ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

01.मंगलाचरण

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

[सम्पादन]
'मंगलाचरणम्

Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
ॐ नमो मंगलं कुर्यात् , ह्रीं नमश्चापि मंगलम् ।

मोक्षबीजं महामंत्रं, अर्हं नमः सुमंगलम्।।१।।
अथ वीराब्दे त्रयोविंशत्यधिकपंचविंशतितमे वैशाखशुक्लाप्रतिपत्तिथेरारभ्य पंचमीपर्यन्तसंजाता या पंचकल्याणकप्रतिष्ठा१ श्रीऋषभदेवस्य प्रतिमानां, सा सर्वलोके कल्याणं वितनोतु। यस्यां प्रतिष्ठायां अक्षयतृतीयाख्यया प्रसिद्धायां वैशाखशुक्लातृतीयायां तपःकल्याणकेन प्रतिष्ठितायै पिच्छिका-कमंडलुसहितायै मूर्तये राजभ्यां सोमप्रभश्रेयांसाभ्यां आहारदानविधिर्विधिना संजाता। प्राणप्रतिष्ठां कारयित्वा पद्मावतीदेवी च ‘ऋषभविहार’ कालोनीमध्ये श्रीऋषभदेवस्य मंदिरस्थिते देवीवेद्यां स्थापिता। सप्तर्षिप्रतिमाश्च प्रतिष्ठिता बभूवुः। इमास्तीर्थकरप्रतिमाः सप्तर्षिप्रतिमाश्च शासनदेवता पद्मावती चापि सर्वत्र दिल्लीराजधान्यां देशे ग्रामे पुरे च सर्वभाक्तिकानां कल्याणं कुर्वन्तु सुभिक्षं क्षेममारोग्यं च वितरन्तु।
अथ अन्तरस्थलान्तर्गतैश्चतुर्दशभिरधिकारैः षोडशाधिकद्विशतसूत्रैरेकजीवापेक्षया कालानुगमनामा द्वितीयोमहाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमेऽधिकारे गतिमार्गणायां अष्टत्रिंशत्सूत्राणि। तदनु द्वितीयेऽधिकारे-इंद्रियनाम्नि त्रयस्त्रिंशत्सूत्रााणि। ततस्तृतीयेऽधिकारे कायमार्गणायां चतुर्विंशतिसूत्राणि। पुनः चतुर्थेधिकारे योगमार्गणानाम्नि अष्टादशसूत्राणि। पुनरपि पंचम्यां वेदमार्गणायां चतुर्दशसूत्राणि। तत्पश्चात् कषायेऽधिकारे चत्वारि सूत्राणि। तदनु ज्ञानमार्गणायां पंचदश सूत्राणि। ततः परं संयमेऽधिकारे द्वाविंशतिसूत्राणि। तदनंतरं दर्शनमार्गणायां अष्टौ सूत्राणि। ततश्च लेश्यायां मार्गणायां षट्सूत्राणि। तदनंंतरं भव्यमार्गणायां पंचसूत्राणि। तत्पश्चात् सम्यक्त्वमार्गणाधिकारे षोडशसूत्राणि। ततः संज्ञिमार्गणायां षट् सूत्राणि। तत्पश्चात् आहारमार्गणायां सप्तसूत्राणीति समुदायपातनिका भवति।

[सम्पादन]
मंगलाचरण

श्लोकार्थ-ॐ नम: बीजाक्षर हम सबके लिए मंगलकारी होवे और ह्रीं नम: बीजाक्षर मंत्र भी मंगलमयी होवे तथा मोक्षधाम का बीजभूत अर्हं नम: मंत्र भी मंगल प्रदान करे।।१।।

वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ तेईस (२५२३) में वैशाख शुक्ला प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ करके वैशाख शुक्ला पंचमी तक भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा की जो पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हो चुकी है, वह समस्त लोक मेें-विश्व भर में कल्याणकारी होवे। जिसकी प्रतिष्ठा में अक्षयतृतीया नाम से प्रसिद्ध वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन तपकल्याणक से प्रतिष्ठित पिच्छि-कमण्डलु सहित ऋषभदेव की प्रतिमा को, हस्तिनापुर के राजा की प्रतिकृति के रूप में सोमप्रभ और श्रेयांसराजा के द्वारा इक्षुरस का आहार दिये जाने की विधि सम्पन्न हुई। उस पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के मध्य ही दिल्ली की ‘‘ऋषभ विहार’’ कालोनी में शासन देवी पद्मावती माता की भी प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई, उन्हें वहाँ के ऋषभदेव मंदिर में निर्मित देवी की वेदी में विराजमान किया गया तथा उसी समय चारण ऋद्धिधारी सप्तऋषियों की प्रतिमा भी प्रतिष्ठित हुर्इं। ये सभी तीर्थंकर प्रतिमा, सप्तऋषि प्रतिमा तथा शासनदेवी पद्मावती माता सर्वत्र राजधानी दिल्ली में एवं सम्पूर्ण देश, ग्राम, नगर आदि के भक्तजनों का कल्याण करेें एवं सुभिक्ष, क्षेम और आरोग्यता प्रदान करें, यही मंगलभावना है।

[सम्पादन]
विशेषार्थ-

मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र से १४ नवम्बर १९९६ को मंगल विहार करके महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा प्रान्त में धर्मप्रभावना करती हुई पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का चैत्र कृ. षष्ठी, ३० मार्च १९९७ को राजधानी दिल्ली में संघ सहित मंगल प्रवेश हुआ। उस दिन दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री साहबसिंह वर्मा ने पूज्य माताजी की प्रेरणानुसार भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती महोत्सव वर्ष का दीप प्रज्ज्वलन करके उद्घाटन किया। पुन: दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर के माध्यम से पूरे वर्ष तक सम्पूर्ण देश में भगवान ऋषभदेव के प्रचार-प्रसार हेतु विभिन्न आयोजन करने की घोषणा की गई। इसी वर्ष के अन्तर्गत दिल्ली की ऋषभ विहार कालोनी में अक्षयतृतीया पर्व बड़े धूमधाम से मनाया गया था। उस समय ऋषभविहार कालोनी में लघुपंचकल्याणक प्रतिष्ठा के साथ-साथ विभिन्न आयोजन सम्पन्न हुए थे। इसी कार्यक्रम के संदर्भ में इस टीका के अंदर टीकाकत्र्री ने उल्लेख किया है।

अब अन्तरस्थलों से सहित चौदह अधिकारों में दो सौ सोलह सूत्रों के द्वारा एक जीव की अपेक्षा कालानुगम नाम का द्वितीय महाधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम अधिकार में गतिमार्गणा में अड़तीस सूत्र हैं। पुन: द्वितीय अधिकार में इंद्रियमार्गणा में तेंतीस सूत्र हैं। आगे कायमार्गणा नामक तृतीय अधिकार में चौबीस सूत्र हैं। पुन: योगमार्गणा नाम के चतुर्थ अधिकार में अठारह सूत्र हैं। उसके पश्चात् वेदमार्गणा नाम के पंचम अधिकार में चौदह सूत्र हैं। तत्पश्चात् कषायमार्गणा नामके छठे अधिकार में चार सूत्र हैं। पुन: ज्ञानमार्गणा नामक सातवें अधिकार में पन्द्रह सूत्र हैं। आगे संयममार्गणा नामक आठवें अधिकार में बाईस सूत्र हैं। तदनंतर दर्शनमार्गणा नामक नवमें अधिकार में आठ सूत्र हैं। उसके बाद लेश्यामार्गणा नामक दशवें अधिकार में छह सूत्र हैं। पश्चात् भव्यमार्गणा नामक ग्यारहवें अधिकार में पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् सम्यक्त्वमार्गणा नामक बारहवें अधिकार में सोलह सूत्र हैं। पुन: संज्ञीमार्गणा वाले तेरहवें अधिकार में छह सूत्र हैं। तत्पश्चात् आहारमार्गणा नामक चौदहवें अधिकार में सात सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।