ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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01.प्रथम अध्याय

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सहस्रनाम स्तोत्र ( प्रथम अध्याय )

विषय सूची

[सम्पादन]
—शंभु छंद—

‘श्रीमान्’ आप अंतर अनंत सुख, ज्ञान वीर्य दर्शन श्रीपति।

बहिरंग समवसरणादि महा—वैभव प्रातिहार्यमयी श्रीपति।।
इन अन्तरंग बहिरंग श्री के, स्वामी प्रभु श्रीमान् बनें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१।।

प्रभु आप ‘स्वयंभू’ स्वयं हुये, निज में निज ज्ञान प्रगट करके।
नहिं गुरु की तनिक अपेक्षा थी, निज को गुरु स्वयं बना करके।।
निज द्वारा निज को निज में ध्या, स्वयमेव स्वयंभू आप बनें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२।।

प्रभु ‘वृषभ’ धर्मघन मेघ सतत् दिव्यध्वनि वर्षा करते हैं।
‘वृष’ धर्म अहिंसा लक्षण से ‘भा’ शोभित होते रहते हैं।।
अथवा भक्तों के लिये सदा इच्छित वर्षाकर वृषभ बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।३।।

‘शंभव’ शं-सुख भव-हो तुमसे इससे शंभव कहलाते हो।
अथवा ‘संभव’ सं-समीचीन भव-जन्म धरा मुस्काते हो।।
हे संभव शांतिमूर्ति प्रभु तुम वंदन करते हम शांत बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।४।।

‘शम्भू’ शं-परमानंदरूप सुख देने वाले आप प्रभो।
इंद्रिय विषयों से रहित अतींद्रिय सौख्य सुधारस लीन विभो।।
परमानंदामृत पीने की शक्ती दीजे हे नाथ! हमें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।५।।

आत्मा से हुये ‘आत्मभू’ हैं, आत्मा शुध बुद्ध स्वभावी है।
चिच्चमत्कार लक्षण परमैक, ब्रह्ममय सौख्य स्वभावी है।।
टंकोत्कीर्ण स्फटिकमणी, आत्मा भू-धरा पा़इ तुमने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।६।।

हे नाथ ‘स्वयंप्रभ’ आप स्वयं, प्रकृष्ट शोभते रहते हैं।
निज प्रभा-कांति से त्रिभुवन को भी, आप प्रकाशित करते हैं।।
मेरी निज आत्मप्रभा मुझको, मिल जावे गुणमणि तेज घने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।७।।

हे नाथ! आप ‘प्रभु’ हो सबके, स्वामी होने से इस जग में।
परिपूर्ण समर्थ नाथ तुमही, भक्तों के मनरथ भरने में।।
मैं स्वयं समर्थ बनूँ निज को, पाने से सब पुरुषार्थ बनें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।८।।

‘भोक्ता’ प्रभु आप सदा परमानंद—सुख के अनुभव कर्ता हैं।
निजके अनंत दृग ज्ञान वीर्य, सुखरूप चतुष्टय भर्ता हैं।।
निज आत्मा से उत्पन्न परम, आह्लाद सौख्य हो प्राप्त हमें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।९।।

हे नाथ ‘विश्वभू’ केवलज्ञान, अपेक्षा व्याप्त विश्व में हो।
अथवा भू-मंगल करे विश्व का, या वृद्धी भी करते हो।।
भू गत्यर्थक-ज्ञानार्थक है, त्रैलोक्य ज्ञान है नाथ तुम्हें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१०।।

‘अपुनर्भव’ नाथ पुनर्भव नहिं, प्रभु जन्म मरण से छूट चुके।
अथवा भव-रुद्र विष्णु ब्रह्मा, इन देवरूप नहिं हो सकते।।
अरिहंत सर्वज्ञ आप भगवन्, नहिं पुनर्जन्म धरते जग मे।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।११।।

‘विश्वात्मा’ आप विश्व को निज, सदृश गिनते विश्वात्मा हैं।
या विश्व-सुकेवल ज्ञानमयी, आत्मा-स्वरूप विश्वात्मा हैं।।
त्रिभुवनस्थित प्राणीगण को, निज सदृश गिना सु दयालु बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१२।।

प्रभु आप ‘विश्वलोकेश’ विश्वके-तीनलोक के जीवों के।
प्रभु ईश-नाथ बस एक आप, नहिं अन्य कोई भी बन सकते।।
जो खुद की रक्षा कर न सके, वो जग के ईश कभी न बनें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१३।।

हे नाथ! ‘विश्वतश्चक्षु’ आप, सब विश्व-लोक में व्याप्त हुआ।
चक्षू-केवल दर्शन प्रभु का, इससे प्रभु ने सब देख लिया।।
श्रुतचक्षू से केवलचक्षू, पाया जगदर्शी आप बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१४।।

‘अक्षर’ प्रभु क्षरण न होता है,नहिं चलित आप हो सकते हैं।
या अक्ष-इंद्रियों को मन को, वश में कर अक्षर बनते हैं।।
तुम नाम स्तुति करते करते, मेरा भी अक्षर नाम बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१५।।

प्रभु आप ‘विश्ववित्’ ज्ञानरश्मि से, विश्व माहिं सुप्रविष्ट हुये।
सब विश्व-चराचर जग जाना, अतएव विश्ववित् प्रगट हुये।।
यह आत्मा ज्ञानस्वभावी है, मुझ अल्पज्ञान भी पूर्ण बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१६।।

प्रभु आप ‘विश्वविद्येश’ आपकी, विद्या विश्वा-सकला है।
वह सकल विमल कैवल्य ज्ञानमय, पूर्ण स्वरूप अविकला है।।
तुम गुण गा गाकर भव्य जीव, सब विद्याओं के ईश बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१७।।

प्रभु ‘विश्वयोनि’ संपूर्ण पदार्थों, की उत्पति के कारण हो।
संपूर्ण पदार्थों के उपदेशक, विश्वयोनि जगतारण हो।।
तुम नाम मंत्र जपते जपते, भाक्तिक जन तुम सम नाथ बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१८।।

प्रभु आप ‘अनश्वर’ कभी नाश, नहिं हो सकता युग युग तक भी।
आत्मा के नाशक गुणघातक, कर्मों का नाश किया है भी।।
प्रभु मुझे अनश्वर पद दे दो, इस हेतु वंदना करूँ तुम्हें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।१९।।

प्रभु आप ‘विश्वदृश्वा’ सारे, जग को इक क्षण में देख लिया।
तुम गुणस्तुति करते करते, भव्यों ने तुमको देख लिया।।
मैं भी तुमको अवलोकन कर, निज को देखॅूँ यह युक्ति बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२०।।

‘विभु’ आप विशेष करें मंगल, भवि के तारन में समरथ हैं।
निज समवसरण में प्रभू राजते, लोकालोक विजानत हैं।।
निजकेवलज्ञान किरण से लोका लोक व्याप्त कर विभू बनें।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२१।।

‘धाता’ चहुँगति में पड़े जीव को, निकाल कर मुक्तिपद में।
धर देते अथवा सर्व प्राणियों, का पालन करते जग में।।
प्रभु परम कारुणिक आप सर्व, रक्षा कर धाता स्वयं बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२२।।

‘विश्वेश’ विश्व-त्रैलोक्य ईश-स्वामी त्रिभुवन के रक्षक हो।
उपदेश अहिंसामयी दिया, सबके बंधू प्रतिपालक हो।।
प्रभु धर्म आपका विश्व धर्म, भवसागर तारण सेतु बने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२३।।

प्रभु आप ‘विश्वलोचन’ त्रिभुवन, प्राणी के चक्षु समान कहें।
सबको हित का उपदेश दिया, इस कारण सबके नेत्र कहें।।
अथवा सब जगका इक क्षण में, अवलोकन करते आप घने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२४।।

प्रभु आप ‘विश्वव्यापी’ कण कण में, ज्ञान आपका व्याप रहा।
त्रिभुवन के सर्वपदार्थ आप, जाने ऐसा विज्ञान लहा।।
नहिं आत्म प्रदेशों से व्यापक, तन में ही रहें प्रदेश घने।
मैं प्रभु नामावलि को वंदूं, मेरे सब इच्छित कार्य बनें।।२५।।

[सम्पादन]
—हरिगीतिका छंद—

‘विधु’ आप कर्म विधान करते, कर्म विधि बतलावते ।

निजज्ञान केवल किरण से, मोहान्धकार भगावते।।
निज ज्ञानज्योती प्रगट हेतू, नाथ मैं वंदन करूँ।
तुम नाम मंत्र अमोघ शक्ती, उसी का चिंतन करूँ।।२६।।

प्रभु आप ‘वेधा’ धर्म की, सृष्टी करें सुखहेतु हैं।
जिनधर्म तीर्थ चलावते, इस हेतु भवदधि सेतु हैं।।
निज ज्ञानज्योती प्रगट हेतु नाथ मैं वंदन करूँ।
तुम नाम मंत्र अमोघ शक्ती, उसी का चिंतन करूँ।।२७।।

प्रभु नाम ‘शाश्वत’ धारते, शश्वत विराजें मोक्ष में।
निज भक्त को शाश्वत परमपद, दें रहे हैं लोक में।।निज.।।२८।।

प्रभु ‘विश्वतोमुख’ समवसृति में, चारदिश चउमुख दिखें।
या जल सदृश भवि पाप कीचड़, धोय स्वच्छ सु कर सवें।।निज.।।२९।।

प्रभु ‘विश्वकर्मा’ कर्मभूमी, की व्यवस्था के समय।
असि मषि प्रभृति सब क्रिया उप—देशी सभी को उस समय।।निज.।।३०।।

प्रभु ‘जगज्जेष्ठ’ त्रिलोक में भी, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ महान हैं।
तुमसे बड़ा नहिं और कोई, अत: सर्व प्रधान हैं।।निज.।।३१।।

प्रभु ‘विश्वमूर्ति’ अनंत गुणमय, देहधारी आप हैं।
या सर्व वस्तु ज्ञान दर्पण में, झलकते साफ हैं।।निज.।।३२।।

भगवन्! ‘जिनेश्वर’ भव्य सम्य—ग्दृष्टि मुनिगण आदि के।
ईश्वर कहाते आप इस, हेतू जिनेश्वर सार्व के।।निज.।।३३।।

प्रभु ‘विश्वदृक्’ संसार की, सब वस्तु सत्तामात्र से।
अवलोकते हैं आप नितप्रति, सर्वदर्शी नाम से।।निज.।।३४।।

प्रभु ‘विश्वभूतेशा’ तुम्हीं, सब प्राणिगण के ईश हैं।
या विश्वभू-त्रैलोक्य लक्ष्मी, ईश सब भूतेश हैं।।निज.।।३५।।

प्रभु ‘विश्वज्योती’ विश्व के, लोचन जगत में ख्यात हैं।
प्रभु आप केवलज्ञान ज्योती, सर्व जग में व्याप्त है।।निज.।।३६।।

भगवन्! ‘अनीश्वर’ आपसम, नहिं अन्य ईश्वर लोक में।
प्रभु ईश सबके आप नहिं कोइ, आपका प्रभु लोक में।।निज.।।३७।।

‘जिन’ आप घाती कर्मशत्रू, जीतकर ‘जिन’ हो गये।
मन इंद्रियों को जीतकर, ‘जिन’ नाम सार्थक कर दिये।।निज.।।३८।।

प्रभु ‘जिष्णु’ तुम कर्मारि जीतन, का स्वभाव प्रसिद्ध है।
जयशील शासन आपका, जग में सदैव विशुद्ध है।।
निज ज्ञानज्योती प्रगट हेतु नाथ मैं वंदन करूँ।
तुम नाम मंत्र अमोघ शक्ती, उसी का चिंतन करूँ।।३९।।

प्रभु ‘अमेयात्मा’ आप में, आनन्त्य गुण अतिशय भरे।
नहिं जान सकता अन्य कोई, माप नहिं सकता खरे।।निज.।।४०।।

प्रभु ‘विश्वरीश’ तुम्हीं मही के, ईश जग में ख्यात हैं।
इस हेतु भविजन नित्य ही, तुमको नमाते माथ हैं।।निज.।।४१।।

प्रभु ‘जगत्पति’ त्रैलोक्य के, स्वामी भविक त्राता तुम्हीं।
रक्षा करो सब द्वंद्व से, सुख शांति होवे आज ही।।निज.।।४२।।

हे नाथ! आप ‘अनंतजित्’, मिथ्यात्व आदी जीत के।
प्रभु नाम सार्थक कर दिया, संसार अनंत सुजीत के।।निज.।।४३।।

प्रभु ‘अचिन्त्यात्मा’ तुम स्वरूप, अचिन्त्य जन मन वचन से।
नहिं चिंतवन कर सके कोई, आप आत्मा चित्त से।।निज.।।४४।।

प्रभु ‘भव्यबंधु’ भव्य जन के, बंधु उपकारक तुम्हीं।
जो रत्नत्रय के योग्य हैं, उनके हितंकर हो तुम्हीं।।निज.।।४५।।

भगवन्! ‘अबंधन’ कर्म बंधन, से रहित गुणखान हो।
सब मोहद्वय आवरण विघ्न, विघात कर जग मान्य हो।।निज.।।४६।।

भगवन्! ‘युगादीपुरुष’ चौथे, काल युग की आदि में।
प्रभु तीर्थकर पहले हुये, युग आदि पुरुष भरत में।।निज.।।४७।।

‘ब्रह्मा’ सुकेवल ज्ञान आदिक, गुण सुवृद्धिंगत हुये।
निज शुद्ध आत्मजनित सुखामृत, तृप्त ब्रह्मा तुम्हीं हुये।।निज.।।४८।।

प्रभु ‘पंचब्रह्मामय’ सु पांचों, ज्ञानमय विख्यात हो।
या पंचपरमेष्ठी स्वरूप, अनंत गुण से सार्थ हो।।निज.।।४९।।

‘शिव’ मोक्ष हो आनंदमय, हो सर्व दोष विहीन हो।
निर्वाण अक्षय शांत परम, कल्याण पद में लीन हो।।
निज ज्ञानज्योति प्रगट हेतू, नाथ मैं अर्चा करूँ।
तुम नाम मंत्र अमोघ शक्ति, उसी की चर्चा करूँ।।५०।।

[सम्पादन]
—रोला छंद—

प्रभु ‘पर’ नाम सुआप, सब जीवों को पालें।

ज्ञान आदि गुण सर्व, पूरण करने वाले।।
नाम मंत्र तुम पूज्य, मैं वंदूं भक्ती से।
भविमन पंकज सूर्य, शिव पाऊँ युक्ती से।।५१।।

‘परतर’ नाम धरंत, सबसे श्रेष्ठ तुम्हीं हो।
हित उपदेश करंत, प्रभु सर्वेश तुम्हीं हो।।नाम.।।५२।।

‘सूक्ष्म’ आप मन इंद्रिय, इनके विषय नहीं हो।
केवलज्ञान अतींद्रिय, उनके विषय सही हो।।नाम.।।५३।।

‘परमेष्ठी’ प्रभु परम, उत्तम पद में तिष्ठो।
अर्हत सिद्धाचार्य, आदि पाँचपद तिष्ठो।।नाम.।।५४।।

नाम ‘सनातन’ आप, सदा एक से रहते।
सदा सदा विद्मान, रूप पुरातन धरते।।नाम.।।५५।।

‘स्वयंज्योति’ प्रभु आप, स्वयं आत्मा ज्योती।
चक्षु जगत्प्रकाश, स्वयं सूर्यमय ज्योती।।नाम.।।५६।।

नाथ! आप ‘अज’ नाम, जग में नहिं उत्पत्ती।
सदा जपूँ तुम नाम, मिले निजातम शक्ती।।नाम.।।५७।।

नाथ ‘अजन्मा’ आप, जन्म कभी नहिं धारो।
गर्भवास नहिं आप, मेरा जन्म निवारो।।नाम.।।५८।।

‘ब्रह्ययोनि’ प्रभु आप, द्वादशांगमय वेदा।
इनकी उतपति आप, से होती विन खेदा।।नाम.।।५९।।

नाथ ‘अयोनिज’ आप, योनी लाख चुरासी।
इनमें नहिं उत्पाद, हरो सकल दुख राशी।।नाम.।।६०।।

‘मोहारीविजयीश’, मोहशत्रु को जीता।
या अरि मोह के आप, विजयशील शिवनीता१।।नाम.।।६१।।

मृत्यु मल्ल को जीत, ‘जेता’ आप कहाये।
सर्व जगत के मीत२, कर्म शत्रु जय पाये।।नाम.।।६२।।

धर्मचक्र के ईश, श्री विहार कर जग में।
भव्यों को संबोध, ‘धर्मचक्रि’ त्रिभुवन में।।
नाम मंत्र तुम पूज्य, मैं वंदूं भक्ती से।
भविमन पंकज सूर्य, शिव पाऊँ युक्ती से।।६३।।

प्रभु ‘दयाध्वज’ आप, दया ध्वजा फहरायी।
अथवा दया सुमार्ग, प्रगटाया सुखदायी।।नाम.।।६४।।

‘प्रशान्तारि’ प्रभु आप, कर्म शत्रु बलवंता।
उनको किया प्रशांत, पूर्ण शांत भगवंता।।नाम.।।६५।।

नाथ ‘अनंतात्मा’, अनंत केवलज्ञानी।
या अनंत अविनाश, अंतरहित शिवगामी।।नाम.।।६६।।

‘योगी’ चित्त निरोध, करके निज को ध्याया।
मन वच तन कर शुद्ध, परम समाधि लगाया।।नाम.।।६७।।

‘योगी’ मुनि के ईश, गणधर से भी अर्चित।
‘योगिश्वरार्चित’ गीत, तीन भुवन में चर्चित।।नाम.।।६८।।

नाथ ‘ब्रह्मवित्’ आप, ब्रह्म-आत्म को जाना।
उसका अनुभव-स्वाद, कर लीना शिव थाना।।नाम.।।६९।।

नाथ ‘ब्रह्मतत्त्वज्ञ’, आत्मतत्त्व के ज्ञानी।
ज्ञान दया का मर्म, जान हुये निज ज्ञानी।।नाम.।।७०।।

‘ब्रह्मोद्याविद्’ आप, ब्रह्म विद्या के वेत्ता।
आत्म विद्या के नाथ, त्रिभुवन के गुरु नेता।।नाम.।।७१।।

नाथ ‘यतीश्वर’ आप, यतियों के ईश्वर हो।
रत्नत्रय में यत्न, करें यती उन गुरु हो।।नाम.।।७२।।

‘शुद्ध’ आप रागादि, भाव कर्ममल रहिता।
फटिकमणी सम नाथ, करो मुझे मल रहिता।।नाम.।।७३।।

‘बुद्ध’ आप संपूर्ण, वस्तु जानते ज्ञानी।
केवलज्ञान सुबुद्धि, पायी अंतर्यामी।।नाम.।।७४।।

‘प्रबुद्धात्मा’ आप, सदा आपकी आत्मा।
शुद्ध ज्ञान से जग—मगती सर्व गुणात्मा।।नाम.।।७५।।

[सम्पादन]
—चौपाई—

नाम ‘सिद्धार्थ’ धरें जगसिद्धा।

सर्व प्रयोजन हुये सुसिद्धा।।
मैं प्रभु नाममंत्र को जपहूँ।
परमानंदमय निजसुख भजहूँ।।७६।।

प्रभो ‘सिद्धशासन’ तुम जग में।
शासन सर्व हितंकर सच में।।मै.।।७७।।

आप ‘सिद्ध’ निजगुणमणि नंते।
प्राप्त किया, शिवगामी संते।।मै.।।७८।।

प्रभु ‘सिद्धांतविद्’ सर्वप्रकाशी।
द्वादशांग जानो, निज भासी।।मै.।।७९।।

‘ध्येय’ आप, मुनिगण आराध्या।
योगिध्यान के ध्येय सुसाध्या।।मै.।।८०।।

‘सिद्धसाध्य’ प्रभु के सब कार्या।
सिद्ध हो चुके हैं, निरबाध्या।।मै.।।८१।।

नाथ! ‘जगद्धित’ जग हितकर्ता।
सबके लिये ‘पथ्य’ सुखभर्ता।।मै.।।८२।।

प्रभु ‘सहिष्णु’ गुण क्षमा धरे हो।
सहनशील हो सौख्य भरे हो।।मै.।।८३।।

‘अच्युत’ निज स्वभाव से च्युत ना।
ज्ञानादिकगुण युत परमात्मा।।मै.।।८४।।

प्रभु ‘अनंत’ अंतक से रहिता।
गुण अनंत सुख आदिक सहिता।।मै.।।८५।।

‘प्रभविष्णू’ बहु प्रभावशाली।
शक्ती अनंती समरथशाली।।मै.।।८६।।

नाथ ‘भवोद्भव’ भव सब श्रेष्ठा।
पंचविद्या संसार विनष्टा।।
मैं प्रभु नाममंत्र को जपहूँ।
परमानंदमय निजसुख भजहूँ।।८७।।

नाथ ‘प्रभूष्णु’ सब शक्तीशाली।
इंद्रादिक के प्रभु गुणमाली।।मै.।।८८।।

‘अजर’ वृद्ध नहिं होते कबहूँ।
सर्व दु:ख नाशो मुझ अबहूँ।।मै.।।८९।।

नाथ ‘अजर्य१’ नाम के धारी।
तुम गुण जीर्ण न हों अविकारी।।मै.।।९०।।

‘भ्राजिष्णु’ ज्ञानादि गुणों से।
अतिशय दीप्तमान् निज सुख से।।मै.।।९१।।

‘धीश्वर’ केवलज्ञानमयी जों
बुद्धी उसके ईश्वर प्रभु हो।।मै.।।९२।।

‘अव्यय’ व्यय नहिं नाथ तुम्हारा।
शिवपद प्राप्त किया सुखकारा।।मै.।।९३।।

कर्मेंधन को अग्निसमाना।
‘विभावसु’ तमहर रवि माना।।मै.।।९४।।

पुनि उत्पन्न जगत में नहिं हों।
‘असंभूष्णू’ मुझ जन्म विलय हो।।मै.।।९५।।

‘स्वयंभूष्णु’ स्वयमेव हुये हो।
सिद्ध अवस्था प्राप्त किये हो।।मै.।।९६।।

नाथ ‘पुरातन’ बहु प्राचीना।
द्रव्यदृष्टि से आदि विहीना।।मै.।।९७।।

‘परमात्मा’ अतिशय उत्कृष्टा।
परम ज्ञानसुख गुणमणि निष्ठा।।मै.।।९८।।

परमोत्कृष्ट ज्योतिमय ज्ञानी।
‘परंज्योति’ गुणमणि रजधानी।।मै.।।९९।।

तीन जगत् के परमेश्वर हो।
‘त्रिजगत्परमेश्वर’ प्रभु तुम हो।।मै.।।१००।।

‘श्रीमान’ नाम से लेकर के, ‘त्रिजगत्परमेश्वर’ तक नामा।
सौ नाम आपके सार्थक हैं, इंद्रों से स्तुत गुणधामा।।
इन नाममंत्र को जप जप के, बस ‘सिद्ध’ नाम इक पा जाऊँ।
प्रभु तुम सम शुद्ध अवस्था हो, नहिं बार बार जग में आऊँ।।१।।

इति श्रीमदादिशतम्।