ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

01.प्राण

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प्राण

सुदर्शन - गुरु जी! आज पड़ोस में एक आदमी के मरने से लोगों ने कहा-इसके प्राण निकल गये। सो प्राण क्या है?

अध्यापक - हाँ सुनो! जिसके सद्भाव से जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार है, उनको प्राण कहते हैं। प्राण के दस भेद हैं-स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियाँ, मनोबल, वचनबल, कायबल, (ये तीन बल) आयु और श्वासोच्छ्वास ये दस प्राण हैं। एकेन्द्रिय जीव के स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, आयु और श्वासोच्छ्वास ये चार प्राण होते हैं। दो इन्द्रिय जीव के रसना इन्द्रिय और वचनबल के बढ़ जाने से छह होते हैं। तीन इन्द्रिय जीव के एक घ्राण इन्द्रिय बढ़ जाने से सात, चार इन्द्रिय जीव में चक्षु इन्द्रिय बढ़ जाने से आठ, असैनी पंचेन्द्रिय में कर्णेन्द्रिय बढ़ जाने से नव तथा सैनी पंचेन्द्रिय जीव में मनोबल के बढ़ जाने से दस प्राण होते हैं।

सुदर्शन - किस गति में कितने प्राण होते हैं?

अध्यापक - तिर्यंचगति में एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक सभी जीव होते हैं, अत: चार प्राण से लेकर दसों प्राण तक होते हैं। देव, नारकी और मनुष्यों में दसों प्राण होते हैं।

सुदर्शन - तब तो गुरु जी! एकेन्द्रिय जीव की हिंसा में कम पाप लगता होगा, दो इन्द्रिय जीव की हिंसा में उससे अधिक, ऐसे-ऐसे पाप बहुत लगता होगा।

अध्यापक - हाँ! यह बात तो ठीक है, फिर भी किसी भी जीव को संकल्पपूर्वक (अभिप्रायपूर्वक) मारने से संकल्पी हिंसा का पाप बहुत ही भयंकर होता है।