानादिषोडशकल्पवासिदेवानां चान्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि षोडशसूत्राणि। तदनन्तरं चतुर्थस्थले नवगै्रवेयकादिसर्वार्थसिद्धिविमानवासिनां कल्पातीतानां अंतरकथनप्रकारेण ‘‘णवगेवज्ज’’ इत्यादिना अष्टौ सूत्राणि इति पातनिका कथिता।
संप्रति एकजीवापेक्षया नारकाणामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
एगजीवेण अंतराणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइयाणं अंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।२।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।३।।
एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र पृच्छासूत्रे ‘केवचिरं’ एतत्कथनेन एकद्वित्रिप्रभृति अनंतपर्यंतं अंतरपृच्छा कृता भवति।
मूलौघविषयकपृच्छा किन्न कृता ?
न, किंच-मूलौघप्रतिबद्धकालप्ररूपणाभावात्।
किमिति तस्य गुणस्थानविषयस्य कालः नोक्तः ?
नैष दोषः, तस्यानुक्तसिद्धेः।
अत्र कश्चिन्नारकजीवः नरकान्निर्गतः, तिर्यक्षु मनुष्येषु वा गर्भोपक्रान्तिकपर्याप्तकेषु उत्पद्य सर्वजघन्यायुः- कालाभ्यन्तरे नरकायुः बद्ध्वा कालं कृत्वा पुनो नरकेषूत्पन्नस्तस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तान्तरमुपलभ्यते।
उत्कर्षेण-नारकजीवस्य नरकान्निर्गत्यानर्पितगतिषु आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानि परिवत्र्य पश्चात् नरकेषूत्पन्नस्य सूत्रोक्तोत्कृष्टान्तरमुपलभ्यते।
एवं षट्सु पृथिवीषु ज्ञातव्यमन्तरं। सप्तम्यां पृथिव्यां तु एष एव विशेषः-तत्रत्यान्निर्गत्य तिर्यक्ष्वेवोत्पद्यते न मनुष्येषु इति मन्तव्यं।
एवं प्रथमस्थले नारकाणामन्तरकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इदानीं सामान्येन तिरश्चामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।५।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।६।।
उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं।।७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-तिर्यग्भ्यः मनुष्येषूत्पद्य कदलीघातयुक्त-क्षुद्रभवग्रहणमात्रकालं स्थित्वा पुनः तिर्यक्षूत्पन्नस्य तज्जघन्यान्तरमुपलभ्यते। उत्कर्षेण-तिरश्चः तिर्यग्भ्यः निर्गतस्य शेषगतिषु सागरोपमशत-पृथक्त्वादुपरि अवस्थानाभावात् सूत्रोक्तोत्कृष्टान्तरमुपलभ्यते।
अधुना चतुर्विधतिरश्चां चतुर्विधमनुष्याणां चान्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
पंचिंदियतिरिक्खा पंचिंदियतिरक्खपज्जत्ता, पंचिदिंयतिरिक्खजोणिणी पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता, मणुसगदीए मणुस्सा मणुसपज्जत्ता मणुसिणी मणुसअपज्जत्ताणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।८।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।९।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जा पोग्गलपरियट्टा।।१०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-विवक्षितगतेर्निर्गत्याविवक्षितगतिषूत्पद्य क्षुद्रभवग्रहणप्रमाणकालं स्थित्वा पुनो विवक्षितगतिमागतस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रान्तरोपलंभात्।
उत्कर्षेण-विवक्षितगतेर्निर्गत्य एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रियादि-अविवक्षितगतिषु आवलिकायाः असंख्यात-भागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानि भ्रमित्वा विवक्षितगतिमागतस्य तदुपलंभात्।
एवं द्वितीयस्थले तिर्यग्मनुष्ययोः अन्तरकथनमुख्यत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
अधुना सामान्येन देवानां भवनत्रिकदेवानां सौधर्मैशानदेवानां चान्तरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
देवगदीए देवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।११।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जा पोग्गलपरियट्टा।।१३।।
भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसिय-सोधम्मीसाणकप्पवासियदेवा देवगदिभंगो।।१४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्येन-देवगतेरागत्य तिर्यग्मनुष्यगर्भोपक्रान्तिकपर्याप्तकेषूत्पद्य समाप्य पर्याप्तीः देवायुषं बंधयित्वा देवेषूत्पन्नस्य अंतर्मुहूर्तान्तरोपलंभात्। उत्कर्षेण-देवगतेरवतीर्य शेषत्रिसृषु गतिषु आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानि उत्कृष्टतया परिवत्र्य पुनः देवगतौ आगमने विरोधाभावात्।
यथात्र देवगतेर्जघन्योत्कृष्टान्तरं प्रोक्तं, तथैव भवनत्रिकदेवानां सौधर्मैशानदेवानामपि चान्तरं ज्ञातव्यं।
कश्चिदाह-अत्र सूत्रे ‘‘भवणवासियदेवा’’ इत्युत्ते देवानामिति कथं कथितं ?
आचार्यःप्राह-‘‘आई-मज्झंतवण्णसरलोओ’’ इति प्राकृतव्याकरणसूत्रेण ‘णं’ शब्दो लुप्तोऽभवत् अतो ‘देवा’ इति पदेन ‘देवाणं’ एवं गृहीतव्यं।


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अथ गतिमार्गणा अधिकार प्रारंभ

यहाँ भी गतिमार्गणा के अनुवाद से चार अन्तरस्थलों के द्वारा चौंतीस सूत्रों में गतियों का वर्णन करेंगे। उनमें से प्रथम स्थल में नरकगति में नारकियों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘एगजीवेण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में तिर्यंच जीवों और मनुष्यों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में भवनत्रिक देवों का एवं सौधर्म-ईशान आदि सोलह कल्पवासी देवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि सोलह सूत्र हैं। तदनन्तर चतुर्थ स्थल में नवग्रैवेयक से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमान तक के कल्पातीत देवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘णवगेवज्ज’’ इत्यादि आठ सूत्र हैं। यह गतिमार्गणा अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका कही गई है।

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अब एक जीव की अपेक्षा नारकी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम से गतिमार्गणानुसार नरकगति में नारकी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१।।

जघन्य से नरकगति में नारकी जीवों का अन्तर अन्तर्मुहूर्त काल तक होता है।।२।।

उत्कृष्ट से अनन्तकाल तक नरकगति से नारकी जीवों का अन्तर होता है, जो अनन्त काल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है।।३।।

इस प्रकार सातों पृथिवियों में नारकी जीवों का अन्तर होता है।।४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ पृच्छा सूत्र में ‘केवचिरं’ अर्थात् ‘कितने काल तक’ इस कथन के द्वारा एक-दो-तीन से लेकर अनन्त तक अन्तरपृच्छा की गई है।

शंका-यहाँ मूलोघविषयक अर्थात् गुणस्थानों की अपेक्षा अन्तरसंबंधी पृच्छा क्यों नहीं की गई ?

समाधान-नहीं, क्योंकि मूलोघसंबंधी कालप्ररूपणा का अभाव होने से उक्त प्ररूपणा नहीं की गई ?

शंका-मूलोघसंबंधी उन गुणस्थान विषयक काल क्यों नहीं बतलाया गया ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि बिना कहे उसकी सिद्धि हो जाती है। यहाँ कोई नारकी जीव नरक से निकलकर तिर्यंच अथवा मनुष्यों में गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्तकों में उत्पन्न होकर वहाँ सबसे जघन्य आयु काल के अन्दर नरकायु का बंध करके वहाँ अपना काल व्यतीत करके पुन: नरकों में उत्पन्न हुए नारकी जीव के नरकगति में जघन्य से अन्तर्मुहूर्त प्रमाण अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-नारकी जीव के नरक से निकलकर अविवक्षित गतियों में आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण पुद्गलपरिवर्तन काल तक परिभ्रमण करके पुन: नरकों में उत्पन्न होने पर सूत्रोक्त उत्कृष्ट अन्तर प्रमाण पाया जाता है।

इस प्रकार से छह नरक पृथिवियों में अन्तर को जानना चाहिए। सातवीं पृथिवी में यह अन्तर है कि-‘‘वहाँ से निकलकर नारकी जीव तिर्यंचों में ही उत्पन्न होते हैं, मनुष्यों में उत्पन्न नहीं हो सकते हैं, ऐसा मानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में नारकियों का अन्तर कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्य से तिर्यंचों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति से तिर्यंच जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।५।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक तिर्यंच जीवों का तिर्यंचगति से अन्तर होता है।।६।।

उत्कृष्ट से सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण काल तक तिर्यंच जीवों का तिर्यंचगति से अन्तर पाया जाता है।।७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंच जीवों में से निकलकर मनुष्यों में उत्पन्न हो कदलीघातयुक्त क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक रहकर पुन: तिर्यंचों में उत्पन्न हुए जीव के क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण जघन्य अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-तिर्यंच जीव के तिर्यंचों में से निकलकर शेष गतियों में सौ सागरोपमपृथक्त्वकाल से ऊपर ठहरने का अभाव होने से उनके सूत्रोक्त उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

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अब चार प्रकार के तिर्यंच एवं चार प्रकार के मनुष्यों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति से पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी, पंचेन्द्रिय तिर्र्यंच अपर्याप्त एवं मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त, मनुष्यिनी तथा मनुष्य अपर्याप्त जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।८।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक उक्त तिर्यंचों का तिर्यंचगति से तथा मनुष्यों का मनुष्यगति से अन्तर होता है।।९।।

उत्कृष्ट से असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्त काल तक पूर्वोक्त तिर्यंचों का तिर्यंचगति से और मनुष्यों का मनुष्यगति से अन्तर होता है, जो अनन्त होता है।।१०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विवक्षित गति से निकलकर अविवक्षित गतियों में उत्पन्न होकर व वहाँ क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण काल रहकर पुन: विवक्षित गति में आए हुए जीव के क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-विवक्षित गति से निकलकर एकेन्द्रिय व विकलेन्द्रिय आदि अविवक्षित गतियों में आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण काल तक भ्रमण कर विवक्षित गति में आये हुए जीव के सूत्रोक्त प्रमाण अन्तर पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंच और मनुष्यों का अन्तर कथन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्य से देवों में भवनत्रिक देवों का और सौधर्म-ईशान स्वर्ग के देवों का अन्तर बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।११।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक देवों का देवगति में अन्तर होता है।।१२।।

उत्कृष्ट से अनन्त काल तक देवगति से देवों का अन्तर होता है, जो अनन्त असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण होता है।।१३।।

भवनवासी, वानव्यन्तर, ज्योतिषी व सौधर्म-ईशान कल्पवासी देवों का अन्तर देवगति के समान ही है।।१४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जघन्य से-देवगति से आकर गर्भोपक्रान्तिक पर्याप्त तिर्यंचों व उन्हें मनुष्यों में उत्पन्न होकर पर्याप्तियाँ पूर्ण कर देवायु बांधकर पुन: देवों में उत्पन्न हुए जीव के देवगति में अन्तर्मुहूर्तप्रमाण का अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्ट से-देवगति से निकलकर शेष तीन गतियों में अधिक से अधिक आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुद्गलपरिवर्तन काल तक उत्कृष्टरूप से परिभ्रमण कर पुन: देवगति में आगमन करने में कोई विरोध नहीं आता है।

जिस प्रकार देवगति में जघन्य से अन्तर्मुहूर्तप्रमाण और उत्कृष्ट से असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तरकाल कहा गया है, उसी प्रकार इन भवनवासी आदि देवों का जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर जानना चाहिए।

यहाँ कोई शंका करता है कि-इस सूत्र में ‘‘भवणवासिय.....देवा’’ ऐसा कहने पर ‘देवानां’ ऐसा क्यों कहा गया है ? आचार्य इसका उत्तर देते हैं कि-

आदि, मध्य व अन्त में आये हुए व्यंजन और स्वरों का प्राकृत व्याकरण के सूत्र से ‘णं’ शब्द का लोप हो गया अत: ‘देवा’ इस पद से ‘देवानां’ ऐसा ग्रहण कर लेना चाहिए।


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संप्रति सानत्कुमारादि अच्युतान्तानां देवानां अंतरप्रतिपादनाय सूत्रद्वादशकमवतार्यते-

सणक्कुमार-माहिंदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१५।।

जहण्णेण मुहुत्तपुधत्तं।।१६।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१७।।
बम्ह-बम्हुत्तर-लांतव-काविट्ठकप्पवासियदेवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१८।।
जहण्णेण दिवसपुधत्तं।।१९।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।२०।।
सुक्क-महासुक्क-सदार-सहस्सारकप्पवासियदेवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।२१।।
जहण्णेण पक्खपुधत्तं।।२२।।
उक्कस्सेण अंणतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।२३।।
आणद-पाणद-आरण-अच्चुदकप्पवासियदेवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।२४।।
जहण्णेण मासपुधत्तं।।२५।।
उक्कस्समणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।२६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चित् सनत्कुमारस्वर्गस्य माहेन्द्रस्वर्गस्य वा देवः तिरश्चो मनुष्यस्य वा भवसंबंधि- मुहूर्तपृथक्त्वप्रमाणां जघन्यस्थितिं बंधयित्वा तिर्यक्षु मनुष्येषु वोत्पद्य परिणामप्रत्ययेन पुनः सनत्कुमार-माहेन्द्रयोः आयुर्बंधं कृत्वा सनत्कुमार-माहेन्द्रयोः उत्पन्नस्य जघन्यमन्तरं भवतीति कथनं ज्ञातव्यं। उत्कृष्टान्तरं सर्वत्र सुगममेव।
ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर-लान्तव-कापिष्ठदेवानां बद्धायुष्कानां दिवसपृथक्त्वादधः स्थितिबंधाभावात्।
कश्चिदाह-अणुव्रत-महाव्रतैर्विना तिर्यञ्चो मनुष्याः वा गर्भादनिष्क्रान्ता एव कथं देवेषु उत्पद्यन्ते ?
आचार्यदेवः समाधत्ते-नैतत्, परिणामप्रत्ययेन गर्भेष्वेव दिवसपृथक्त्वजीवितानां तिर्यग्मनुष्यपर्याप्तानां ततोऽनन्तरं गर्भेष्वेव मृतानां तत्रब्रह्मादिचतुष्कस्वर्गेषु उत्पत्तेर्विरोधाभावात्।
शुक्रादिचतुष्ककल्पवासिनां पक्षपृथक्त्वं जघन्यान्तरं कथितं। इत्थमेव आनताद्यच्युतकल्पवासिनां सप्ताष्टौ वा मासप्रमाणं जघन्यान्तरं भवति एष मासपृथक्त्वस्यार्थो गृहीतव्यः। सहस्रारस्वर्गादुपरि इमे देवाः तिर्यगायुर्न बध्नन्ति तेभ्यः च्युत्वा मनुष्या एव भवन्तीति।
कश्चिदाशंकते-एते मनुष्येषु उत्पद्यमाना मनुष्या अपि गर्भाद्यष्टवर्षेषु गतेषु अणुव्रतानां महाव्रतानां वा ग्राहिणो भवन्ति। न चाणुव्रतमहाव्रतैविना आनतादिषु उत्पत्तिरस्ति, तथोपदेशाभावात्। ततो नात्र मासपृथक्त्वान्तरं युज्यते, कितु वर्षपृथक्त्वेनान्तरेण भवितव्यम् ?
अत्राचार्यदेवः परिहरति-अणुव्रतमहाव्रतैः संयुक्ताश्चैव तिर्यञ्चो मनुष्या वा आनतप्राणतदेवेषूत्पद्यन्ते न चैष नियमोऽस्ति, किंच-एतन्मन्यमाने तिर्र्यगसंयतसम्यग्दृष्टीनां षड्रज्जुस्पर्शनसूत्रेण१ सह विरोधात्। न चानतप्राणतासंयतसम्यग्दृष्टयो मनुष्यायुषः जघन्यस्थितिं बध्नन्तो वर्षपृथक्त्वादधो बध्नन्ति, महाबंधे जघन्यस्थितिबंधाद्धा छेदे सम्यग्दृष्टीनामायुषो वर्षपृथक्त्वमात्रस्थितिप्ररूपणात्। ततः आनत-प्राणतमिथ्यादृष्टे-र्मनुष्यायुः मासपृथक्त्वमात्रं बंधयित्वा पुनो मनुष्येषूत्पद्य मासपृथक्त्वं जीवित्वा पुनः संज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यक्- संमूच्र्छिमपर्याप्तकेषु अंतर्मुहूर्तायुष्केषु उत्पद्य पर्याप्तको भूत्वा संयमासंयमं प्रतिपद्यानतादिषु आयुर्बंधयित्वा उत्पन्नस्य जघन्यमन्तरं भवतीति वक्तव्यं। उत्कृष्टान्तरं स्पष्टमेव ज्ञातव्यं।
एवं तृतीयस्थले भवनत्रिकादि कल्पवासिदेवानां जघन्योत्कृष्टान्तरप्रतिपादनत्वेन षोडश सूत्राणि गतानि।
संप्रति कल्पातीतानां नवग्रैवेयकविमानवासिनां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
णवगेवज्जविमाणवासियदेवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।२७।।
जहण्णेण वासपुधत्तं।।२८।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।२९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-नवग्रैवेयकवासिनोऽहमिन्द्राः वर्षपृथक्त्वादधः जघन्यायुःस्थितिं न बध्नन्ति। उत्कर्षेण मिथ्यादृष्टीनां अभव्यानां वा अनंतकालपरिभ्रमणं संभवतीति ज्ञातव्यं। ये केचिद् भव्या अपि मिथ्यात्ववशेन पंचपरावर्तनं कुर्वन्ति तेषामपि एतत्कालं संभवति अभव्यानां तु संभवत्येवेत्यर्थः।
नवानुदिशविमानवासिनां अन्तरनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
अणुदिस जाव अवराइदविमाणवासियदेवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।३०।।
जहण्णेण वासपुधत्तं।।३१।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।३२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सम्यग्दृष्टीनां वर्षपृथक्त्वादधः आयुषो जघन्यस्थितिबंधाभावात्। उत्कर्षतः-नवानुदिशविमानवासिनोऽहमिन्द्रस्य पूर्वकोट्यायुष्कमनुष्येषूत्पद्य पूर्वकोटिं जीवित्वा सौधर्मैशानयोर्गत्वा तत्र सार्धद्वयसागरोपमप्रमाणकालं गमयित्वा पुनः पूर्वकोट्यायुष्कमनुष्येषूत्पद्य संयमं गृहीत्वा स्वस्वात्मनो विमाने उत्पन्नस्य सातिरेकद्विसागरोपममात्रान्तरं उपलभ्यते।
संप्रति सर्वार्थसिद्धिनिवासिनामहमिन्द्राणां अन्तरप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।३३।।
णत्थि अंतरं, णिरंतरं।।३४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सर्वार्थसिद्धिविमानाद् मनुष्यगतिमवतीर्णस्य मोक्षं मुक्त्वान्यत्र गमनं नास्ति।
‘णत्थि अंतरं णिरंतरं’ अस्मिन् सूत्रे पुनरुक्तदोषप्रसंगात् द्वयोः पदयोः संग्रहः कर्तव्यः इति चेत् ?
नैष दोषः, द्वौ अपि नयौ अवलम्ब्य स्थितानां द्विविधानामपि शिष्याणामनुग्रहार्थं तथाविधप्ररूपयतः सूत्रस्य पुनरुक्तदोषाभावात्। किनच ‘णत्थि अंतरं’ इति वचनं पर्यायार्थिकनयाश्रितशिष्याणामनुग्रहकारकं, विधिव्यतिरित्ते प्रतिषेधे एव व्यापृतत्वात्। ‘णिरंतरं ’ इति वचनं द्रव्यार्थिकनयाश्रितशिष्यानुग्राहकं, प्रतिषेध-विरहितविधेः प्रतिपादनत्वात्।
तात्पर्यमेतत्-‘विजयादिषु द्विचरमाः।’ इति सूत्रेण विजयादिभ्यश्च्युता अप्रतिपतितसम्यक्त्वा मनुष्येषूत्पद्य संयममाराध्य पुनर्विजयादिषूत्पद्य ततश्च्युताः पुनर्मनुष्यभवमवाप्य सिद्ध्यन्तीति द्विचरमदेहत्वं तेषामहमिन्द्राणां सिद्धं। अत्र पुनः सर्वार्थसिद्धिविमाने उत्पद्य ततश्च्युता नियमेन मनुष्यभवमवाप्य दैगम्बरीदीक्षामादाय स्वशुद्धात्मानं ध्यायन्तः सन्तः तस्मिन्नेव भवे सिद्ध्यन्ति अतो न तेषामन्तरं भवतीति ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले कल्पातीतदेवानामन्तरकथनत्वेन सूत्राष्ट गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमेगणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः समाप्तः।

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अब सानत्कुमार स्वर्ग से लेकर अच्युत स्वर्ग तक के देवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु बारह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सनत्कुमार और माहेन्द्र कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१५।।

जघन्य से मुहूर्तपृथक्त्व काल तक सनत्कुमार और माहेन्द्र कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर होता है।।१६।।

उत्कृष्ट से अनन्तकाल तक सनत्कुमार और माहेन्द्र देवों का देवगति से अन्तर होता है। जो अनन्तकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।१७।।

ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर व लान्तव-कापिष्ठ कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१८।।

जघन्य से दिवसपथक्त्वमात्र ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर और लान्तव-कापिष्ठ कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर होता है।।१९।।

उत्कृष्ट से अनन्त काल तक ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर व लान्तव-कापिष्ठ देवों का देवगति में अन्तर होता है जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।२०।।

शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर कितने काल तक होता है ?।।२१।।

कम से कम पक्षपृथक्त्वकाल तक शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर होता है।।२२।।

उत्कृष्ट से अनन्त काल तक उक्त देवों का देवगति में अन्तर होता है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।२३।।

आनत-प्राणत और आरण-अच्युत कल्पवासी देवों का देवगति में अन्तर कितने काल तक रहता है ?।।२४।।

जघन्य से मास पृथक्त्व तक उक्त देवों का देवगति में अन्तर होता है।।२५।।

उत्कृष्ट से अनन्तकाल आनत-प्राणत और आरण-अच्युत कल्पवासी देवों का अन्तर होता है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंच या मनुष्य आयु को बांधने वाले कोई सनत्कुमार और माहेन्द्र देवों के तिर्यंच व मनुष्य भवसंबंधी जघन्य स्थिति का प्रमाण मुहूर्तपृथक्त्व पाया जाता है। भवसंबंधी मुहूर्तपृथक्त्वप्रमाण जघन्य तिर्यंच व मनुष्य आयु को बांधकर तिर्यंचों में व मनुष्यों में उत्पन्न होकर परिणामों के निमित्त से पुन: सनत्कुमार और माहेन्द्र देवों की आयु बांधकर सनत्कुमार-माहेन्द्र देवों में उत्पन्न हुए जीवों का मुहूर्तपृथक्त्वप्रमाण जघन्य अन्तर होता है। ऐसा कथन जानना चाहिए, उत्कृष्ट अन्तर सर्वत्र सुगम ही है।

ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लांतव-कापिष्ठ स्वर्ग के बद्धायुष्क देवों के दिवसपृथक्त्व से नीचे की स्थिति के बंध का अभाव पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि- अणुव्रत और महाव्रत के बिना तिर्यंच और मनुष्य जो अभी गर्भ से निकले ही नहीं हैं, वे देवों में कैसे उत्पन्न हो सकते हैं ?

आचार्य समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं है, क्योंकि परिणामों के निमित्त से गर्भ में ही दिवसपृथक्त्वप्रमाण जीवित रहने वाले तिर्यंच व मनुष्य पर्याप्तक जीवों के गर्भ में ही मर जाने पर वहाँ ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लांतव-कापिष्ठ इन चार स्वर्गों में उत्पन्न होने में कोई विरोध नहीं आता है।

शुक्रादि चतुष्क-शुक्र-महाशुक्र, शतार और सहस्रार स्वर्गों के कल्पवासी देवों का जघन्य अन्तर पक्ष पृथक्त्व कहा गया है। इसी प्रकार से आनतादि से लेकर अच्युत स्वर्ग तक के कल्पवासी देवों का जघन्य अन्तर सात अथवा आठ मास प्रमाण होता है, यह मासपृथक्त्व का अर्थ ग्रहण करना चाहिए। सहस्रार स्वर्ग से ऊपर के ये देव तिर्यंच आयु का बंध नहीं करते हैं, वहाँ से च्युत होकर वे मनुष्य ही होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि- ये मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य भी गर्भ से लेकर आठ वर्ष तक व्यतीत हो जाने पर अणुव्रत व महाव्रतों को ग्रहण करने वाले होते हैं और अणुव्रतों को व महाव्रतों को ग्रहण न करने वाले मनुष्यों की आनत आदि देवों में उत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि वैसा उपदेश नहीं पाया जाता है।

अतएव आनत आदि चार देवों का मासपृथक्त्व अन्तर कहना युक्त नहीं है, क्योंकि उनका अन्तर वर्ष पृथक्त्व होना चाहिए ?

आचार्य देव उक्त शंका का परिहार कहते हैं-महाव्रतों से संयुक्त ही तिर्यंच व मनुष्य आनत-प्राणत देवों में उत्पन्न हो ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का जो छह राजु स्पर्शन बतलाने वाला सूत्र है, उससे विरोध होता है। और आनत-प्राणत कल्पवासी असंयतसम्यग्दृष्टि देव मनुष्यायु की जघन्य स्थिति बांधते हुए वे वर्ष पृथक्त्व से कम की आयु स्थिति नहीं बांधते है, क्योंकि महाबंध में जघन्य स्थितिबंध के काल विभाग में सम्यग्दृष्टि जीवों की आयु स्थिति का प्रमाण वर्षपृथक्त्वमात्र प्ररूपित किया गया है। अत: आनत-प्राणत कल्पवासी मिथ्यादृष्टि देव के मासपृथक्त्वप्रमाण मनुष्यायु बांधकर फिर मनुष्यों में उत्पन्न हो मासपृथक्त्व जीवित रहकर पुन: अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयु वाले संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच समूच्र्छन पर्याप्त जीवों में उत्पन्न होकर पर्याप्तक हो संयमासंयम ग्रहण करके आनतादि कल्पों की आयु बांधकर वहाँ उत्पन्न हुए जीव के सूत्रोक्त मासपृथक्त्व प्रमाण जघन्य अन्तरकाल होता है, ऐसा कहना चाहिए। उत्कृष्ट अन्तर स्पष्ट ही जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में भवनत्रिक से लेकर कल्पवासी तक के देवों का जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर प्रतिपादन करने वाले सोलह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब कल्पातीत देवों में नव ग्रैवेयक विमानवासी देवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।२७।।

जघन्य से वर्षपृथक्त्व काल तक नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों का अन्तर होता है।।२८।।

उत्कृष्ट से अनन्तकाल तक नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों का अन्तर होता है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है।।२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नौ ग्रैवेयकवासी अहमिन्द्र देव वर्षपृथक्त्व से नीचे-पहले जघन्य आयु स्थिति का बंध नहीं करते हैं। उत्कृष्टरूप से मिथ्यादृष्टि अथवा अभव्य जीवों का संसार में अनन्तकाल तक परिभ्रमण संभव होता है, ऐसा जानना चाहिए। जो कोई भव्य जीव भी मिथ्यात्व के कारण पंचपरावर्तन करते हैं, उनके भी यह काल संभावित होता है और अभव्य जीवों के तो अनंतकाल तक संसार परिभ्रमण संभव रहता ही है।

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अब नव अनुदिश विमानवासी देवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अनुदिश आदि अपराजित पर्यन्त विमानवासी देवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।३०।।

जघन्य से वर्ष पृथक्त्व काल तक अनुदिश से लेकर अपराजित पर्यन्त विमानवासी देवों का अन्तर होता है।। ३१।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक दो सागरोपमप्रमाण काल तक अनुदिश से लेकर अपराजित पर्यन्त विमानवासी देवों का अन्तर होता है।।३२।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सम्यग्दृष्टि जीवों के आयु का जघन्य स्थितिबंध वर्षपृथक्त्व से नीचे नहीं होता है, क्योंकि अनुदिशादि अहमिन्द्र देव के पूर्वकोटि की आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर पूर्वकोटि काल तक जीवित रहकर सौधर्म-ईशान स्वर्ग को जाकर वहाँ ढाई सागरोपमकाल व्यतीत कर पुन: पूर्वकोटि की आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर संयम को ग्रहण करके अपने-अपने विमान में उत्पन्न होने पर उनका अन्तरकाल कुछ अधिक दो सागरोपमप्रमाण प्राप्त होता है।

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अब सर्वार्थसिद्धि विमानवासी अहमिन्द्रों का अन्तर निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।३३।।

सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देवों का अन्तर नहीं होता, वह गति निरन्तर है।।३४।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सर्वार्थसिद्धि से मनुष्यगति में उतरने वाले जीव का मोक्ष के सिवाय अन्यत्र गमन नहीं होता है।

शंका-‘सर्वार्थसिद्धि विमानवासियों का कोई अन्तरकाल नहीं होता, वह गति निरन्तर है’ ऐसा कहने में पुनरुक्त दोष का प्रसंग आता है, अतएव दो पदों में से किसी एक का ही संग्रह करना चाहिए ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक इन दो नयों का अवलम्बन करने वाले दोनों प्रकार के शिष्यों के अनुग्रह के लिए उक्त प्रकार से प्ररूपण करने वाले सूत्रकार के पुनरुक्ति दोष नहीं आता है, क्योंकि अन्तर नहीं है, यह वचनपर्यायार्थिक नय का अवलम्बन करने वाले शिष्यों का अनुग्रहकारी है, क्योंकि यह वचन विधि से रहित प्रतिषेध में ही व्यापार करता है। ‘निरन्तर है’ यह वचन द्रव्यार्थिक शिष्यों का अनुग्राहक है, क्योंकि वह प्रतिषेध से रहित विधि का प्रतिपादक है।

‘तात्पर्य यह है कि-‘विजयादिषु द्विचरमा:’ अर्थात् विजय, वैजयंत, जयन्त, अपराजित इन चार अनुत्तर विमान के देव द्विचरम-मनुष्य के दो भव लेकर मोक्ष जाते हैं। इस सूत्र के अनुसार विजय आदि विमानों से च्युत होकर सम्यक्त्व से पतित न होकर मनुष्यों में जन्म लेकर संयम की आराधना करके अर्थात् मुनिव्रत का पालन करते हुए समाधिपूर्वक मरण करके पुन: विजय आदि विमानों में जन्म धारण करते हैं और वहाँ से च्युत होकर पुन: मनुष्य भव में आकर सिद्धपद को प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा द्विचरमदेहपना उन अहमिन्द्र देवों के सिद्ध होता है।

यहाँ साररूप में यह जानना है कि यहाँ पुन: सर्वार्थसिद्धि विमान में उत्पन्न होकर वहाँ से च्युत होने वाले देव नियम से मनुष्य भव को प्राप्त करके जैनेश्वरी दिगम्बर दीक्षा ग्रहण करके अपने शुद्धात्मा का ध्यान करते हुए उसी भव में मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं, अत: उनके अन्तर नहीं होता है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में कल्पातीत देवों का अन्तर बतलाने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्रीषट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।